Aakhet Mahal - 8 in Hindi Classic Stories by Prabodh Kumar Govil books and stories PDF | आखेट महल - 8

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आखेट महल - 8

आठ

घण्टा भर बीतते-बीतते फिर गौरांबर की जेब में पच्चीस रुपये थे।

स्टेशन पर अन्दर आकर सामान उठाने में वहाँ के लाइसेंसधारी कुली एतराज करते थे और किसी बाहरी व्यक्ति को सामान उठाने नहीं देते थे। परन्तु ट्रक के साथ उसे भी ट्रक का खलासी ही समझ कर वहाँ घूम रहे कुलियों ने कुछ नहीं कहा और गौरांबर की कमाई हो गयी।

गौरांबर स्टेशन के भीतर चला गया। स्टेशन पर कोलाहल था। शायद अभी-अभी किसी गाड़ी के आने का सिग्नल हुआ था। गौरांबर वहाँ एक बैंच पर बैठ गया और यात्रियों की भागादौड़ी देखने लगा। एक-दो मिनटों में ही गाड़ी प्लेटफॉर्म पर आ लगी। गौरांबर को अचम्भा हुआ, जब उसने देखा कि गाड़ी धीमी होते ही दो-तीन कुली गाड़ी के साथ दौड़ते-दौड़ते पायदान से लटक गये। इनमें एक वही कुली था, जिसे गौरांबर ने अपनी घड़ी बेची थी।

सवारियों के उतरने के बाद, सामान की रेलमपेल और कुलियों के मोल भाव के बाद जब वहाँ थोड़ी शान्ति हुई, गौरांबर की आँख उस बूढ़े कुली से मिली। कुली भी तुरन्त ही उसे पहचान गया। दोनों ने साथ-साथ बैठकर बीड़ी पी। बीड़ी कुली ने ही पिलायी।

कुली को बातों-बातों में जब यह पता चला कि गौरांबर के पास न रहने की जगह है और न ही काम का ठिकाना, तो उसने कुछ सोचकर उसे अपने साथ आने को कहा। वह आगे-आगे चलता हुआ उसे स्टेशन के छोर के पास बने एक छोटे-से कमरे की ओर ले गया। गौरांबर को, फुर्ती-से चलता हुआ वह बूढ़ा, इस समय किसी देवदूत जैसा लग रहा था। परन्तु उम्मीद और सद्भाव की ये घड़ी ज्यादा देर कायम न रही। कुली चलता-चलता एक ऐसे दरवाजे पर पहुँच कर ठिठक गया, जिस पर बाहर से ताला लगा हुआ था। गौरांबर के साथ-साथ कुली भी हताश हो गया।

‘‘ठीक है, तू मुझे कल सुबह नौ बजे यहीं मिल जाना।’’

गौरांबर ने बड़ी उम्मीद से बूढ़े की ओर देखा तथा उसकी बात की सहमति में सिर हिला दिया। गौरांबर के बिना कोई अभिवादन किये ही वह कुली अभिवादन का जवाब देने की मुद्रा बनाकर प्लेटफॉर्म की सीढ़ियाँ चढ़ गया और आँखों से ओझल हो गया।

उसके जाने के बाद गौरांबर ने बंद दरवाजे के ऊपर लगा बोर्ड पढ़ा। वह शायद रेलवे के किसी कैंटीन ठेकेदार की जगह थी। गौरांबर मन-ही-मन उस जगह की अवस्थिति को गुनता हुआ वहाँ से चल पड़ा। 

आज रात गौरांबर मन्दिर के चौक में नहीं गया। वह स्टेशन पर ही ठहर गया। उसने खाना भी स्टेशन के नजदीक एक ढाबे पर खाया।

रात को स्टेशन के बगल वाले गोदाम के सामने के लम्बे गलियारे में गौरांबर ने अपना डेरा जमाया। वहाँ करीब ही लाइट के दो बड़े-बड़े हण्डे जल रहे थे। नजदीक ही चार-पाँच आदमी एक चादर बिछा कर ताश खेल रहे थे। एक-दो कुली भी टाँगें पसारे बीड़ी पी रहे थे।

गौरांबर ने कमीज उतार कर उसे गोल लपेट कर उसका सिरहाना बना लिया और लेट गया। गर्मी काफी थी। उमस भी बहुत ज्यादा बढ़ गयी। बादलों की ओर देखकर ऐसा लगता था कि रात में थोड़ी-बहुत बारिश जरूर होगी। थोड़ी देर तक ऐसे ही लेटे रहने के बाद गौरांबर ताश खेलने वाले लडक़ों के और नजदीक खिसक आया और सिर को हाथ का सहारा देकर करवट से लेटा-लेटा उन लोगों का खेल देखने लगा।

आधा घण्टा गुजरा होगा कि बारिश होने लगी। थोड़ी ही देर में सारा गलियारा पानी से भीग गया, क्योंकि इस हिस्से में छत नहीं थी। वहाँ सोये सारे लोग उठ-उठ कर स्टेशन के भीतरी हिस्से में तितर-बितर हो गये। गौरांबर भी उठकर गोदाम के दरवाजे के छज्जे के नीचे आ गया। छज्जे के पास दीवार से लगकर बड़े-बड़े बोरों के पार्सल पड़े हुए थे। गौरांबर की आँखों में नींद भरी हुई थी। उसने किनारे के एक बोरे के पास आकर अपनी पैंट उस पर बिछा दी और कमीज को सिरहाने लगाकर बोरे पर लेट गया।

रात के करीब ग्यारह ही बजे होंगे कि गौरांबर की आँखें फिर खुलीं। देखा, एक पुलिसवाला सामने खड़ा था। उसके डण्डा टाँगों पर छुआते ही गौरांबर उठ बैठा। आँखें मलते हुए गौरांबर ने सामने देखा। पुलिस वाला उसी तरह खड़ा था। डण्डा फटकारते हुए बोला—

‘‘ऐ लड़के, चलो बाहर यहाँ से।’’

गौरांबर ने कातर दृष्टि से देखा। बोला, ‘‘बाहर बारिश हो रही है हवलदार जी! सोने दो।’’

‘‘कहाँ हो रही है बारिश। सब उठकर चले गये। बन्द हो गयी बारिश। चल बाहर।’’ कहते-कहते हवलदार ने अपने हाथ का डण्डा गौरांबर की पीठ के निचले भाग पर छुआ दिया। गौरांबर फुर्ती से उठ बैठा और अपने कपड़े समेटने लगा। बोरे से कूदकर उसने चप्पल पहनी और वहाँ खड़ी एक कार के समीप जाकर अपने कपड़े पहनने लगा। जाते-जाते पुलिस वाले को गौरांबर ने घूरती निगाहों से देखा और मन-ही-मन एक वजनदार गाली दी।

इधर-उधर देखकर गौरांबर स्टेशन की इमारत से बाहर ही निकल आया। आँखों से नींद पूरी तरह भाग चुकी थी। स्टेशन के बाहर की चहल-पहल भी आहिस्ता-आहिस्ता कम होने लगी थी।

गौरांबर के कदम पास ही के सिनेमाघर के सामने की ओर खुली दो-तीन दुकानों की तरफ बढ़ गये। वहाँ पान-बीड़ी की एक दुकान अब भी खुली थी। गौरांबर ने वहाँ पहुँच कर बीड़ी का बण्डल खरीदा और एक बीड़ी सुलगा कर वहीं खड़ा हो गया। पास ही शो छूटने के इन्तजार में एकाध दुकान अब तक खुली थी।

गौरांबर को न जाने क्या सूझी। वह रिक्शे वाले के पास आकर खड़ा हो गया।

रिक्शे पर बैठा लड़का प्रश्नवाचक निगाहों से उसकी ओर देखने लगा।

‘‘अंबेडकर नगर के पल्ली पार चलेगा?’’

‘‘पल्ली पार कहाँ..?’’

‘‘वहीं, हाइवे पर।’’

‘‘हाइवे पर कितना आगे जाओगे?’’

‘‘पेट्रोल पम्प के पास छोड़ देना।’’

‘‘बारह रुपये होंगे।’’

‘‘अबे जा, बारह रुपये होंगे।’’ गौरांबर ने उपेक्षा से कहा।

‘‘दस रुपये देने हैं?’’ रिक्शे पर बैठे लड़के ने मोल भाव करते हुए कहा।

‘‘ज्यादा है।’’ गौरांबर ने बीड़ी का धुआँ छोड़ते हुए कहा। रिक्शे पर बैठा लड़का काफी छोटा था और देहाती था। इसी से गौरांबर ने जरा अकड़ कर उससे बात की। 

‘‘अजी ज्यादा कहाँ है, सारी चढ़ायी चढ़नी पड़ेगी। ऑटो रिक्शा वाले तो वहाँ के बीस रुपये लेते हैं। इस समय तो कोई जायेगा भी नहीं। वहाँ से खाली आना पड़ता है।’’

‘‘ऑटो रिक्शा वाले का तो पेट्रोल जलता है। तेरा क्या जायेगा, ठीक बोल, छ: रुपये लेगा?’’ गौरांबर ने पुलिस वाले का क्रोध इस निरीह-से लड़के पर निकालते हुए कड़क और ऊँचे स्वर में कहा।

आखिर आठ रुपये में बात तय हो गयी। गौरांबर लपककर रिक्शे पर चढ़ गया। रिक्शा मुड़कर सड़क पर आया और तेजी से चल पड़ा।

रात के बारह बजने वाले थे। सडक़ों पर अँधेरा और सन्नाटा एक साथ फैला पड़ा था। कहीं-कहीं इक्का-दुक्का वाहन आते-जाते दिखायी दे जाते। कहीं-कहीं सड़क की लाइटें भी न होने से बहुत ही सुनसान लगता था। काफी खराब रास्ता था। सड़क भी जगह-जगह से टूटी और उखड़ी हुई थी।

शहरों में हर काम के बड़े-बड़े दफ्तर होते हैं। दफ्तरों में सारी उम्र काम करने वाले लोग होते हैं। कामकाज के लिए और सुख-सुविधाओं के रख-रखाव के लिए लाखों-करोड़ों के बजट होते हैं। लेकिन फिर भी जो हालात होते हैं, वे खुलेआम होते हैं।

रिक्शा कहीं-कहीं जबरदस्त हिचकोले खाता था।

थोड़ी ही देर में शहर का आबाद हिस्सा पार करके रिक्शा तेजी से हाइवे की ओर दौड़ा जा रहा था। गौरांबर को शहर की उमस और बदबूदार हवा से यहाँ खुले-खुले से इलाके में आने के बाद काफी राहत-सी महसूस हो रही थी। उसे अपने पर अचम्भा हो रहा था कि वह एकाएक कैसे यहाँ चला आया। पर रिक्शे की रफ्तार के साथ उसके अपने विचार भी तेजी से बदल रहे थे। अब उसने ठान लिया था कि जो होगा देखा जायेगा, वह एक बार कोठी में पहुँच कर वहाँ के हालात तो जरूर देखेगा।

अब दोनों ओर रेतीले मैदान वाली, चढ़ाई वाली सड़क शुरू हो गयी थी और रिक्शे वाला भी पैडल पर जोर डालता हुआ हाँफने लगा था। उसके माथे से पसीने की धाराएँ बहने लगी थीं। उसका दम फूलता देखकर गौरांबर धीमे-धीमे सरकते रिक्शे से कूद लिया और बोला, ‘‘चल, चढ़ाई पार कर ले।’’ 

कहकर गौरांबर सड़क के एक ओर खड़ा होकर पेशाब करने लगा। परन्तु रिक्शे वाले लड़के ने भी कोई जोखिम लेना उचित न समझा। उसने झट से रिक्शा वहीं रोक दिया और सीट पर लटका-लटका सवारी के आने का इंतजार करने लगा। गौरांबर लड़के के मन के भाव समझ गया। पलट कर वापस रिक्शे में आ बैठा। रिक्शे वाले को भय था कि सवारी पैसे दिये बिना ही अँधेरे में गुम न हो जाये।

पन्द्रह-सोलह बरस का देहाती लड़का भी चौकन्नेपन से इतनी समझ तो रखता ही था कि शहर से इतनी दूर इस वीराने में सवारी उसकी इतनी मेहनत की मजदूरी दिये बिना इधर-उधर हो जाये तो क्या हाल होगा। अब चौदह-पन्द्रह साल की उमर में ही सब सिखा देती है दुनिया।

गौरांबर के आ बैठते ही रिक्शा फिर चल पड़ा। दूर संजय नगर की लाइटें दिखायी देनी शुरू हो गयी थीं।

इस ढलान के बाद ही बस चौराहे से बायीं ओर मुड़ने पर अंबेडकर नगर था।  

पेट्रोल पम्प के नजदीक, कोठी से जरा फासले पर ही, गौरांबर उतर गया। जेब से रुपये निकाल कर गिनकर आठ रुपये उसने रिक्शे वाले को दिये। रिक्शे वाले ने रुपये कमीज की जेब में डालकर, हाथ के अँगूठे को मोड़, पसीने की एक पतली-सी धार को साफ किया और तेजी से रिक्शा वापस मोड़ लिया। सचमुच इस समय यहाँ से वापसी की कोई सवारी मिलने की कोई आस नहीं थी। लड़का तेजी से रिक्शा भगाता हुआ निकल गया।

गौरांबर ने एक आत्मीय-सी नजर चारों ओर के माहौल पर डाली। यह इलाका इतनी तेजी से विकसित हो रहा था कि कुछ ही दिन बाद वापस आने पर भी गौरांबर को चारों ओर बहुत से परिवर्तन दिखायी दे रहे थे। सबसे बड़ा परिवर्तन तो यही था कि पेट्रोल पम्प पर दो बड़े-बड़े बिजली के लट्टू और लग जाने से चकाचौंध हो रही थी।

तेजी से कदम बढ़ाता हुआ गौरांबर कोठी की दिशा में चल पड़ा। मुख्य सड़क से पेट्रोल पम्प के करीब सौ गज आगे चलकर कोठी की ओर जाने वाली सड़क मुड़ती थी, जिस पर काफी दूर तक डामर की सड़क बन गयी थी। इस तरह अब खेतों का नामोनिशान तक दिखायी नहीं देता था। बीच-बीच में घास-फूस के कुछ गोल और ऊबड़-खाबड़ गड्ढे जरूर छितराये हुए कहीं-कहीं दिखते थे।

दूर से गौरांबर ने देखा, कोठी में कोई लाइट नहीं जल रही थी। इस समय लाइट नहीं जली होने से यह कदापि नहीं माना जा सकता था कि कोठी में कोई नहीं है, क्योंकि रात का लगभग एक बज रहा था। यदि गौरांबर के जाने के बाद वहाँ कोई आया भी होगा, तो इस समय सो ही रहा होगा, यही गौरांबर ने सोचा।

 यदि दिन का समय होता तो गौरांबर को कोठी में पहुँचने से पहले ही सब मालूम चल जाता। आसपास किसी दुकान वाले से वह सब हाल मालूम करके तब इत्मीनान से कोठी के भीतर जाता। पर अब, इस समय दूर-दूर तक कोई ऐसा न था कि गौरांबर उसके जाने के बाद की कोठी की हलचलों के बाबत कुछ पूछ सके।

कोठी अब कुछ ही गज के फासले पर रह गयी थी। गौरांबर धीरे-धीरे डग बढ़ाता हुआ कोठी के अहाते में जा पहुँचा। उसका दिल धड़क रहा था। यह बड़ी कोठी थी, जिसकी रखवाली की जिम्मेदारी गौरांबर को सौंपी गयी थी और आज ये उल्टा चक्र चल रहा था कि खुद गौरांबर चोरों की तरह उसमें दाखिल होने के लिए अपने आपको तैयार कर रहा था। गौरांबर जैसे ही कोठी के मुख्य द्वार पर से भीतर दाखिल हुआ, उसे यह देखकर बेहद इत्मीनान हुआ कि कोठी के बाहर ताला लगा हुआ था। इसका मतलब यह था कि गौरांबर की जगह अब तक वहाँ किसी दूसरे आदमी को रखा नहीं गया था। और यदि किसी और ने वहाँ आकर दूसरी चाबी से कोठी को खोला भी हो, तो कम-से-कम इस समय तो वहाँ कोई नहीं था। गौरांबर की जान में जान आयी। उसने फुर्ती से चाबी निकालने के लिए जेब में हाथ डाला। हाथ रूमाल के साथ जेब में पड़े थोड़े-से खुले पैसों पर घूमकर रह गया। तभी गौरांबर को ध्यान आ गया कि उसने सुरक्षा की दृष्टि से चाबी को अपने नाड़े में बाँध लिया था।

झटपट उसने पैंट में दबी कमीज को निकाल कर बाहर किया और पैंट को जरा खोलकर चाबी को टटोलकर निकाला। वह झुककर चाबी से ताला खोलने लगा। 

पर यह क्या? गौरांबर अभी चाबी को ताले में घुमा ही रहा था कि पीछे से तेजी से किसी भेडिय़े की तरह हुँकार भरते हुए किसी आदमी ने अपने मजबूत हाथों से उसे दबोच लिया। गौरांबर बुरी तरह हड़बड़ा गया। वह सँभल भी नहीं पाया था कि मजबूत हाथों वाले आदमी ने एक हाथ उसकी गर्दन पर कस दिया। चाबी ताले से निकल कर गौरांबर के पेट के पास झूल गई।

गौरांबर इतनी बुरी तरह घबरा गया था कि उसके मुँह से हड़बड़ाहट में कोई बोल नहीं फूटा। उसने आदमी की गिरफ्त से छूटने की भरपूर कोशिश की। बहुत जोर लगाने पर भी वह हाथ को टस-से-मस नहीं कर पाया। आदमी ने उसकी गर्दन पर एक हाथ की पकड़ बहुत ही मजबूत कर दी थी और दूसरे हाथ को घुमा कर गौरांबर की पीठ पर टटोलकर उसकी पैंट पकड़ने की कोशिश की। इसी समय गौरांबर ने घबराये बिना फुर्ती से काम लिया। गर्दन के गिर्द लिपटे हुए हाथ पर उसने जोर से नाखून गड़ाते हुए दाँत से काट लिया। आदमी एकदम से बौखला कर रह गया। तेज नाखून से कलाई पर हमला कर देने से उसकी कलाई की पकड़ जरा ढीली हुई और बिजली की-सी फुर्ती से गौरांबर ने दोनों हाथों से उसकी कलाई को पकड़ बहुत खतरनाक तरीके से काट लिया। जैसे मक्का के भुट्टे को खाने के लिए दाँतों पर लगाया जाता है, ठीक वैसे ही गौरांबर ने उसकी कलाई काटकर लहुलुहान कर दी। काटा इतनी जोर से गया था कि उस दानव जैसे बदन वाले आदमी की भी सिसकारी निकल गयी। दाँतों के निशान से मांस खिंचकर निकल आया। दाँतों के नमकीन-से स्वाद को घृणा से गौरांबर ने एक ओर थूका। आदमी का गर्दन वाला हाथ जख्मी हो जाने पर उसने पूरी ताकत दूसरे हाथ पर लगाकर पीठ की ओर से गौरांबर की पैंट को पकडऩा चाहा। मगर पैंट खुली होने के कारण वहाँ से भी उनका हाथ फिसल कर रह गया और गौरांबर उसकी इस नाकामी का भरपूर फायदा उठाकर उसके शिकंजे से तेजी से निकल भागा।

आदमी ने हुँकार भर के गौरांबर को रोकने की कोशिश की, मगर गौरांबर चीते की-सी फुर्ती से कोठी के मुख्य द्वार के बाहर भाग लिया। घायल हो जाने पर भी आदमी ने हार नहीं मानी और वह बिजली-सी गति से उछलकर गौरांबर के पीछे भाग लिया। 

अब आगे-आगे गौरांबर और उसके पीछे भीमकाय आदमी कोठी के पिछवाड़े के कच्चे रस्ते की ओर से भाग रहे थे, जहाँ आगे जाकर खेत, काँटों भरे झाड़ और पथरीले ऊँचे-नीचे पानी भरे गड्ढे थे।

लगभग दो-तीन फर्लांग गौरांबर ने उस आदमी को दौड़ाया पर गौरांबर के पैर से, भागने के दौरान उसकी चप्पलें निकल गयी थीं। आदमी बूट पहन भाग रहा था। गौरांबर के पैर लहूलुहान हो गये। एक जगह पत्थर की ठोकर लगने से बहुत जोर से वह काँटों भरे झाड़ में गिरा। फिर सँभल नहीं सका। उसके उठ पाने और फिर से खड़े होने की चेष्टा भर में ही आदमी उस तक पहुँच गया और आदमी ने उसे चीते की तरह दबोच कर अपने कब्जे में कर लिया।

आदमी बेहद गुस्से में था और दर्द से बौखलाया हुआ भी। उसने पास आकर बुरी तरह से गौरांबर को मारना शुरू कर दिया। कभी लात मारता, कभी घूँसा। एक हाथ से उसे कॉलर से पकड़ रखा था और दूसरे से उसे बराबर मारे जा रहा था।

गौरांबर ने हाथ-पैर छोड़ दिये। अब वह बेदम-सा होने लगा। उसकी नाक, हाथ तथा पैरों से कई जगह से खून भी रिसने लगा था। आदमी अब अपनी भारी-भरकम आवाज में उसे गालियाँ भी दे रहा था और बूट की ठोकरों से मारता भी जा रहा था।

मारते-मारते उसके हाथ रुक जाते। वह गालियाँ देने लग जाता, पर गाली के अन्त तक आते-आते उसका क्रोध फिर भड़क उठता और जैसे किसी अनुष्ठान के समय मंत्रोच्चार के बाद स्वाहा बोलते हुए हवन कुण्ड में समिधा डाली जाती है उसी तरह आदमी उत्तेजित हो जाता और गौरांबर को मारने लग जाता। लात-घूँसों की बौछार से उसने गौरांबर को बेदम-सा कर दिया।

गौरांबर लहूलुहान होकर पथरीले रास्ते पर उसके साथ नंगे पाँव घिसट रहा था। वह आदमी कद में भी गौरांबर से बहुत अधिक था, इसलिये अब गौरांबर के झूल जाने के बाद उसे आसानी से घसीटे लिए जा रहा था। गौरांबर की कमीज जगह-जगह से फट गयी। खुली हुई पैंट भी सरक कर घुटनों पर आ गयी थी। 

आदमी को रह-रहकर क्रोध आता था। वह गौरांबर के कपड़े फाड़ने लगा। खींच-खींच कर उसने गौरांबर की कमीज को तार-तार कर दिया था। फिर उसी फटी हुई कमीज से एक बड़ा-सा टुकड़ा खींचकर उसने एक पट्टी जैसी निकाली और अपनी कलाई पर, गौरांबर द्वारा काटने से हुए जख्म पर लपेट कर बाँधने लगा। पट्टी बाँधने के दौरान उसने रुक कर, गौरांबर को अपने घुटनों के बीच दबा कर फँसा लिया था। गौरांबर वैसे भी अब बहुत अशक्त हो चुका था। उसने कोई प्रतिवाद करना भी छोड़ दिया था। गौरांबर की कमीज का सिर्फ कॉलर ही कपड़े की एक माला की शक्ल में उसके गले में रह गया।

कलाई पर पट्टी बाँध कर जब घुटनों के बीच से आदमी ने गौरांबर को धकेल कर अलग किया तो गौरांबर सँभल कर खड़ा न रह सका। वह लडख़ड़ा कर गिर गया। आदमी ने रुक कर एक बार दाँत पीसे और फिर उसे उठाने की कोशिश किये बिना ही पैंट पकड़ कर जमीन पर उसे घसीटते हुए ले जाने लगा।

पीठ के बल घिसटते गौरांबर की पीठ भी पत्थरों व काँटों से छलनी हो गयी और उसकी आँखें बेहोशी से मुँदने लगीं। घसीटते-घसीटते आदमी गौरांबर को सड़क तक ले आया। फिर उसे छोड़कर पल-दो पल सुस्ताने के ख्याल से बैठ गया। आदमी ने बेहोश पड़े गौरांबर की पैंट की जेब से बचे-खुचे पैसे-रुपये अपनी जेब के हवाले किये। वहीं एक सिगरेट सुलगायी और गौरांबर को वहीं छोड़ पेट्रोल पम्प की ओर चल दिया।

और इस तरह चोरी की अफवाह के बाद से गश्त पर तैनात हुए सिपाही ने अपने होने की सार्थकता सिद्ध की।