Vaarnika - 1 in Hindi Love Stories by Himanshu Singh books and stories PDF | वार्णिका - एक अनोखे प्रेम की दास्तां - 1

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वार्णिका - एक अनोखे प्रेम की दास्तां - 1

समय रात के लगभग 12:00 बजे,,,,,, 

रात के 12:00 बज चुके थे चारों और घन्ने अंधेरे के साथ साथ सन्नाटा पसर चुका था। आधे से भी ज्यादा शहर नींद की आगोश में जा चुका था।

तो वही लगभग एक पच्चीस साल की लड़की जिसका नाम वार्णिका है वह अपने बिस्तर पर चैन की नींद सो ही रही होती है की तभी उसको महसूस होता है जैसे किसी ने उसके सिर पर प्यार से अपना हाथ फैराया हो और उसके साथ ही उसको अपने कानों में किसी की आवाज सुनाई देती है।

वार्णिका,,वार्णिका,,उठो बेटा देखो तुमसे मिलने कौन आया है।

यह आवाज सुनते ही वार्णिका अपनी आँखों को थोड़ा सा खोलकर देखती है तो उसे लगता है जैसे कोई उसके पास खड़ा हो।

वह हड़बड़ाकर अपने बिस्तर पर उठकर जाती है और नींद में ही इधर उधर देखने लगती है तो उसे वहाँ कोई भी नज़र नही आता है।  

नींद में होने के कारण वार्णिका उसे अपना वहम समझकर वापस से अपने बेड पर जाकर सो जाती है पर कुछ ही देर बाद उसे एहसास होता है जैसे एक बार फिर किसी ने उसके कंधों पर अपना हाथ रखा हो।

वार्णिका,,, वार्णिका,,, वार्णिका,,, बेटा उठो देखो तुमसे मिलने कौन आया है ? तुमसे मिलने तुम्हारी माँ आई है।

जो वार्णिका अब तक सबकुछ अपना वहम समझकर आराम से सो रही थी माँ शब्द सुनते ही उसके चेहरे पर सुकून की मुस्कान छा जाती है।

वह फटाफट से अपने बिस्तर पर उठकर बैठ जाती है और नीचे उतरकर इधर से उधर भागते हुए कहती है।

माँ,, माँ,, आप कहाँ हो प्लीज माँ,, सामने आओ ना, आपको देखने के लिए मेरी आँखे ना जाने कबसे तरस रही है।

इतना बोलते ही वार्णिका की आँखों से आँसूं निकल पड़ते है और वह रोते-रोते नीचे जमीन पर घुटनों के बल बैठ जाती है।

तभी एक बार फिर वार्णिका को अपने कानों में अपनी माँ की आवाज सुनाई देती है।

वार्णिका देखो बेटा मैं कबसे बाहर आंगन में बैठकर तुम्हारा इंतज़ार कर रही हूँ वार्णिका बेटा जल्दी आओ।

यह सुनते ही वार्णिका अपनी आँखों से आँसू पोंछती है और जमींन से उठकर फटाफट से अपने कमरे का दरवाजा खोलती है और भागते हुए आंगन की ओर चली जाती है।

वार्णिका जैसे ही आंगन में पहुंचती है और इधर उधर अपनी नजरे दौड़ाती है तो इस बार भी उसे वहाँ कोई नज़र नही आता लेकिन तभी उसे आंगन से बाहर किसी के कदमों की आहट सुनाई देती है।

कदमों की आवाज सुनाई देते ही वार्णिका सोचती है की शायद उसकी माँ आंगन से बाहर खड़ी है वह बिना किसी देरी के आंगन के बाहर जाने लगती है और बोलती है।

माँ,, माँ,, माँ आप कहाँ हो ? प्लीज माँ रुको मुझे आपसे बात करनी है।

वार्णिका जब दरवाजा खोलती है तो उसे कोई नज़र नही आता है और वार्णिका मानों उसे किसी बात का कुछ होश ही न रहा हो वह तो बस कैसे भी करके अपनी माँ से मिलना चाहती थी।

वह बिना कुछ सोचे समझे माँ,,, माँ,,, पुकारती हुई आंगन का  दरवाजा खोलती है और सड़क की तरफ भाग पड़ती है तो वही उसके कानों में अपनी माँ की आवाज लगातार गूंजती रहती है।

माँ,,, माँ,,, प्लीज माँ,, सामने आओ। मै आ रही हूँ माँ,, इस बार मैं आपको कुछ नही होने दूंगी। वार्णिका खुदसे ही बड़बड़ाते हुए कहती है।

कुछ ही समय में वार्णिका सड़क के बिल्कुल बीचों बीच पहुँच जाती है उसके चारों सभी प्रकार की गाडियाँ अपनी रफ्तार से चल रही होती है।

तो वही वार्णिका सड़क के बीच खड़ी होकर इधर उधर नजरे दौड़ाकर देखती है तो उसे उसकी माँ कहीं दिखाई नही देती पर उसे अपने कानों में उनकी आवाज अभी भी सुनाई दे रही होती है, जिसकी वजह से वार्णिका अपने कानों पर हाथ रखते हुए जोर से चिल्लाती है और कहती है।

माँ,, माँ,, आप कहाँ हो माँ,, प्लीज सामने आओ, आप क्यों मुझे इस तरह से सता रही हैं ? 

काफी देर ऐसे ही चीखने चिल्लाने के बाद वार्णिका समझ जाती है की वह सब उसका वहम है उसे यहाँ कोई नही मिलने वाला तो वह अपने कदम वापस से घर की ओर ले लेती है।

वार्णिका जैसे ही अपने कदम वापस से घर की ओर लेती है तो उसकी आँखों पर तेज सी रोशनी पड़ती है वह जब सामने देखती है तो उसके पैरों तले जमीन खिसक जाती है।

क्योंकि सामने से एक कार तेज रफ्तार कार वार्णिका की ओर बढ़ रही होती है जिसे देखकर वह अपने होश खो बैठती है वह बेहोश होकर नीचे जमीन पर गिरने ही वाली होती है की तभी एक अनजान लड़का पीछे से उसका हाथ पकड़कर उसे अपनी ओर खींच लेता है।

वह लड़का वार्णिका का हाथ अपनी ओर खींचकर उसे अपनी बाहों में समेट लेता है वार्णिका बेहोशी की हालत में अपनी आँखों को थोड़ा-सा खोलती है और एक नज़र उस लड़के की आँखों में आँखें डालकर देखती है।

उस लड़के की आँखों में एक अजीब सी चमक थी एक अपना- पन था जैसे वह उसे पहली भी कहीं देख चुकी है जैसे वह उसे जानती है जैसे उनका एक दूसरे के संग पहले से कोई रिश्ता हो।

तो वही चांदनी रात की मध्य रोशनी से वार्णिका का चेहरा भी काफी दमक रहा था।

तुम ठीक तो हो ? वह लड़का वार्णिका की ओर देखते हुए धीरे से उससे पूछता है।

लेकिन वार्णिका वह उस लड़के की आँखों में खो चुकी थी वह अनजान लड़का जो कुछ भी उससे बोल रहा था वार्णिका सब अनसुना कर देती है।

वह तो बस एक टक उस लड़के की आँखों में देखे जा रही थी जैसे वह लड़का उसकी रूह में समा चुका हो। वह लड़का वार्णिका को देखकर कुछ कहने ही वाला होता है की वार्णिका अचानक से बेहोश हो जाती है।

वह लड़का बिना किसी देरी के वार्णिका को अपनी गोदी में  उठाता है और उसे सड़क के किनारे बैठा देता है उसकी आँखों में वार्णिका के लिए चिंता और अजीस-सा अपनापन था। वह लड़का मन ही मन सोचता है। 

आखिर कौन है यह लड़की ? क्यों इतनी अकेली है ? पहली मुलाकात में भी मुझे ऐसा क्यों लग रहा है जैसे मैं इसे पहले से जानता हूँ ?

To Be Continue Part - 2