Baarish ke bich ek Ajnabi - 4 in Hindi Love Stories by Avinash books and stories PDF | बारिश के बीच एक अजनबी - 4

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बारिश के बीच एक अजनबी - 4

भाग 4: बारिश की गूँज और एक नया आगाज़

तीन महीने बीत चुके थे। मुंबई की गर्मी अब अपनी चरम सीमा पर थी, और कबीर वापस अपने उसी नीरस ऑफिस रूटीन में लौट आया था। वह विदेश से लौट तो आया था, लेकिन उसके अंदर का कुछ हिस्सा अब भी उस बरसात वाली रात में कहीं अटका हुआ था। उसने ज़ोया को कई बार फोन करने की कोशिश की, पर उसका नंबर बंद आ रहा था। वह उस पुराने कैफे और स्कूल भी गया, पर ज़ोया वहाँ नहीं मिली। उसे लगा कि शायद ज़ोया ने उस मदद को अपनी स्वाभिमान पर चोट समझा और हमेशा के लिए दूर चली गई।

कबीर की मेज पर अब भी वह 'ब्लू बर्ड' वाला की-चेन रखा था, जो उसे उसकी अधूरी प्रेम कहानी की याद दिलाता रहता था।
एक शाम, कबीर के केबिन में उसका एक जूनियर कर्मचारी आया। "सर, इस शनिवार शहर की सबसे बड़ी आर्ट गैलरी में एक नई प्रदर्शनी है—'The Rain of Hope'। हमारे क्लाइंट्स वहाँ जा रहे हैं, उन्होंने हमें भी इनवाइट किया है।"

कबीर का मन नहीं था, पर 'बारिश' शब्द सुनकर उसके दिल में एक टीस उठी। उसने जाने का फैसला किया।
शनिवार की शाम गैलरी रोशनी से नहाई हुई थी। शहर के बड़े-बड़े लोग वहाँ मौजूद थे। कबीर बिना किसी दिलचस्पी के पेंटिंग्स देख रहा था, तभी वह गैलरी के सबसे मुख्य हिस्से (Center Hall) में पहुँचा। वहाँ एक बहुत बड़ी पेंटिंग लगी थी।
पेंटिंग में एक धुंधला सा बस स्टॉप था, तेज़ बारिश हो रही थी, और एक पीली स्कूटी की हेडलाइट की रोशनी में एक आदमी खड़ा था, जिसके हाथ में एक छोटा सा नीला पक्षी था। पेंटिंग का शीर्षक था— "इत्तेफाक की वो एक रात।"
कबीर की सांसें थम गईं। उसने नीचे पेंटर का नाम देखा— ज़ोया।
"क्या आपको यह पेंटिंग पसंद आई?" पीछे से एक जानी-पहचानी खनकती हुई आवाज़ आई।

कबीर ने मुड़कर देखा। ज़ोया खड़ी थी। उसने आज कोई रेनकोट या भीगी हुई शर्ट नहीं पहनी थी। उसने एक खूबसूरत नीली साड़ी पहनी थी और उसके चेहरे पर वही पुरानी बेपरवाह मुस्कान थी, पर आँखों में एक नई चमक थी।
"ज़ोया! तुम... तुम कहाँ थी?" कबीर की आवाज़ भारी हो गई।
"मैं अपनी माँ के साथ उनके गाँव गई थी, कबीर। उनकी रिकवरी के लिए वहाँ का माहौल ज़रूरी था," ज़ोया ने पास आकर कहा। "और हाँ, तुम्हारा वो 'लोन' चुकाने के लिए मुझे इस प्रदर्शनी को जीतना ज़रूरी था। रिसेप्शनिस्ट ने मुझे सब बता दिया था।"
"ज़ोया, मैंने वो पैसों के लिए नहीं किया था..." कबीर ने कहना चाहा, पर ज़ोया ने उसके होंठों पर उंगली रख दी।
"मुझे पता है। तुमने वो मेरे सपनों के लिए किया था। और आज मैं जो कुछ भी हूँ, तुम्हारी वजह से हूँ। तुमने एक ऐसी लड़की पर भरोसा किया जिसे तुम जानते भी नहीं थे।"
दोनों गैलरी के बरामदे में बाहर आए। अचानक, मौसम ने फिर से अपनी पुरानी करवट ली। बिजली कड़की और अचानक ज़ोरों की बारिश शुरू हो गई। बिल्कुल वैसी ही, जैसी उनकी पहली मुलाकात में हुई थी।

"देखो कबीर," ज़ोया ने बारिश की ओर इशारा किया। "आज न मेरा फोन डिस्चार्ज है, न मेरी स्कूटी खराब है। और मेरे पास अपने घर की चाबी भी है।"
कबीर मुस्कुराया और उसने अपनी जेब से वह 'ब्लू बर्ड' वाला की-चेन निकाला। "और मेरे पास अब भी तुम्हारी यादों की ये चाबी है।"
ज़ोया ने कबीर की आँखों में देखा। "तो क्या अब हम उस अधूरी कॉफी के लिए चलें? पर इस बार कोई शर्त नहीं है।"
कबीर ने अपना हाथ आगे बढ़ाया। "सिर्फ कॉफी नहीं ज़ोया, इस बार मैं पूरी ज़िंदगी तुम्हारे साथ भीगने के लिए तैयार हूँ।"
ज़ोया ने उसका हाथ थाम लिया। बारिश की बूंदें उनके चारों ओर एक घेरा बना रही थीं, जैसे कुदरत खुद उनकी कहानी पर अपनी मुहर लगा रही हो। जो कहानी एक अजनबी की तरह शुरू हुई थी, वह अब एक अटूट वादे में बदल चुकी थी।

मुंबई की सड़कों पर हज़ारों लोग भीग रहे थे, पर उस रात, उस बारिश के बीच, दो अजनबी अब अजनबी नहीं रहे थे।