UJJAIN EXPRESS - 6 in Hindi Moral Stories by Lakhan Nagar books and stories PDF | उज्जैन एक्सप्रेस - 6

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उज्जैन एक्सप्रेस - 6

एक महीना बीत चुका था...

 

उज्जैन स्टेशन की वही चिरपरिचित चुप्पी अब भी बरकरार थी। ट्रेनों की आवाज़ें, यात्रियों की भीड़, और उस एकांत बेंच की खामोशी — सब कुछ वैसा ही था। लेकिन अब वहाँ हवा में एक अदृश्य भारीपन था, जिसे कोई देख नहीं सकता था, पर महसूस हर कोई करता था।

 

एक सुबह शहर की नींद एक अख़बार की ख़बर ने तोड़ दी:

 

"पिछले एक महीने में पाँच युवाओं ने उज्जैन एक्सप्रेस के सामने कूदकर आत्महत्या की। पाँचों की जेब से एक-एक डायरी मिली, जिनमें उनकी अंतिम लिखावट थी — पर सबसे हैरान करने वाली बात ये थी कि हर डायरी में एक लड़की का नाम प्रमुखता से लिखा गया था — मीरा, श्वेता, मीना, पायल और श्रुति  ।"

 

पुलिस और पत्रकारों की जाँच में जो सामने आया, वो रूह कंपा देने वाला था।

इन पाँचों नामों की पहले से रिपोर्ट दर्ज थी। इन  पाँचों लड़कियो ने  पिछले साल, इसी उज्जैन एक्सप्रेस के सामने कूदकर अपनी जान दे चुकी थीं।

रमन की डायरी में मीरा का ज़िक्र था, जिसने उसे ज़िंदगी की नई परिभाषा दी थी। नरेश की डायरी में श्वेता का नाम था, जो हल्के अंदाज़ में उसकी आत्मा के सबसे भारी हिस्सों को छू गई थी। अमृत  की जेब में मीना का नाम था, जिसने उसके स्टार्टअप के सपने में फिर से जान डालने की कोशिश की थी। सौरभ ने पायल को याद किया था, जिसने उसके अंधेरे को देखा था। और सुनील... उसने अपनी आखिरी लाइन में लिखा था — “श्रुति  ने मुझे फिर से साँस लेना सिखाया।”

पर इन सभी लड़कियों की फाइलें पुलिस स्टेशन की धूल भरी अलमारियों में पहले से दर्ज थीं। उनकी तस्वीरें, उनके केस नंबर, उनके अंतिम पत्र — सबकुछ...

तो फिर...

वो कौन थीं, जो उन रातों में आईं? जो इतने टूटे हुए लड़कों के ज़ख्मों पर अपने शब्दों से मरहम रख गईं?

क्या वो सिर्फ कल्पनाएँ थीं? या वो आत्माएँ थीं — अधूरी, भटकी हुई, जिन्होंने किसी और की ज़िंदगी बचाकर अपने अधूरेपन को थोड़ी देर के लिए पूरा किया?

या फिर...

ज़िंदगी जब किसी को बहुत गहराई में तोड़ती है, तो कहीं न कहीं से कोई टुकड़ा लौट आता है — शायद किसी और की साँस बनकर।

यह कोई संयोग नहीं था। ये पाँचों आत्महत्याएँ एक अदृश्य धागे से जुड़ी थीं। और वो धागा इन पांचों लड़कियों की आत्मा थी — जो शायद खुद की जान देकर, किसी और को आखिरी बार मुस्कराना सिखाना चाहती थीं।

 

उज्जैन एक्सप्रेस अब सिर्फ एक ट्रेन नहीं थी। वो एक मोड़ बन चुकी थी — जहाँ कुछ ज़िंदगियाँ खत्म हुईं, और कुछ... बस अधूरी रह गईं।

और अब प्लेटफॉर्म की वो आखिरी बेंच, सिर्फ एक बेंच नहीं रही — वो एक गवाह बन चुकी थी। उन अधूरी मुलाक़ातों की, उन डूबती आवाज़ों की, और उन आत्माओं की... जो लौट आई थीं, सिर्फ किसी और को टूटने से रोकने के लिए।


कभी-कभी सोचता हूँ,अगर समझाने से ही सब कुछ बदल जाता, तो न वो लड़कियाँ आत्महत्या करतीं... न वो लड़के, जिन्हें उन्होंने समझाया था।

हममें से हर कोई किसी न किसी मोड़ पर सलाह देने वाला होता है — दोस्त, शिक्षक, प्रेमी या एक अजनबी। हम कहते हैं, “सब ठीक हो जाएगा।” लेकिन सच यह है कि कुछ दुख इतने गहरे होते हैं कि शब्द वहाँ पहुँच ही नहीं पाते। वे केवल सुने जा सकते हैं, समझे नहीं जा सकते।

समझाना आसान है, पर समझ पाना मुश्किल। और जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी यही है — कि सबसे ज़्यादा टूटे हुए लोगों से सबसे कम बोला जाता हैं।

इन लड़कियों ने जिन लड़कों को रोका, वो खुद पहले ही उस मोड़ से गुजर चुकी थीं। उन्होंने जो शब्द बोले, शायद वही शब्द किसी दिन उन्हें भी सुनने को मिले थे — लेकिन वो उनके भीतर असर नहीं कर सके।

क्योंकि कुछ दर्द ऐसे होते हैं, जो केवल अंदर से महसूस होते हैं। और जब दर्द, साँसों से गहरा हो जाए — तो ज़िंदगी खुद छोटी लगने लगती है।
कभी-कभी प्रेम, सलाह, और तर्क भी नाकाफी होते हैं। ज़रूरत होती है सिर्फ एक साथ की, एक मौन की जो चीख बन जाए।

और शायद यही वजह थी कि वे पाँच आत्माएँ लौट आईं — ताकि जो दर्द वे खुद नहीं सह सकीं, वो किसी और को जीने की वजह बन जाए। 
पर नहीं , शायद समाज का सत्य कुछ और ही हैं। कितना दुखद हैं ना कि दुनिया की सबसे हसीन कल्पनाओ में से एक यह भी हैं कि – जिंदगी खत्म हो जाने से दुःख , दर्द , पीड़ा , ग्लानी , प्रेम , प्रतिष्ठा जैसे भाव भी खत्म हो जाते हैं ; यह बात हर विवेकशील प्राणी के लिए हमेशा से हास्यास्पद रही हैं कि लोग आत्महत्या जैसे कदम केवल इस भ्रांति में उठा लेते हैं कि मौत के पार की दुनिया हसीन हैं या इस दुनिया के दुखों से तो कम से कम बढ़िया ही हैं , परन्तु यदि इसमें थोड़ी सी भी सच्चाई होती तो इस बात में कोई हर्ज नहीं कि दुनिया का हर विवेकशील प्राणी मौत को जिंदगी से बढ़कर मानता , और मौत की दुखी जीवन पर वरीयता देता परन्तु ऐसा कुछ नहीं हैं ; मौत के बाद सुख की कल्पना करना उतना की यादृच्छिक हैं जितना हर सट्टेबाज का यह सोचना हैं कि इसके बाद सब सही हो जायेगा ।

 कभी-कभी मन में आता हैं कि अपने इतिहास में सबसे विवेकशील प्राणी होने के बावजूद भी मनुष्य ही एकमात्र प्राणी हैं जो पीड़ा निवारक की दवाई के रूप में आत्महत्या को चुनता हैं , शायद मानव समाज को अब पृथ्वी पर इस बात की सार्वजनिक रूप से घोषणा कर देनी चाइये की हमने सभी दुखो के इलाज के रूप में काल्पनिक प्रचलित दवाई – आत्महत्या को सर्वसम्मति प्रदान कर दी हैं , और हम यह बात मान चुके हैं कि मौत सब दुखों का अंत हैं , जैसे हमने यह मान रखा हैं कि मरने के बाद स्वर्ग या नरक मिलेगा ,, जन्नत या दौज़ख़ मिलेगा ; इस बात में कोई संदेह नहीं हैं कि मानव इतिहास की सबसे बड़ी क्षतियों के प्रमुख कारणों में से एक पारलौकिक फूहड़ कल्पनाएँ ( यूटोपिया) भी हैं , और मानव इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदी यह हैं कि इन कल्पनाओं को सामाजिक स्वीकृति प्राप्त हैं , हमारे अपने समाज की स्वीकृति , जो शायद हमने ही मिलकर दी हैं , मैंने , आपने , हम सबने ।