Safar ki Rangat - 2 in Hindi Love Stories by Std Maurya books and stories PDF | सफ़र की रंगत - 2

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सफ़र की रंगत - 2

यात्री ने लंबी सांस खींचते हुए कहा,
“देखो बेटी! यह नन्ही-सी बच्ची नशीले पदार्थ बेच तो रही है, लेकिन सिर्फ इसलिए ताकि इसे एक वक्त की रोटी नसीब हो सके। इसे इस दलदल में धकेला गया है, इसने खुद यह रास्ता नहीं चुना।”
मैंने सहमति में सिर हिलाते हुए कहा,
“बेशक! आपकी बात सही है। इस मासूम बच्ची को क्या मालूम कि वह जो बेच रही है, वह कितनी खतरनाक चीज है? उसने यह काम अपनी मर्जी से शुरू नहीं किया होगा, बल्कि किसी न किसी ने उसे जरिया बनाया होगा।”
मेरी बात सुनकर प्रियांशी भी चुप न रह सकी, वह बोल पड़ी,
“हाँ! यह काम उससे करवाया ही जा रहा होगा। पर सोचने वाली बात यह है कि जिस किसी ने भी उसे काम सिखाना चाहा, वह उसे कोई अच्छा काम भी तो सिखा सकता था। पर उन्होंने मासूमियत का फायदा उठाना ही बेहतर समझा।”
“पर ऐसा ही क्यों? आखिर उसे यही काम क्यों दिया गया?” प्रियांशी ने उलझन में पूछा।
अंकिता तपाक से बोली,
“शायद इसलिए भैया, क्योंकि आज के समय में लोग गुटखे का सेवन सबसे ज्यादा करते हैं। उस मासूम बच्ची के जरिए गुटखा बेचना आसान है, ताकि वह ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमा सके।”
मैंने एक गहरी सांस ली और कहा,
“शायद तुम्हारी बात सही है अंकिता। आजकल क्या नौजवान और क्या बूढ़े, हर कोई नशे की इस लत में डूबा हुआ है। हालत तो यह हो गई है कि लोग अब फलों से ज्यादा पैसा नशीले पदार्थों पर खर्च कर रहे हैं। सेहत से ज्यादा फिक्र उन्हें अपनी लत की है।”
प्रियांशी हमें चुपचाप सुन रही थी। उसकी खामोशी बता रही थी कि वह भी इस कड़वे सच से परेशान है।
तभी उसी डिब्बे में बैठा एक व्यक्ति, जो खुद नशे की हालत में लग रहा था, अचानक बोल पड़ा,
“अरे भाई! आपकी यह बात तो सौ फीसदी सच है कि आजकल लोग नशे पर जितना पैसा लुटा रहे हैं, उतना फल और माखन पर भी खर्च नहीं करते।”
उसने एक लंबी सांस ली और अपनी लाचारी जाहिर करते हुए कहा,
“मैं खुद इस बुरी लत का शिकार हूँ और अपनी ही इस आदत से बेहद परेशान भी हूँ। जहाँ दुनिया सुबह उठकर चाय या पानी पीती है, वहीं हमारी सुबह तो गुटखे के साथ ही होती है। हालत यह हो गई है कि अब मेरा मुँह पूरी तरह से नहीं खुलता और न ही दाँत साफ रहते हैं। अगर कभी कुछ कड़ा या तीखा खा लूँ, तो पूरे मुँह में असहनीय जलन होने लगती है।”
उस व्यक्ति की ये बातें सुनकर डिब्बे में सन्नाटा छा गया। उसकी आँखों में पछतावा साफ दिख रहा था।
अंकिता बोली,
“भैया, फिर यह नशा क्यों नहीं छोड़ देते हो?”
फिर वह व्यक्ति कहता है,
“छोड़ना तो चाहता हूँ, मगर छोड़ नहीं पाता हूँ।”
मुस्कुराते हुए अंकिता बोली,
“हाँ भैया, लत तो लग गई है।
पहले यह बताइए, आपकी शादी हो गई है या नहीं?”
वह व्यक्ति हँसते हुए बोला,
“अगर शादी हो गई होती, तो छोड़ ही देता।”
यह बात सुनकर सब हँसने लगे।
फिर मैंने कहा,
“कहीं आपको इश्क तो नहीं हुआ था, जो उसकी यादों में नशेड़ी बन गए हो?”
वह व्यक्ति हँसते हुए बोला,
“जो आप सब समझ लो…”
मैंने कहा,
“मैंने हल्की मुस्कान के साथ कहा,… जो हो रहा है, सही हो रहा है।”
‘आप लोग सो जाइए, बहुत रात हो चुकी है… मैं भी अब सोने जा रहा हूँ।’”
सभी लोग सोने के लिए अपनी-अपनी चादर निकालने लगे।
कुछ ही देर में डिब्बे में सन्नाटा छा गया और कहीं-कहीं से लोगों की खर्राटों की आवाज़ भी आने लगी।
बल्ब भी बंद कर दिए गए थे।
लेकिन प्रियांशी का नटखटपन अभी खत्म नहीं हुआ था।
वह मेरी ही सीट पर आकर बैठ गई और अंकिता को फिर से ऊपर वाली सीट पर भेज दिया।
जब भी मुझे नींद आने लगती, वह शरारत करते हुए मेरे कान में धागा डाल देती…
और मैं झुंझलाकर उसे हटाने लगता।
मैंने उसे धीरे से कहा,
“ऐसा मत करो… नहीं तो तुम्हारे गुलाब जैसे होंठों को चूम लूंगा…”
मेरी बात सुनकर प्रियांशी मुस्कुरा दी और धीरे से बोली,
“तो फिर कर ही लो…”
देर किस बात की..
प्रियांशी अपनी नज़रें झुकाकर किस करने ही जा रही थी कि तभी किसी निकम्मे ने बल्ब चालू कर दिया…
अचानक रोशनी फैल गई, और प्रियांशी घबराकर पीछे हट गई।
उसके चेहरे पर हल्की सी शर्म और मुस्कान दोनों झलक रहे थे…
लेकिन थोड़ी ही देर में बल्ब फिर से बुझ गया…
और जैसे ही अंधेरा हुआ, मैंने मौका देखकर प्रियांशी को किस कर लिया।
प्रियांशी झट से दूर हटने लगी और धीरे से बोली,
“अरे छोड़ो… कोई देख लेगा…”
मैंने हल्की मुस्कान के साथ कहा,
“कोई नहीं देखेगा… लाइट बुझी हुई है…”
प्रियांशी मुझे थोड़ा दूर हटाकर अपनी सीट पर चली गई और बोली,
“अब सो जाओ… मुझे नींद आ रही है…”
मैंने कहा,
“मुझे तो अभी नींद नहीं आ रही…”
फिर मैंने धीरे से कहा,
“कुछ पल रुको…”
और मैं अपना सिर उसकी गोद में रखकर लेट गया।
प्रियांशी चुपचाप मेरी आँखों में देखती रही…
उसकी आँखों में एक अजीब सा सुकून था… 
पता ही नहीं चला कब हमें नींद आ गई…
और हम दोनों उसी तरह सो गए…
सुबह हो चुकी थी… करीब पाँच बज रहे थे।
अंकिता की आँख खुल गई और वह ऊपर की सीट से नीचे उतरकर हमारी सीट के पास आ गई।
जैसे ही उसने मुझे प्रियांशी की गोद में सिर रखकर सोते हुए देखा, वह हैरान रह गई और जोर से बोली,
“अरे भैया! और प्रियांशी जी… उठ जाओ! यह घर नहीं है, जो आप दोनों इस तरह सो रहे हो। अब सुबह हो गई है… लोग देखेंगे तो क्या कहेंगे?” 
लेकिन हम दोनों गहरी नींद में ही थे।
फिर अंकिता हमें हल्के-हल्के हिलाते हुए बोली,
“उठो भैया… सुबह हो गई है…”
इतना सुनते ही मेरी नींद खुल गई…
मैंने आँखें मलते हुए इधर-उधर देखा…
लेकिन प्रियांशी अभी भी उसी तरह मेरी गोद में सिर रखे गहरी नींद में सो रही थी…
तभी प्रियांशी की भी नींद खुल गई।
अंकिता मज़ाक करते हुए बोली,
“थोड़ी दूरी बनाकर रखो… अभी शादी नहीं हुई है मेरे भैया से! कहीं शादी से पहले मैं बुआ न बन जाऊ…” 
उसकी यह बात सुनकर मैं झुंझलाते हुए बोला,
“हट पगली! क्या-क्या सोचती रहती है तू… तेरे दिमाग में सीधी बात नहीं आती क्या?”
प्रियांशी अभी भी नींद में ही थी और ठीक से कुछ समझ नहीं पा रही थी।
मैंने अंकिता से कहा,
“जरा बोतल का पानी देना…”
अंकिता ने मुझे पानी दिया…
और मैंने शरारत में थोड़ा सा पानी प्रियांशी के चेहरे पर छिड़क दिया।
अचानक वह चौंककर उठ बैठी… 
उसकी आँखों में हैरानी और चेहरे पर हल्की सी शर्म थी…
और हम दोनों की नज़रें एक पल के लिए टकराईं…
शायद…
सुबह के साथ कुछ

अब देखिये अगला भाग की प्रियांशी क्या कहती हैं