Sanyasi in Hindi Moral Stories by Saroj Verma books and stories PDF | सन्यासी -- भाग - 7

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सन्यासी -- भाग - 7

इसके बाद गोपाली आँगन में गीले कपड़े सुखाने पहुँची,जहाँ पर उसकी जेठानी सुरबाला पहले से ही मौजूद थी,जो धूप में मसाले सूखने के लिए डाल रही थी,वो लाल साबुत मिर्चों पर हाथ फेरते हुए गोपाली से बोली...
"गोपाली! सच सच बताना,क्या हुआ था कल रात को"?
"जीजी! तुम्हें सब पता ही तो है,फिर क्यों पूछती हो",गोपाली ने सुरबाला से कहा....
"बता ना! मैं किसी से कुछ ना कहूँगीं",सुरबाला बोली...
तब गोपाली बोली....
"कल रात मुन्नीबाई कहीं और किसी नवाब के यहाँ मुजरा करने चली गई थी,इसलिए तुम्हारे देवर उससे मिल नहीं पाएँ,मैं रात मुन्ने को सुलाने की कोशिश कर रही और वो मेरे करीब आना चाहते थे,मैंने मना किया तो रोते हुए बच्चे को दूसरी ओर लिटाकर मेरे साथ जबरदस्ती करने लगे,इस बात पर मुझे बहुत गुस्सा आ गया तो मैंने उन्हें जोर का धक्का दे दिया और वे बिस्तर से गिर पड़े,फिर क्या था मेरे ऐसा करने पर वे बौखला उठे और फिर उन्होंने मेरे साथ मारपीट शुरु कर दी"
"ओह...तो ये बात है,लेकिन तूने बिल्कुल सही किया,मुझे अच्छा लगा",सुरबाला बोली....
"मजबूरी में करना पड़ा जीजी! वरना कौन पत्नी नहीं चाहती कि उसका पति उसके करीब आएँ",गोपाली बोली....
"मजबूरी....कैंसी मजबूरी?",सुरबाला ने पूछा...
"जीजी! बिना प्रेम का शुष्क मिलन मेरी बरदाश्त के बाहर है,ऐसे मिलन में ना तो देह तृप्त होती और ना ही मन,बिना प्रेम का मिलन भला कोई मिलन होता है,इसलिए मुझे उनका अपने करीब आना अच्छा नहीं लगा और उनके मुँह से आती शराब की बूँ से मुझे उबकाई आने लगती है,वे मुझसे प्रेम नहीं करते तो क्यों मैं उन्हें अपनी देह सौंपूँ,थोड़ा बहुत आत्मसम्मान तो अब भी बाक़ी है मुझ में,मैं अपने अरमानों का खून करके उन्हें तृप्त नहीं कर सकती", गोपाली बोली...
"बात तो तेरी बिलकुल सही है गोपाली!,लेकिन संसार में ना जाने कितनी स्त्रियों को प्रेम से वंचित होकर ऐसा ही शुष्क मिलन करना पड़ता है,कभी परिवार की खातिर तो कभी अपनी गृहस्थी बचाने के खातिर, ऐसी स्त्रियों को अपने माँ बाप को भी तो ये दिखाना होता है कि वो अपने ससुराल में कितनी खुश है,बेटी अपनी गृहस्थी में खुश नहीं है और अगर ये बात माँ बाप को पता चल जाती है तो उन पर कह़र टूट पड़ता है" सुरबाला बोली....
"जीजी! तुम क्यों इतनी दुखी होती हो,जेठ जी तो बहुत अच्छे हैं,वो तो तुम्हें पलकों की छाँव में रखते हैं", गोपाली ने सुरबाला से कहा....
"हाँ! देखने वालों को तो यही लगता है,लेकिन जिसके साथ जो रहता है तो वही जानता है उसके रंगढंग", सुरबाला बोली....
"जीजी! तुम कहना क्या चाहती हो कि जेठ जी तुम्हारे साथ अच्छा सुलूक नहीं करते",गोपाली बोली...
"जाने दे ना! तू भी क्या फिजूल की बातें लेकर बैठ गई",सुरबाला ने गोपाली से कहा....
"नहीं बताना चाहती तो मत बताओ,मैं तुमसे जबरदस्ती भी नहीं करूँगी",गोपाली बोली...
"पहले तेरी समस्या तो सुलझ जाएँ,बाद में मेरी समस्या भी सुलझ ही जाऐगी",सुरबाला बोली...
"मेरी समस्या तो वो मुन्नीबाई है,अगर वो कहीं मर खप जाएँ तो सब ठीक हो जाऐगा",गोपाली बोली....
"इस भूल में मत रहना गोपाली! जैसा देवर जी का आचरण हैं ना तो अगर वो मुन्नीबाई मर गई ना तो वे किसी और तवायफ़ को अपने लपेटे में लेगें",सुरबाला बोली...
"सही कहती हो जीजी! काश मुझे पहले पता होता कि जिससे मेरी शादी होने वाली है वो ऐसा है तो मैं कतई ये शादी ना करती,तुम जब मुझे देखने आई थी तो तुमने भी तो मुझे कुछ नहीं बताया अपने देवर के बारें में,वरना ये शादी टल जाती", गोपाली सुरबाला से रुठते हुए बोली...
"अब तुझे क्या बताऊँ गोपाली! मुझे सख्त हिदायतें दीं गईं थीं कि अगर मैंने किसी से कुछ कहा तो मेरी शादी भी खतरे में पड़ सकती है,इसलिए मैंने अपना मुँह बंद रखा और छोटे देवर जी को उन्होंने किसी रिश्तेदार के यहाँ भेज दिया था,वरना वे जरूर कुछ करते",सुरबाला बोली....
"हाँ! जीजी! इसमें तुम्हारी भी कोई गलती नहीं है,ये सब मेरे नसीब का खेल है,इस चौखट पर आना लिखा था, सो मैं आ गई",गोपाली उदास होकर बोली....
"जी क्यों उदास करती है गोपाली! देखना एक दिन सब ठीक हो जाऐगा",सुरबाला बोली...
"बस इसी उम्मीद में तो जी रही हूँ",गोपाली आह भरते हुए बोली....
"इतना उदास क्यों होती है पगली!,जरा अपने मुन्ने के बारें में भी तो सोच",सुरबाला बोली....
"उसी के बारें में सोचकर तो रह जाती हूँ,वरना यहाँ जीने का मन किसका करता है",गोपाली बोली....
"जिन्दगी में सब कुछ हमारे अनुसार कभी नहीं चलता,समझौते का नाम ही तो जिन्दगी है"सुरबाला बोली.....
"यही तो....कभी कभी सोचती हूँ कि लोग जब हमारे बड़े बंगले के सामने से गुजरते होगें तो ये कहते होगें कि कितना खुशहाल और सम्पन्न परिवार होगा ये,लेकिन लोग ये नहीं जानते होगें कि यहाँ क्या चल रहा है,वही वाली बात हो गई ये तो कि ऊँची दुकान और फीका पकवान",गोपाली बोली...
"शायद सच कहती है तू",सुरबाला बोली...
और ऐसे ही देवरानी जेठानी आपस में बातें कर रहीं थीं, तभी उन दोनों की छोटी ननद सुहासिनी छत पर आकर उन दोनों से बोली...
"आप दोनों यहाँ दरबार कर रहीं हैं और उधर माँ के हाथ में चोट लग गई",
"कैंसे लगी चोट",सुरबाला ने पूछा....
"दरवाजे में दाएँ हाथ की तीन उँगलियाँ दब गई हैं,खून बह रहा था,मैंने हाथ धुलाकर हल्दी लगा दी है और डाक्टर साहब को टेलीफोन भी कर दिया है,वे आते ही होगें"
"अच्छा...चलो....चलो...जल्दी से नीचे चलो",गोपाली बोली....
और फिर सभी छत से उतरकर नीचे आईं और नलिनी के पास पहुँचीं,अभी भी नलिनी की उँगलियों से खून बह रहा था,तब गोपाली ने उससे पूछा....
"माँ! जी! कैंसे लगी चोट",
"कुछ सोच रही थी,दरवाजे पर ध्यान नहीं गया और दब गईं उँगलियाँ",नलिनी बोली....
"एक तो घर में हो रही रोज रोज की कलह किसी ना किसी की जान लेकर ही रहेगी",सुरबाला गुस्से से बोली....
"ऐसा मत बोल बड़ी बहू! शुभ शुभ बोल",नलिनी ने सुरबाला से कहा...
"क्या करूँ माँ जी! रोज़ रोज़ की किट किट से जी ऊब गया है,तभी मुँह से ऐसे बोल निकल गए",सुरबाला अपनी सफाई पेश करते हुए बोली...
"पता नहीं डाक्टर साहब कितनी देर में आऐगें,मैं तब तक माँजी का हाथ बर्फ के पानी में डुबो देती हूँ,सुबह ही रामू बर्फ की सिल्ली रखकर गया था",और ऐसा कहकर गोपाली नलिनी के लिए बर्फ का पानी लेने चली गई,
इसके बाद सब थोड़ी देर तक नलिनी का घरेलू इलाज करते रहे ,फिर थोड़ी देर के बाद डाक्टर साहब की मोटर बंगले के मेन गेट पर आकर रूकी और डाक्टर साहब जल्दी से उतरकर दरवाजे के पास आएं और जैसे ही वे दरवाजे में लगी घण्टी बजाने ही वाले थे कि तभी सुहासिनी ने फौरन ही उनके लिए दरवाजा खोल दिया और उनके गले में लटके हुए आले और हाथ में डाक्टर वाली पेटी देखकर उनसे बोली....
"आपका ही इन्तजार हो रहा था डाक्टर साहब!,लेकिन आप तो डाक्टर सिद्धनारायण पाण्डेय नहीं हैं,मैं तो उन्हें अच्छी तरह से पहचानती हूँ,वे हमारे फैमिली डाक्टर हैं"
"जी! मैं उनका बेटा अरुण पाण्डेय हूँ,दो हफ्ते पहले ही विलायत से डाक्टरी करके लौटा हूँ,अब आप बातों में वक्त जाया ना करें,मुझे फौरन मरीज के पास ले चलें",डाक्टर अरुण बोले...
"जी! माँफ कीजिए,चलिए मैं आपको उनके पास लिए चलती हूँ"
फिर सुहासिनी डाक्टर अरुण को नलिनी के पास ले गई और उन्होंने नलिनी का इलाज शुरू कर दिया....
उनके हाथ में पट्टी बाँधने के बाद डाक्टर अरुण बोले...
"इन्हें अब आराम करने दीजिए,मैंने जो दवा दीं हैं, उन्हें दूध के साथ दो बार दे दे दीजिएगा,कल शाम मैं इनके हाथ की पट्टी बदलने आऊँगा",
"जी! बहुत अच्छा!",सुहासिनी बोली...
इतना कहकर डाक्टर साहब जाने लगे तो सुरबाला सुहासिनी से बोली....
"सुहासिनी बिन्नो! तनिक चाय पानी तो पूछ लो डाक्टर साहब से,वे ऐसे ही चले जा रहे हैं",
"जी! उसकी कोई जुरुरत नहीं है,क्लीनिक में बहुत भीड़ थी,मरीज मेरा वहाँ इन्तजार कर रहे होगें,चाय वगैरह फिर कभी"
और ऐसा कहकर डाक्टर अरुण चले गए और सुहासिनी उन्हें जाते हुए देखती रही....

क्रमशः....
सरोज वर्मा....