Adhura Pyaar - 1 in Hindi Thriller by iqbal Raj books and stories PDF | अधुरा प्यार - 1

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अधुरा प्यार - 1

उत्तर प्रदेश की वो सर्द रात और दिल में सुलगती नफरत... इकबाल राज के लिए अब अपना कहने को कुछ भी नहीं बचा था। सगी पत्नी के धोखे ने उसे रातों-रात बेघर और 'लावारिस' कर दिया। शहर छूटा, सुकून छूटा और इकबाल दर-दर भटकता हुआ एक अनजान गाँव पहुँचा, जो उसके भाई का ससुराल था। वहां उसका कोई अपना नहीं था, बस बेबसी थी।गाँव की सरहद पर इकबाल की मुलाकात उस मंजर से हुई जिसने उसकी नफरत को मोहब्बत में बदल दिया। जुबैदा—हाथ में छड़ी लिए अपनी बकरियां चराती हुई एक मासूम लड़की। उसकी सादगी और खिलखिलाती बातों ने इकबाल के जख्मों पर मरहम का काम किया। इकबाल को लगा कि शायद इस लावारिस ज़िंदगी को जुबैदा के रूप में एक ठिकाना मिल गया है।लेकिन, कहानी में असली जहर घोला जुबैदा की भाभी 'मुस्कान' ने। जैसे ही मुस्कान को भनक लगी कि इकबाल और जुबैदा के बीच मोहब्बत की कोंपलें फूट रही हैं, उसने अपने काले इरादों का जाल बिछा दिया। मुस्कान नहीं चाहती थी कि उसकी ननद किसी बाहरी और लावारिस लड़के के करीब जाए।उसने रात के सन्नाटे में एक तांत्रिक ताबीज का खेल शुरू किया। अब आलम यह है कि घर के अंदर जुबैदा के दिल पर मुस्कान और उसके ताबीज का पहरा रहता है—वह इकबाल को पूरी तरह भूल जाती है। लेकिन जैसे ही जुबैदा बाहर खेतों में बकरियां चराने आती है और इकबाल का चेहरा देखती है, उस ताबीज का असर कच्ची डोर की तरह टूटने लगता है।क्या इकबाल अपनी मोहब्बत की ताकत से मुस्कान भाभी के उस शैतानी ताबीज को मात दे पाएगा? या यह लावारिस एक बार फिर अपनी तकदीर से हार जाएगा?अध्याय 2: उत्तर प्रदेश की उन धूल भरी गलियों और पुराने बरगद के पेड़ को पीछे छोड़े अब कई घंटे बीत चुके थे। ट्रेन की पटरियों की वह 'खट-खट' की आवाज़ जैसे दिल की धड़कनों से मुकाबला कर रही थी। खिड़की के बाहर भागते हुए लहलहाते खेत अब धीरे-धीरे कंक्रीट के जंगलों में तब्दील हो रहे थे। मेरे जेहन में बार-बार वही पुरानी बातें घूम रही थीं। मुस्कान का वह चेहरा, जुबेदा की भाभी की वे तीखी बातें और वह माहौल जिससे निकलना मेरे लिए अनिवार्य हो गया था। मैं वहाँ एक लावारिस की तरह था, जिसकी अपनी कोई ज़मीन नहीं थी, कोई छत नहीं थी।​जैसे ही ट्रेन ने महाराष्ट्र की सीमा में प्रवेश किया, हवा में एक अलग सी नमी महसूस होने लगी। यह नमी समुद्र की थी या इस शहर की भागदौड़ की, यह कहना मुश्किल था। जब 'मुंबई सेंट्रल' का बड़ा सा बोर्ड सामने आया, तो एक पल के लिए कलेजा मुंह को आ गया। स्टेशन पर उतरते ही जो नज़ारा देखा, उसने होश उड़ा दिए। यहाँ इंसान नहीं, बल्कि इंसानों का एक समंदर बह रहा था। हर कोई कहीं न कहीं पहुँचने की जल्दी में था। कोई किसी को देख नहीं रहा था, कोई किसी के लिए रुक नहीं रहा था।​स्टेशन के बाहर निकलते ही जो धूप चेहरे पर पड़ी, वह यूपी की धूप जैसी तपिश वाली नहीं थी, बल्कि उसमें एक अजीब सी चिपचिपाहट थी। मैंने अपने कंधे पर टंगे पुराने थैले को कस कर पकड़ लिया। उस थैले में कपड़े कम और उम्मीदें ज़्यादा भरी थीं। मेरे पास न तो किसी का फोन नंबर था और न ही कोई पता। बस इतना सुना था कि यह शहर मेहनत करने वालों को भूखा नहीं सुलाता। लेकिन इस हज़ारों की भीड़ में, जहाँ हर कोई अपनी पहचान बनाने के लिए लड़ रहा था, मुझ जैसे एक 'लावारिस' की क्या बिसात थी?​मैं फुटपाथ के किनारे खड़ा होकर ऊँची इमारतों को देख रहा था। वे इमारतें जैसे मुझसे कह रही थीं, "यहाँ टिकना है, तो अपनी नसों में खून नहीं, फौलाद दौड़ना होगा।" जेब में पड़े कुछ चंद रुपयों को मैंने टटोला। ये रुपये शायद दो-तीन दिन तक मेरा साथ दे पाते, लेकिन उसके बाद? पेट की भूख और सिर पर छत का सवाल खड़ा था। मुझे याद आया कि कैसे गाँव में लोग कहते थे कि मुंबई में सड़कों पर भी सोना पड़ता है। आज वह बात सच होती दिख रही थी।​चलते-चलते मैं एक छोटी सी चाय की टपरी के पास रुका। वहाँ लोगों की बातें सुनकर समझ आया कि यहाँ हर शख्स एक कहानी लेकर आया है। कोई एक्टर बनने आया है, तो कोई सिर्फ दो वक्त की रोटी के लिए अपनी जान खपा रहा है। मैंने भी एक कप कड़क चाय ली और ठंडी हवा के झोंके को महसूस किया। यह शहर अजनबी ज़रूर था, लेकिन इसमें एक अजीब सी कशिश थी।​रात ढलने लगी थी और मरीन ड्राइव की बत्तियाँ किसी हार की तरह चमक रही थीं। मैंने तय कर लिया था कि अब पीछे मुड़कर नहीं देखना है। उत्तर प्रदेश की यादें अब एक बंद किताब की तरह थीं। अब जो भी था, इसी शोर और इसी भीड़ के बीच था। मैंने एक लंबी सांस ली और भीड़ का हिस्सा बनने के लिए अपना पहला कदम बढ़ाया।​मेरा संघर्ष अब शुरू होने वाला था। एक ऐसी जगह जहाँ मेरे पास खोने के लिए कुछ नहीं था, लेकिन पाने के लिए पूरा आसमान बाकी था। मुझे नहीं पता था कि कल सुबह कहाँ होगी, लेकिन दिल के किसी कोने से आवाज़ आई— "हिम्मत मत हारना, ये शहर तुझे तेरी पहचान ज़रूर देगा।"