चंदेला — भाग 3
लेखक: राज फुलवरे
तीसरा पाठ — प्रकाश की जिम्मेदारी
कांता अब केवल एक नाम नहीं रही थी। वह एक प्रतीक बन चुकी थी — एक ऐसी लौ, जो अंधेरे में उगी थी और आँधियों के बावजूद बुझी नहीं। जिस गाँव ने कभी उसे चुड़ैल कहा था, वही गाँव अब उसे आदर और भय के मिले-जुले भाव से “चंदेला” कहकर पुकारता था। यह नाम अब किसी औरत का नहीं, एक विचार का था — सच का, साहस का, और जिम्मेदारी का।
पर कांता यह भी जानती थी कि सच का सामने आ जाना ही लड़ाई का अंत नहीं होता। सच के उजाले में खड़े रहना, हर दिन, हर फैसले में — यही असली परीक्षा होती है।
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1. बदली हुई नज़रें, अधूरा बदलाव
शादी के बाद कांता और इंस्पेक्टर सूरज देशमुख कुछ समय के लिए शहर चले गए। शहर की चौड़ी सड़कों, तेज़ रफ्तार गाड़ियों और ऊँची इमारतों के बीच कांता को राहत भी मिलती थी और बेचैनी भी। राहत इसलिए कि यहाँ कोई उसे घूरकर नहीं देखता था, और बेचैनी इसलिए कि उसका मन बार-बार चंदेला की गलियों में भटक जाता था।
एक शाम बालकनी में खड़े-खड़े उसने सूरज से कहा,
“तुम्हें लगता है, सूरज, कि चंदेला बदल गया होगा?”
सूरज ने थोड़ी देर चुप रहकर जवाब दिया, “कानून बदल देता है चेहरे, कांता… पर सोच बदलने में वक़्त लगता है।”
कुछ महीनों बाद जब वे चंदेला लौटे, तो बदलाव और अधूरेपन की तस्वीर साफ़ दिखने लगी। सरपंच जेल में था, उसके गुंडे गाँव से गायब थे, पर डर अब भी ज़िंदा था — बस उसने चुप्पी का नया रूप पहन लिया था।
औरतें अब खुलकर बोलती थीं, पर फैसले अब भी मर्दों की बैठक में होते थे। चौपाल में कुर्सियाँ बदली थीं, पर बैठने का हक़ अब भी वही तय करता था।
कांता यह सब देख रही थी। एक दिन वह गाँव की चौपाल में खड़ी हुई। धूप ठीक सिर के ऊपर थी और हवा में मिट्टी की महक घुली हुई थी। उसने दृढ़ आवाज़ में कहा,
“सिर्फ एक आदमी के जेल जाने से व्यवस्था नहीं बदलती। व्यवस्था तब बदलती है, जब सोच बदलती है।”
कुछ लोग सिर झुकाकर सुन रहे थे, कुछ अब भी असहज थे। किसी ने खाँसकर बात बदलनी चाही, पर कांता की निगाहें उनके भीतर तक उतर गईं।
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2. सवाल जो चुभते हैं
कांता ने औरतों की एक खुली बैठक बुलाई — बिना पर्दे, बिना डर। चौपाल के पीछे पीपल के पेड़ के नीचे दरी बिछी थी। पहली बार औरतें इस तरह खुले में बैठी थीं।
कांता ने पहला सवाल पूछा,
“तुम्हें आज़ादी मिली है… पर क्या तुम उसे जी भी रही हो?”
सन्नाटा छा गया। चिड़ियों की आवाज़ें भी जैसे रुक गई हों।
कुछ देर बाद एक बुज़ुर्ग औरत, धुली हुई साड़ी और काँपते हाथों के साथ बोली,
“डर अभी भी है, बेटी। बस अब मार नहीं पड़ती।”
कांता की आँखें भर आईं। उसने आगे बढ़कर उस औरत का हाथ पकड़ा और बोली,
“डर का न होना ही आज़ादी नहीं है। डर के बावजूद बोल पाना आज़ादी है।”
यहीं से स्त्री संवाद मंडल की नींव पड़ी — एक ऐसा मंच जहाँ औरतें सिर्फ अपने दुःख नहीं, अपने सपने भी रख सकती थीं।
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3. सूरज का स्थानांतरण
इसी बीच एक खबर आई — इंस्पेक्टर सूरज देशमुख का ट्रांसफर हो गया था।
कांता मुस्कुराई, पर भीतर कुछ टूट गया।
सूरज ने कहा,
“मैं जहाँ रहूँगा, वहीं सच के साथ रहूँगा। और तुम… तुम चंदेला हो, तुम यहीं रहोगी।”
कांता ने धीरे से जवाब दिया,
“वर्दी के बिना लड़ना मुश्किल होता है, सूरज।”
सूरज ने उसका हाथ थाम लिया,
“पर सच बिना वर्दी के ही सबसे ज़्यादा ताक़तवर होता है।”
सूरज चला गया, और कांता रुक गई। अब उसे अकेले लड़ना था — बिना वर्दी की ताक़त के, सिर्फ अपने विश्वास के सहारे।
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4. नई सत्ता, पुरानी सोच
कुछ महीनों बाद नए चुनाव हुए। नया सरपंच चुना गया — नाम बदला, चेहरा बदला, पर सोच?
पहली बैठक में ही कांता को एहसास हो गया।
“औरतें घर तक सीमित रहेंगी।” “बहुत बोलने से गाँव बदनाम होता है।”
ये वाक्य फिर लौट आए थे।
कांता खड़ी हुई। उसकी आवाज़ शांत थी, पर शब्द तीखे थे,
“बदनामी अपराध से होती है, सवाल से नहीं।”
सभा में खामोशी छा गई। कुछ आँखें झुकीं, कुछ में गुस्सा उभरा।
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5. एक और साज़िश
इस बार हमला सीधा नहीं था। अब हमला था चरित्र पर, विचारों पर।
कहा जाने लगा,
“शादी के बाद औरत को चुप हो जाना चाहिए।” “ये बाहर के विचार गाँव बिगाड़ रहे हैं।”
कांता समझ गई — यह वही तंत्र है, बस नया चेहरा पहनकर।
उसने खुद से कहा,
“अगर मैं चुप रही, तो यह चुप्पी मेरी हार होगी।”
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6. चंदेला की असली परीक्षा
एक रात गाँव की एक लड़की — गौरी — रोती हुई कांता के पास आई। उसका चेहरा आँसुओं से भीगा था और आँखों में डर जमी हुई थी।
“दीदी… मेरे साथ…”, शब्द उसके गले में अटक गए।
कांता ने उसे सीने से लगाया। उसे सब समझ आ गया।
इस बार वह चुप नहीं रही। उसने थाने, मीडिया और समाज — तीनों का सामना किया।
कांता ने सबके सामने कहा,
“अगर आज हम चुप रहे, तो कल हर बेटी अकेली होगी।”
यह मामला पूरे जिले में गूंज उठा।
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7. कांता नहीं, एक आंदोलन
अब कांता अकेली नहीं थी। उसके साथ खड़ी थीं — गाँव की औरतें, लड़कियाँ, और कुछ ईमानदार पुरुष भी।
चंदेला में पहली बार औरतों ने पंचायत में बैठना शुरू किया।
कांता ने कहा,
“मुझे नेता मत बनाओ। खुद को मज़बूत बनाओ।”
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8. अंत नहीं, शुरुआत
सूरज की चिट्ठी आई,
“तुम सही थी, कांता। सच की लड़ाई किसी एक जगह की नहीं होती।”
कांता ने पत्र बंद किया और आसमान की ओर देखा। अब उसे डर नहीं था।
क्योंकि वह जान चुकी थी —
चंदेला कोई औरत नहीं, एक जिम्मेदारी है।
और वह जिम्मेदारी अब एक से सैकड़ों में बँट चुकी थी।
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तीसरे पाठ का संदेश
“अंधेरा एक व्यक्ति से नहीं बनता, और रोशनी भी एक से नहीं फैलती। जब एक औरत खड़ी होती है, तो वह सिर्फ खुद को नहीं — पूरी पीढ़ी को सीधा खड़ा करना सिखाती है।”
नारी शक्ति है..