हमको ओढ़ावे चदरिया अब चलती बिरया
उस दिन लोधी रोड श्मशान घाट में खाकी वर्दी में बहुत लोग उपस्थित थे, विद्युत् शवदाह अर्थात इलेक्ट्रिक क्रेमेटोरियम के पास ही एक तरफ दो बिगुलर भी चुपचाप खड़े बाहर की तरफ बार-बार देख रहे थे, एक हथियार बंद टोली दिवंगत को अंतिम सलामी देने के लिए उपस्थित थी| कुछ महिलायें भी मौजूद थी| पहले समय में तो महिलायें श्मशान पर कभी नहीं आती थी पर अब बदले समय में थोड़ी बहुत आने लगी हैं| कुछ लोग बाहर मुख्य द्वार खड़े दिवंगत भूतपूर्व महा-निदेशक के मृत शरीर को लाने वाली एम्बुलेंस का इंतज़ार कर रहे थे| बाहर पुलिस के सीनियर ऑफिसरों की मंडलियाँ आपस में बातचीत में मशगूल थी, जो आल इंडिया इंस्टिट्यूट की और से आने वाली सड़क पर बार बार देख रही थी, फिर समय का हिसाब लगाने के लिए अपने घड़ियों की तरफ देखते जाते| उनमें बीएसएफ के वर्तमान महा-निदेशक, कुछ वर्तमान अन्य कुछ रिटायर्ड सीनियर पुलिस अधिकारी, इनके अलावा कई सिविल विभागों के उच्च पदासीन लोग,व मित्र-गण थे| तभी हलचल हुई क्योंकि एम्बुलेंस दिवंगत को लेकर आ गयी थी| वर्दी में तैनात गार्ड चौकस हो कर तैयार हो गए, बिगुलर ने भी अपनी निश्चित जगह तैनाती कर ली| वहां खड़े लोगों ने भी बातचीत बंद कर अपनी निगाहें सड़क पर लगा दी यह देखने के लिए कि अब आगे आगे क्या कुछ होने वाला है?
बाहर खड़ी अपनी बस से उतर कर बीएसएफ का एक छोटा बेंड शव यात्रा से आगे एक शोक धुन बजाता धीरे-चाल से मार्च करने लगा था, पीछे फुल यूनिफार्म में अर्थी को कन्धा देते अफसर चल रहे थे| साइड में गोपालन की बेटी अक्षरा, व उनका आठ दस वर्ष का पौत्र उदयन भी चलते आ रहे थे| उदयन के पापा स्कवाड्रन लीडर माधवन एयरफोर्स के फाइटर पायलट थे| कोई तीन वर्ष पूर्व उनके मिग-21 के दुर्घटना ग्रस्त हो जाने से उनकी मृत्यु हो हुई थी| इस प्रकार उदयन ही उनके कुल का बड़ा कुलदीपक था|
श्मशान घाट में अन्दर एक चबूतरे पर उनका शव बड़े आदर के साथ उतार कर रख दिया था| वहां पीछे दीवार पर भैंसे पर बैठे यमराज को दर्शाया हुआ था जो जीवन की नश्वरता दिखलाता सा लग रहा था| किसी को पता नहीं कब यमराज के दूत आकर बिना समय दिए पकड़ कर ले जावें| किसी ने ठीक ही कहा है, “कौन गया निश्चय से सोने, जागे का वो देख सवेरा|” यहाँ श्मशान घाट इस सारे माहौल को देख कर वैराग्य सा मन में आता है जिसे विद्वान् लोग श्मशान वैराग्य का नाम देते हैं|
पीछे दीवार पर तरह तरह के जीवन की क्षण भंगुरता दर्शाते उपदेश व दोहे लिखे थे| जिनमे से ज्यादातर संतकवि कबीर के दोहे थे|
एक में लिखा था,
हमको ओढ़ावे चदरिया अब चलती बिरया,
प्राण राम जब निकसन लागे, उलट गयी दोउ नैन पुतरिया ,
भीतर से जब बाहर लाये, छूट गयी सब महल अटरिया,
चार जने मिल खाट उठावत, ले चलत डगर डगरिया,
कहत कबीर सुनो भई साधो, साथ जली बस सूखी लकरिया.
सबसे पहले बीएसएफ के महानिदेशक पुन्नू स्वामी नायर ने फूलों की पुष्पांजलि चढ़ाई, फिर बारी-बारी से अनेक अफसरों व अन्य महानुभावों ने ऐसा किया|
कई लोग अलग-अलग तरह से उनके बारे में बात कर रहे थे, कुछ नश्वरता का ज्ञान बघार रहे थे.वहां आये कई आई०पी०एस० अधिकारी धीरे धीरे आपस में बातचीत करते हुए कह रहे थे कि गोपालन काफी अलग और अजीब थे अपने आई०पी०एस० के कैडर के अफसरों का अधिक ध्यान नहीं करते थे उनसे भी उम्मीद करते थे कि पेरा-मिलिट्री अफसरों की तरह हथियार चलाना सीखें उनकी तरह जोखिम उठावें उन्हीं की तरह पी०टी० परेड,पेट्रोलिंग,फायरिंग प्रैक्टिस आदि करें, ‘लीड फ्रॉम फ्रंट’ करने को कहते नकि केवल एयर कंडिशन्ड ऑफिस में बैठ कर इन फोर्सों को कमांड करें| सबको अपने रंग में रंगना चाहते थे| उन्हें सीआरपीएफ, बीएसएफ, आईटीबीपी की चुनौतीपूर्ण जिन्दगी ज्यादा पसंद थी, वे उन्ही की तरह के हो गए थे. अपने आई०पी०एस०अधिकारियों से ज्यादा वहां के अफसरों को मानते थे, उनकी सुनते थे| इसीलिए आई०पी०एस० अधिकारिर्यों में पोपुलर नहीं थे| इसके विपरीत उनके पेरामिलिट्री में कार्यरत अफसर उनके लीडरशिप व फिटनेस के गुणों को बेहद पसंद करते थे, मुश्किल टाइम में वे हथियार लेकर साथ खड़े मिलते थे, इसीलिए नए पुराने लोग बड़ी संख्या में आये हुए थे| ऑपरेशनों में भाग लेने पर उन्हें ‘ राष्ट्रपति के वीरता पदक से अलंकृत किया हुआ था.
उनके साथ काम किये सभी रैंक उनके निधन से इस प्रकार दुखी थे जैसे उन्हीं के परिवार का बुजुर्ग सदस्य उन्हें छोड़ कर चला गया हो| बीएसएफ से ज्यादा सेवानिवृत लोग सीआरपीएफ से थे जहाँ वे ज्यादा समय रह चुके थे| यह सब जब कि गोपालन साहेब को रिटायर हए पंद्रह साल से भी ज्यादा समय हो चुका था|
एक तरफ खड़े रिटायर्ड और सर्विंग अफसर दुखी थे उनके साथ बिताये समय की बातें बता रहे थे, कब और कहाँ उन्होंने उनके साथ ऑपरेशन किये थे, वे लाइव सिचुएशन में कंधे से कंधा मिला कर उनके साथ काम कर चुके थे, एक कह रहा था कि उसने भी उनके साथ वेपन कोर्स किया था, वे अपने कंधे पर सब की तरह एलएमजी रख कर खूब दौड़ते थे और आगे रहते थे, एक कह रहा था कि फायरिंग में उनसे भी अच्छी महारत उन्हें थी|
एक कह रहा था किसी की कोई सिफारिश नहीं सुनते थे बिलकुल नियम क़ानून से चलते थे, एक उनके मोटर साइकिल शौंक की बात कर रहा था कि उन्होंने मोटर साइकिल पर कई दुर्गम स्थान की यात्रा की| एक कह रहा था था के वे ‘डेयर डेविल’ थे, हर काम में साफ़ सुथरे, ईमानदार और पारदर्शी थे| एक उनके द्वारा लिखी पुस्तक ‘ फोर्टी इयर्स इन खाकी’ का उल्लेख कर रहा था| बातों से लग रहा था कि वे उनके प्रिय नायक रह चुके हैं| इसीलिए रिटायर हुए भी अनेक वर्ष होने पर उन्हें अंतिम विदाई देने बहुत से स्वेच्छा से वहां आये थे|
इल्क्ट्रिक श्मशान का स्वच्छ विकल्प पर्यावरण का ध्यान रखने के कारण उन्होंने बहुत पहले ही अपने लिए चुन लिया था जिससे प्रदूषण बहुत कम होता है| उनकी बेटी उन्ही की तरह आधुनिक विचारों की तथा बुद्धिमत्ता पूर्ण निर्णय लेने की क्षमता रखती थी तभी उसने स्वयं आकर बेटे की भूमिका निभाई थी तथा पंडितों की इच्छा के विरुद्ध यह तरीका अपनाया था|
उपरोक्त घटना कोई आठ वर्ष पुरानी है, पर द्वारका, दिल्ली की नंदनवाडी केंद्रीय सहकारी हाउसिंग सोसाइटी में रहने वाले बीएसएफ के डीआईजी बीस साल से पेंशन भोगी नंदलाल शर्मा को अखबार में आईपीएस और सीपीऐएफ के बीच में पड़ी खाई और गृह मंत्रालय द्वारा आईपीएस का पक्षपात में एक नया बिल संसद में लाने और उस पर उठे विवाद को पढने के बाद गोपालन के बारे में बहुत सी बातें बार-बार याद आई| वह अकेले आईपीएस थे जो अपने आप को बेहद फिट रखते थे तथा उन्हें पेरा मिलिट्री जैसे आईटीबीपी, सीआरपीएफ, बीएसएफ ज्यादा भाती थी, उनमें भी जहाँ गंभीर ऑपरेशन एरिया में कार्य करना पड़े| जहाँ एक्शन हो रहा हो उनकी पहली पसंद थी अगर अब वे होते अवश्य ही इस बिल के विरोध करने के आगे आते.
नंदलाल शर्मा बहुत पुराने समय के बारे में बता रहे थे जब उनकी सबसे पहले गोपालन सर से उनकी मुलाकात अजीब हालत में हुई थी| तब शर्मा की बीएसफ में नई नई सर्विस थी और शादी को केवल दो ही वर्ष हुए थे, उनकी पत्नी व एक वर्ष का बेटा था, कश्मीर में 93 बीएसएफ बटालियन में उनकी पहली पोस्टिंग थी| उन दिनों कश्मीर पोस्टिंग बड़ी अच्छी मानी जाती थी, सरकारी खर्च पर ‘धरती के स्वर्ग’ में रहना| अचानक उन्हें मध्य प्रदेश इंदोर स्थित सेंट्रल स्कूल ऑफ़ वेपन्स एंड टैक्टिस( सी०एस०डब्लू०टी०) में कोर्स के लिए नामित कर भेजा गया था| वे कोर्स में फॅमिली को साथ लेकर गए थे तथा मदद के लिए एक सिपाही को अर्दली ड्यूटी के लिए भी लेकर गए थे|
शर्मा जी की ट्रेन आधी रात के भी बाद इंदौर स्टेशन पहुँची थी, वे सिविल कपड़ों में थे, साथ में एक कांस्टेबल अर्दली मदद के लिए अपने साथ लेकर आये थे, वही उनका ध्यान रख रहा था उसी के पास उनकी राइफल थी. क्योंकि स्कूल की बस तो सवेरे ही लेने के लिए आनी थी वे अपने तामझाम के साथ फर्स्ट क्लास के वेटिंग रूम में आये| वहां सारी बेंच भरी थी, पर एक बेंच पर एक महिला ने अपने पास बैठने के लिए उनकी पत्नी और बच्चे को जगह दे दी थी|
अचानक शर्मा जी ने बड़े आश्चर्य से देखा, वहां फर्श ही पर एक बाकायदा फुल पुलिस यूनिफार्म के एडिशनल एस.पी. रैंक का लम्बी बड़ी मूंछों वाला स्मार्ट आई.पी.एस. अधिकारी बड़े मजे से सो रहा है, जिसने अपनी राइफल को जंजीर के साथ अपनी कलाई पर बाँधा हुआ है| सुबह तडके ही एक ट्रेन और आई और बी.एस.एफ के एक आर०पी० ने बताया कि एक थ्री टन ट्रक ट्रेनीज को लेने आया है, शर्मा जी का सामान उनका अर्दली दो चक्कर में गाडी में रख आया, पर मूछ वाले पुलिस अधिकारी ने उठ कर अपनी राइफल को शिलिंग आर्म कर कंधे पर डाला, एक हाथ में एक बक्स दूसरे हाथ में एक अटेची आराम से उठा कर गाडी में चढ़ाई तथा दूसरे चक्कर में अपनी पत्नी और एक बच्चे के साथ बाकी सामान उठा कर आये हुए ट्रक के पास ज़मीन पर बक्से को रख, उसी पर चढ़ा कर अपनी पत्नीं को भी ट्रक में चढ़ा दिया| शर्मा जी ने उनसे बहुतेरा अनुरोध किया के वे सीनियर है अतः दोनों पति पत्नी आगे ड्राईवर के साथ सीट पर चले जायें पर उन्होंने कहा वे वहीँ ठीक हैं| सपत्नीक शर्मा जी आगे सीट पर चले गए. लगभग दस बारह और ट्रेनिंग कोर्स के लिए आये सभी रैंक के ट्रेनीज को लेकर ट्रक स्कूल पहुंचा था| शर्मा जी और उनसे सीनियर उन्ही आई.पी.एस अफसर को पास पास दो छोटी फॅमिली एकोमोडेशन अलोट हुई मिली थी| वे ही गोपालन थे, उन्होंने बताया की स्वेच्छा से वे आई.टी.बी.पी. में चाइना बॉर्डर में तैनात हो कर गए थे और स्वयं कह कर इस कठिन आउट डोर कोर्स में आये थे. 10 सप्ताह के इस कोर्स के दौरान दोनों अफसर और उनके परिवार बहुत करीब आ गये थे, वे शर्मा जी से लगभग चार वर्ष बड़े थे पर दोनों की शादी लगभग साथ-साथ हुई थी और दोनों के एक एक डेढ़ वर्ष के बेटे थे|
लगभग आधी शताब्दी के बाद शर्मा जी को लोधी रोड श्मशान घाट गोपालन सर के बारे में ये सब कुछ ऐसे याद आ रहा था जैसे वे फिल्म देख रहें हों| उन्हें याद आ रहा था कि गोपालन सबसे टफ ट्रेनीज में से एक थे| सिपाहियों की तरह पिट्ठू लगा कर एल.एम्.जी. को कंधे पर रख वे दस किलोमीटर दौड़ भी वे हंसते करते थे| वे कोर्स सीनियर भी थे, इसलिए वे ज़रा सी भी ढील नहीं करते ज़ब की कोर्स इंचार्ज कई बार उनको कुछ ज़रामरा छूट भी देना चाहें तो उन्हें मंज़ूर न था| सबके सामने वे एक आदर्श नमूना थे.
इंदोर में कोर्स के दौरान वे अपने साथ किताबें भी बहुत लाये थे और अत्यंत पढाक्कू भी थे| जब भी मौका मिलता पढ़ते रहते थे|
शर्मा जी की विचार श्रंखला एक के बाद पुराने से नए और नए से पुराने के बीच चक्कर लगा रही थी.
श्मशान घाट में सब सर्विंग सीनियर अफसरों की फूलों की गोल गोल पुष्पांजलि (रीथ) अर्पण के बाद शर्मा जी ने भी कुछ फूल उठा कर हाथ जोड़ते जोड़ते, ईश्वर से प्रार्थना करते हुए उनके पैरों की तरफ समर्पित की और वापिस आकर खड़े हो गए थे|
फिर से उन्हें याद आ रहा था कि नेहरु स्टेडियम के निकट प्रगति विहार हॉस्टल के पास मदर डेयरी बूथ पर वह दूध लेने गया था कि अचानक उनसे मुलाकात हुई वे भी दूध लेने आये हुए थे, वे डी आई जी हो चुके थे सड़क के पार सी० जी०ओ० काम्प्लेक्स के टाइप फाइव सरकारी क्वार्टर में रहते थे| डी.आई.जी. होते हुए भी खुद ही दूध लेने आ रहें हैं, शर्मा जी का दूध लेने अर्दली ही आता था उस दिन उसे कुछ और सामान लेने के लिए भेजा हुआ था इस लिए ही शर्मा जी को आना पड़ा था| शर्मा जी के अपने आई.पी.एस. डीआईजी तो अपने आप को फन्नेखां ही समझते थे, जो कई बार आयु और सर्विस में कम होने के बावजूद ऐसे बात करते थे जैसे शर्मा जी बीस वर्ष की सर्विस के बावजूद कुछ नहीं जानते और बिन मांगे अजीबोगरीब सलाह और सुझाव देते| उनमें से कई तो पहली ही बार ऊँचे पद पर केन्द्रीय पुलिस संगठनों में सीधे डीआईजी पद पर पेराशूट द्वारा ड्राप हुए थे|
श्मशान में सब कुछ देखते समय विचार मग्न शर्मा जी सोच रहे थे गोपालन इन सब से कितने अलग थे, कितने ईमानदार कितने निष्पक्ष| यही सुना जा रहा था कि अस्वस्थ थे और अपने फ्लैट की बालकोनी में हाथ से मोबाइल छूटने पर उसे पकड़ने के चक्कर में चौथी मंजिल से गिर कर उनको गंभीर अवस्था में ट्रोमा सेंटर में भर्ती कराया गया था, वहां भी शर्मा उनको देखने गए थे, गंभीर हालत में भी अपनी मूंछों के नीचे से मुस्कुराते हुए से लगे थे| कम से कम उनके चेहरे पर कोई दीन भाव नहीं था| खैर गिरने के बाद दोनों पैरों और कमर में फ्रैक्चर थे हालत तो गंभीर थी पर आशा भी थी बच जायेंगे पर अपंग हो जायेंगे| दिमाग में आ रहा था अपंग जीना उनके स्वभाव के विपरीत है|
शव को अग्नि में समर्पित करने से पहले दक्षिण भारतीय लूंगी धारी ब्राह्मणों ने जोर-जोर से मंत्र बोले फिर छोटे से उदयन से अग्नि दाह की रस्म कराई सेरेमोनियल गार्ड ने सलामी दी बिगुलरों ने लास्ट पोस्ट बजाया, हवा में राइफल फ़ायर कर गार्ड ने और पूरा सैनिक सम्मान दिया और धीरे धीरे अन्तिम संस्कार संपन्न हो रहा था. कुछ लोगों को छोड़ कर धीरे धीरे लोग चले गए|
शर्मा जी को याद आ रहा था 1984 का वर्ष असम आन्दोलन चरम पर था| शर्मा जी की दो कम्पनी की डीटेच्मेंट वहां लगी हुई थी, असम के मंगलदोई नगर, जो दरांग जिले में तैनाती थी. जहाँ उन दिनों काफी स्थिति खराब चल रही थी वहां के सर्किट हाउस में रात को वे ठहरे हुए थे, ब्रेक-फ़ास्ट के बाद अपनी तीन गाड़ियों की एस्कॉर्ट के साथ निकलने वाले थे कि एक सरकारी गाडी आई जिसमें से गोपालन निकलते दिखाई दिए, खुद गाड़ी चला कर लाये थे, बगल की सीट से अपनी स्टेनगन को कंधे पर स्लिंग आर्म कर अन्दर जाने वाले थे कि शर्मा जो बीएसएफ में लम्बी नौकरी के बावजूद तब तक एक ही प्रमोशन पाए थे और गोपालन आईजी की ड्रेस में थे| वे ऐसे मिले थे जैसे पुराने मित्र हों, रैंक का अंतर आड़े नहीं आ रहा था| साथ बैठ कर चाय पीते हुए जब शर्मा ने उनसे पूछा,“सर, आई.जी. बनने पर भी सिक्यूरिटी के लिए एस्कॉर्ट क्यों नहीं रखते?”
उनका जबाब था, “जब मैं खुद हथियार अच्छी तरह चला सकता हूँ तो इस सबकी क्या ज़रूरत है?”
उनमें अदम्य आत्म विश्वास दिखाई दिया था| शर्मा चुप हो गए फिर उसी दिन गोपालन सर ने आगे बताया था कि वे गौहाटी से एक मीटिंग से आ रहे हैं और तेजपुर जा रहें हैं जिसमें अन्य बातों के अलावा बताया था कि उन्हें अपने एरिया से कम से कम तीन बसें कांग्रेस में होने वाली किसी रैली के लिए भर कर दिल्ली भेजनी है जिसमें भारत वर्ष के सभी प्रान्तों से लोग शामिल होने वाले हैं|
हंस कर फिर कहा,“ मैंने साफ़ मना कर दिया कि इस तरह का कोई आदेश वे नहीं मानेंगे और उनका कोई मातहत|” यह पुलिस महा-निदेशक व मुख्यमंत्री दोनों की उपस्थिति में कहा और कह कर हंस दिए| इतना साहस कितनों में होता है? इसी कारण बहुत से लोग उनसे खफा रहते तथा मातहत इस बात से खुश की सीधे नियम से चलने वाले हैं, कोई चापलूसी या बाहर की सिफारिश की ज़रूरत नहीं है|
शर्मा को फिर याद आ रहा था कि जब वह एक सिविल विभाग डेपुटेशन पर थे और स्टाफ बस से उतर कर पैदल अपने सीजीओ काम्प्लेक्स स्थित अपने ऑफिस जा रहे थे, सामने से एक 3- स्टार वाली सफ़ेद एम्बेसडर जिसके आगे पीछे एस्कॉर्ट थी निकली जा रही और अचानक उनके पास आकर रूक गयी| शर्मा ने चलना जारी रखा| अचानक पीछे से एक इंस्पेक्टर रैंक के व्यक्ति ने पीछे से लपक कर आकर उनका कन्धा टैप किया और पीछे इंगित करते कहा, “डी.जी. साहेब आप को याद कर रहे हैं|”
मुड कर जब शर्मा जी ने देखा तो गोपालन सर फुल यूनिफार्म में खड़े हंस रहे थे| पास आने पर न केवल हाथ मिलाया बल्कि झप्पी भी भरी, मुझे उनकी बेबाकी पर संकोच हो रहा था क्योंकि बहुत से लोग देख रहे थे| बताया कि वे डी.जी. तो बन गए हैं, पर बहुत से लोगों को उनका डी.जी. होना पच नहीं रहा है. बहुत से सिफारिशी और दलाल लोगों की दुकान अपने आप बंद हो गयी कुछ कहना सुनना नहीं पड़ा, फिर इंग्लिश में कहा, ‘reputation travel faster than person’ वे थोडा ज़ल्दी में थे बताया “गृह मंत्रालय में मीटिंग है, लंच टाइम से पहले आ जाऊंगा, उस समय ऑफिस में ज़रूर ज़रूर आना|” और कार में बैठ कर आगे बढ़ गये थे| दोपहर बाद फिर उनसे मिला और बड़ा अच्छा टाइम रहा बहुत नई पुरानीं बातें की खूब हंस कर बताते रहे|
श्मशान से घर लौट कर भी तरह तरह से गोपालन की बातें घुमड़ घुमड़ कर शर्मा जी को याद आती रही, सोच रहा था कि नौकरी में सर्वोच्च पद पाकर भी कैसे सामान्य रहा जा सकता है यह उनसे ही सीखना चाहिए| ऐसे ही ईमानदारी से, बिना डरे या समझौता किये बिना भी काम किया जा सकता है| ऑफिस में भी बहुत सारी पुस्तकें उनकी टेबल पर पढने के लिए करीने से हुई थी| वे पूर्वोत्तर की नगा व मिज़ो इन्सेर्जेंसी या विद्रोह और हिंसक सशस्त्र अलगाववादी आन्दोलन के बारे में बेहद विशद ज्ञान रखते थे| एक एक अलगाववादी गुट उनके समर्थक उनके कैंप आदि के बारे उनसे ज्यादा ज्ञान शायद ही किसी को हो| इसी तरह कश्मीर घाटी में भी आई जी बीएसएफ की हैसियत से खुद भी जोखिम उठा कर उन्होंने बहुत अच्छा काम बॉर्डर एरिया में किया था|
अंतिम संस्कार वाली रात को शर्मा को नींद बहुत देर से आई, मिसेज शर्मा ने शाम को उनकी हालत देख कर समझाया भी था की दुःख की बात ज़रूर है पर अपने आप को इतना उद्वेलित न करो कि खुद की तबीयत ही ख़राब न हो जाए|
उस समय शर्मा जी चुप हो गए और बिजली बुझाने के बाद भी पहले तो करवट बदलते रहे सोते ही उनके सपने में फिर उन्हें दिखाई दिया वह दृश्य जब उनके बेटे स्क्वाड्रन कमांडर की एयर क्रैश में मृत्यु के बाद वे उनके घर गए, उनका बेटा शर्मा जी के बेटे की आयु का था तथा वे दोनों मित्र भी थे, उनके बेटे मुनीश ने ही शर्मा जी को इस दुखद घटना के बारे बेंगलोर से फ़ोन पर बताया था, मिसेज शर्मा भी उनके साथ घर पर गयी, जब वे उनके घर गए सादे से ड्राइंग रूम में पूरे साफ़ सुथरे कपड़ों में , पैरों में ब्राउन यूनिफार्म वाले अम्येनिशन बूट पहने हुए थे जिन्हें वे मोटर साइकिल चलाते हुए पहनते थे, उन्हें मोटर साइकिल चलने का बहुत शौंक था|
शर्मा जी ने जब बड़े उदास हो कर जब अपना दुःख प्रगट किया तब उन्होंने बिना कोई दुःख के संयत रहते गीता के ‘सुखे दुखे समे कृत्वा’ भाव में कहा, “इट इस ऑलराइट, ही हेज़ चोजेन दिस प्रोफेशन ऑफ़ ब्रेव” सुन कर शर्मा जी को बड़ा आश्चर्य हो रहा था, पर जानते थे वे नार्मल तो कभी भी नहीं रहे ही नहीं अलग मिटटी के बने थे|
पुत्र-शोक से बड़ा दुःख तो किसी पिता का दुनिया में नहीं होता, इतना समभाव, इतना मज़बूत हृदय तो बिरले से बिरले में ही होता है, जवान बेटे की मौत हुई थी| स्वाभिमानी थे अपने को कमज़ोर नहीं बनाया, हाँ उनकी पत्नी बेहद दुखी थी और उनकी हालत रो रो कर काफी खराब और दयनीय थी|
उनके देहांत के बारे में भी बाद में पता लगा था कि उन्हें प्रोस्टेट कैंसर हुआ था और बिना किसी को बताये वे अपना इलाज आल इंडिया इंस्टिट्यूट दिल्ली में कराते रहे, चुपचाप पीड़ा हंस हंस कर सहते रहे उनकी पत्नी को भी आभास नहीं था कि उनको लाईलाज कैंसर है, डॉक्टर तो उनको एडमिट ही रखना चाहते थे पर वे स्वयं घर आये घर पर आकर कुछ पर्सनल फाइल में लिखते पढ़ते रहे फिर यह चौथी मंजिल से गिरने की घटना हो गयी थी| पर सोसाइटी के प्रेसिडेंट सहरावत जो शर्मा जी के पुराने मित्र ने उन्हें बताया था कि उनका अनुमान ही नहीं पूरा विश्वास है “कोई एक्सीडेंट पेक्सीडेंट नहीं हुआ था बल्कि वे खुद ही अपने दर्दों को और छुपाना, सहना नहीं चाहते होंगे और उन्होंने अपने फ्लैट की चौथी मंजिल की बालकनी से छलांग लगा कर अपना अंत किया था|”
सच तो नहीं मालूम पर वे बेहद स्वाभिमानी थे, वीर थे, गंभीर थे दयनीय बन कर कुछ और दिन घिसटना उनके स्वभाव के अनुकूल हरगिज़ नहीं था| उनके जैसे निडर बैखोफ बहादुरों के लिए प्रसिद्ध शायर फैज़ अहमद फैज़ ने ठीक ही फ़रमाया है –
जिस धज से कोई मकतल में गया वो शान सलामत रहती है;
ये जान तो आनी जानी है, इस जां की तो कोई बात नहीं
उनकी अंतिम यात्रा और विदाई बेहद शान से ही तो हुई|