The Deathless and His Shadow - 3 in Hindi Fiction Stories by Dewy Rose books and stories PDF | The Deathless and His Shadow - 3

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The Deathless and His Shadow - 3


भाग 3: शाश्वत काल का दंश

आर्यन की नींद उस रात टूटी हुई थी। मृया के जाने के बाद से ही उसके मन में असंख्य प्रश्न भंवर की तरह घूम रहे थे। उसने अपनी कलाई के निशान को बार-बार देखा। वह स्त्री का हाथ अब और स्पष्ट होता जा रहा था, जैसे कोई कलाकार धीरे-धीरे उसे पूरा कर रहा हो।

उसकी घड़ी में रात के 2:30 बजे थे। मृया ने 3:07 का जो समय बताया था, उसकी प्रतीक्षा करते हुए आर्यन ने अपना लैपटॉप खोला। 'मृया' नाम को गूगल पर सर्च किया।

परिणाम सामान्य थे, कविताएँ, गाने, कुछ लोक कथाएँ। हिंदी में मृया का अर्थ था 'मृत्यु से संबंधित' या 'मरणशील'। संस्कृत में इसका मतलब था 'मृत्यु का'।

"मृत्यु की देवी," आर्यन ने फुसफुसाया। पर वह देवी नहीं थी। वह तो... एक खोई हुई आत्मा लगती थी।

उसने अपनी फ़ाइलों में से एक पुरानी ऑलबम निकाली। परिवार की पीढ़ियों की तस्वीरें। उसके दादाजी, परदादाजी... और फिर उसे एक तस्वीर मिली।

एक पुरानी काली-सफेद तस्वीर, लगभग सौ साल पुरानी। उसके परदादा राजेंद्र वर्मा एक हवेली के सामने खड़े थे। पीछे, एक युवती धुंधली सी दिख रही थी, शायद नौकरानी। उस युवती का चेहरा इतना धुंधला था कि पहचानना मुश्किल था, पर आँखें... वही गहरी, उदास आँखें।

आर्यन का दिल जोर से धड़क उठा। क्या यह संभव था? क्या मृया उसी हवेली से जुड़ी थी जो उसे दिखाई दी थी?

तभी, कमरे का तापमान अचानक गिर गया। आर्यन ने अपनी बाँहों पर रोंगटे खड़े होते महसूस किए। यह सामान्य ठंड नहीं थी, यह वही भेदक ठंड थी जो मृया के आसपास महसूस होती थी।

पर कुछ गलत था।

यह ठंड अधिक तीखी थी, अधिक खतरनाक। हवा में एक गंध आई, पुरानी मिट्टी और सड़े हुए फूलों की।

आर्यन ने पीछे मुड़कर देखा।

उसकी खिड़की के सामने, दो लाल आँखें तैर रही थीं। कोई आकृति नहीं, सिर्फ आँखें, जलते हुए कोयलों की तरह, बिना पलकों के।

"आर्यन वर्मा," एक आवाज़ गूंजी, जो सीधे उसके दिमाग में आई, कानों से नहीं। यह आवाज़ सर्प की फुफकार और पत्थरों के रगड़ने की आवाज़ का मिश्रण थी।

"तुम कौन हो?" आर्यन ने पूछा, अपनी आवाज़ को स्थिर रखने की कोशिश करते हुए।

"मैं हूँ काल," आवाज़ ने कहा। "समय का रखवाला। मृत्यु का संचालक। और तुम... तुम एक अनियमितता हो।"

लाल आँखें करीब आईं। अब आर्यन एक आकृति देख सकता था, लंबा, पतला, एक काले लबादे जैसा कुछ, पर वह लबादा नहीं था। वह शुद्ध अंधकार था, जो हवा में लहरा रहा था।

"तुम्हारी मृत्यु की तिथि अनिश्चित है," काल ने कहा। "यह असंभव है। प्रत्येक जीव की एक समय सीमा होती है। प्रत्येक धागे का एक अंत।"

"शायद मेरा धागा अभी खत्म होने वाला नहीं है," आर्यन ने कहा।

लाल आँखें चमकी। "अहंकार। मनुष्यों का शाश्वत अभिशाप। नहीं, तुम्हारा धागा टूट चुका है। तुम तो मर चुके होते, अगर मृया ने अपना कर्तव्य निभाया होता।"

आर्यन की साँस अटक गई। "मृया... उसने क्या किया?"

"वह तुमसे जुड़ गई है," काल ने कहा, उसकी आवाज़ में नफरत थी। "एक दूत का इंसान से जुड़ाव... यह निषिद्ध है। यह संतुलन को बिगाड़ता है।"

काल ने अपना हाथ (या जो कुछ भी था) बढ़ाया। उससे एक काली रोशनी निकली, जो मृया की नीली रोशनी के उलट थी। यह रोशनी आर्यन की ओर बढ़ी, और इस बार कोई रुकावट नहीं थी।

आर्यन ने अपने सीने पर एक भयंकर दबाव महसूस किया, जैसे कोई उसका दिल हाथ से निचोड़ रहा हो। उसकी साँसें उखड़ने लगीं। वह घुटनों के बल गिर गया।

"तुम्हारा अस्तित्व एक त्रुटि है," काल ने कहा। "और मैं त्रुटियों को ठीक करता हूँ।"

तभी, एक नीली चमक कमरे में फूट पड़ी।

मृया दीवार से होकर अंदर आई, उसका चेहरा डर और दृढ़ संकल्प से भरा हुआ था। उसने अपने दोनों हाथ आगे बढ़ाए, और नीली रोशनी की एक दीवार खड़ी कर दी, जो काल की काली रोशनी को रोक दिया।

"मृया," काल की आवाज़ में खतरा था। "तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई?"

मृया ने कोई जवाब नहीं दिया। वह आर्यन के सामने खड़ी हो गई, उसे बचाने की मुद्रा में। उसने काल की ओर देखा, और अपनी आँखों में एक चुनौती थी।

"तुम जानती हो इसकी सजा क्या है," काल ने कहा। "शाश्वत विस्मृति। तुम्हारा अस्तित्व मिट जाएगा। तुम कभी थी ही नहीं।"

मृया ने हाँ में सिर हिलाया। उसने आर्यन की ओर देखा, और उसकी आँखों में एक अजीब सी कोमलता थी। फिर उसने काल की ओर मुड़कर एक संकेत दिया, मुझे ले जाओ, उसे छोड़ दो।

"नहीं!" आर्यन चिल्लाया, खुद को उठाते हुए। "तुम उसे कुछ मत करो!"

काल हँसा, एक भयानक, खोखली हँसी। "देखो, मनुष्य का भावनात्मपन। यही तो तुम्हारी कमजोरी है, मृया। और यही तुम्हारा अंत करेगा।"

मृया ने आर्यन की ओर देखा और उसे रुकने का इशारा किया। फिर उसने काल की ओर एक जटिल संकेत किया, हाथों की भाषा जो आर्यन को समझ नहीं आई।

काल चुप हो गया। उसकी लाल आँखें संकुचित हुईं। "क्या? यह संभव नहीं।"

मृया ने फिर से वही संकेत दिया, दृढ़ता से।

"तुम्हें कैसे पता?" काल ने पूछा।

मृया ने अपने सिर पर हाथ रखा, यादें। फिर आर्यन की ओर इशारा किया।

काल धीरे-धीरे आर्यन की ओर मुड़ा। "तुम... तुम्हें यादें आ रही हैं? मृया की यादें?"

आर्यन ने सिर हिलाया। "हाँ। एक हवेली। एक लाल गुलाब। बारिश।"

काल के चारों ओर का अंधकार सघन हो गया। "यह असंभव है। दूतों की कोई यादें नहीं होतीं। हम निर्विकार होते हैं। निर्विशेष।"

"शायद वह हमेशा से दूत नहीं थी," आर्यन ने कहा, अचानक एक अनुमान लगाते हुए। "शायद उसे दूत बनाया गया था।"

एक लंबी खामोशी छा गई। फिर काल बोला: "तुम दोनों को सीधे दंडाधिकरण के सामने पेश होना होगा। कल रात, चौराहे के पुराने बरगद के पेड़ के नीचे। अगर तुम नहीं आए, तो तुम्हारे पूरे वंश को शापित किया जाएगा।"

और वह गायब हो गया।

ठंड धीरे-धीरे कम होने लगी। आर्यन हाँफ रहा था, उसका शरीर कांप रहा था। मृया उसके पास आई, और उसकी आँखों में चिंता थी।

"मैं ठीक हूँ," आर्यन ने कहा। "पर तुम... दंडाधिकरण क्या है?"

मृया ने अपनी उँगलियों से फाँसी का संकेत बनाया।

"वे तुम्हें मार देंगे?"

मृया ने सिर हिलाया। फिर उसने अपने हाथों से एक और संकेत बनाया, पूरी तरह से मिटा देना। कभी अस्तित्व में न होना।

"नहीं," आर्यन ने कहा। "मैं ऐसा नहीं होने दूँगा। हम कुछ करेंगे।"

मृया ने दुखी मुस्कान दी। उसने आर्यन का हाथ उठाया, और उसकी कलाई के निशान को देखा। फिर उसने अपनी कलाई दिखाई, वहाँ अब एक निशान था। आर्यन का नाम, हल्के से जलता हुआ।

"यह क्या है?" आर्यन ने पूछा।

मृया ने अपने दिल पर हाथ रखा, फिर आर्यन के दिल की ओर इशारा किया। एक बंधन।

"हम जुड़ गए हैं," आर्यन ने समझा।

मृया ने हाँ में सिर हिलाया। फिर उसने एक अजीब संकेत बनाया, दो उँगलियाँ एक साथ, फिर अलग, फिर दोबारा जुड़ती हुई। भाग्य।

"हमारा भाग्य जुड़ा हुआ है?"

हाँ।

मृया ने घड़ी की ओर इशारा किया। समय कम है। फिर उसने हवेली का संकेत बनाया, और एक प्रश्नवाचक भाव।

"हाँ, मुझे वह हवेली याद आई," आर्यन ने कहा। "और मुझे लगता है मेरे पास उसकी एक तस्वीर है।"

उसने मृया को वह पुरानी तस्वीर दिखाई। मृया ने देखा, और अचानक उसके शरीर में एक झटका सा लगा। उसने तस्वीर को पकड़ लिया, उस युवती के धुंधले चेहरे को देखते हुए।

उसकी आँखों में आँसू आ गए। असली आँसू, जो उसकी गालों पर बहने लगे और जमीन पर गिरे, जहाँ वे बर्फ के टुकड़ों की तरह टिक-टिक की आवाज़ करते हुए पिघल गए।

"तुम उसे पहचानती हो," आर्यन ने फुसफुसाया। "वह तुम हो, है ना?"

मृया ने हाँ में सिर हिलाया, आँसुओं से भरी आँखों के साथ। उसने अपने सिर पर हाथ रखा, मुझे याद नहीं, पर मैं जानती हूँ।

आर्यन ने तस्वीर के पीछे देखा। वहाँ एक पता लिखा था: "वर्मा हवेली, चंद्रनगर।"

"चंद्रनगर," उसने कहा। "यह जगह अभी भी है। मैंने दादाजी से इसके बारे में सुना है।"

मृया की आँखों में एक आशा की किरण जगी। उसने जल्दी से संकेत किय, वहाँ जाओ। सच्चाई ढूँढो।

"पर कल रात तो दंडाधिकरण..."

मृया ने सिर हिलाया। पहले दंडाधिकरण। फिर हवेली। उसने आर्यन से वादा करने का संकेत किया, अगर मैं नहीं बची, तो तुम जाना। मेरी यादों को ढूँढना।

"तुम बचोगी," आर्यन ने दृढ़ता से कहा। "मैं तुम्हें नहीं मरने दूँगा।"

मृया ने एक दुखभरी मुस्कान दी, जैसे कह रही ह, तुम मृत्यु को कैसे रोक सकते हो?

पर आर्यन के मन में एक योजना बन रही थी। अगर मृया को यादें आ रही थीं, और वह उससे जुड़ी हुई थी, तो शायद उनके बीच का यह बंधन ही उनकी ताकत थी। शायद यही वह शक्ति थी जो काल को भी डरा सकती थी।

उसने मृया का हाथ थामा। इस बार, कोई झटका नहीं लगा। सिर्फ एक गर्मी, एक जुड़ाव।

"कल रात," आर्यन ने कहा। "हम साथ जाएँगे। और हम साथ लड़ेंगे।"

मृया ने उसके हाथ को दबाया। उसकी आँखों में आभार था, और कुछ और... शायद पहली बार, आशा।

और आर्यन ने महसूस किया कि उसकी कलाई का निशान अब गर्म हो रहा था, जैसे कोई जीवित चीज़।

दो खोई हुई आत्माएँ, एक ही भाग्य से बंधी हुई।

और एक रात बाकी थी उन्हें साबित करने के लिए कि प्यार मृत्यु से भी मजबूत हो सकता है।