Antarnihit - 35 in Hindi Classic Stories by Vrajesh Shashikant Dave books and stories PDF | अन्तर्निहित - 35

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अन्तर्निहित - 35

[35]

वत्सर ने संध्या आरती सम्पन्न की। कृष्ण के अधरों पर स्थित बाँसुरी को उठाया और शीला पर बैठकर नित्यक्रम से उसे बजाने के लिए गर्भगृह से जैसे ही बाहर निकला तो उसने अपने सम्मुख पुलिस अधिकारी को पाया। वह रुक गया। प्रश्न के साथ उसने अधिकारी को देखा। 

“वत्सर, तुम्हें हमारे साथ चलना होगा। अभी, इसी समय।” अधिकारी ने कहा। 

“कहाँ और क्यों?”

“हम पंजाब पुलिस से हैं। हमारे साथ तुम्हें फिरोजपुर चलना होगा। मीरा मृत्यु घटना के संदर्भ में। यह रहा न्यायालय का सूचना पत्र। दो दिन पश्चात तुम्हें न्यायालय में प्रस्तुत किया जाएगा। तब तक तुम हमारे कारावास में रहोगे।”

“कौन मीरा?”

“वही लड़की जो तुम्हारे शिल्प की भांति सतलज नदी से मरी हुई मिली थी।”

वत्सर को सब समज आ गया। उसने अधिकारी से पत्र लिया, पढ़ा और बोला, “मैं न्यायालय के पत्र का सम्मान करता हूँ। मुझे बस कुछ समय दीजिए। तब तक मैं भगवान के शयन की विधि सम्पन्न कर लेता हूँ।”

“इतना समय नहीं है हमारे पास। तुम्हें अभी चलना होगा।”

अधिकारी ने वत्सर का हाथ पकडा और खींचने लगा। वत्सर ने झटके से हाथ छुड़ाया। झटका इतना तीव्र था कि अधिकारी के पूरे तन में एक प्रवाह बह गया। अधिकारी को वत्सर से ऐसी प्रतिक्रिया की अपेक्षा नहीं थी। वह मन से आहत हुआ तथापि दूसरी बार वत्सर का हाथ पकड़ने का साहस नहीं कर पाया। 

“तुम इस प्रकार पुलिस पर घात नहीं कर सकते, वत्सर।”

“क्या नाम है, आपका?”

“राहुल खान, पुलिस इंस्पेक्टर फिरोजपुर, पंजाब।”

“शैल जी और सारा जी कहाँ हैं?”

“अब उन दोनों को इस घटना से मुक्त कर दिया गया है। अब मैं और सोनिया यह कार्य कर रहे हैं।”

राहुल ने सोनिया की तरफ संकेत किया। वत्सर ने उसे देखा। 

“वत्सर, चलो। अब और कोई बात नहीं।” सोनिया ने आदेश करते हुए कहा। 

“न्यायालय के पत्र अनुसार दो दिन पश्चात मुझे स्वत: उपस्थित होना है। अत: आपके साथ जाने के लिए मैं बाध्य नहीं हूँ। न ही आप मुझे बाध्य कर सकते हो।”

“तुम्हें हमारे साथ ही चलना होगा। हम तुम्हें लेकर ही चलेंगे।”

“आपका यह अधिकार है ही नहीं। आप जाइए, मैं स्वयं उपस्थित हो जाऊंगा।”

“हम तुम्हें घसीटकर भी ले जा सकते हैं।”

“प्रयास करके देख लो। मुझे घसीटने का साहस है आपमें?”

वत्सर के आव्हान से राहुल का अभिमान भंग हो गया। उसने अपनी रिवॉल्वर निकाली, वत्सर के सामने धर दी, “चलते हो या मैं गोली चला दूँ?”

राहुल के वाक्य पूर्ण होते ही कहीं से किसी ने राहुल के हाथ पर पत्थर मार दिया। रिवॉल्वर नीचे गिर पड़ी। राहुल ने देखा कि गाँव वालों की एक भीड़ वहाँ जुड़ चुकी थी। क्षण में उसने स्थिति का आकलन कर लिया। 

“ठीक है, मंगलवार को न्यायालय में आ जाना। इसमें चुकने पर गोली चलाने में मैं विलंब नहीं करूंगा।” राहुल ने अपनी रिवॉल्वर उठाई और लौट गया। 

वत्सर ने बाँसुरी यथा स्थान रखी, भगवान के शयन की प्रक्रिया पूर्ण की। अपने पूजा के श्वेत वस्त्र बदलकर सादे वस्त्र पहन लिए। 

मंदिर के द्वार बंद करते समय वत्सर ने एक दृष्टि कृष्ण की आँखों में डाली। कृष्ण ने स्मित दिया। उस स्मित का अर्थ वह जानता था। उसने कृष्ण को नमन किया और द्वार बंद करते हुए बोला, “तेरी लीला तू ही जाने। जब तक मैं लौटकर न आऊं, तुम यहीं रहना। तब तक यह द्वार बंद ही रहेंगे। कोई नहीं खोलेगा। मैं भी देखता हूँ कितने दिन तुम अंदर रहोगे!” वत्सर ने द्वार बंद किया। चला गया।

“गुरुजी, ऐसा क्यों होता है?”

“कैसा होता है?”

“असीम प्रयत्न करने पर भी हम जिसे प्राप्त करना चाहते हैं वह हाथ नहीं आ रहा है।”

“तुम जिस कार्य पर निकले हो उसमें सफलता होगी।”

“तो आप जानते हैं हमारा लक्ष्य क्या है?”

“उस लक्ष्य को आप दोनों अवश्य प्राप्त करोगे।”

“किन्तु कब?”

“जब उसका योग बनेगा तब।”

“कैसा योग?”

“जब तक आप दो रहोगे तब तक वह योग नहीं बनेगा। दो से चार हो जाओगे तभी योग बनेगा।”

“हम चार? अन्य दो से आपका संकेत कहीं राहुल और सोनिया की तरफ तो नहीं, गुरुजी?”

“नहीं गुरुजी, हम उन दोनों के साथ एक चरण भी नहीं चल सकते हैं। हमें चलना भी नहीं है।”

“तब तो लक्ष्य कभी नहीं मिलेगा, गुरुजी।”

“धैर्य रखो। जो दो व्यक्ति आपके साथ जुड़ेंगे वे राहुल – सोनिया नहीं होंगे।”

“कौन हो सकते हैं?”

“उचित समय की प्रतीक्षा करो, वत्स।”

“यह सब कब होगा? कैसे होगा?”

“सब होगा, अवश्य होगा। किन्तु उस मार्ग पर चलने से पूर्व आपको इस अभियान को एक बार छोड़ना पड़ेगा। अनेक घटनाओं का प्रतिकार करना पड़ेगा। अनेक संघर्ष करने पड़ेंगे। अनेक समस्याओं से पार उतरना पड़ेगा।”

“क्या हम दोनों उस पर विजय प्राप्त कर पाएंग?”

“दो नहीं, चार। जब आपके साथ वे दोनों जुड़ेंगे तभी आप उस मार्ग पर चल सकोगे।”

“जैसी गुरु जी की आज्ञा। अभी कल प्रात: हमें अपने मार्ग पर निकलना है।”

“कल का आपका मार्ग शुभ हो। अब विश्राम कर लो।”

दोनों गुरुजी को प्रणाम कर चले गए।