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“दो दिन से हमने कुछ भी नहीं किया है। इस प्रकार बैठे रहने से तो कार्य आगे बढ़ेगा ही नहीं।”
“अगले दो दिनों में DNA रिपोर्ट भी आ जाएगी। तब तक ...।”
“इसी प्रकार प्रतीक्षा करते रहने का ही आशय है क्या, श्रीमान?”
“कुछ कर भी तो नहीं सकते।” शैल ने कहा।
“यदि आप अन्यथा न लें तो मैं एक प्रस्ताव रखूं?”
“रखो, सारा जी। वैसे भी हमारे पास और कुछ काम तो है नहीं और न ही कोई दिशा सूझ रही है।”
“पुलिस अन्वेषण का सिद्धांत है कि, तुम भी तो जानते ही हो, शैल।”
“क्या?”
“यही कि प्रत्येक अपराध का रहस्य स्वयं अपराध में ही छिपा हुआ होता है। इसी प्रकार हत्या का रहस्य मारे हुए शरीर में ही होता है।”
“ठीक है, किन्तु यह मृत शरीर स्वयं कुछ नहीं बोल रहा। पूर्ण रूप से चुप है। जैसे उसे अपने मृत्यु के रहस्य को जानने की या हमें बताने की कोई मनसा ही न हो!”
“तुम पोस्ट मॉर्टम रिपोर्ट की बात कर रहे हो।”
“वही तो।”
“किन्तु मैं स्वयं मृतदेह की बात कर रही हूँ।”
“क्या?”
“एक बार पुन: उस मृतदेह को हम देखते हैं। कुछ नए तथ्य, नए प्रमाण, नए साक्ष्य द्रदिख जाए जिस पर अभी तक हमने ध्यान ही नहीं दिया हो।”
“वाह, वाह। यह बात तो हो सकती है। अब तक हमें यह कैसे नहीं सुझा?”
“चलो अब करते हैं।”
“ऐसा करने से पूर्व हमें एक और बात करनी होगी।”
“क्या इसके लिए भी हमें अनुमति माँगनी पड़ेगी?” सारा के शब्दों में व्यंग था, अधरों पर स्मित। शैल ने उसे देखा, समझा भी।
“आप व्यंग भी कर लेती हो यह जानकार प्रसन्नता हुई।” शैल ने कहा।
“वह तो बस यूं ही मन के भार को दूर करने के लिए। तुम कुछ और काम करने की बात कर रहे थे?”
“हाँ। जब हमारी सीमा पर यह मृतदेह मिला तब हमने मृतदेह के, उस स्थान के अनेक चित्र और चलचित्र बनाये थे। हमें उसको भी देखना होगा। संभव है वहाँ से कुछ मिल जाए, कोई कड़ी कोई संकेत प्राप्त हो जाए।”
शैल ने ताले में बंद उन चित्रों और चलचित्रों को मुक्त कर दिया। सारे चित्र टेबल पर रख दिए। दोनों एक एक कर सभी चित्रों को देखने लगे।
“सभी चित्र देख लिए। प्रत्येक में कुछ खोजने की हमने निष्ठापूर्वक चेष्टा की है किन्तु, किन्तु सारे के सारे चित्र मौन! कुछ भी नहीं कह रहे। न कोई कड़ी न कोई संकेत दे रहे हैं।” सारा निराश हो गई।
“जब मृतदेह स्वयं मौन है तो मृतदेह के चित्र क्या कहेंगे?”
“तो अब क्या?”
“घूम फिर कर वहीं आ गए जहां से चले थे।”
“अभी भी यह चलचित्र देखने बाकी हैं, चलो उसे देखते हैं।”
शैल ने सभी चलचित्र एक एक कर के चलाए।
“इसमें भी कोई विशेष संकेत नहीं मिल रहा है, शैल।”
“बार बार देखना पड़ेगा तब कुछ काम का मिलेगा।”
“बस अब यही शेष बचा है करने को।” सारा ने लंबी सांस छोड़ी।
“सारा जी आप ऐसा क्यूँ कह रही हो?”
“मैं जानती हूँ कि मेरे शब्दों में कटुता है, व्यंग भी है। उसके लिए मैं लज्जित भी हूँ किन्तु निराशा और विफलता के कारण ऐसे शब्द अनायास निकाल जाते हैं।”
“निराश तो अवश्य है ही, इसी निराशा से आशा की दिशा में जाने का कोई मार्ग मिलेगा।”
“किन्तु कैसे?”
“बस यही तो खीजना है।”
“और वही नहीं मिल रहा है। है न विडंबना?” दोनों मौन हो गए।
चलचित्र अभी भी स्वत: चल रहे थे, दोनों की आँखें उसे देख तो रही थी किन्तु उस पर किसी का भी ध्यान नहीं था। मन कहीं अन्यत्र थे।
“सारा जी चलिए, चलते हैं।” सहसा शैल बोल उठा।
“घर जाने का मन ही नहीं हो रहा है, शैल।”
“घर नहीं जाना है हमें।”
“तो?”
“उस सीमा पर चलते हैं, उस घटना स्थल पर चलते हैं।”
“चलो।”
()()()()
“यहाँ से मृतदेह मिला था।” शैल ने स्थान बताते हुए कहा।
“तो यह है घटना स्थल?” सारा ने कहा और नदी के प्रवाह को ध्यान से देखने लगी।
“हाँ, यही है।”
“तुम मुझे अबतक यहाँ लेकर क्यों नहीं आए?”
“मेरे पास इसका कोई उत्तर नहीं है।”
“कोई बात नहीं।” सारा अभी भी नदी के प्रवाह को देख रही थी। नदी की प्रत्येक लहर का निरीक्षण किया पश्चात तट के प्रत्येक कण कण को भी देखते हुए बोली, “यहाँ तो कोई कड़ी नहीं दिख रही। ऐसा घटना स्थल पूर्व में कभी नहीं देखा।”
“सारा जी, यहाँ कुछ मिलने वाला भी नहीं है।”
“ऐसा क्यों कह रहे हो?”
“क्यों की यहाँ नदी का गतिमान प्रवाह है। यहाँ कुछ भी ठहरता नहीं है। यदि यहाँ कुछ होता भी तो जल प्रवाह में बहकर कहीं विलुप्त हो गया होगा।”
“हाँ, नदी तो निरंतर बहती रहती है। जिस नदी ने उस मृतदेह को यहाँ लाकर रख दिया था वह नदी तो कहीं दूर निकल गई है।”
“और अपने साथ सभी प्रमाणों को भी बहा ले गई है।”
“तो क्या हमें नदी के प्रवाह के साथ उसके अंतिम बिन्दु तक जाना होगा?”
“हो सकता है।”
“अर्थात पुन: नदी के पीछे पीछे पाकिस्तान में जाना पड़ेगा?”
“हाँ, जाना चाहिए यदि रहस्य तक पहुंचना हो तो।”
“मैं नहीं जानेवाली अब कभी पाकिस्तान में।”
“कभी नहीं से क्या तात्पर्य है?”
“कभी नहीं।”
“ऐसा क्यों कह रही हो? जब यह घटना, यह विषय सम्पन्न हो जाएगा तब तो आपको लौटना होगा आपके अपने देश पाकिस्तान में।”
“मैं निश्चय कर चुकी हूँ, किसी भी स्थित में मैं वहाँ नहीं जाऊँगी।”
“आपने ऐसा दूसरी बार कहा है। क्या कोई विशेष कारण है?”
“हाँ, है।”
“ठीक है। आपके अपने कारण होंगे। उसे जानने की मुझे अभी रुचि नहीं है। अभी तो इस विषय का रहस्य जानने की चिंता है, रुचि है।”
शैल उस स्थान पर घूमने लगा। सहसा नदी के समीप गया। नदी के जल में पग रख दिया। जल की शीतलता ने उसके समग्र तन में एक प्रवाह संचारित कर दिया। वह झुका, नदी के जल से अपनी हथेली भर ली। कुछ क्षण हथेली को, हथेली में रहे जल को देखता रहा। सहसा दूर पश्चिम आकाश में अस्त हो रहे सूर्य का प्रतिबिंब हथेली में रहे जल में देखा। उसने हथेली के जल को स्थिर किया। सूर्य प्रतिबिम्ब स्थिर हो गया। प्रतिबिंब से उसने बिम्ब की तरफ देखा। सूर्य अस्त होने ही वाला था। बड़ा सा गोल सूर्य! लाल सूर्य! शैल ने प्रतिबिंब को देखने के लिए हथेली के जल को देखा। हथेली का पानी सरक कर नदी में घुल गया था। खाली हथेली देख शैल बोला, “हथेली खाली क्यों रह जाती है? अभी अभी तो भरपूर थी, अब खाली?”
“इस घटना में भी हमारी हथेली खाली ही है, शैल।”
“सारा जी, आप?” शैल चोंक गया। “मैं तो बस यूं ही कह रहा था।”
“सत्य कह रहे थे।” सारा ने गहन श्वास ली।
शैल ने अस्ताचल के सूर्य को देखा, हथेली में पानी भरा और अस्त हो रहे सूर्य को अर्घ्य दिया। शैल को देखकर सारा ने भी वही किया। क्षणभर पश्चात वह पुछ बैठी, “तुमने डूबते हुए सूर्य को अर्घ्य दिया। किन्तु आप लोग तो उदय होते हुए सूर्य को अर्घ्य देते हो न?”
“आपने भी तो अस्त हो रहे सूर्य को अर्घ्य दिया न?”
“वह तो तुम्हें देखकर। अस्त होता सूर्य तो अंत का प्रतीक है न?”
“नहीं, नए प्रारंभ का प्रतीक है वह।”
“क्या?”
“अस्त होता सूर्य कहता है कि मैं विश्राम करने जा रहा हूँ क्यों कि अब रात्री होगी। समग्र संसार को भी अब विश्राम की आवश्यकता है।”
“यही तो अंत है न?”
“प्रत्येक अंत किसी न किसी नए आरंभ की तरफ ले जाता है।”
“और प्रत्येक रात्री नए प्रभात की तरफ!” अपने शब्दों पर सारा हंस पड़ी। मुक्त मन से हंसती रही। नदी के निनाद में मिश्रित होता हुआ सारा का हास्य सुंदर – मधुर – कर्णप्रिय संगीत का सर्जन कर रहा था। शैल उसे सुनते हुए अस्त हो गए सूर्य के द्वारा व्याप्त अनेकों रंगों से भरे आकाश को देखता रहा।