Nehru Files - 102 in Hindi Anything by Rachel Abraham books and stories PDF | नेहरू फाइल्स - भूल-102

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नेहरू फाइल्स - भूल-102

भूल-102 
चुनावी फंडिंग और प्रचार

भ्रष्टाचार का एक प्रमुख कारण चुनावी फंडिंग है। यह वह अकेला क्षेत्र था, राजाजी ने जिसके राष्ट्रीयकरण की माँग की थी। राजाजी ने पैसे की ताकत के बेहिसाब अनुचित फायदों को दूर करने के लिए राज्य द्वारा चुनावों में धन उपलब्ध करवाने की वकालत की थी। उन्होंने कहा, “चुनाव अब निजी उद्यम हो गए हैं; जबकि यह वह पहली चीज है, जिसका राष्ट्रीयकरण किया जाना चाहिए।” (आर.जी.3/390) 

लेकिन नेहरू ने उनकी बात नहीं सुनी। नेहरू ने उस चीज का राष्ट्रीयकरण किया, जिसका नहीं किया जाना चाहिए था और जिसका राष्ट्रीयकरण करना था उसका नहीं—राज्य द्वारा चुनावों में धन उपलब्ध करवाना। इसने एक नवजात लोकतंत्र में विपक्ष को स्थापित करने में मदद की होती। विपक्ष के पास धन की भारी कमी थी। इसके अलावा, उनके पास अपने लिए प्रचार की मशीनरी भी नहीं थी। 

नेहरू ने हमेशा उद्योगपतियों के खिलाफ बात की; लेकिन अगर उन्होंने आदान-प्रदान के आधार पर उनकी चुनावी तिजोरी को भरने में मदद की तो नेहरू के ‘सिद्धांत’ कभी आड़े नहीं आए; क्योंकि सारी चुनावी फंडिंग तो कांग्रेस को मिल रही थी (निश्चित रूप से आदान-प्रदान के बदले) और ऐसे में नेहरू विपक्ष के लिए धन का इंतजाम कर उन्हें क्यों मजबूत करें? नेहरू ने कांग्रेस को बड़े कारोबारी घरानों से मिलनेवाले चंदे की देखभाल पूरी सावधानी से की। 

जब राजाजी, जिन्होंने नेहरू की आर्थिक नीतियों के चलते भारत के बरबाद हो जाने को लेकर चिंता व्यक्त की और अपने जैसी सोच के लोगों के साथ मिलकर ‘स्वतंत्र पार्टी’ की स्थापना की तथा चुनावी मैदान में उतरे तो नेहरू ने उन्हें धन से भरे थैलों का समर्थक बताया। ये विशेषण उनके साथ चिपके रहे; हालाँकि वह कांग्रेस पार्टी थी, जो इन पैसे भरे थैलों से धन प्राप्त कर रही थी और स्वतंत्र पार्टी चुनाव लड़ने के लिए पैसों की व्यवस्था करने में मुश्किलों का सामना कर रही थी। 

बाद में जब जे.आर.डी. टाटा, जो राजाजी की स्वतंत्र पार्टी के उग्र सुधारवादी मुक्त बाजार के एजेंडे, जो नेहरू के गरीबी को बढ़ानेवाले समाजवाद के बिल्कुल उलट था, से प्रभावित हुए और स्वतंत्र पार्टी को आर्थिक मदद की पेशकश की तो नेहरू ने नाराजगी के साथ उनका विरोध किया और जब जे.आर.डी. फिर भी आगे बढ़े तो नेहरू ने कई तरीकों से उनसे बदला लिया। (डब्‍ल्यू.एन.15) 

नेहरू, उनकी सरकार और कांग्रेस पार्टी का रेडियो, जो टी.वी. से पहले के दिनों में जन- संचार का सबसे प्रमुख साधन था, पर एकाधिकार था। अ‍ॉल इंडिया रेडियो (ए.आई.आर.) को एक स्वायत्त निकाय बनाने की माँग थी; नेहरू ने एक बार तो यहाँ तक कहा था कि वे आकाशवाणी को बी.बी.सी. की तर्ज पर बनाना चाहते हैं; लेकिन उसकी विशाल पहुँच के मद्देनजर और सभी प्रकार के प्रचार को पाने में उसके अनुचित लाभ को उठाने के उद्देश्य से नेहरू इसके पुनर्गठन और सुधार की बात को पूरी तरह से भूल गए। आकाशवाणी ने कभी भी नेहरू या उनकी नीतियों या सरकार को लेकर कोई प्रतिकूल टिप्पणी नहीं की। आकाशवाणी नेहरू का प्रचार वाहन बन गया तथा उनके बाद उनके वंश का और इसमें विपक्ष के लिए कोई जगह नहीं थी। 

नेहरू और कांग्रेस ने प्रिंट मीडिया को अपना गलुाम बनाने के लिए साम-दाम-दंड-भेद की नीति अपनाई। नेहरू की तसवीरें, बयान और भाषण विपक्ष के दृष्टिकोण एवं टिप्पणियों को छिपा देते थे। सरकार का विशाल प्रकाशन विभाग नेहरू और उनके संरक्षक गांधी के सभी प्रकार के चयनित और एकत्र किए गए कार्यों, पत्रों एवं भाषणों को प्रकाशित करने के लिए समर्पित था; लकिे न सरदार पटेल या नेताजी बोस या डॉ. आंबेडकर के बेहतर कार्यों, पत्रों व भाषणों को कोई महत्त्व देने से पूरी तरह से पीछे रहता था। पी.आई.बी. (समाचार-पत्र सूचना कार्यालय) का छायाचित्र विभाग विभिन्न अवसरों पर दिल खोलकर नेहरू की तसवीरें जारी करता और उन्हें व्यापक प्रचार प्रदान करता। 

नेहरू और उनके राजवंश ने आकाशवाणी, सरकार द्वारा नियंत्रित संस्थानों, शिक्षाविदों और मीडिया का इतना दुरुपयोग किया, ताकि जनता के जेहन में उनको लेकर यह धारणा बने कि सिर्फ वे ही हैं, जो भारत को गरीबी से बाहर निकाल सकते हैं, भारत को एकजुट रख सकते हैं और केवल वही हैं, जो भारत जैसे एक बड़े तथा विविधता भरे देश पर शासन करना जानते हैं; केवल वही हैं, जो अल्पसंख्यकों एवं कमजोर वर्गों की रक्षा कर सकते हैं और वे अकेले ही भारत के उद्धारकर्ता हो सकते हैं! संक्षेप में कहें तो नेहरू और उनके राजवंश ने यह सुनिश्चित करने के लिए कि भारत एक पार्टी के वर्चस्व वाला लोकतंत्र बना रहे और उनका राजवंश इस पूरी कवायद में प्रभावी बना रहे, के लिए सभी तरीके आजमाए। इससे अधिक गैर-जिम्मेदाराना और देश के साथ अपकार क्या हो सकता है?