क्या सब ठीक है?
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यह किताब उन अनकहे सवालों और अधूरी बातों का संग्रह है, जिन्हें हम अक्सर अपने अंदर दबाकर जीते रहते हैं।
हर कहानी हमारे रोज़मर्रा के जीवन से जुड़ी एक सच्चाई को सामने लाती है - रिश्तों की खामोशी, दूरियाँ, और वो एहसास जिन्हें हम शब्द नहीं दे पाते।
यहाँ आपको कोई हीरो या परफेक्ट अंत नहीं मिलेगा,
बल्कि ऐसे किरदार मिलेंगे जो बिल्कुल हमारी तरह हैं - थोड़े उलझे हुए, थोड़े थके हुए, पर फिर भी आगे बढ़ते हुए।
यह कहानियाँ आपको सिर्फ़ पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि खुद को महसूस करने के लिए लिखी गई हैं।
शायद कहीं न कहीं, हर पन्ने पर आपको अपनी ही ज़िंदगी की झलक मिले।
क्योंकि सच तो यही है - हम सब बाहर से ठीक दिखते हैं,
पर अंदर कहीं न कहीं एक सवाल हमेशा रहता है…
क्या सब ठीक है?
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कहानी 1: सब ठीक है
राहुल की ज़िंदगी ठीक थी। कम से कम बाहर से देखने पर तो सब कुछ ठीक ही लगता था। एक स्थिर नौकरी थी, हर महीने समय पर सैलरी आ जाती थी, और शहर के एक ठीक-ठाक इलाके में उसने EMI पर घर भी ले लिया था। हर महीने बैंक से पैसे कटते थे और उसे यह अहसास होता था कि वह धीरे-धीरे “settle” हो रहा है। उसके आसपास के लोग अक्सर कहते, “भाई, तेरी तो life set है,” और वह हल्की-सी मुस्कान के साथ जवाब देता, “हाँ, बस… सब ठीक है।”
असल में “सब ठीक है” उसका सबसे ज़्यादा इस्तेमाल किया जाने वाला वाक्य बन चुका था। काम कैसा है - सब ठीक है। घर कैसा है - सब ठीक है। ज़िंदगी कैसी है - सब ठीक है। उसने कभी रुककर यह सोचने की कोशिश ही नहीं की कि यह “ठीक” सच में ठीक है भी या सिर्फ एक आदत बन चुका है।
उसकी सुबह एक तय पैटर्न पर चलती थी। अलार्म 7:30 पर बजता, वह उसे बंद कर देता और फिर पाँच मिनट के लिए आँखें बंद कर लेता। पाँच मिनट कब दस में बदल जाते, उसे पता ही नहीं चलता। आखिरकार आठ बजे के आसपास वह थोड़ा-सा guilty महसूस करते हुए उठता, लेकिन यह guilt इतना भी गहरा नहीं होता कि उसकी आदत बदल सके। ब्रश करते समय भी मोबाइल उसके हाथ में ही रहता - कभी WhatsApp, कभी ऑफिस के मेल, कभी बिना वजह reels। कई बार उसे खुद पर हल्की-सी हँसी भी आती कि वह इतना भी व्यस्त नहीं है, फिर भी ऐसे behave करता है जैसे उसके बिना सब रुक जाएगा। लेकिन यह सोच कुछ ही सेकंड में गायब हो जाती।
ऑफिस जाने का रास्ता भी अब उसे याद करने की ज़रूरत नहीं पड़ती थी। वही ट्रैफिक, वही सिग्नल, वही लोग। कई बार वह बिना कुछ सुने, बिना कुछ सोचे बस गाड़ी चलाता रहता। बाहर शोर होता था, लेकिन उसके अंदर एक अजीब-सी खामोशी रहती थी - ऐसी खामोशी जिसमें सुकून नहीं था, बस एक खालीपन था जिसे वह पहचानना नहीं चाहता था।
ऑफिस में उसका काम ठीक-ठाक चल रहा था। न वह सबसे आगे था, न सबसे पीछे। इतना ज़रूर था कि उसकी नौकरी सुरक्षित रहे। सच कहें तो अब उसे “बहुत अच्छा” करने का मन भी नहीं करता था। एक समय था जब वह नई चीज़ें सीखने के लिए उत्साहित रहता था, कुछ अलग करने की सोचता था, लेकिन अब उसका एक ही लक्ष्य रह गया था - किसी तरह सब ठीक चलता रहे। उसने अपने सपनों को छोड़ा नहीं था, बस धीरे-धीरे उन्हें postpone करते-करते भूल गया था।
शाम को जब वह घर लौटता, तो शारीरिक थकान से ज़्यादा मानसिक थकान होती थी। दरवाज़ा खोलकर अंदर आते ही वह सबसे पहले जूते उतारता, फिर सीधे सोफे पर बैठ जाता। कुछ मिनट ऐसे ही बैठा रहता, जैसे शरीर घर आ गया हो लेकिन दिमाग अभी भी ऑफिस में अटका हो। फिर बिना सोचे-समझे हाथ मोबाइल की तरफ चला जाता। यह अब आदत नहीं, एक तरह की reflex बन चुकी थी।
घर में बातचीत होती थी, लेकिन कम। उसकी पत्नी कभी-कभी दिनभर की बातें बताने की कोशिश करती - घर के छोटे-मोटे काम, किसी रिश्तेदार का फोन, या बस यूँ ही कुछ - लेकिन राहुल अक्सर आधा सुनता था। “हूँ… अच्छा… ठीक है…” जैसे जवाब उसके लिए काफी होते थे। वह सुन तो रहा होता था, लेकिन ध्यान कहीं और होता था। एक-दो बार उसकी पत्नी ने बात बीच में ही रोक दी, जैसे उसे समझ आ गया हो कि सामने वाला सच में सुन नहीं रहा। राहुल ने यह notice किया, लेकिन उस पर रुककर सोचा नहीं।
धीरे-धीरे घर में एक अजीब-सी चुप्पी बसने लगी। कोई लड़ाई नहीं होती थी, कोई बड़ा झगड़ा नहीं होता था, लेकिन बात भी कम होती जा रही थी। सब कुछ सामान्य था - इतना सामान्य कि उसमें कुछ भी महसूस नहीं होता था।
एक रात उसकी पत्नी ने अचानक पूछा, “तुम खुश हो?”
राहुल ने बिना सोचे जवाब दिया, “हाँ, क्यों?”
“बस ऐसे ही…” उसने कहा और करवट बदल ली।
राहुल ने भी ज़्यादा नहीं सोचा। उसे लगा, यह भी एक सामान्य सवाल है, जैसे बाकी सब कुछ।
लेकिन उस रात उसे नींद थोड़ी देर से आई।
पहली बार उसने यह सोचा कि उसने “हाँ” क्यों कहा।
और क्या वह सच में खुश था।
अगले कुछ दिनों तक सब पहले जैसा ही चलता रहा। वही ऑफिस, वही घर, वही मोबाइल। लेकिन अब बीच-बीच में वह खुद को observe करने लगा था। जैसे वह अपनी ही ज़िंदगी को बाहर से देख रहा हो।
ऑफिस में बैठा हुआ वह कभी-कभी स्क्रीन से नज़र हटाकर लोगों को देखता - हर कोई अपने-अपने सिस्टम में व्यस्त, हर किसी के चेहरे पर एक सी seriousness। किसी को जल्दी थी, किसी को डर था, किसी को बस आदत थी। उसे लगा - सब कुछ चल रहा है, लेकिन कोई भी सच में जी नहीं रहा।
घर में भी अब उसे छोटी-छोटी चीज़ें दिखने लगीं। उसकी पत्नी अब कम बोलती थी। पहले वह हर बात शेयर करती थी, अब सिर्फ ज़रूरी बातें ही कहती थी। उसने कभी सीधे कुछ कहा नहीं, लेकिन उसकी चुप्पी पहले से अलग थी - जैसे उसने उम्मीद करना थोड़ा कम कर दिया हो।
एक दिन राहुल ने कोशिश की - “आज क्या किया पूरे दिन?”
पत्नी ने हल्के से कहा, “कुछ खास नहीं… वही रोज़ जैसा।”
बात वहीं खत्म हो गई।
राहुल को लगा जैसे उसने कुछ देर के लिए एक दरवाज़ा खोला था, लेकिन अंदर जाने से पहले ही बंद कर दिया।
कुछ हफ्तों बाद एक रविवार को वह घर पर था। कोई खास काम नहीं था। मोबाइल भी कुछ देर के लिए साइड में रख दिया था। वह बस चुपचाप बैठा था।
काफी समय बाद उसे ऐसा लगा कि वह सच में खाली है।
उसने घर को ध्यान से देखा। वही दीवारें, वही फर्नीचर, वही सब कुछ… जो उसने कभी अपने सपनों में सोचा था। सब कुछ था।
फिर भी कुछ कमी थी।
लेकिन वह कमी क्या है, यह उसे समझ नहीं आ रहा था।
उसी दिन शाम को उसकी पत्नी ने casually कहा, “तुम पहले जैसे नहीं रहे।”
राहुल ने पूछा, “कैसे?”
“पहले तुम बात करते थे… अब बस जवाब देते हो।”
राहुल कुछ पल चुप रहा।
उसके पास इस बात का कोई जवाब नहीं था।
उस रात वह देर तक सो नहीं पाया।
मोबाइल उसके पास ही था, लेकिन उसने उठाया नहीं।
बहुत समय बाद वह अपने ही thoughts के साथ अकेला था।
उसे याद आया - वह पहले कैसा था।
उसे छोटी-छोटी चीज़ों में खुशी मिलती थी। वह बातें करता था, सुनता था, plans बनाता था। अब वह सब कुछ “manage” कर रहा था… जी नहीं रहा था।
सुबह जब अलार्म बजा, तो उसने उसे बंद किया।
इस बार उसने snooze नहीं किया।
कुछ देर छत को देखता रहा।
फिर धीरे से उठकर बालकनी में चला गया।
बहुत समय बाद उसने बिना मोबाइल के सुबह देखी।
कुछ खास नहीं था - वही सूरज, वही सड़क, वही लोग।
लेकिन इस बार उसे सब कुछ थोड़ा अलग लगा।
नीचे चाय वाला अपना ठेला लगा रहा था। कोई अखबार ले रहा था। कोई जल्दी में जा रहा था।
ज़िंदगी वैसी ही थी।
बस राहुल पहली बार उसे देख रहा था।
उसने गहरी साँस ली।
कोई बड़ा फैसला नहीं लिया।
कोई dramatic बदलाव नहीं हुआ।
बस एक छोटी-सी बात समझ में आई -
सब ठीक होना… और ठीक लगना, दोनों अलग चीज़ें हैं।
उसने अंदर जाकर अपनी पत्नी से पूछा -
“चाय बनाऊँ?”
पत्नी ने थोड़ी हैरानी से उसकी तरफ देखा…
फिर हल्की-सी मुस्कान आई -
“हाँ…”
कहानी यहीं खत्म नहीं होती।
क्योंकि ज़िंदगी भी यहाँ नहीं रुकती।
पर शायद…
यहीं से थोड़ी बदल सकती है।
अंतिम बात:
सब कुछ ठीक होना ज़रूरी नहीं है…
पर यह समझना ज़रूरी है कि क्या ठीक नहीं है।