धागा टूटा।
और उसी पल —
कनिष्क हँसा।
इतने ज़ोर से।
इतनी खुशी से।
जैसे सालों से कोई चीज़ चाहता था — और आज मिल गई।
उसकी हँसी मंडप की छत से टकराई। दीवारों से टकराई। वापस आई।
वो हँसता रहा।
रुका नहीं।
और फिर —
उसने इशारा किया।
बस एक इशारा।
और युद्ध शुरू हो गया।
तलवारें टकराईं।
आवाज़ें उठीं।
मशालें गिरीं।
मंडप — जो कुछ देर पहले फूलों और मंत्रों से सजा था —
अब लहू और धुएँ की जगह बन गया।
अविराज ज़मीन पर था।
धागा टूटने की आवाज़ अभी भी उसके कानों में थी।
उसने देखा —
वर्धान डगमगाया था।
कनिष्क हँस रहा था।
और प्राणली —
प्राणली की आँखें उस टूटे हुए धागे पर थीं।
मैंने क्या किया।
पूरी बात समझ नहीं आई।
पर इतना समझ आया —
कनिष्क ने मुझसे कुछ बहुत बुरा करवाया है।
वो उठा।
तेज़ी से।
भीड़ को चीरता हुआ।
सीधे कनिष्क की तरफ़।
उसने कनिष्क की गर्दन पकड़ी —
दोनों हाथों से।
उँगलियाँ कसी हुईं।
जबड़ा भिंचा हुआ।
आँखें लाल।
"तूने मुझसे क्या करवाया।"
आवाज़ में सवाल नहीं था।
दर्द था।
कनिष्क की हँसी —
रुक गई।
उसने अविराज को देखा।
चेहरे पर वो मुस्कान गायब हुई।
आँखें ठंडी हो गईं।
और उसने —
बस हल्का सा धक्का दिया।
अविराज उड़ा।
हवा में।
और दूर जाकर गिरा।
इतनी दूर —
कि एक पल के लिए साँस रुक गई।
"अविराज—!"
प्राणली चीख़ी।
कनिष्क ने पंख फैलाए।
पूरे।
मंडप में हवा भर गई।
दीपक बुझ गए।
फूल उड़ गए।
और उसकी शक्ति —
उसकी असली शक्ति —
सबके सामने आई।
प्राणली ने वो देखा।
एक पल।
और अगले ही पल —
तलवार उठाई।
दौड़ी।
सीधे कनिष्क पर वार किया —
झनक।
कनिष्क ने वार रोका।
मुड़ा।
और प्राणली को देखकर —
मुस्कुराया।
वो मुस्कान जो रोंगटे खड़े कर दे।
"देवी —" उसकी आवाज़ मीठी थी। ज़हर जैसी मीठी। "आप ऐसा न करें। आपको तो मेरे साथ गरुड़ लोक जाना है।"
उसने इशारा किया।
हवा बदली।
तेज़।
बहुत तेज़।
प्राणली के हाथ काँपे —
तलवार छूट गई।
ज़मीन पर।
इधर —
परास लड़ रहा था।
चार सैनिक एक तरफ़ से। तीन दूसरी तरफ़ से।
पर परास परास था।
एक तलवार। और वो।
बस।
चार को दाईं तरफ़ से। तीन को बाईं से।
एक-एक करके।
वर्धान दूसरी तरफ़ था।
उसकी तलवार हवा में चमक रही थी।
शक्तियाँ कम थीं — पर हाथ वही थे।
वो हाथ जिन्होंने सालों तक युद्ध कौशल सीखा था।
शक्ति से नहीं —
इरादे से लड़ रहा था।
लड़ते-लड़ते परास वर्धान के पास आया।
साँसें तेज़ थीं। माथे पर पसीना था।
पर आँखें शांत थीं।
"वर्धान।"
वर्धान ने एक सैनिक को पीछे धकेला। मुड़ा।
"क्या?"
"प्राणली को बचाओ। तुम यहाँ से ले जाओ उसे।"
"और तुम?"
परास ने एक पल उसे देखा।
फिर मुस्कुराया —
वो मुस्कान जो तब होती है जब इंसान जानता हो कि आगे क्या है। और फिर भी चुनता हो।
"मैं सँभाल लूँगा।"
"परास—"
"तुम उसकी कमज़ोरियाँ जानते हो वर्धान।" परास की आवाज़ में अब कोई मज़ाक नहीं था। "मुझसे बेहतर। उसे बचाओ।"
वर्धान ने उसे देखा।
एक पल।
दो पल।
फिर —
मुड़ गया।
वो प्राणली के पास पहुँचा।
उसका हाथ थामा —
"प्राणली। अभी सवाल मत करो। मेरे साथ चलो।"
"कहाँ?"
"यहाँ से दूर।"
"क्यों? क्या छुपा रहे हो?"
"कुछ नहीं छुपा रहा। पर यहाँ रुकना ख़तरनाक है।"
कनिष्क ज़ोर से हँसा।
"सुनो अविराज देखो वो भाग रहा है " (उसने अविराज को ताना मारा)
अविराज उठ रहा था दूर।
घुटने ज़मीन पर।
उसने ये सुना।
और उसके भीतर जो आग थी —
और भड़क गई।
वर्धान ने जाते-जाते पलटकर देखा।
कनिष्क को।
सीधे।
और उसकी आवाज़ —
इस बार मंडप में नहीं —
पूरे आसमान में गूँजी।
"किसी भी बीजापुर वाले पर कोई गरुड़ शक्ति नहीं कनिष्क।"
एक पल रुका।
"वरना गरुड़ लोक तो क्या — तुम्हारे पार्थिव शरीर को गरुड़ लोक की धूल भी नसीब नहीं होगी।"
कनिष्क रुका।
उसने वर्धान को देखा।
और एक पल के लिए —
बस एक पल के लिए —
उसके चेहरे पर कुछ और आया।
उसने झुककर कहा —
"जो हुकुम — बड़े भाईया।"
और अगले ही पल —
उसके पंख समट गए।
इंसानी रूप।
उसने तलवार उठाई।
और परास की तरफ़ मुड़ गया।
इंसान की तरह।
इंसानों की तरह लड़ने के लिए।
वर्धान ने प्राणली का हाथ थामा।
उसकी उँगलियाँ उसकी हथेली में थीं।
ठंडी थीं।
काँप रही थीं।
वो दौड़ पड़े।
अँधेरे में।
मंडप की रोशनी पीछे छूटती गई।
शोर पीछे छूटता गया।
परास की तलवार की आवाज़ पीछे छूटती गई।
प्राणली दौड़ रही थी।
वर्धान का हाथ थामे।
पर उसकी नज़र —
एक बार पीछे मुड़ी।
परास को देखा।
अकेला।
कनिष्क के सामने।
उसने कुछ नहीं कहा।
पर आँखें भर आईं।
और वो दोनों —
रात के अँधेरे में —
तक्षक गुफा की तरफ़ दौड़ते रहे।
चट्टानों के बीच वो रास्ता था।
संकरा। अँधेरा। ऊपर से पानी टपकता था।
वर्धान आगे था। प्राणली पीछे।
दोनों की साँसें तेज़ थीं — दौड़ने से नहीं। उस सब से जो पीछे छूट आया था।
गुफा का मुँह आया।
काला। गहरा। जैसे ज़मीन ने मुँह खोला हो।
वर्धान अंदर गया। प्राणली रुकी।
उसने उस जगह को देखा —
पत्थर की दीवारें। ऊपर से पानी की बूँदें। कोने में एक दीपक — जो न जाने कब से जल रहा था।
"तुम्हें इस गुफा के बारे में कैसे पता?"
प्राणली की आवाज़ में सवाल था। और कुछ और भी।
"ये तो सिर्फ़ बीजापुर के राजघराने को पता है। यहाँ हमारे पूर्वज तपस्या करते थे।"
वर्धान ने उसे देखा।
एक पल।
"इस सब का समय नहीं है प्राणली।"
उसने चारों तरफ़ देखा। फिर उसकी तरफ़ मुड़ा।
"अदृश्य रेखा खींचो — अपनी शक्तियों से। ताकि कोई ये गुफा न देख पाए।"
प्राणली ने उसे देखा।
फिर अपने हाथों को।
फिर वापस उसे।
कुछ समझ नहीं आ रहा था।
वो घड़ियाँ। वो धागा। परास का चेहरा। कनिष्क की हँसी।
सब एक साथ।
उसने सिर पर हाथ रखा —
"ये सब क्या हो रहा है।"
आवाज़ टूट गई।
और आँसू —
आँसू रुके नहीं।
वो फुट फूट के रोने लगी,
वर्धान ने बहुत रोका खुद को, दूर रहा,।
फ़िर सबर का बांध टूट गया ।।
उसके पास आया , हाथ पकड़ा ,अपनी ओर खींचा और सीने से लगा लिया।।।।।
एक पल में सारी दुनिया , भागदौड़ ,युद्ध सब कुछ शांत।