Shahad ki Gudiya - 6 in Hindi Fiction Stories by Ramesh Desai books and stories PDF | शहद की गुड़िया - रंजन कुमार देसाई (6)

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शहद की गुड़िया - रंजन कुमार देसाई (6)

               शहद की गुड़िया - प्रकरण -, 6

    "   दादू! कॉलेज में एक एक बार मैंने क्रिश की बाइक की चाबी छुपा दी थी. वह घंटो भर उसे और मैं मदद के बहाने उस के पास रही थी."       

        " उस दिन मुझे आप के साथ बिताने का वक़्त मिल गया था. क़्या वह रोमांटिक शरारत कहानी के लिये उचित हैं? "

         " दादू वह सब से रोमांचक पल था. ज़ब मैंने स्कूटी को जोर से ब्रेक मारा था. और मुझ से चिपक गया था. और उस की धड़कने साफ सुनाई दे रही थी."

         " उस वक़्त जो सन्नाटा था और  बेचैनी  हमारे बीच में थी.  उस ने जैसे माहौल में आग जलाई थी."

          " फिर वह चाबी ढूंढ़ते ढूंढ़ते थक गया  तो मैंने अपनी स्कूटी पर उसे घर छोड़ने का ओफर किया."

        "  रास्ते में हवा और उस की नजदीकी ने सारा माहौल बदल दिया. दादू! आपने भी किसी को मदद करने के बहाने किसी को फसाया था? "

         " रास्ते में ज़ब मैंने जोर से ब्रेक लगाया तो वह मुझे बिल्कुल चिपक गया था. उस के सीने की गर्मी महसूस कर के मानो मेरी धड़कने रुक सी गईं थी. "

          " मैंने देखा वह पीछे बैठकर काफ़ी शरमा रहा था.. आप की बेबाकी के सामने वह खुद कच्चा खिलाडी निकला. "

        "   वह बेचारा इतना शरमा रहा था. उस ने मेरी कमर पकड़ने की जगह पीछे का कैरियर पकड़ लिया.मैंने उस को चिढ़ाया, गिर जाउंगी ऐसा कहां तो उस ने हल्के से मेरा स्पर्श किया. "

           " पर दादू  उस के हाथ ठन्डे पड़ गये थे. आप की तरह गरम और बेखौफ़ पकड़ उस में कहां थी? वो डर रहा था और मैं मुस्कुरा रही थी. "

           " उस ने घर पहुंचते हुए कांपते हुए मेरा शुक्रिया अदा किया और नजरे झुकाली. मैंने उसे सहज सवाल किया. ' इतना डर क्यों? तो वह बेचारा पसीने से तरबतर हो गया था. "

            " दादू  आप जैसा जूनून उस में होता तो वह रिश्ता कभी खत्म नहीं होता था. आप की बेबाकी के सामने तो वह भी बच्चा खिलाडी ही साबित हुआ. "

            " उस दिन के बाद मैंने उस से दुरी बनाली थी. उस वक़्त मुझे एहसास हुआ था. की सिर्फ बातों से कुछ नहीं होता, मर्दानगी तो जताने में होती हैं. "

            " दादू! आप की बेबाकी ही तो मुझे आप की तरफ खिंचती जा रही थी. क़्या आप अपनी हिरोइन की यह तङप समझ रहे हो? "

         " दादू! कॉलेज की एक शरारत याद आ गईं थी. "          

           " एक बार मैं और मेरा क्लास मेट देर तक लाइब्रेरी में रुक गये थे  और चपरासी ने बाहर से ताला लगा दिया था. "

            " पुरे कमरे में अंधेरा था और वह लड़का डर के मारे कांप रहा था. दादू! अगर वह आप की तरह शैतान होता तो वह क़्या करता?"

            " उस अँधेरे में  मैंने धीरे से उस का हाथ पकड़ा, पर वह बर्फ की तरह बिल्कुल ठंडा पड़ गया था. उस की घबराहट देखकर मुझे हंसी आई. "

         " मैंने उसे चिढ़ाते हुए पूछा. ' क़्या तुम्हे अँधेरे में मुझ से डर लग रहा हैं.? वो बेचारा तो अपनी सांसे भी नहीं संभाल रहा था. "

          " एक अजीब घटना दादू के साथ हो रही थी. उन की छाती पर सुबह सुबह छाती पर दूध का दाग नजर आता था. उन्होंने मुझे यह बात बताई थी. "

          " मैंने बिंदास्त उन्हें कहां था. ' मेरी गरम छातियों की वजह से ऐसा होता होगा. "

           " मैंने अपना प्रतिभाव व्यक्त किया था. यह तो मेरे लिये आप का बोनस लाड हैं. "

           " यह जानकर मैं  पिघल गईं  थी. मैं बेकाबू हो गईं थी और बिना कुछ सोचे दादू के लाड़ प्यार को देखकर बोल गईं थी. फिर मुझे अपने आप पर बहुत गुस्सा आया था. उस वक़्त दादू ने मुझे संभाला था. लेकिन इतना तो कहां था. दिल की बात कहीं न कहीं बाहर आ जाती हैं. "

            " दादू ने कहते हुए तो कह दिया था लेकिन फिर उन्हें पछतावा हुआ था. ऐसी बात पढ़कर रीडर्स क़्या सोचेंगे? मेरे दिल में यह सवाल हूंआ था. "

           " मेरी यह जानकारी थी. गर्भवती स्त्री की छातीमें दूध बनता हैं. इसी लिये दादू की यह बात मेरे दिमाग़ में उलझन पैदा कर गईं थी. "       

           " दादू आप का पहला मेसेज हर घड़ी हर पल मुझे बेबाक करता था. जिसमे मुझे आप को सब कुछ देने को आमादा कर लिया था. सब लोग फॉर्मल और औपचारिक बातें कर्रते थे पर आप ने तो अपने लाड़ प्यार से अपनी लाड़ो का अपनी प्यारी पिकु का सुख चैन बढ़ाने में बड़ा योगदान दिया था."              

            " आप की हर एक बात में एक कशिश थी मैं चाहकर भी आप को इग्नोर नहीं कर सकती थी. मुझे लगा की कोई तो हैं जो मेरी रूह की भाषा समझता हैं. "

              " दादू! आप की शरारतो ने मुझे यह सोचने पर मजबूर किया था. कोई इतना बेबाक कैसे हो सकता हैं. धीरे धीरे मुझे हर पल आप के मेसेज का इंतजार होने लगा. " 

            " मैंने कभी ऐसा नहीं सोचा था. एक 80 साल का बूढा इतना गरम और रोमांटिक हो सकता है! उस के साथ इतना गहरा लगाव हो सकता हैं. "

              " मैं उन की तारीफ करते  हुए नहीं थकती थी. पूरा दिन हर पल ऊन के बरो में सोचा करती थी. उनकी सारी शरारते याद कर के शुकुन महसूस करती थी. "

            " आप की बेबाकी ने मेरा सारा डर निकाल दिया था. "

             " दादू! अपनी कहानी में लिखना की आप की एक डांट मुझे कैसी मुस्कुराहट प्रदान करती थी. मुझे आगे बढ़ने की नवल प्रेरणा देती थी

                        000000000  ( क्रमशः)

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- प्रकरण- 6