“राजू… उठ जा बेटा… चल, काम पर नहीं जाना है क्या?”
राजू की माँ उसे रोज़ सुबह जल्दी जगा दिया करती थी, जिससे वह हमेशा चिढ़ जाता था। वह अपने कानों पर हाथ रखकर चादर फिर से मुँह तक खींच लिया करता था।
“माँ, थोड़ी देर और सोने दो ना…”
राजू मुँह बनाकर कहता।
माँ उसे अफ़सोस भरी नज़र से देखती और फिर दोबारा आवाज़ लगाती,
“राजू बेटा, सुबह जल्दी उठने से दिन अच्छा गुजरता है और इंसान के सारे काम बन जाते हैं।”
इतना कहकर माँ रसोई की ओर बढ़ जाती और राजू बड़बड़ाता रह जाता।
“हाँ, जल्दी उठने वाला सेठ बन जाता है जैसे…
एक कबाड़ी तो शाम तक कबाड़ी ही रहेगा।
यहाँ कौन-सा जल्दी उठकर स्कूल जाना है, दूसरे बच्चों की तरह…”
राजू अक्सर बिस्तर पर मुँह किए लेटा-लेटा सोचता रहता था। कच्चे से मकान की टूटी-फूटी खिड़की से सुबह की पहली किरण के साथ ही उसकी नींद खुल जाती थी। रात भर मच्छर सोने नहीं देते थे और सुबह होते ही दिन का उजाला और माँ की आवाज़ें शुरू हो जाती थीं।
एक बार नींद खराब हो जाती तो फिर दोबारा आती नहीं थी। फिर भी राजू कोशिश करता था कि थोड़ी देर और सो ले, क्योंकि उसके बाद उसे पूरा दिन दूसरे मोहल्लों में घूम-घूमकर फेरी लगानी होती थी और कबाड़ इकट्ठा करना होता था। शाम को वही कबाड़ बेचकर जो पैसे मिलते, वह माँ को दे देता, ताकि घर में खाना बन सके।
“माँ, मैं दूसरे बच्चों की तरह स्कूल क्यों नहीं जा सकता?”
राजू अक्सर अपनी माँ से यह सवाल करता था।
माँ उसके चेहरे को देखकर जवाब नहीं दे पाती थी और चुपचाप सोच में पड़ जाती थी। ग़रीब बस्ती में रहने वाले बच्चों को कौन समझाए कि स्कूल में पढ़ना भी आसान नहीं होता—स्कूल की किताबें, यूनिफ़ॉर्म, जूते, स्कूल बैग… आखिर राजू की माँ उसके लिए इतना पैसा कहाँ से लाती?
वह खुद पास के मोहल्लों में जाकर बर्तन और झाड़ू का काम करती थी, और बेचारा राजू अपनी उम्र से कहीं ज़्यादा मेहनत करता था। तब जाकर दोनों को दिन में दो वक्त का खाना नसीब होता था।
राजू सिर्फ़ 12 साल का था। उसका पिता भी यही काम करता था, लेकिन एक हादसे में उसकी मौत हो गई थी। पिता के जाने के बाद बेचारा राजू भी उनकी तरह फेरी लगाने लगा था। वह उम्र में बहुत छोटा था, लेकिन जब-जब वह अपने पिता के साथ जाता था, उसने देख रखा था कि फेरी का काम कैसे किया जाता है।
उसकी उम्र भले ही 12 साल थी, लेकिन वक्त ने उसे बहुत कुछ सिखा दिया था। माँ ने उसे बहुत मना किया था,
“मैं काम करती हूँ ना राजू, तुझे काम करने की ज़रूरत नहीं है।”
लेकिन राजू जानता था कि माँ अक्सर बीमार रहती है और ज़्यादा काम उसके बस का नहीं है। वह अपने पिता की तरह माँ को भी खोना नहीं चाहता था।
कुल मिलाकर वक्त बस कट रहा था। राजू अपनी ज़िंदगी से खुश नहीं था। वह कुछ बड़ा करने के बारे में सोचता रहता था—अपनी माँ को सुख देने के बारे में, एक अच्छी ज़िंदगी जीने की चाह उसके दिल को दिन-ब-दिन और कसकर जकड़ती जा रही थी।
दिन भर मोहल्ले-मोहल्ले जाकर फेरी लगाना, लोगों के घरों से कबाड़ उठाना और फिर उसे बेच आना… इससे ज़्यादा पैसे नहीं मिलते थे। कभी-कभी तो लोग उसे बच्चा समझकर उसके साथ धोखा भी कर जाते थे। राजू सब समझ जाता था, लेकिन कुछ कर नहीं पाता था।
एक दिन शाम को जब वह फेरी लगाकर घर लौटा, तो देखा कि माँ बिस्तर पर पड़ी हुई है। राजू दौड़कर माँ के पास आया।
“क्या हुआ है माँ?”
उसने जल्दी से माँ का माथा छुआ—काफी तेज़ बुखार था।
“कुछ नहीं हुआ… चल, तू हाथ-मुँह धो ले, मैं खाना लगा देती हूँ,”
माँ ने प्यार से उसका हाथ थामकर उसे बैठा दिया।
“नहीं माँ, मैं बाद में खा लूँगा। पहले तुम डॉक्टर के पास चलो, तुम्हें बुखार है,”
कहते हुए राजू ने माँ को सहारा देकर उठाया।
माँ जैसे ही उठकर चलने लगी, उसे ज़ोर का चक्कर आया और वह गिर पड़ी।
“माँ! क्या हुआ माँ!”
राजू चीख उठा।
माँ बेहोश हो चुकी थी।
राजू दौड़कर पड़ोस के घर से सावित्री मासी को बुला लाया।
“देखो ना मासी, माँ की तबीयत ठीक नहीं है। आप यहाँ रहो, मैं डॉक्टर से दवा लेकर आता हूँ।”
सावित्री मासी को माँ के पास छोड़कर राजू डॉक्टर को बुलाने दौड़ गया। सावित्री मासी ने माँ को ठीक से बिस्तर पर लिटाया और एक बर्तन में पानी लेकर कपड़े से उसके माथे पर गीली पट्टी रखने लगीं।
“उफ़… बुखार काफ़ी तेज़ है,”
उन्होंने चिंता से कहा।
थोड़ी देर में पास की क्लिनिक से एक कंपाउंडर-टाइप डॉक्टर आया। उसने सुधा को देखा और बोला,
“घबराने की बात नहीं है, बस बुखार ज़रा तेज़ है। मैं इंजेक्शन दे रहा हूँ और दवाइयाँ भी हैं। कुछ खिला-पिला देना, सुबह तक ठीक हो जाएगी।”
राजू ने दवाइयों की बात ध्यान से समझ ली थी। उसने डॉक्टर साहब की फ़ीस दी और फिर सावित्री मासी के पास आ गया।
“मैं भी चलती हूँ राजू। सुधा की तबीयत अब पहले से ठीक है। कोई ज़रूरत लगे तो मुझे बुला लेना,”
कहकर वह चली गईं।
राजू ने माँ को दूध के साथ दवा दी और फिर अच्छी तरह चादर ओढ़ाकर सुला दिया। माँ के सो जाने के बाद राजू बाहर आँगन में अपनी टूटी-सी चारपाई बिछाकर लेट गया।
उस समय रात के बारह बजने में कुछ ही मिनट बाकी थे। राजू चारपाई पर लेटा बस आसमान को घूर रहा था, जैसे मन-ही-मन भगवान से लड़ रहा हो।
“क्या सारे जहाँ में हम लोगों की किस्मत ही ऐसी होनी थी?
मेरे पिता को छीन लिया… अब अगर मेरी माँ को कुछ हो गया तो अच्छा नहीं होगा…”
सारे दिन की कमाई डॉक्टर ले गया था। अब वह सोच रहा था कि सुबह माँ के लिए दूध और ब्रेड कहाँ से लाएगा। दवा भी तो देनी थी। माँ कितनी कमज़ोर हो गई है—डॉक्टर ने कहा था कि उसे जूस भी पिलाना होगा।
यह सब सोचते-सोचते न जाने कब वह चारपाई से उठा और घर से बाहर निकलकर एक तरफ़ चल पड़ा। थोड़ी दूर एक सुनसान जगह पर पहुँचकर राजू ने आसमान की ओर मुँह उठाया और ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगा—
“मेरी माँ को मत मारना… मैंने क्या किया है?
मेरी ज़िंदगी इतनी बुरी क्यों बना दी? मैं इतना ग़रीब क्यों हूँ?
मैं दूसरे बच्चों की तरह खेल नहीं सकता, पढ़ नहीं सकता, स्कूल नहीं जा सकता।
अच्छे कपड़े नहीं पहन सकता… क्यों? आखिर क्यों?
मेरे साथ ऐसा क्यों किया भगवान? मैं बहुत नाराज़ हूँ…”
यह कहते-कहते राजू वहीं बैठकर रोने लगा।
आसमान में बादल घिर आए और ज़ोर से बिजली कड़क उठी। राजू डर गया। थोड़ी-थोड़ी बूँदें आसमान से गिरकर उसके गालों पर पड़ने लगीं। वह उठ खड़ा हुआ और घर की ओर चल पड़ा।
वह वापस अपने कच्चे मकान में आया, जहाँ उसकी माँ सो रही थी। राजू ने माँ के पास ही चादर बिछाई और वहीं लेटकर खुद भी सो गया।
सुबह उठकर राजू ने माँ को दवा दी और थोड़ा नाश्ता करवा दिया। खुद भी खा-पीकर वह अपनी फेरी पर निकल आया। माँ की तबीयत अब थोड़ी ठीक थी। राजू ने सोचा, “आज कहीं और चला जाऊँ, बड़े-बड़े बंगले की तरफ़। वहाँ से अच्छा सामान मिलेगा, उसे बेचकर अच्छे पैसे मिलेंगे। फिर माँ के लिए जूस, दूध और फल सब ले जाऊँगा।”
इसी सोच के साथ वह एक पॉश कॉलोनी में पहुँच गया।
“ए कबाड़ी वाली, ए लड़के, इधर आओ!”
साफ-सुथरी कॉलोनी के गेट पर चौकीदार अकड़ा हुआ बैठा था। दूर से ही बड़े-बड़े घर दिखाई दे रहे थे। राजू उन्हें हैरत से देख रहा था। “क्या ये महल हैं या घर?” उसने मन ही मन सोचा। तभी उसे याद आया—वो यहाँ फेरी लगाने और कबाड़ लेने आया था।
किसी आवाज़ ने उसका ध्यान भंग किया। दो घर छोड़कर एक घर के बाहर एक बाबू टाइप का आदमी अपनी गाड़ी के पास खड़ा था। उसके पास ही एक कुत्ता भी था। गले में पट्टा देखकर राजू समझ गया कि यही उसका कुत्ता है। चमचमाते, ब्राउन बालों वाला कुत्ता राजू की ओर देख रहा था। राजू उसके पास जाते हुए डर रहा था।
“तुम्हारे साथ और कोई नहीं है क्या?”
उस आदमी ने हैरत से छोटे राजू को देखा।
“नहीं साहब… मैं ही हूँ। आप बताइए, क्या देना है?”
हाँ, कुछ रद्दी है, अंदर से भिजवाता हूँ, ले जाकर जाना।””
आदमी उसे देखते हुए अंदर चला गया। उसका कुत्ता भी धीरे-धीरे उसके साथ अंदर चला गया।
राजू ने घर से कुछ पुराने अख़बार और किताबें ले लीं। बदले में उसने पैसे दिए, लेकिन उस साहब ने मना कर दिया। फिर भी राजू खुश होकर आगे बढ़ गया। उस दिन उसका फायदा हुआ, और घर लौटते समय उसने बहुत सारा सामान इकट्ठा कर लिया था।
आज के कबाड़ से राजू को अच्छे पैसे मिल गए थे। उसने इरादा कर लिया कि अब से वह उसी कॉलोनी में जाया करेगा। राजू खुशी-खुशी घर की ओर आ रहा था कि तभी कुछ लड़कों ने उसे घेर लिया।
राजू घबरा गया। सबके मुँह पर रूमाल बँधे थे। वे तीन लड़के थे। सड़क सुनसान थी। इसी का फ़ायदा उठाकर वे राजू को लूटने आ गए।
“ऐ, चल! जो भी तेरी जेब में है, सब इधर दे दे… जल्दी!”
एक लड़के ने चाकू जैसी चीज़ दिखाकर उसे डराते हुए कहा।
“नहीं, मेरे पास कुछ नहीं है… थोड़े-से पैसे हैं। मेरी माँ बीमार है, उसकी दवा लानी है…”
कहते हुए राजू ने अपनी शर्ट की जेब कसकर पकड़ ली।
तीनों हँसने लगे। वे उम्र में राजू से थोड़े बड़े और कद में भी लंबे थे।
“अच्छा! तो इसकी जेब में पैसे हैं… चल, इसका हाथ पकड़!”
कहते हुए उसने दूसरे लड़के की ओर इशारा किया।
दोनों लड़कों ने राजू के हाथ पकड़ लिए और तीसरे ने उसकी जेब से पैसे निकाल लिए। राजू छटपटाता रहा, रोता रहा, और वे पैसे लेकर जिस तरफ़ से आए थे, उसी तरफ़ दौड़ पड़े।
ज़रा देर पहले वह खुशी-खुशी सोच रहा था कि क्या-क्या करेगा, और अब अपने सारे किए-कराए पर पानी फिर चुका था। राजू वहीं सड़क पर बैठ गया। वह बेआवाज़ रो रहा था। फिर मन-ही-मन अपनी क़िस्मत को कोसते हुए घुटनों के बल बैठ गया और आसमान की ओर मुँह उठाकर गुस्से से बोला—
“अब चैन आ गया ना? मेरी माँ अब कभी ठीक नहीं होगी। उसकी दवा के पैसे वे लोग ले गए। बोलो, अब मैं क्या करूँ?
ये सारे ज़ुल्म मेरे साथ ही क्यों होते हैं? और जो बेबस लोगों को लूटते हैं, उनका तुम साथ देते हो… जानते हो तुम बस!”
यह कहते हुए राजू ने पास पड़ा एक पत्थर उठाया और ज़ोर से आसमान की तरफ़ फेंक दिया। उसी पल आसमान में बादल गरजे, बिजली कड़की और ज़ोर की बारिश शुरू हो गई।
राजू ने सिर झुकाया तो अपने सामने किसी चीज़ को चमकते हुए देखा। उसने हैरानी से उसे उठाया।
“माँगो… क्या माँगना है…”
बारिश की बूँदों के बीच उसके कानों में जैसे किसी ने फुसफुसाकर कहा।
वह एक छोटी-सी मूर्ति थी। राजू को लगा जैसे आवाज़ उसी मूर्ति से आई हो। वह डर गया और उसने उसे वापस ज़मीन पर रख दिया।
“ये क्या है? कौन है यहाँ?”
वह घबराकर बोला।
“घबराओ मत, राजू… माँगो, क्या माँगना है…”
वही आवाज़ फिर से सुनते ही राजू के होश उड़ गए। वह मूर्ति को वहीं छोड़कर, मूसलाधार बारिश में घर की ओर सरपट भागने लगा। थोड़ी देर पहले जो गुस्सा उसके भीतर था, सब उड़ चुका था।
तभी एक बार फिर ज़ोर से बिजली कड़की… और किसी के हँसने की आवाज़ राजू का पीछा करने लगी।