Antarnihit 43 in Hindi Classic Stories by Vrajesh Shashikant Dave books and stories PDF | अन्तर्निहित - 43

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अन्तर्निहित - 43

[43]

“भागवत ग्रंथ में श्रीकृष्ण का पूरा जीवन चरित्र है। जन्म से लेकर देह त्याग पर्यंत श्रीकृष्ण का चरित्र महर्षि वेद व्यासजी ने लिखा है। भागवत के उपरांत व्यासजी ने दूसरे ग्रंथ महाभारत में भी श्रीकृष्ण  चरित्र का वर्णन किया है। दोनों ग्रंथों में राधा नाम का एक शब्द भी नहीं है। कहीं भी राधा का उल्लेख नहीं है। जो भागवत में नहीं है, जो महाभारत में नहीं है, जो श्रीकृष्ण के पूर्ण जीवनकाल में नहीं है उस का अस्तित्व कैसे हो सकता है, महाशय?” वत्सर ने कहा। 

“क्या बात कर रहे हो? भागवत और महाभारत में राधा जी का नाम तक नहीं है? तुम असत्य कह रहे हो, वत्सर।” न्यायाधीश ने धैर्य खो दिया। 

“किन्तु महाशय, यही सत्य है।”

“यह कैसे हो सकता है?”

“जो नहीं है उसको व्यासजी ने नहीं लिखा है। बस इतनी सी बात है।” वत्सर की बात से न्यायाधीश विचलित होने लगे। स्वयं से प्रश्न करने लगे। 

‘प्रात:काल मैं घर में स्थित श्रीकृष्ण के साथ जिसकी पूजा करता हूँ वह कौन है? राधे राधे की मला जपता हूँ वह कौन है? सारा संसार राधे कृष्ण कहता है वह राधा कौन है? वह है भी या नहीं? राधा कृष्ण में स्थित मेरी दीर्घ आस्था क्यों डगमगा रही है? वास्तव में वेद व्यासजी ने राधा का नाम ही नहीं लिखा है? मुझे मेरी आस्था पर संदेह क्यों हो रहा है? मुझे संदेह नहीं करना चाहिए। मैं न्यायाधीश हूँ। मुझे किसी की बात से विचलित न होकर तटस्थ रहना है, स्थिर रहना है।’ 

“कपिल महोदय, क्या यह सत्य है कि भागवत – महाभारत में राधा जी का नाम एक बार भी नहीं लिखा गया?” न्यायाधीश ने पूछा। 

“नहीं। नहीं महाशय। ऐसा नहीं है। भागवत में राधा कृष्ण की रासलीलाओं का वर्णन स्वयं वेद व्यासजी ने ही लिखा है। वत्सर असत्य कह रहा है।”

“क्या तुम असत्य कह रहे हो? न्यायालय में असत्य कहना दंड को आमंत्रित करना होता है। यह जानते हो न?”

“महाशय, मैं सत्य कह रहा हूँ।”

“प्रमाण दो।”

“क्या आपने श्रीमद भागवत पढ़ी है? कपिल महाशय, आपने?”

“नहीं।” “नहीं।” कपिल और न्यायधिश ने एक साथ कहा। 

“किन्तु हमने भागवत कथाकारों से भागवत सुनी अवश्य है। उसमें राधा कृष्ण की बात है।” 

“हमारे तर्कों से कुछ भी सिद्ध नहीं हो रहा है। कपिल महोदय, वत्सर की बात की परीक्षा एकमात्र भागवत ही है। अत: भागवत को ही न्यायालय में प्रस्तुत किया जाए।” न्यायाधीश ने आदेश दिया।

“महाशय, भागवत तो अभी प्रस्तुत हो जाएगी। किन्तु इतना विशाल ग्रंथ पढ़ेगा कौन? कैसे? इसमें तो न्यायालय के समय का प्रलंब व्यय होगा।”

“तो क्या उपाय है?”

“एक उपाय है। किसी भागवत कथाकार को न्यायालय में बुलाकर सत्यासत्य की परीक्षा हो सकती है।”

“महोदय, क्या आप ऐसे किसी कथाकार को अभी प्रस्तुत कर सकते हो?”

“नहीं, महाशय। कुछ दिनों का समय चाहिए।”

“कितना समय?”

“पंद्रह दिनों का।”

“यह तो दूर की बात हो जाएगी।”

“इसमें समय तो लगेगा ही। प्रथम तो प्रकांड विद्वान एवं प्रखर कथाकार को खोजना होगा। उसे सारा कांड समझाना होगा। पश्चात उनकी काथा के दिनों का भी विचार करना होगा। उसे न्यायालय तक लाने के लिए प्रसन्न करना होगा। तभी बात बनेगी।” कपिल ने उचित तर्क रखा। 

“ठीक है। पंद्रह दिनों के पश्चात न्यायालय इस पर आगे विचार करेगा। वत्सर, समय देने में तुम्हें कोई आपत्ति है क्या?” 

“नहीं महाशय।” न्यायालय स्थगित हो गया।  

*******

न्यायाधीश भूपेन्द्र की आस्था भी विचलित होने लगी। उसी अवस्था में वह घर लौटे। उसे देखकर पत्नी ने पूछा, “क्यों आज चिंतित दिख रहे हो? मीरा कांड का अंतिम निर्णय सुनाकर किसी निर्दोष को दंड देकर तो नहीं आए हो?”

“नहीं, ऐसा नहीं है।” 

“तो बात क्या है?”

“वैसे देखा जाए तो बात कुछ है ही नहीं।”

“तो कैसे देखने से कोई बात होती है?” पत्नी का व्यंग समझकर भूपेन्द्र हंस पड़े। 

“मीरा कांड में आज सहसा नया घुमाव आ गया है।” भूपेंदार क्षणभर रुके। पत्नी ने अधीरता से उसे देखा। 

“कैसा घुमाव, पिताजी?” पुत्री ने भी रुचि प्रकट की। 

“क्या कोई एक तर्क हमारी वर्षों की श्रद्धा को चलित कर सकता है?”

“यदि श्रद्धा सत्य पर आधारित हो तो वह किसी से भी चलित नहीं हो सकती।”

“पिताजी, जो भी बात है, स्पष्ट कहिये।”

“आज अधिवक्ता कपिल ने अभियुक्त वत्सर को घेरते हुए कहा कि वत्सर के मंदिर में केवल श्री कृष्ण की प्रतिमा है और राधा रानी की नहीं है। सारे संसार में राधा रानी के साथ ही श्री कृष्णजी मंदिरों में विराजमान हैं किन्तु वत्सर ने राधारानी की प्रतिमा पूरी सजगता से नहीं स्थापित की। उसके आधार पर कपिल ने उसे स्त्री द्वेषी सिद्ध कर वत्सर को ही मीरा की हत्या का दोषी मानने को आग्रह किया।”

“और आपने उस तर्क को मानकर वत्सर को दंड भी दे दिया?” पुत्री ने विस्मय से पूछा। 

“नहीं। मेरा न्याय इतना दुर्बल नहीं है यह बात तुम अपनी बेटी को भी समझाओ।” 

“तो?” पुत्री ने पुन: संशय किया। 

“वत्सर ने तो कह दिया कि राधा नाम की कोई व्यक्ति का अस्तित्व ही नहीं है अत: राधारानी की प्रतिमा नहीं रखी है और न कभी रखेगा।”

“क्या? राधा रानी का अस्तित्व ही नहीं है?” माँ बेटी एक साथ बोल पड़ी। 

“वह तो कहता है कि राधारानी केवल कल्पना है, इससे अधिक कुछ नहीं। और उसका तर्क सुनकर मेरी आस्था भी अब विचलित होने लगी है।” पश्चात भूपेन्द्र ने न्यायालय में किए गए सभी तर्कों को पत्नी और पुत्री को बता दिया। 

“तो अब आगे क्या होगा?”

“पंद्रह दिन पश्चात कपिल किसी भागवत कथाकार को प्रस्तुत करेंगे। वह सिद्ध करेगा कि भागवत में राधारानी का नाम है।”

“इसमें क्या? यह तो हम दोनों भी सिद्ध कर सकते हैं कि राधा जी का अस्तित्व होते हुए भी व्यासजी ने भागवत में उसका नाम क्यों नहीं लिखा।” पुत्री ने कहा। 

“आप अपनी श्रद्धा को बनाये रखना।” पत्नी ने कहा। 

“पंद्रह दिनों की प्रतीक्षा क्यों करनी है? हम कल ही यह सिद्ध कर देंगे, आप कल न्यायालय में हमें अवसर दें।” पत्नी और पुत्री ने उत्साह से कहा। 

“आप दोनों?”

“हाँ। कोई संदेह है आपको?”

“संदेह तो नहीं है क्यों कि आप दोनों की कृष्ण भक्ति एवं गहन अध्ययन का मैं साक्षी रहा हूँ। किन्तु मीरा कांड में मैं आप दोनों को तर्क रखने की अनुमति नहीं दे सकता।”

“क्यों?”

“न्यायतंत्र के कुछ नियम होते हैं।”

“कैसे नियम?”

“जिस कांड का न्यायाधीश मैं हूँ उस कांड में यदि कोई प्रमाण, कोई साक्षी या किसी पक्षकार का संबंध मुझसे है तो कोई भी पक्षकार विरोध कर सकता है और NOT BEFORE ME- का प्रस्ताव रखकर मुझे उस कांड के न्यायाधीश के पद से दूर कर सकता है। इस स्थिति में इस कांड की कार्यवाही मेरे न्यायालय में कभी नहीं हो सकती। मुझे इस कांड से मुक्त कर दिया जाएगा और मैं इस कांड से मुक्त नहीं होना चाहता।”

“इस कांड से इतनी ममता क्यों, पिताजी?”

“इसलिए कि मेरा अंत:करण कह रहा है कि वत्सर हत्या नहीं कर सकता।”

“तो आपको वत्सर के प्रति पक्षपात हो रहा है?”

“नहीं बेटी, आजतक मुझे कभी भी किसी पर पक्षपात नहीं हुआ। मैं सदैव तटस्थ रहा हूँ। कल भी तटस्थ ही रहूँगा।”

“ठीक है किन्तु हमें अपना पक्ष रखना हो तो कोई उपाय है क्या?”

“उपाय तो है। यदि कोई भी पक्षकार आप दोनों का विरोध न करे तो आप अपना तर्क रख सकती हो।”

“तो पुछ लो सभी पक्षकारों को कि किसी को कोई आपत्ति तो नहीं।”

“अब तो पन्द्रह दिनों पश्चात यदि भागवत कथाकार राधा जी का प्रमाण देने में विफल रहेंगे तो आप दोनों के प्रस्ताव पर विचार किया जा सकता है।”

“ठीक है। इन पंद्रह दिनों तक राधारानी पर अपनी श्रद्धा बनाये रखना।”

भूपेन्द्र ने अपनी श्रद्धा को निश्चल रखने का प्रयास किया तभी पुत्री ने कहा, “पिताजी, न्यायालय में हम अपना पक्ष रखें तो किसी को आपत्ति हो सकती है। यदि हम पूरी कार्यवाही के समय न्यायालय में उपस्थित रहें तो किसी को कोई आपत्ति हो सकती है क्या?”

“केवल उपस्थित रहना चाहो तो किसी को आपत्ति नहीं होगी किन्तु स्मरण रहे कि आप दोनों पूर्ण रूप से मौन होकर ही सब कुछ देखेंगे। यह बात स्वीकार्य हो तो ही आप आ सकते हैं।”

“हमें स्वीकार्य है।” पत्नी – पुत्री ने एक साथ कहा। परस्पर देखकर स्मित किया। उस स्मित का तात्पर्य भूपेन्द्र नहीं जानते थे।