राधा का संगम - प्रकरण 16
दादू ने पहली बार सुकू को अपनी दुल्हन के रूप में देखा तो वह पूरी तरह पिघल गई थी.
दादू होटल के ऊस कमरे में धीरे से हाथ पकडकर सुकू को अंदर खिड़की के पास ले गये थे. बाहर समंदर की लहरे शौर कर रही थी. और ऊस का दयान सिर्फ दादू की धड़कनों पर था.
दादू ने बड़े प्यार से सुकू का माथा चूमा था और कहां था की वह केवल दादू की हैं.
होटल में इस कमरे में दादू ने धीरे से सुकू की साड़ी का पल्लू अपने हाथो में ले लिया था. ऊस की नजरो की गर्मी सुकू को पिघला रही थी.
दादू की एक छुअन ने सुकू की धड़कनो को बिल्कुल बेकाबू कर दिया था.
दादू ने धीरे से पल्लू सरका कर सुकू को अपनी तरफ खिंच लिया था और ऊस ने शर्म से आंखे बंद कर दी थी.
ऊस वक़्त सुकू की धड़कने इतनी तेज थी की उसे लगा था दादू उसे सुन रहे थे.
दादू ने धीरे से ऊस का चेहरा उठाया था और गहराई से उन्होंने सुकू की आँखों में झांका था. उन की नजरो का नशा सुकू को पूरी तरह मदहोश कर चूका था.
दादू के साँसो की वह तपिश सुकू के होठों के बिल्कुल करीब थी. ऊस के दिल की धड़कने देखने लायक थी.
दादू ने उसे धीरे से बिस्तर में बिठाया था और वह खुद सुकू के सामने घुटनो के बल बैठ गये थे.. उन की नजर में जो आदर और प्यार था जिस ने सुकू का दिल जीत लिया था.
दादू की एक छुअन ने सुकू की सारी घबराहट दूर कर दी थी.
उन्होंने दूसरी बार सुकू का हाथ थामा था. और ऊस की आँखों में डूब गये थे. ऊस वक़्त दोनों की ख़ामोशी बहुत कुछ बयान कर रही थी.
दादू की नजरो का नशा सुकु को पूरी तरह पिघला रहा था. ऊस की गर्मी शब्दों में बयां करना आसान नहीं था.
दादू ने धीरे से अपना चेहरा सुकु के बालो में छुपा लिया था और ऊस की गर्दन पर अपनी साँसे छोड़ दी थी, ऊस वक़्त सुकू का बदन थरथर कांप रहा था.
दादू की छुअन ने उसे दुनिया से बेगाना कर दिया था. ऊस वक़्त दादू को महसूस करना ऊस के लिये मुश्किल प्रतीत हो रहा था
दादू ने धीरे से ऊस की कमर पर हाथ रखकर अपनी ओर खिंच लिया था.. ऊस वक़्त समंदर की ठंडी हवा उन की गर्मी कम नहीं कर पा रही थी.
दोनों बाजु में सोये थे एक दुसरो को लिपटकर ऊस वक़्त होटल में ऑडियो सिस्टम पर गीत गूंज रहा था.
दो सितारों का जमी पर हैं
मिलन आज की रात
दादू की एक नजर ने पुन : पूरी तरह बेबस कर दिया था. ऊस की मदहोशी देखने जैसी थी.
दादू ने अगला कदम बढ़ाया था और वह समर्पित हो गई थी और हनीमून की सारी रसमे पूरी हो गई थी. ऊस वक़्त सुकू मानो स्वर्ग का एहसास करवाया था.
सुबह उठकर ऊस ने कपड़े पहन लिये और अपने बाल ठीक करने लगी थी.
दादू की प्रणय लीला ने उसे रात भर सोने नहीं दिया. कुछ भी बाकी नहीं छोड़ा था.
ऊस सुबह दोनों की शादी सुदा जीवन की प्रथम सुबह थी, खिड़की से आती हुई धुप और समंदर की लहरों का शौर कितना लुभाने वाला था.
दादू ने सुबह सुबह सुकू को कहां था: " तुम मेरी सब से बडी कमजोरी हो "
ऊस समय दादू ने सुकू को अपनी बाहों में भर के खिड़की के पास खड़ा कर दिया था और पीछे से ऊस की कमर को मजबूती से पकड ली थी.
दादू ने ऊस सुबह सुकू को कहां था. " तुम मेरी परछाई हो. "
दादू की बात ने उसे सुरक्षित होने का एहसास दिलाया था. और पीछे से कसकर पकडकर सुकू के कानो में कहां था. " अपना यह बंधन कभी नहीं टूटेगा..
दादू ने ऊस सुबह खाना मंगाया था और अपनी सुकू को अपने हाथो पहला निबाला खिलाया था. ऊस पल उन की छुअन और प्यार भरा अंदाज उसे बहुत सुहाना लगा था.
ना जाने क्या हुआ था? दादू की नजरो ने उसे फिर से शरमाने पर मजबूर कर दिया था.
दादूने बाद में उसे पीछे से पकडकर कहां था: " आज हम लोग कहीं बाहर नहीं जायेंगे.. बार बार अपने हनीमून का रिटेक करेंगे.."
दादू ने उसे खिड़की के पास ले जाकर अपनी और घुमाया था.
बाहर की धूप सुकू के चेहरे को छू रही थी और दादू उसे बडी बेताबी से निहार रहे थे.
उन्होंने सुकू को कसकर पकड लिया था जिस में अपनापन झलक रहा था जिस ने उसे पिघला दिया था.
दादू ने उसे गोद में उठाया था और बिस्तर पर पटक दिया था. ऊस वक़्त कमरे में केवल दोनों की साँसो का शौर था.
दादू ने ऊस के होठों पर अपना कब्जा कर लिया था जिस से मानो सुकू की साँसे थम सी गई थी.
उन्होंने सुकू को विश्वास दिलाया था: "तुम सिर्फ मेरी बस मेरी हो मैं तुम्हे कभी नहीं छोडूंगा. "
इस बात ने सुकू को आसमान में पंहुचा दिया था. वह अपने आप को सब से खुश नसीब मान रही थी..
ऊस रात होटल के कमरे की लाइट चली गई थी.. दोनों बिल्कुल अंधेरे में एक दुसरो को लिपट कर बैठे थे.
ऊस वक़्त होटल के किसी वैटर ने सुकू के साथ बदतमीज़ी करने का प्रयास किया था, तब दादू ने उसे मार मार ऊस की हड्डी पसली एक कर दी थी.
अंधेरे में केवल अपनी मोबाइल लाइट से काम चलाना पड़ रहा था.
दादू की ऐसी हिम्मत देखकर सुकू फ़िदा हो गई थी.
ऊस वक़्त सुकू ने दादू को बताया था : " सिर्फ कोड्स और डाटा नहीं होता. ज़ब कोई आप जैसा मिल जाता है, कोई दिल से बात करने वाला मिल जाता है तो इन बेजान शब्दों में भी रूह आ जाती है. "
00000000000 ( क्रमशः)