behind the scenes - 2 in Hindi Moral Stories by ARTI MEENA books and stories PDF | पर्दे के पीछे - 2

Featured Books
Categories
Share

पर्दे के पीछे - 2


मिश्रा जी जैसे ही अंदर आए, उन्होंने देखा — मिश्राइन जी का चेहरा उतरा हुआ था।
बच्चियाँ चुपचाप टीवी देख रही थीं।
Mishra ji ने बैग रखा और बोले —
“क्या हुआ? आज मुँह इतना फूला क्यों है?”
Mishrain ji गुस्से में बोलीं —
“क्या बताऊँ आपको… आज बाहर नाली साफ करने वाले आए थे। उनमें से एक बिना पूछे हाथ धोने घर के अंदर आ गया। सीधा नल पकड़ लिया।”
उनकी आवाज़ में गुस्सा साफ था।
“मैंने उसे खूब सुनाया। बोला — बिना पूछे घर में घुसने की हिम्मत कैसे हुई? जैसे-तैसे बाहर निकाला। फिर पूरा घर दोबारा साफ करना पड़ा।”
Mishrain ji कुछ देर रुकीं, फिर बोलीं —
“और जाते-जाते उनमें से एक लड़का बोल गया —
अब कर लो जितनी सफाई करनी है… अब तो सरकार ने कानून बना दिया है… अब कोई ऊँच-नीच नहीं चलेगी।”
Mishrain ji झुंझलाकर बोलीं —
“ये कैसा कानून बना दिया सरकार ने? क्या इसलिए वोट देते हैं हम… कि सब हमारे सिर पर बैठ जाएँ?”
कमरे में कुछ पल के लिए चुप्पी छा गई।
Mishra ji खड़े रह गए।
उन्हें सुबह अस्पताल की बात याद आई — जहाँ बराबरी और बदलाव की चर्चा हो रही थी।
और अब…
उसी सोच का दूसरा रूप… उनके अपने घर के अंदर खड़ा था।
आज पहली बार उन्हें लगा —
समाज सिर्फ बाहर नहीं…
घर के अंदर भी बसता है।Mishra ji ने धीरे से कहा —
“अरे, हुआ क्या है? घर में हाथ धोने ही तो आया था… कुछ चोरी तो नहीं की उसने। इतना क्यों सोच रही हो? क्या तुम नहीं चाहती कि ये भेदभाव खत्म हो?”
Mishrain ji तुरंत भड़क गईं।
“नहीं चाहते हम ये सब खत्म हो!
आज बराबरी की बात करेंगे… कल हमारे साथ कदम मिलाकर चलेंगे।
फिर घर में आने-जाने लगेंगे।
तुम समझ क्यों नहीं रहे?”
उनकी आवाज़ अब और तेज हो गई थी।
“आज वो हाथ धोने आया था…
कल रसोई में आ जाएगा…
फिर मंदिर तक पहुँच जाएगा।
फिर क्या बचेगा शुद्ध-अशुद्ध का?”
कमरे में भारी सन्नाटा छा गया।
Mishra ji चुप हो गए।
उन्होंने Mishrain ji को देखा…
फिर नजर झुका ली।
उनके मन में अचानक एक ख्याल आया —
“शायद… ये इतना आसान नहीं है।
कानून बन जाने से सोच नहीं बदलती।
और शायद… ये सब इतनी जल्दी खत्म भी नहीं होने वाला…
चाहे सरकार कितने ही कानून क्यों न ले आए।”
Mishra ji ने गहरी साँस ली।Mishra ji चुपचाप अपने कमरे में चले गए।
कपड़े बदले, हाथ-मुँह धोया और बाहर खाने की मेज़ पर आकर बैठ गए।
तब तक बच्चे भी आ गए थे।
Mishrain ji रसोई से खाना लेकर आईं और सबको परोसने लगीं।
कुछ देर तक सब चुपचाप खाते रहे।
तभी उनकी छोटी बेटी, जो 11वीं क्लास में थी और जिसका राजनीतिक विज्ञान विषय था, धीरे से बोली —
“माँ… ये तो संविधान में भी लिखा है कि हम किसी के साथ छुआछूत नहीं कर सकते।
मैं तो अपनी किसी भी दोस्त के साथ ऐसा नहीं करती…
और आज आप जो बोल रही थीं… वो सही नहीं लगा।”
मेज़ पर जैसे अचानक सन्नाटा जम गया।
Mishrain ji ने तेज़ नज़र से बेटी को देखा और बोलीं —
“अच्छा… तो तुझे ऐसा लगता है?
तो ऐसा कर… कल से उन्हीं के घर का खाना खा लेना।
फिर समझ आएगा बराबरी क्या होती है।”
बेटी चुप हो गई…
लेकिन उसके चेहरे पर डर कम… और सवाल ज़्यादा थे।
Mishra ji ये सब चुपचाप सुन रहे थे।
उनकी नज़र कभी अपनी बेटी पर जाती…
कभी अपनी पत्नी पर।
उन्हें पहली बार महसूस हुआ —
एक ही घर में…
तीन अलग सोचें बैठी थीं।
एक — जो सालों से चली आ रही थी।
एक — जो बदलना चाहती थी।
और एक — जो बीच में खड़ी समझ नहीं पा रही थी कि सही क्या है।
उस रात खाना जल्दी खत्म हो गया।
लेकिन बात… सबके मन में बाकी रह गई।हम अक्सर सोच लेते हैं कि शायद अब छुआछूत खत्म हो गई है।
कम से कम… सामने से तो ऐसा ही लगता है।
लेकिन वो सिर्फ पर्दे के सामने है।
पर्दे के पीछे… शायद आज भी बहुत कुछ वैसा ही है।
कभी-कभी सच सामने नहीं दिखता…
क्योंकि हम खुद भी उसे देखने की कोशिश नहीं करते।खाना खाकर मैं टीवी देखने बैठा।
कुछ दिन पहले की ही बात थी — खबरों में दिखाया जा रहा था कि हमारे देश के प्रधानमंत्री अयोध्या गए थे।
वहाँ उन्होंने सफाई कर्मियों के साथ बैठकर भोजन भी किया।
टीवी पर वो दृश्य देखकर लगा —
शायद अब सच में समाज बदल रहा है।
लेकिन बाद में जब सफाई कर्मियों से बात की गई, तो उन्होंने कहा —
भोजन तो उनके ही कर्मचारियों ने बनाया था।
हमने तो उसे हाथ भी नहीं लगाया।
ये सुनकर मन में एक अजीब सा सवाल उठा —
क्या सिर्फ ऐसे दृश्य दिख जाने से…
हमारे देश में छुआछूत सच में खत्म हो सकती है?
या फिर…
ये सब सिर्फ पर्दे के सामने का सच है…
और पर्दे के पीछे आज भी बहुत कुछ वैसा ही है?रात होते-होते घर में सब शांत हो गया।
रोज़ की तरह सब अपने-अपने कमरों में सोने चले गए।
बातें भले खत्म हो गई थीं…
लेकिन कुछ सवाल अब भी हवा में तैर रहे थे।
सुबह हुई।
रोज़ की तरह सब कुछ सामान्य था।
मिश्राइन जी ने चाय बनाई।
सबने साथ बैठकर चाय पी।
बच्चियाँ स्कूल के लिए तैयार हुईं और साइकिल से निकल गईं।
Mishra ji भी तैयार होकर अस्पताल के लिए निकल गए।
सब कुछ पहले जैसा ही था…
वही घर…
वही लोग…
वही दिनचर्या…
लेकिन अंदर ही अंदर…
कुछ बदलने की शुरुआत शायद हो चुकी थी…
या शायद… सब कुछ अभी भी वैसा ही था —
जैसा सालों से चलता आया था।आज सुबह रोज़ की तरह सीमा काम पर आई।
उसके चेहरे पर वही रोज़ वाली जल्दी और थकान थी।
सीमा को इन सब बातों का ज़्यादा पता नहीं था —
देश में कौन सा कानून आया…
सरकार क्या नया नियम बना रही है…
इन सब बातों से उसका कोई सीधा मतलब नहीं था।
बस्तियों की औरतों की ज़िंदगी ज़्यादातर एक ही चक्कर में गुजर जाती है —
सुबह से काम पर जाना…
घर चलाने के लिए पैसे कमाना…
बच्चों का पेट भरना…
और जैसे-तैसे दिन निकाल देना।
उन्हें ये सोचने का वक्त ही कहाँ मिलता है —
कौन सा कानून बना…
कौन सा खत्म हुआ…
और उससे उनकी ज़िंदगी पर क्या असर पड़ेगा।
सीमा भी बस अपना काम करती थी।
चुपचाप आती…
चुपचाप काम करती…
और चुपचाप चली जाती।
लेकिन कई बार…
जिन बातों से उन्हें लगता है कि उनका कोई लेना-देना नहीं…
वही बातें… उनकी ज़िंदगी को सबसे ज़्यादा प्रभावित करती हैं।उस दिन Mishrain ji का कल वाला गुस्सा अभी शांत नहीं हुआ था।
उन्हें जैसे मौका ही चाहिए था… और आज सामने सीमा थी।
काम करते-करते ही उन्होंने ताने देने शुरू कर दिए।
“अब करेंगे बराबरी…”
“जिनकी जगह पैरों के पास होती है… वो अब सर पर बैठेंगे…”
“कल को ये हमारे भगवान तक को अपवित्र कर देंगे…”
सीमा सब सुन रही थी।
उसके हाथ काम करते रहे…
चेहरा झुका रहा।
गरीब इंसान अक्सर वहीं चुप हो जाता है…
जहाँ से उसके घर का चूल्हा जलता है।
पेट की मजबूरी… कई बार आवाज़ को दबा देती है।
सीमा ने भी वही किया।
वो चुपचाप सुनती रही।
शायद…
हमारे समाज में न जाने कितनी सीमा होंगी…
और न जाने कितने लोग…
जो ऐसी बातें सालों से सुनते आ रहे हैं…
और चुपचाप जीते जा रहे हैं। सीमा सब बातें सुनती रही…
लेकिन उसने कुछ नहीं कहा।
क्योंकि कई बार गरीब इंसान के सामने सबसे पहले पेट की मजबूरी खड़ी होती है।
सीमा चुपचाप अपना काम खत्म करती रही।
काम खत्म करके उसने सिर झुकाकर “चलती हूँ” कहा…
और घर चली गई।
सीमा जैसी बहुत सी औरतें ग्रामीण इलाकों से शहरों में आती हैं।
गरीबी…
घर की जिम्मेदारी…
शिक्षा का अभाव…
और पेट भरने की मजबूरी —
उन्हें शहर की तरफ खींच लाती है।
लाखों सीमा रोज़ शहरों में आती हैं…
और फिर धीरे-धीरे खुद को काम में झोंक देती हैं।
अपनी थकान… अपनी तकलीफ… अपनी आवाज़ —
सब कहीं अंदर दबा देती हैं।
सीमा के जाने के बाद, Mishrain ji घर का काम समेटकर पड़ोस में अपनी सहेलियों के पास चली गईं।
जैसे रोज़ जाती थीं…
और रोज़ की तरह…
आज भी बातों का सिलसिला शुरू हो गया।अब कुछ ही दिनों में बच्चियों की स्कूल की छुट्टियाँ शुरू होने वाली थीं।
घर में भी उसी की बातें चल रही थीं।
स्कूल में भी बच्चियाँ आपस में बात कर रही थीं —
कौन अपने गाँव जाएगा…
कौन नानी के घर जाएगा…
कौन छुट्टियों में कोचिंग करेगा…
कौन बस घर पर ही रहेगा।
इधर मोहल्ले में भी औरतों की अपनी अलग दुनिया थी।
दोपहर के समय, काम निपटाने के बाद, सब एक-दूसरे के घर इकट्ठा हो जातीं।
बातें वही होतीं —
सजने-संवरने की…
बाज़ार में क्या नया आया है…
किसकी साड़ी कहाँ से आई…
किस मंदिर में कौन सा भजन चल रहा है…
किसके घर कौन सा त्योहार कैसे मनाया गया…
हँसी-मज़ाक…
हल्की चुहल…
और बीच-बीच में समाज की बातें भी।
ऊपर से सब कुछ बहुत सामान्य लगता था —
जैसे सब ठीक है…
सब खुश हैं…
सब बराबर हैं।
लेकिन कई बार…
इन हँसी-मज़ाक और रोज़मर्रा की बातों के पीछे…
अनकही सोचें…
और गहरी दूरियाँ…
चुपचाप छिपी रहती हैं।