Adakaar - 8 in Hindi Crime Stories by Amir Ali Daredia books and stories PDF | अदाकारा - 8

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अदाकारा - 8

अदाकारा 8*

      सुनील को आउटडोर से शाम 5 बजे तक आ जाना था। लेकिन आठ बजने आये थे और अभी तक उसका कोई पता नहीं था।उर्मिला बेसब्री से उसका इंतज़ार कर रही थी।

    हर महीने मे दो बार सुनील को ऑफिस के काम से बैंगलोर जाना पड़ता था।चार-छह दिन रुकने के बाद,जब उसका काम पूरा हो जाता, तो वह ऑफिस जाने के बजाय सीधे घर आ जाता।क्योंकि वह जानता था कि उर्मिला वहाँ साँस रोके बैठी होगी और उसका इंतज़ार कर रही होगी।जैसे चातक पक्षी अपनी प्यास बुझाने के लिये बारिश का इंतज़ार करता है, वैसे ही मेरी उर्मी मेरा इंतज़ार कर रही होगी।

   और इसीलिए वह ऑफिस जाए बिना सीधे घर आ जाता।और फिर अगले दिन अपने बॉस को अपने बेंगलुरु के काम की रिपोर्ट देता।

   इस बार बैंगलोर के दौरे से जब वह आ रहा था।तो दोपहर 2 बजे,उसने बैंगलोर एयरपोर्ट से उर्मिला को फ़ोन किया और बताया कि उसकी दोपहर 2:30 बजे की फ़्लाइट है।और अब वह उस फ़्लाइट में सवार हो चुका हे। इसलिए वह शाम 5 बजे तक घर पर पहुँच जाएगा। लेकिन अब रात के 8 बज चुके थे, लेकिन सुनील अभी तक घर नहीं पहुँचा था।

     उर्मिला शाम 6 बजे से सुनील का नंबर ट्राई कर रही थी,लेकिन सुनील का मोबाइल लगातार बंद आ रहा था।इसलिए अब उसे सुनील की चिंता होने लगी।

 उसने सुनील के ऑफिस में उसके बॉस को फ़ोन किया।

"नमस्ते सर।मैं उर्मिला बोल रही हूँ। सुनील की पत्नी..."

  "हाँ, बताओ, क्या काम था?"

   "सुनील ऑफिस आया है?"

   "अरे मैडम।वो हमेशा उस टूर से सीधे घर आता है, है ना?"

 "जी सर।लेकिन वो आज अभी तक नहीं आया इसलिए….."

 "आखिरी बार कब बात हुई थी तुम्हारी उसके साथ?"

बॉस ने उर्मिला की बात बीच में ही काटते हुए पूछा।

   "दोपहर दो बजे।"

   "क्या कहा था उसने?"

  "मैं फ़्लाइट में बैठ गया हूँ।और पाँच बजे तक घर पहुँच जाऊँगा।"


"हम्म।अभी तो आठ बजेने आए हैं।हैना?"

"हाँ सर।ओर इसलिए मुझे अब सुनील की चिंता हो रही है।"

"चिंता मत करो।मैडम,वो आता ही होगा।क्या तुमने फ़ोन ट्राई किया था?"

बॉसने ढाढस देने की कोशिश करते हुए पूछा।

"जी सर।लेकिन उसका फ़ोन बंद आ रहा है।"

उर्मिला की आवाज़ चिंता ओर दर्द से भरी थी। और बॉसने भी यह महसूस किया।उन्होंने उर्मिला को हिम्मत देते हुए कहा।

"आप इस तरह हिम्मत मत हारिए मैडम। हो सकता हे फ़ोन की बैटरी शायद उतर गई होगी। हो सकता हे रास्ते में कहीं ट्रैफ़िक जाम लगा होगा।"

"मान लेते हैं बैटरी उतर गई होगी या ट्रैफिक लगा होगा लेकिन घर एयरपोर्ट से कितनी दूर है?अगर तुम पैदल भी आ जाए तो मुश्किल से आधा घंटा लगेगा।"

"तुम। चिंता मत करो।वो ज़रूर आएगा।"

यह कहकर बॉस ने फ़ोन रख दिया। फ़ोन कटते ही उर्मिला सोचने लगी।

"कैसा बॉस है वो?उसे अपने कर्मचारियों की ज़रा भी परवाह नहीं।सुनील उन्हीं काम के सिलसिले में महीने में दो बार घर से निकलकर टूर पर जाता है।तो कुछ उनकी भी कोई ज़िम्मेदारी होनी चाहिए ना उनके कर्मचारियों का क्या हुआ?"

घड़ी की सुइयाँ धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थीं।

नौ।

दस।

ग्यारह।

और उर्मिला का दिल मानो गले तक पहुँच गया था।एक अनजानी आशंका से उसका दिल धड़कने लगा।मेरे सुनील को क्या हुआ होगा?

ऐसे ही संदेह और आशंका के बादल उसके सिर मंडराने लगे।और अब अचानक वे बादल उसकी आँखों से आँसुओं के रूप में बहने लगे।

   वह सुनील से दिल से प्यार करती थी। उसके बिना वह अधूरी थी। वह सुनील के बिना जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकती थी।उसकी आँखों से धीरे-धीरे बह रहे आँसू अब सिसकियों का रूप ले रहे थे।और फिर जाने कितनी देर तक वह घुटनों पर सिर रखकर रोती रही।

   वह घर में ही अकेली थी।ओर उसे सांत्वना देने या धैर्य देने वाला वहां कोई नहीं था।

  जब वह रोते-रोते थक गई,तो उसने सोचा कि देर होने से पहले उसे कुछ करना होगा। उसे किसी की मदद लेनी होगी।उसने अपना मोबाइल उठाया और सोचने लगी कि किसे फ़ोन करे?दीदी को या बेहराम भाई को?कुछ देर सोचने के बाद,उसने तय किया कि दीदी को अगर वह सुनील के बारे मे बताएगी तो वह भी मेरी तरह अपने भाई की फिक्र में परेशान हो जायेगी।बेहतर है कि में बेहराम भाई को फ़ोन करु।उसने बेहराम का नंबर ढूंढ कर डायल करने ही जा रही थी कि दरवाज़े की बैल बज उठी......

(आधी रात को वहाँ कौन आया होगा?सुनील को क्या हुआ होगा?जानने के लिए पढ़ते रहें *अदाकारा*)