Mahashakti - 38 in Hindi Mythological Stories by Mehul Pasaya books and stories PDF | महाशक्ति - 38

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महाशक्ति - 38


🌺 महाशक्ति – एपिसोड 38

"पाप का दर्पण और अंधकार का आमंत्रण"



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🔱 प्रारंभ – तीसरे कुल की ओर

गंधर्व लोक की परीक्षा के बाद अर्जुन, अनाया और ओजस अब आगे बढ़ रहे थे —
इस बार की यात्रा थी सबसे कठिन,
क्योंकि वे बढ़ रहे थे असुर लोक की ओर —
जहाँ न सिर्फ अंधकार, बल्कि अपने ही भीतर छुपे हुए पापों का दर्पण उनका इंतज़ार कर रहा था।

गुरुजी ने स्पष्ट चेताया था:

> "असुर लोक में शत्रु बाहर नहीं, भीतर छुपा होता है।
वहाँ तुम्हारा अतीत ही तुम्हारा सबसे बड़ा युद्ध बनेगा।"




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🛤️ प्रवेश – भूलोक से नीचे की ओर

तीनों अब धरती से नीचे उतरने लगे —
एक पतली गुफा, जहाँ हवा भारी थी और दीवारें सिसकती थीं।
हर मोड़ पर एक अजीब सी फुसफुसाहट सुनाई देती:

> "सच का चेहरा देख सको तो आओ… वरना लौट जाओ।"



ओजस ने माँ का हाथ पकड़ा,
और पहली बार डरते हुए कहा —
"यह जगह… मेरी आत्मा को खींच रही है।"

अनाया ने उसे सीने से लगा लिया,
"हम सब साथ हैं… हम सब एक-दूसरे का दर्पण हैं।"


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🔥 असुर लोक – पापों की नगरी

अचानक एक बड़ा काला द्वार उनके सामने खुला —
और अंदर फैली थी एक नगरी,
जहाँ न कोई भवन था, न मंदिर —
बस चारों ओर जलती हुई आत्माएँ,
जो अपने ही अपराधों के बोझ से झुलस रही थीं।

वहाँ असुर कुल का शासक मिला — "ताम्रकर्ण" —
जिसकी आँखें भस्म से बनी थीं।

उसने कहा:

> "तुम तीनों को अपने भीतर उतरना होगा…
और जो तुमने कभी छिपाया, वो अब सामने आएगा।"




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⚔️ अर्जुन की आत्मा का दर्पण

अर्जुन को एक गुफा में भेजा गया —
जहाँ दीवारें बोलती थीं।

— “तेरी पहली पत्नी का क्या हुआ?”
— “तू अनाया से पहले जिसे प्रेम करता था, क्या उसे तूने नहीं छोड़ा था?”
— “तेरा पुत्र तुझसे इतना महान क्यों है? क्या तू भीतर से खुद पर ही संदेह करता है?”

अर्जुन चिल्लाया:
"मैंने जीवन में गलतियाँ कीं… हाँ, किया है प्रेम पहले…
पर अनाया से जो है, वो प्रेम नहीं — वो समर्पण है।
और ओजस… वो मेरा उत्तर नहीं, मेरी पुनर्रचना है!"

गुफा कांप उठी —
दीवारें गिरने लगीं —
और अर्जुन बाहर निकल आया, आँखों में आँसू के साथ।


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🕊️ अनाया का दर्पण – त्याग की पीड़ा

अनाया को एक कक्ष में भेजा गया,
जहाँ एक स्त्री खड़ी थी — उसकी माँ।

"तू जो है, वो मेरा त्याग है।
मैंने तुझे जनम देकर छोड़ दिया ताकि तू मानव लोक में पल सके।
क्या तू मुझे क्षमा कर पाई, अनाया?"

अनाया फूट पड़ी।
"मैंने कभी तुमसे घृणा नहीं की माँ…
पर मैं अब जानती हूँ, मेरा जन्म किसी कारण से हुआ है।
अब मैं उस लक्ष्य के लिए तैयार हूँ।"

वही स्त्री मुस्कराई — और प्रकाश बनकर विलीन हो गई।


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🔮 ओजस का आमंत्रण – छाया की चाल

ओजस को एक अंधकारमयी कक्ष में डाला गया,
जहाँ कोई दिखाई नहीं देता था —
सिर्फ एक आवाज़ गूंजती थी:

> "तेरे माता-पिता तुझसे डरते हैं ओजस…
वे तुझे बाँधना चाहते हैं…
पर मैं तुझे मुक्त कर सकती हूँ।
मेरे साथ आओ… मैं तुम्हें तुम्हारी पूरी शक्ति दूँगी…
तुम त्रिलोक के स्वामी बन सकते हो…"



ओजस की साँसें तेज़ होने लगीं।
उसके माथे का रक्तवृत्त और चमकने लगा।

उसे दिखा — एक सिंहासन, तीन लोक उसके चरणों में…
और उसके पीछे छाया खड़ी मुस्कुरा रही थी।

वो आगे बढ़ा…

तभी एक हल्की सी स्वर लहर उसके कानों में गूँजी —
अनाया का स्वर:

> "ओजस… बेटा… लौट आओ…"



ओजस ने आँखें बंद कीं।
“नहीं… मैं शक्ति हूँ, पर अहंकार नहीं।
मैं प्रकाश हूँ, पर ध्वंस नहीं।”

छाया चिल्लाई:
"तू मुझे ठुकराएगा ओजस??"

"हाँ!" ओजस चीखा, और उसके रक्तवृत्त से एक सफेद प्रकाश फूटा,
जिसने छाया को उस क्षण भगा दिया।


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🕯️ ताम्रकर्ण का झुकना

तीनों बाहर आए — शांत, थके हुए, लेकिन भीतर से साफ़।

ताम्रकर्ण ने कहा:
"जो अपने ही भीतर के पापों को स्वीकार कर सके —
वही असुर कुल को नई दिशा दे सकता है।"

उसने अर्जुन को एक काले रत्न से बना त्रिशूल दिया —

> "जब छाया तुझे भीतर से तोड़ने की कोशिश करे,
ये त्रिशूल तुझे अपने सत्य की याद दिलाएगा।"




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🌌 छाया की छटपटाहट

दूसरी ओर छाया का रक्तवृत्त अब अस्थिर था।

"ओजस… अब तू मेरे लिए ख़तरा बन चुका है।
अब तुझे समाप्त करना ही होगा।"

और उसने भेजा एक नया दूत —
"मोहंध" — जो न डर से, न शक्ति से, बल्कि
मोह और भ्रम से ओजस की आत्मा को जकड़ेगा।


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🌠 तीनों की शपथ

अर्जुन, अनाया और ओजस एक चट्टान पर खड़े होकर
आसमान की ओर देखते हैं।

"अब आधे कुल हमारे साथ हैं," अर्जुन बोला।
"अब जो शेष हैं, वे भविष्य की दिशा तय करेंगे।"

अनाया ने ओजस का हाथ थामा:
"जो भी हो… हम साथ रहेंगे।"

ओजस बोला:
"अब मैं तैयार हूँ…
मुझे समाप्त करने नहीं…
बल्कि छाया को अपने प्रकाश में विलीन करने के लिए।"


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✨ एपिसोड 38 समाप्त