भाग 8: परीक्षा दो, विश्वासघात की छाया
दूसरे दिन की सुबह चंद्रनगर में एक अजीब सी उम्मीद लेकर आई। हवेली के बरामदे में आर्यन, मृया और विजय नाश्ता कर रहे थे, हालाँकि विजय और मृया को खाने की ज़रूरत नहीं थी, पर आर्यन की संगति में उन्हें एक सामान्य जीवन का एहसास हो रहा था।
"कल की परीक्षा," मृया ने कहा, अपनी चाय के कप को घुमाते हुए। "विश्वासघात। इसका क्या मतलब हो सकता है?"
विजय ने गहरी साँस ली। "शायद वे हमें एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा करेंगे। हमें चुनाव करने को कहेंगे।"
"पर हम चुनाव नहीं करेंगे," आर्यन ने दृढ़ता से कहा। "हम एक साथ रहेंगे।"
मृया ने आर्यन की ओर देखा, उसकी आँखों में एक अजीब सी चिंता थी। "पर क्या होगा अगर... अगर चुनाव ही एकमात्र रास्ता हो?"
तभी, हवा में वही सूक्ष्म सिहरन दौड़ गई। पर इस बार यह ठंडी नहीं थी, यह गर्म थी, जैसे कोई आग का झोंका।
सामने की दीवार पर फिर से पोर्टल खुला, पर इस बार उसका रंग लाल था। काली की आवाज़ फिर से आई, पर आज उसमें एक अलग ही गंभीरता थी।
"दूसरी परीक्षा का समय। विश्वासघात का सामना। याद रखो कभी-कभी वफादारी सबसे बड़ा विश्वासघात होती है।"
पोर्टल ने तीनों को निगल लिया।
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आर्यन खुद को एक अदालत में पाया। वह एक स्टैंड पर खड़ा था, और सामने तीन जज बैठे थे, काल, काली, और एक तीसरा जिसे उसने पहले नहीं देखा था: एक युवक, जिसकी आँखें सुनहरी थीं।
"आर्यन वर्मा," काल ने कहा, उसकी लाल आँखें चमक रही थीं। "तुम पर एक आरोप है। तुमने मृया का विश्वासघात किया है।"
"क्या?" आर्यन हैरान था। "मैंने कभी..."
"चुप रहो," सुनहरी आँखों वाले युवक ने कहा। उसकी आवाज़ में एक धातु की झनझनाहट थी। "हम तुम्हें सबूत दिखाएँगे।"
काली ने अपना हाथ उठाया, और हवा में एक दृश्य प्रकट हुआ। आर्यन ने खुद को देखा, अस्पताल की छत पर, उस रात के बाद जब मृया पहली बार गायब हुई थी।
दृश्य में, आर्यन अपनी नोटबुक में लिख रहा था: "वह एक खतरा है। उसे नष्ट करना होगा।"
"नहीं!" आर्यन चिल्लाया। "मैंने कभी ऐसा नहीं लिखा!"
"देखो," काल ने कहा। "तुम उसे नष्ट करना चाहते थे। क्योंकि तुम डर गए थे।"
"यह झूठ है!" आर्यन ने कहा।
"और यह देखो," सुनहरी आँखों वाले ने कहा।
दृश्य बदला। अब आर्यन देवेंद्र से बात कर रहा था। "मृया एक शाप है। हमें उससे छुटकारा पाना होगा।"
"मैंने कभी..." आर्यन की आवाज़ टूट गई। यह सच नहीं था। पर दृश्य इतने वास्तविक थे।
"तुमने उसका विश्वासघात किया," काल ने कहा। "और अब तुम्हें सजा मिलेगी।"
"पर मैं निर्दोष हूँ!"
"तो फिर साबित करो," काली ने कहा, पहली बार बोलते हुए। "हम मृया को बुलाते हैं। वही फैसला करेगी।"
दरवाज़ा खुला, और मृया अंदर आई। पर वह आज अलग थी, उसकी आँखों में एक ठंडक थी, एक गुस्सा।
"मृया," आर्यन ने कहा। "यह सब झूठ है। मैंने कभी..."
"चुप रहो," मृया ने कहा, उसकी आवाज़ बर्फ की तरह ठंडी थी। "मैंने सब देख लिया। तुम्हारी नोटबुक। तुम्हारी बातचीत। तुम मुझे नष्ट करना चाहते थे।"
"नहीं, मैं..."
"सच बोलो!" मृया चिल्लाई। "तुम मुझसे डरते थे। तुम मुझे एक राक्षस समझते थे।"
आर्यन ने उसकी आँखों में देखा। वहाँ प्यार नहीं था, सिर्फ नफरत और दर्द था। पर तभी, उसे कुछ अजीब लगा।
मृया की बाईं आँख की पुतली... वह फड़क रही थी। बहुत हल्के से, पर फड़क रही थी। जैसे कोई संकेत दे रही हो।
आर्यन ने गहरी साँस ली। यह परीक्षा थी। यह सच नहीं था।
"मृया," उसने धीरे से कहा। "तुम्हें याद है जब तुमने पहली बार मेरी आत्मा लेने की कोशिश की थी? तुम्हारी रोशनी मुझ तक नहीं पहुँच पाई थी।"
मृया चुप रही।
"तुम्हें याद है जब हमने पहली बार बात की थी? छत पर? तुम बोल नहीं पा रही थीं, पर तुम्हारी आँखों ने सब कुछ कह दिया था।"
मृया की आँखों में कुछ हलचल हुई। ठंडक कम हो रही थी।
"और तुम्हें याद है," आर्यन ने कहा, अब आगे बढ़ते हुए। "जब तुमने मुझे बचाया था? काल के सामने खड़ी हो गई थीं? अपने अस्तित्व को दाँव पर लगा दिया था?"
मृया की आँखें नम हो गईं।
"यह सब झूठ है," आर्यन ने कहा, अब जजों की ओर मुड़कर। "तुम लोग झूठे सबूत बना रहे हो। हमारे बीच का बंधन इतना कमजोर नहीं है।"
काल ने गुस्से में अपनी मुट्ठी बंद की। "तुम..."
"रुको," काली ने कहा। उसने मृया की ओर देखा। "क्या यह सच है? क्या तुम्हें विश्वास है कि आर्यन ने तुम्हारा विश्वासघात नहीं किया?"
सभी की निगाहें मृया पर टिक गईं।
मृया ने आर्यन की ओर देखा। फिर वह मुस्कुराई। "हाँ। मुझे विश्वास है।"
और उसके साथ ही, अदालत का दृश्य धुंधला पड़ने लगा।
"पहला भाग पूरा," काली की आवाज़ आई। "पर परीक्षा अभी खत्म नहीं हुई।"
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विजय की दुनिया अलग थी। वह वर्मा हवेली के उसी बरामदे में था, पर समय फिर से 1923 में वापस चला गया था।
उसके सामने मृया (मैत्रेयी) खड़ी थी, पर आज वह रो रही थी।
"तुमने मेरा विश्वासघात किया," मैत्रेयी ने कहा।
"क्या?" विजय हैरान था। "मैंने कभी..."
"तुमने अपने पिता को बताया," मैत्रेयी रोते हुए बोली। "तुमने कहा कि हम प्यार करते हैं। और फिर उसने मुझे मार डाला।"
"नहीं! मैंने कभी नहीं बताया!"
"झूठ!" मैत्रेयी चिल्लाई। "तुम कायर हो। तुमने मुझे बचाने की कोशिश भी नहीं की।"
विजय का दिल टूट रहा था। यह वही आरोप था जिसने उसे सौ साल तक सताया था। क्या वह सच में कायर था?
"मैंने कोशिश की," उसने कहा, आवाज़ काँप रही थी। "मैंने विरोध किया।"
"बहुत देर से," मैत्रेयी ने कहा। "जब मैं मर चुकी थी। तब तक बहुत देर हो चुकी थी।"
विजय ने अपना सिर झुका लिया। शायद यह सच था। शायद वह सच में कायर था।
तभी, उसे एक आवाज़ सुनाई दी। आर्यन की आवाज़।
"विजय, यह सच नहीं है।"
"पर यह दिख रहा है..."
"दिखना हमेशा सच नहीं होता," आर्यन की आवाज़ ने कहा। "तुम्हें अपने दिल से सुनना होगा। तुम्हें याद करना होगा कि तुमने वास्तव में क्या किया था।"
विजय ने आँखें बंद कर लीं। उसने याद किया।
उस रात। रसोईघर। मैत्रेयी जमीन पर गिरी हुई। उसका पिता खड़ा हुआ, हाथ में खाली गिलास।
विजय ने चिल्लाया था। रोया था। अपने पिता से लड़ा था। उसने मैत्रेयी को उठाने की कोशिश की थी, पर वह मर चुकी थी।
और फिर... उसने पुलिस को बुलाने की धमकी दी थी। अपने ही पिता को।
"मैं कायर नहीं था," विजय ने कहा, आँखें खोलकर। "मैंने लड़ाई लड़ी। हार गया, पर लड़ाई लड़ी।"
मैत्रेयी की आकृति धुंधली पड़ने लगी। "तो फिर... तुमने मेरा विश्वासघात नहीं किया?"
"कभी नहीं," विजय ने कहा। "मैं तुम्हें हमेशा प्यार करता था। और मरने के बाद भी करता हूँ।"
मैत्रेयी मुस्कुराई। और फिर वह गायब हो गई।
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मृया की परीक्षा सबसे कठिन थी। वह एक सफेद कमरे में थी, और सामने... दो आर्यन खड़े थे।
"एक सच्चा है, एक झूठा," काली की आवाज़ गूंजी। "चुनो। गलत चुनाव का मतलब है विश्वासघात।"
दोनों आर्यन एक जैसे दिख रहे थे। एक जैसे कपड़े, एक जैसी मुस्कान, एक जैसी आँखें।
"मृया," पहले आर्यन ने कहा। "मैं तुम्हारा आर्यन हूँ। मुझे चुनो।"
"नहीं, मैं हूँ," दूसरे ने कहा। "वह झूठा है।"
मृया ने दोनों को ध्यान से देखा। वह कैसे पहचाने? क्या कोई संकेत था?
"मुझे याद है," पहले आर्यन ने कहा। "जब हम पहली बार मिले थे। तुम्हारी आँखें। तुम्हारी ठंड। मेरी घड़ी रुक गई थी।"
दूसरा आर्यन भी वही बात कह सकता था। यह जानकारी सभी को पता थी।
मृया ने अपनी आँखें बंद कर लीं। उसने अपने दिल की सुनी। अपने बंधन की सुनी।
और तभी उसे एहसास हुआ।
उसने अपनी कलाई उठाई। उस पर आर्यन का निशान था, हल्का सा, पर मौजूद।
"तुम दोनों," उसने कहा। "अपनी कलाई दिखाओ।"
दोनों आर्यन ने अपनी कलाई उठाई। दोनों पर मृया के हाथ का निशान था।
पर मृया मुस्कुराई। "मैंने पहचान लिया।"
"कैसे?" काली की आवाज़ ने पूछा।
"क्योंकि मेरा निशान सिर्फ एक ही आर्यन पर है," मृया ने कहा। "जिस आर्यन से मेरा बंधन है। और वह निशान... वह जवाब देता है।"
उसने अपनी कलाई के निशान को छुआ। और सच्चे आर्यन की कलाई से भी एक हल्की चमक निकली। झूठे आर्यन की कलाई से नहीं।
"तुम," उसने सच्चे आर्यन की ओर इशारा किया। "तुम मेरे हो।"
झूठा आर्यन गायब हो गया। सच्चा आर्यन मुस्कुराया। "तुमने मुझे पहचान लिया।"
"हमेशा," मृया ने कहा।
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तीनों फिर से हवेली के बरामदे में थे। शाम हो रही थी।
काली प्रकट हुई, उसके चेहरे पर एक संतुष्ट मुस्कान थी। "तुमने दूसरी परीक्षा पार कर ली। तुमने साबित कर दिया कि तुम्हारा विश्वास सतही नहीं है। यह गहरा है। अटूट है।"
"पर तीसरी परीक्षा?" आर्यन ने पूछा।
"कल," काली ने कहा। "त्याग की परीक्षा। तैयार रहना। क्योंकि इस बार... तुम्हें वास्तव में कुछ त्यागना पड़ सकता है।"
वह गायब हो गई।
तीनों चुपचाप बैठे रहे। शाम की हवा में एक ठंडक थी।
"त्याग," मृया ने फुसफुसाया। "क्या हमें एक-दूसरे को त्यागना पड़ेगा?"
"नहीं," विजय ने कहा। "हम कुछ और त्यागेंगे। हमारा डर। हमारा अहंकार। हमारा अतीत।"
"पर अगर हमें एक-दूसरे को त्यागना पड़े?" मृया ने फिर से पूछा, उसकी आवाज़ में डर था।
आर्यन ने उसका हाथ थामा। "तो फिर हम नहीं त्यागेंगे। हम ऐसा कोई त्याग नहीं करेंगे जो हमें अलग करे।"
"पर अगर वही एकमात्र रास्ता हो?" मृया ने कहा।
"तो फिर हम नया रास्ता बनाएँगे," विजय ने कहा। "जैसे हमने आज किया। जैसे हम हमेशा से करते आए हैं।"
और तीनों ने एक-दूसरे का हाथ थाम लिया।
शायद यही उनकी ताकत थी, न सिर्फ प्यार, बल्कि एक दूसरे पर अटूट विश्वास।
और शायद यही विश्वास ही था जो उन्हें हर परीक्षा से गुजार सकता था।
भले ही वे तीनों अलग-अलग दुनिया से आए हों, एक जीवित, एक मृत, एक मृत्यु की दूत।
पर एक चीज़ उन्हें एक करती थी, एक ऐसा बंधन जो समय, मृत्यु और भाग्य को चुनौती देता था।
और कल, उन्हें साबित करना होगा कि वे इस बंधन के लिए क्या त्याग सकते हैं।
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रात होते-होते, हवेली के एक कोने में एक छाया हिली। यह काल या काली नहीं थी।
यह वह तीसरा जज था, सुनहरी आँखों वाला।
वह आर्यन के कमरे की ओर देख रहा था, उसके चेहरे पर एक अजीब सी उत्सुकता थी।
"दिलचस्प," उसने फुसफुसाया। "बहुत दिलचस्प।"
और फिर वह गायब हो गया, एक सुनहरी चिंगारी छोड़कर।
एक चिंगारी जो आर्यन की कलाई के निशान के पास जा कर खत्म हो गई।
और आर्यन, अपनी नींद में, एक अजीब सी गर्मी महसूस करके करवट बदल गया।