Kashish - 3 in Hindi Love Stories by puja books and stories PDF | कशीश...... पहले प्यार की.... 3

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कशीश...... पहले प्यार की.... 3

"थोड़ा कमज़ोर लग रहा था लेकिन आवाज़ में वो ही खनक थी। लेकिन, एक बात कितनी अजीब है कि हम दोनों ही कॉलेज के ज़माने में ही एक दूसरे को पसंद करते थे लेकिन, न कभी उसने अपने प्यार का इज़हार किया न ही कभी मैंने"

"अच्छा ही हुआ न। अगर पता चल जाता तो तुम मेरी पत्नी कैसे बनतीं?"

कहने को तो दीपकान्त ने शरारत से नेहा की आंखों में झांक कर कह दिया लेकिन थे तो वो पुरुष ही और पति भी थे। मन का एक कोना फ़िलहाल यही सोच सोच कर संदिग्ध था कि, राशि ने खुद को एक कवच में कैद करके रखा है। जिस तरह वो एक अच्छे बेटे, भाई और सरकारी अफ़सर का दायित्व निभा रहे हैं उसी तरह, नेहा भी एक अच्छी पत्नी होने का दायित्व निभा रही है।

एक रात, सुंदर बेड रूम की धीमी रोशनी में, अपनी सशक्त बाहों में नेहा को लेकर, दीपकान्त बड़े इत्मीनान से बोले,

"शादी से पहले तुम संजय को पसंद करतीं थीं ये तो तुम मुझे पहले ही बता चुकी थीं लेकिन, इन चार दिनों में, संजय से मिलने के बाद जो तुम्हारे व्यवहार में बदलाव आया है वो देख कर सोच रहा हूं कि कहीं मेरी बारह वर्ष की तपस्या तो भंग नहीं हो जाएगी? कहां संजय, लिस्टेड कंपनी का सीईओ और कहां मैं, एक साधारण सा गेज़ेडेट अफ़सर !"

"दीप, मैं बहुत ही बेबाक़ क़िस्म की इंसान हूं। कुछ
छिपाना चाहती तो तुमसे, संजय का ज़िक्र कभी भी नहीं
करती। दूसरा इसलिए भी कि जितने तुम सुलझे हुए
इंसान हो उतना शायद ही कोई होगा। इसीलिए मैंने तुम्हें
सब कुछ बताकर अपने मन का बोझ हल्का कर लिया।
फिर भी झूठ नहीं बोलूंगी, कभी कभी मैं खुद से ये
सवाल आज भी पूछ लेती हूं कि, ऐसी कौन सी कमी थी
मुझ में, जो, संजय ने मुझे स्वीकार नहीं किय?, ये सोच
ही शायद वो ख़लिश थी जिसके कारण मैं अपने अतीत
को याद करना ही नहीं चाहती थी, पर अब, संजय से
मिलने के बाद वो फांस भी हमेशा हमेशा के लिए मेरे
दिल से निकल गई है"

समय धीरे धीरे बीत रहा था। दिनचर्या गृहस्थी संभालने, बच्चों को स्कूल भेजने, खुद ऑफिस जाने और देर रात तक प्रेजेंटेशन तैयार करने में कब सुबह होती और शाम ढल जाती पता ही नहीं चलता था। एक दिन अचानक नेहा अपनी मारुति कार से उतर ही रही थी कि, संजय नीली मर्सिडीज़ से उतरता हुआ दिखाई दिया। दोनों "कहकशा" रेस्टोरेंट के लॉन में कोने की टेबल पर बैठ कर बिल्कुल नार्मल तरीक़े से बातें कर रहे थे। टेबल वेजीटेबल्स कटलेट्स, पनीर टिक्कों और स्वीट लाइम सोडा से सजी हुई थी।

"संजय, मैंने दीपकान्त को बताया कि, बॉम्बे एयरपोर्ट पर तुम से मुलाक़ात हुई थी तो बोले,

"भई नेहा , पुराने दिन याद करके हमें भूल मत जाना, नहीं तो इस अधेड़ उम्र में दो दो बच्चों को कैसे संभाल पाऊंगा। संजय, जानते हो दीप ने हावर्ड से एम बी ए किया है। कहते हैं मेरी दो दो गर्ल फ्रेंड थीं। एक डेढ़ साल, दूसरी दो साल पर दोनों ही साथ छोड़ गईं। साथ तो हिंदुस्तानी बेगम ही दे रही है न। संजय कपूर कैसे उड़ा कर ले जा सकता था तुम्हें?। जन्म जन्म का साथ तो हम दोनों का ही है न"

संजय ने महसूस किया, नेहा के हावभाव में कहीं भी विरह, अलगाव या वर्तमान से असंतुष्टि का भाव नहीं था। बड़े सहज ढंग से बोला,

" नेहा पहले प्यार में बड़ी अजब सी कशिश होती है। न भूली जाने वाली कुछ मीठी यादों के घेरे में बंध कर रह जाती हैं ज़िंदगी का वो पहला पाक एहसास। तुमने और मैंने, अपने वैवाहिक जीवन के साथ समझौता करके बड़ी ही समझदारी से काम लिया और अपने जीवनसाथी को खुद ही अपने "कृश" के बारे में सब कुछ बता दिया। अब तो हम दोनों के पास एक एक बहुत अच्छा जीवन साथी भी है और प्यारे प्यारे बच्चे भी हैं"

नेहा की आंखों में नमी तैर आई थी। संजय उसकी पीठ थपथपा कर बोला,

" मैंने तुम्हें और तुमने मुझे चाहा था। ये अध्याय हम दोनों यहीं पर समाप्त करते हैं। कभी घर आओ, सीमा मेरी पत्नी तुम्हें खुद फ़ोन करेगी, मैं दीपकान्त के लिए हमेशा यही दुआ करूंगा कि, तुम और मैं कभी भी बेईमानी करके अपने परिवार को खंडित नहीं होने देंगे और अपने जीवन साथी और बच्चों के प्रति निष्ठावान रहेंगे। प्यार शक्ति होता है और प्यार पूजा भी होता है। आज का यहां मिलना तुम, दीपकान्त को बताना और मैं सीमा को बताऊंगा। अब जब भी मिलेंगे, सब इकट्ठे ही मिलेंगे। मन को साफ़ रखेंगे, बिल्कुल दर्पण की तरह। दर्पण कभी झूठ नहीं बोलता।"

और दोनों गाड़ियां लगभग एक साथ स्टार्ट हुई थीं। दो प्रेमी नहीं, दो मित्र अपने अपने घर की तरफ़ जा रहे।

धन्यवाद 🙏..।