पारस चुपचाप बैठा रहा।
प्रणाली के रोने की आवाज़ धीरे धीरे शांत हो रही थी।
कितनी देर बाद —
उसने अपना सिर उठाया।
आँखें पोंछीं।
और बोली —
"भैया... वो बस एक साधारण इंसान है।"
पारस ने उसे देखा।
"उसका नाम वर्धान है।"
पारस की आँखों में कुछ हिला — पर वो चुप रहा। सुनता रहा।
प्रणाली ने सब बताया —
जंगल में पहली मुलाकात। वो झोपड़ी। वो बाबा। वो नदी किनारे की बातें। वो हँसी। वो झगड़े।
और फिर — वो आखिरी लम्हा।
"जाओ।"
पारस देर तक चुप रहा।
गरुड़ लोक और बीजापुर की पुरानी कहानी उसे पहले से पता थी।
और अब —
एक एक बात जुड़ रही थी।
उसने धीरे से पूछा —
"जिस दिन मेरे प्राण बचे थे..."
प्रणाली ने ऊपर देखा।
"उस दिन तुम वर्धान से मिली थीं?"
प्रणाली ने एक पल सोचा —
"नहीं भैया।"
"उसने मुझसे कहा था — खिड़की खुली रखना।"
"पर वो आया नहीं था।"
पारस की आँखें कहीं खो गईं।
एक धुंधली याद —
कोई था। उस रात।
उसके शरीर में किसी की ऊर्जा आई थी — अनजानी पर गर्म।
और एक आवाज़ —
"मैं इस दुश्मनी को आगे नहीं बढ़ाना चाहता।"
"उम्मीद करता हूँ — हम मिलकर एक खुशहाल राज्य की नींव रखेंगे।"
पारस की आँखें वापस आईं।
सब समझ आ गया।
वर्धान कोई साधारण इंसान नहीं था।
वो गरुड़ था।
उसने एक गहरी साँस ली —
"प्रणाली।"
"तुम्हें यह विवाह करने की कोई ज़रूरत नहीं है।"
प्रणाली ने उसे देखा।
आँखें भरी हुई थीं — पर उनमें एक फैसला था।
"नहीं भैया।"
"मैं यह विवाह करूँगी।"
पारस ने मुँह खोला —
"पर—"
"भैया।" — उसकी आवाज़ शांत थी — दर्द से भरी पर मज़बूत।
"मेरा कुछ माह का प्रेम — मुझे इतना दुख दे रहा है।"
एक पल रुकी।
"अविराज मुझसे सालों से प्रेम करता है।"
"वो यह सह नहीं पाएगा।"
होंठ काँपे —
"और मैं... मैं उसे यह दर्द नहीं दे सकती।"
पारस की आँखें भर आईं।
वो कुछ नहीं बोला।
बस —
उसने अपनी बहन को फिर से गले लगा लिया।
और दोनों —
उस रात —
वो अपनी बहन को संभालता रहा।
अगले दिन सुबह —
गरुड़ लोक में वर्धान के कक्ष का दरवाज़ा खुला।
दूत सामने था — सिर झुकाए।
"राजकुमार।"
वर्धान ने उसे देखा —
"बोलो।"
दूत ने एक पल लिया —
"कनिष्क — पाताल लोक में था ही नहीं।"
वर्धान की आँखें सिकुड़ गईं।
"क्या?"
दूत ने सिर झुकाया —
"पाताल लोक के द्वारपालों से पूछताछ की। कनिष्क वहाँ गया ज़रूर था — पर बहुत कम समय के लिए।"
एक पल की ख़ामोशी।
"पिछले दस माह से वो..."
दूत ने धीरे से कहा —
"...गरुड़ लोक और बीजापुर के आस पास ही था।"
कक्ष में सन्नाटा छा गया।
वर्धान ने दूत को देखा।
"दस माह।" — उसने दोहराया — धीरे से।
वो वही समय था —
जब वो पहली बार जंगल में गया था।
जब पहली बार प्रणाली से मिला था।
जब उन दोनों की पहली मुलाकात हुई थी।
कनिष्क तब से नज़र रख रहा था।
पूरे दस माह से।
उसके हाथ की मुट्ठी भिंच गई।
दूत आगे बोला —
"राजकुमार... एक बात और है।"
वर्धान ने उसे देखा।
"बीजापुर में विवाह की तैयारियाँ शुरू हो गई हैं।"
"मेहंदी की रस्म कल हुई।"
वर्धान ने कोई जवाब नहीं दिया।
बस —
"जाओ।"
दूत चला गया।
कक्ष में अकेला था।
खिड़की के पास आया।
बाहर गरुड़ लोक था — पर नज़रें धरती की तरफ थीं।
"दस माह से नज़र रख रहा था।"
"पहले दिन से जानता था — प्रणाली के बारे में।"
"और मैं सोचता रहा — वो बधाई देने आया था।"
होंठों पर एक कड़वी मुस्कान आई।
आँखों में आग थी —
"कनिष्क।"
आवाज़ में अब कोई भाई वाली गर्माहट नहीं थी।
सिर्फ —
एक चेतावनी थी।
एक वादा था।
महल में हल्दी की रस्म शुरू हो चुकी थी।
दासियाँ गा रही थीं। फूलों की खुशबू थी। हँसी थी।
प्रणाली चौकी पर बैठी थी — पीली साड़ी में।
हल्दी लगाई जा रही थी — हाथों पर, गालों पर।
वो मुस्कुरा रही थी।
खुद को मना रही थी —
सब अच्छा है।
शायद यही लिखा था।
पर मन —
मन नहीं मान रहा था।
वो मुस्कान — जो होंठों पर थी — आँखों तक नहीं पहुँच रही थी।
उधर —
पारस अपने कक्ष में था।
पर मन कहीं और था।
कल रात की बातें — एक एक करके जुड़ रही थीं।
वो रात — जब उसके प्राण गए थे।
किसी ने उसके शरीर में अपनी ऊर्जा भेजी थी।
एक गरुड़।
उसने आँखें बंद कीं —
पर गरुड़ों का हमला भी तो उसी रात हुआ था।
गरुड़ विष।
और वो हमला...
वो रुका।
धीरे धीरे — एक सच उभर रहा था।
वो हमला उस पर था ही नहीं।
वो तो...
प्रणाली के लिए था।
ब्रह्मवर्धनी के लिए।
उसकी आँखें खुल गईं।
मतलब — गरुड़ों में से ही कोई है — जिसने यह सब किया।
और गरुड़ों में से ही कोई है — जो यह दुश्मनी खत्म करना चाहता है।
वो तुरंत उठा।
सीधे राजपुरोहित के पास गया।
सारी बात बताई — एक एक करके।
राजपुरोहित चुपचाप सुनते रहे।
और जब पारस चुप हुआ —
उन्होंने एक गहरी साँस ली।
"राजकुमार..."
"गरुड़ लोक का नया राजा — वर्धान है।"
"जो एक सुखी और समृद्ध राज्य बनाना चाहता है।"
"दोनों लोकों के लिए।"
पारस की आँखों में एक चमक आई —
और उसके साथ —
एक गुस्सा भी। 😤
वो सीधे उस जगह गया —
जो प्रणाली ने उसे बताई थी।
शापित गरुड़ की कुटिया।
जिसने वर्धान को बचाया था।
कुटिया के सामने पहुँचते ही —
पारस ने तलवार निकाली।
और एक झटके में — शापित गरुड़ की गर्दन पर रख दी।
"बुला उसे।"
आवाज़ में आग थी।
"अभी।"
शापित गरुड़ डरा नहीं।
वो जानता था — यह दिन आएगा।
उसने आँखें बंद कीं।
और अपनी शेष शक्ति और योग विद्या से —
वर्धान को संदेश भेजा।
गरुड़ लोक में —
वर्धान के कानों में एक आवाज़ गूँजी।
धीमी। पर स्पष्ट।
शापित गरुड़ की आवाज़।
वो एक पल के लिए रुका —
और अगले ही पल —
धरती पर था।
कुटिया के सामने —
एक लंबी शख्सियत उतरी।
भूरे पंख। राजसी भाव।
वर्धान।
उसने सामने देखा —
पारस।
तलवार हाथ में।
और उससे पहले कि वर्धान कुछ समझता —
तलवार उसकी गर्दन पर थी।
पारस की आँखों में आग थी — आँसू थे — और एक टूटा हुआ भाई था।
"तो तू ही है..."
आवाज़ काँप रही थी —
"...जिसने मेरी बहन की ज़िंदगी से खिलवाड़ किया है।"
वर्धान ने तलवार नहीं हटाई।
हिला नहीं।
बस —
पारस की आँखों में देखता रहा।
शांत।
पर उन आँखों में —
कोई सफाई नहीं थी।
कोई इनकार नहीं था।
सिर्फ —
एक सच था।