Vikri - 1 in Hindi Science-Fiction by Priyosi Sarkar books and stories PDF | विक्री - 1

Featured Books
Categories
Share

विक्री - 1

2087 में, सबसे महंगी चीज़ यादें थीं। और सबसे सस्ती चीज़ भी।
मीरा के हाथ काँपते थे — बस थोड़े से, मुश्किल से नज़र आने वाले — जब उसने अपनी हथेली मेमवॉल्ट स्कैनर के ऊपर रखी। शीशे के काउंटर के पीछे बैठा तकनीशियन, एक उकताया हुआ लड़का जिसके नाम के टैग पर "रोहन-7" लिखा था, बिना उसकी तरफ देखे स्क्रीन पर कुछ टाइप करता रहा।
"कितनी देनी हैं?" उसने पूछा। एक आम सा सवाल। जैसे कोई किराने की सूची माँग रहा हो।
"सारी।" मीरा की आवाज़ बिल्कुल सपाट थी।
अब रोहन-7 ने उसकी तरफ देखा।
                            · · ·
मेमवॉल्ट के बाहर की दुनिया नीयॉन और धुएँ में लिपटी रहती थी — पुरानी दिल्ली का वो हिस्सा जो आधिकारिक तौर पर "विरासत पुनर्विकास क्षेत्र 4" था, लेकिन स्थानीय लोग उसे अभी भी चाँदनी चौक का भूत कहते थे। पुरानी इमारतों के ऊपर होलोग्राम छाये रहते, पुरानी दुकानों के बोर्डों की जगह अब याद-विनिमय के विज्ञापन थे।
अपनी खुशी बेचो। किसी और की ज़िंदगी जियो।
मीरा ने पहली बार वो विज्ञापन तीन साल पहले देखा था। तब उसने सोचा था — कौन करता है ऐसा? आज वो खुद अंदर थी।
"यादें बेचने से इंसान मरता नहीं। बस... हल्का हो जाता है। जैसे कोई किताब के सारे पन्ने निकाल ले और सिर्फ जिल्द बची रहे।"
यह उसने अपनी दादी से सुना था — एक चेतावनी की तरह। लेकिन दादी को नहीं पता था कि जिल्द के साथ भी जीना पड़ता है। किराया नहीं रुकता। भूख नहीं रुकती। और मीरा की छोटी बहन रिया की दवाई — वो भी नहीं रुकती।
                            · · ·
"सारी यादें नहीं ले सकते हम," रोहन-7 ने आखिरकार कहा, अब उसमें थोड़ी इंसानियत आ गई थी। "नियम है। मूल पहचान के टुकड़े रखने पड़ते हैं। आपका नाम, बुनियादी शारीरिक क्रियाएँ, भाषा—"
"मुझे पता है नियम।" मीरा ने उसे काटा। "खुशी की यादें। सिर्फ वो। जब मैं छोटी थी, माँ के साथ जो वक्त था, वो पहली बार जब रिया ने अस्पताल में मेरा हाथ पकड़ा था, वो दिन जब मैं पहले स्थान पर आई थी और किसी ने ध्यान नहीं दिया—" वो एक पल के लिए रुकी। "वो सब।"
"मैडम, यह—" रोहन-7 के शब्द रुक गए। फिर धीरे से: "यह बहुत ज़्यादा है।"
"हाँ।" मीरा ने स्कैनर पर हाथ रख दिया। "इसीलिए तो इनकी कीमत भी ज़्यादा होगी।"
· · ·
प्रक्रिया में सिर्फ बीस मिनट लगे। मीरा ने आँखें बंद कीं, अपनी कनपटियों पर ठंडा जेल महसूस किया, और फिर — एक अजीब सी खालीपन। जैसे कोई दराज खोलो और अंदर सिर्फ कोरे कागज़ हों। जानते हो कुछ था वहाँ। पता नहीं क्या।
बाहर निकलते वक्त उसके खाते में दो लाख तीस हज़ार रुपये आ चुके थे।
रिया की तीन महीने की दवाई। सुरक्षित।
उसने सोचकर खुश होना चाहा। लेकिन खुशी — वो तो अभी बिक चुकी थी।
चाँदनी चौक के भूत में वो चली गई। सिर्फ एक चीज़ उसके साथ थी — एक नंबर जो उसने प्रक्रिया से पहले हाथ पर लिख लिया था। फ़ाइल नंबर। उसी फ़ाइल में एक संदेश था जिसे तकनीशियन ने नज़रअंदाज़ कर दिया था।
एक गुप्त संदेश। सिर्फ चार शब्द।
"तुम्हारी यादें — किसी के पास हैं।"

              — अध्याय 1 समाप्त —
               अगला अध्याय: वो नंबर