Maharana Pratap - Chapter 2 in Hindi Love Stories by Aarushi Singh Rajput books and stories PDF | Maharana Pratap - Chapter 2

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Maharana Pratap - Chapter 2

राजमहल के सभा-कक्ष में सन्नाटा पसरा था। कुंवर प्रताप हल्की सी मुस्कान के साथ बोले,
“दाजीराज, मीरा माँ … घर वापस कब आती थी?”

उनके प्रश्न के साथ ही सबकी नज़रें एक साथ राणा उदय सिंह जी की ओर मुड़ गईं।
कुँवर प्रताप, अपने उत्तर की प्रतीक्षा करते हुए, शांत भाव से पिता की ओर देखने लगे।

राणा उदय सिंह ने कुछ पल मौन साधा, फिर धीमे स्वर में बोले  “नहीं लौटती थी, प्रताप। क्यों लौटती?
इतने अपमान और कठोरता से भरे संसार में उसके लिए क्या था?

“उसका दिव्य स्वभाव इस राजमहल की कठोर रीतियों के बोझ मर्यादाओं में घुट गया था…”
इतना कहकर राणा उदय सिंह कुछ पल के लिए मौन हो गए, जैसे किसी पुराने दृश्य में लौट गए हों।

महल की गूंजती गलियों में वह दिन अब भी ताज़ा था—
उदाबाई, गुस्से में तपती हुई, मीरा बाई का हाथ पकड़कर उन्हें जबरन खींचते हुए ले जा रही थीं।
उनकी आँखों में क्रोध था, शब्दों में तिरस्कार।

“राजघराने की बहू होकर तुम सड़कों पर उतरती हो!
भिखारियों और साधारण लोगों के बीच भजन गाती हो!
आज हम तुम्हें ऐसा पाठ पढ़ाएँगे कि अगली बार गाने से पहले तुम्हारी आत्मा काँपेगी!”

इतना कहकर उन्होंने मीरा बाई को एक बड़े कक्ष में धकेल दिया।
धक्का इतना तेज़ था कि मीरा बाई का सिर एक खंभे से जा टकराया।
वह गिर पड़ीं, पर आँखों में आँसू नहीं थे बस कृष्ण नाम का उजाला था।

उदाबाई ने दरवाज़ा बंद किया और तेज़ क़दमों से अपने  विक्रमादित्य के पास पहुँचीं।
“भाई, अब ध्यान रखना मीरा बाई को अन्न-जल न मिले।
इसे हम अब ऐसी सज़ा देंगे कि ये फिर कभी बाहर जाने का साहस न करे!”

विक्रमादित्य ने अपनी बहन के क्रोध को शांति से सुनते हुए कहा 

“ठीक है, बहना। जैसा तुम कहो, वैसा ही होगा।”

राणा उदय सिंह जी की आँखें अतीत के उस अंधेरे से बाहर आईं।
कुंवर प्रताप अब भी मौन थे, पर उनकी दृष्टि तीव्र थी
“तो… भूखों मरने के लिए कक्ष में बंद कर दिया गया था मीरा माँ को?
महल की इन चारदीवारियों में किसी ने कुछ कहा नहीं?
किसी ने रोका नहीं?”

उदय सिंह जी ने गहरी साँस ली
“नहीं प्रताप, मीरा भाभी अकेली नहीं थीं…
उनका साथ देने वाली भी कोई थीं।”

कुंवर प्रताप ने विस्मय से पिता की ओर देखा,
“कौन, दाजीराज?”

राणा उदय सिंह जी ने हल्की मुस्कान के साथ कहा
“तुम्हारी दादी माँ… रानी कर्णावती।
राजपूताना की मर्यादा के कारण उन्हें सबके सामने कठोर दिखना पड़ता था,
पर जब भी वो अकेली होतीं, मीरा भाभी के लिए उनका स्नेह उमड़ पड़ता था।
उनका हृदय जानता था कि यह औरत कोई साधारण स्त्री नहीं एक साध्वी, एक भक्त है। 

उधर दरबार-ए-आगरा में…

महल की दीवारों के पार, मुग़ल दरबार में भी उसी नाम की चर्चा थी।
शाहंशाह जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर अपने दरबार में बैठे थे,
और उनकी बाड़ी अम्मा महामंगा हँसते हुए बोलीं 
“शाहंशाह, सुना है एक औरत अपने जिंदा पति को छोड़
किसी बुत को अपना खाविंद मान बैठी?
और आप, इतनी दूर द्वारका तक, उसके किस्से सुनने जा रहे हैं!”

जलाल की आँखों में झिलमिलाती चिंगारी उतर आई।
उन्होंने तनसेंग की ओर देखते हुए कहा 
“मियाँ तनसेंग, हम यह उम्मीद करते हैं कि आप हमारे सामने
किसी झूठे अफ़साने का बयान करने नहीं आए हैं।”

तनसेंग ने सिर झुकाकर उत्तर दिया 
“जहाँपनाह, जिसे आप अफ़साना कह रहे हैं,
वह मेवाड़ का इतिहास है।
हमारी पीढ़ियों की पवित्र धरोहर।
जिस मीरा बाई को आप ‘औरत’ कह रहे हैं,
वह सात वर्ष की आयु में ही अपने भीतर ईश्वर का साक्षात्कार पा चुकी थी।
उसने कृष्ण की मूर्ति में भगवान को जीवित पाया था।
और उसी क्षण से उसका हृदय उसी में विलीन हो गया।”

मेवाड़ में...
राणा उदय सिंह जी बोले 
“मीरा भाभी के घरवालों को लगा था कि यह सब बचपना है।
जब विवाह होगा, तो यह सब समाप्त हो जाएगा।
पर हुआ उल्टा 

उनका प्रेम, उनकी भक्ति, और गहरी हो गई।
कृष्ण अब उनके पति, स्वामी और जीवन बन चुके थे।”

उन्होंने थोड़ी देर रुककर सबकी ओर देखा 
“ दादा भाई को अपनी पत्नी से कोई शिकायत न थी।
मीरा भाभी सदा अपने पति का ध्यान रखती थीं,
एक कर्तव्यपरायण पत्नी थीं।
बस… उनके बीच पति पत्नी का बंधन नहीं था,
किन्तु प्रेम और स्नेह संपूर्ण था 

उसी समय, कक्ष में एक दासी आई।
“खम्मा घणी, हुकुम। राजपुरोहित जी पधारे हैं।
आपसे मिलना चाहते हैं।”

“उन्हें आदर सहित भीतर लाओ,”
राणा जी ने कहा।

कुछ क्षण बाद, एक वृद्ध ब्राह्मण भीतर आए 
सिर झुकाकर बोले,
“खम्मा घणी, हुकुम।
यह समाचार फैल चुका है कि बाबुजी राज मीरा बाई को चित्तौड़ लाने हेतु ब्राह्मणों के दल के साथ द्वारका जा रहे हैं।
सभी ब्राह्मण इस कार्य में सम्मिलित होने को तत्पर हैं।”

कुँवर प्रताप ने प्रसन्न होकर कहा 
“यह तो अत्यंत शुभ समाचार है, राजपुरोहित जी।
आप सब ब्राह्मणों को कहिए 
हम भी उसी दल में सम्मिलित होंगे।
सुबह सूर्यदेव के उदय के साथ प्रस्थान करेंगे।
पर ध्यान रहे, द्वारका अब शत्रु राज्य का क्षेत्र है,
इसलिए हम अपनी वास्तविक पहचान गुप्त रखेंगे।
हम ब्राह्मणों के वेश में चलेंगे।
और मीरा माँ को चित्तौड़ लाने का पूर्ण प्रयास करेंगे।
भगवान से यही प्रार्थना है कि
राजपरिवार ने उनके साथ जो अन्याय किया,
उसके लिए वे हमें क्षमा करें और साथ लौट आएँ।”

राजपुरोहित जी ने दोनों हाथ जोड़कर कहा 
“खम्मा घणी, हुकुम। जैसा आप चाहें।”
और प्रणाम कर वहाँ से चले गए।