6 किलोमीटर। सीधी रेखा में। लेकिन 2087 के पुरानी दिल्ली में कोई चीज़ सीधी रेखा में नहीं थी।
पहले दो किलोमीटर विरासत क्षेत्र के अंदर थे , भीड़भाड़, शोरगुल, जाना-पहचाना। मीरा का इलाका। अर्जुन यहाँ पहली बार था शायद, लेकिन वो ऐसे चलता था जैसे नहीं था। वो हर जगह फिट हो जाता था बिना किसी जगह का हिस्सा बने , एक खूबी जो मीरा को बेचैन करती थी और उपयोगी भी लगती थी।
तीन किलोमीटर पर क्षेत्र की सीमा थी , कोई भौतिक दीवार नहीं, बस होलोग्राम और शोर का अचानक गायब हो जाना। जैसे आवाज़ का स्विच बंद हो गया हो।
"यहाँ से प्रतिबंधित क्षेत्र शुरू होता है तकनीकी रूप से," अर्जुन ने कहा।
"तकनीकी रूप से?"
"कोई लागू नहीं करता। 2079 में सरकार ने यह क्षेत्र छोड़ दिया था। आधिकारिक तौर पर 'पुनर्विकास के अधीन' है , सात सालों से।" उसने एक नज़र डाली। "मतलब कोई नहीं आता।"
"या आते हैं तो वापस नहीं जाते।" मीरा ने धीरे से जोड़ा।
अर्जुन ने जवाब नहीं दिया। जो अपने आप में एक जवाब था।
· · ·
सुविधा दिखने से पहले महसूस हुई , एक धीमी गुनगुनाहट, मुश्किल से सुनाई देती, जो सीने में नहीं, कहीं और गहराई में कंपन करती थी। जैसे याद की आवृत्ति। मीरा को नहीं पता था यह सोच असली थी या कल्पना।
फिर इमारत आई।
वो "परित्यक्त" नहीं लगती थी , वो जानबूझकर खाली लगती थी। फर्क होता है। परित्यक्त इमारतों में एक लापरवाही होती है , टूटा हुआ शीशा, बिखरी हुई चीज़ें। यह इमारत बाहर से बिल्कुल साफ थी। खिड़कियाँ सलामत।
दरवाज़े बंद। कोई लेखन नहीं। कोई मकड़ी के जाले नहीं।
कोई इस जगह को संभाल रहा था। यह दिखावा करते हुए कि नहीं कर रहा।
"यह परित्यक्त नहीं है," मीरा ने कहा।
"नहीं," अर्जुन ने सहमति जताई।
"और तूने मुझे पहले क्यों नहीं बताया?"
"बताता तो आती क्या?"
उचित बात। परेशान करने वाली, लेकिन उचित।
· · ·
बगल का प्रवेश द्वार एक भारी दरवाज़ा था , इलेक्ट्रॉनिक ताला, लेकिन बिजली की आपूर्ति कटी हुई थी जाहिरा तौर पर। अर्जुन ने अपनी जैकेट से एक पतला औज़ार निकाला और हाथ से दरवाज़ा खोल दिया। तीन मिनट। मीरा ने वक्त गिना। ठीक तीन मिनट।
"यह सब तूने कहाँ से सीखा?" उसने पूछा।
"प्रिया ने सिखाया था।" सीधा। कोई विस्तार नहीं।
अंदर , पहले अंधेरा। फिर आँखें ढलीं। आपातकालीन रोशनी थी , फर्श के स्तर पर, धुंधली हरी पट्टियाँ। देखने के लिए काफी। बमुश्किल।
गलियारा। लंबा। दोनों तरफ दरवाज़े , सब बंद, सब क्रमांकित। कोई नाम नहीं। सिर्फ नंबर।
और एक गंध , रासायनिक, बाँझ, एक असहज तरीके से जानी-पहचानी। अस्पताल से अलग। प्रयोगशाला जैसी।
याद जैसी।
"यह मेमवॉल्ट की मूल शोध सुविधा है," अर्जुन ने फुसफुसाते हुए कहा। "जहाँ सब शुरू हुआ था। 2061 में।"
· · ·
गलियारे के अंत में एक कमरा था जो बाकी से अलग था , दरवाज़े पर ताला नहीं था। सीधा खुला। जैसे निमंत्रण।
मीरा और अर्जुन दोनों रुके।
"आकर्षक," मीरा ने कहा।
"हाँ। जाल भी ऐसे ही लगते हैं।" अर्जुन ने कहा। फिर अंदर चला गया। मीरा ने एक पल इंतज़ार किया , और पीछे गई। क्योंकि यही वो करती थी।
कमरे में एक अकेली मेज़ थी। उस पर एक पुराने ज़माने का लैपटॉप , 2070 के दशक का, मीरा की माँ के फ़ोन जैसा। स्क्रीन बंद। लेकिन एक छोटी हरी एलईडी टिमटिमा रही थी।
चालू।
अर्जुन ने छूने से पहले मीरा की तरफ देखा। उसने सिर हिलाया।
उसने लैपटॉप खोला।
स्क्रीन चालू हुई , सीधे, कोई पासवर्ड नहीं, कोई बूट क्रम नहीं। सीधे एक फ़ोल्डर। नाम:
विषय: X-7-R-9 | कुल संख्या: 47
47 लोग। एक ही कोड। एक ही नमूना।
अर्जुन ने फ़ोल्डर खोला। फ़ाइलें। नाम। तस्वीरें। तारीखें।
फिर वो रुक गया।
मीरा ने स्क्रीन देखी। समझी क्यों वो रुका।
सूची में — नंबर 31 पर:
वर्मा, प्रिया। उम्र 23। अधिग्रहण: 15.03.2087। स्थिति: सक्रिय — सुविधा 7।
अर्जुन की बहन। जीवित। कहीं।
अर्जुन ने कुछ नहीं कहा। हाथ स्क्रीन पर था , बस वो नाम छू रहा था जैसे असली पुष्टि कर रहा हो।
मीरा ने स्क्रॉल किया। नंबर 44:
शर्मा, मीरा। उम्र 22। अधिग्रहण: 14.06.2087। स्थिति: लंबित — पुनःप्राप्ति निर्धारित।
आज की तारीख: 14.06.2087।
पुनःप्राप्ति निर्धारित। आज।
पीछे से एक आवाज़ आई — गलियारे में। कदमों की आहट। एक से ज़्यादा। नपे-तुले। पेशेवर।
आ रहे थे।
— अध्याय 5 समाप्त —