"उलझन "----------गंगा के तट पर बैठा " कहा चला गया था, इतना गंभीर हो गया था " ये अभ्यास मुझे तीन चार साधु की संगत मे बैठा रात को दाल भात की प्रसादी ग्रहन की। फिर सब लगे मुझे की सब एक नये सकून मे है। " बेटा नये आये हो, पजामे और ऊपर कोई वस्त्र नहीं, जानऊ धारण किये हो... " मैंने कहा जी गुरु जी... मै अभागा बालक की तरा हूँ... मै सकून की अवस्था मे ग्रहण के लिए आपकी संगति मे आया हूँ.." एक बजुर्ग हस पड़ा.... " बेटा मन को रोक लो, बस यही एक तपस्या है... कोई सकल्प विकल्प उठने न दो... हाँ बहुत परेशान घर छोड़ कर आये हो बेटा... " मिटी लगा सब कुछ...महा पुरष जी। " हाँ हाँ..... हाँ... " एक बहुत कम उम्र का साधु अवस्था मे पहुंच चूका लड़का कह सकते है। ये जोड़ी चारो की हो गयी थी। "किसी के आगे हाथ उठे न, भिखारी नहीं बनना ----" ये संगति से कुछ सिखने से ये सीख मिली थी " तुम ज़ब तक मन को इकठा नहीं करते, चुप नहीं करते, किसी की चुगली भी निसंदेह है, शक के बिना जीओ... महाकाल सब के पाप काटते है। " आज की सीख यही है.... गंभीर बन जाओ..... बस। सोते वक़्त भी सिमरन हो, करवट लेते भी सिमरन हो.... बस यही कला आ जाये तो भला मागो सर्वत का....
जो जातक यहां बालक बता रहा था ---- उसका नाम हरी दयाल था। उम्र पचास की तो होंगी।लेकिन जिंदगी की करवाहट से भरा पड़ा था। लोग कैसे है, कौन है हम... ज़ब तक ये नहीं समझते, तब तक तुम इस दुनिया मे मधोले जाओगे... ये जानो तुम कौन हो.... कैसे सब आगे जो साधु दुनिया तोड कर बने है... उनसे सगति हो गयी थी....
"सवाल फिर वही खड़ा था एक आधा घंटा तुम किधर थे " अचूक बान थे। तरक्ष था महाकाल जी के पास... वो ही दुनिया चलाते है। सुबह का शंख से घोष हुआ था... तीव्र था... फिर आरती वदना फिर महाकाल की नगरी मे जेकारे गुजे। कितना बड़ा संकल्प था। उसकी नगरी मे वो सब का ख्याल रखता था... गंगा की लहरे मध्यम शिव के गीत गाती जा रही थी... जैसे कुछ कह रही हो, शिव के गीत गुनगुनाती हुई " आओ भक्तो डुबकी लाओ, शिव के दुबारे। " लोगों की चहल पहल शुरू हो गयी थी... कुछ तो प्रटक थे जो विदेश से आये हुए, जिहो ने मोबइल से कही योगियों की फोटो खींची थी.... कुछ योगी अखाड़ों मे वटे हुए थे। हम चार थे लेकिन उनमे मेरा दिल नहीं रमता था... पता नहीं शिव किर्पा से कयो नहीं.... " पहले उन्होंने बता दिया था गुरू भाई होना चाहते हो तो इनसे मंत्र लो... जो जटो को एक जुड़ें मे बादता था... मुँह पे शरीर पे भस्म रमाए रहता था... उनसे गुरू मंत्र लिया था... लेकिन बाद मे मन उसके सिवा और की तरफ कभी नहीं गया। वो पता नहीं गुरू मंत्र के साथ मुझे कया कुछ दे गया था... लेकिन वो कुछ दिनों के लिए हमारी मंडली मे रहा बाद मे पता नहीं कहा चला गया... कोई नहीं जानता था। मै उसी के जाप मे शिव शिव करता रहता था.... एक बजुर्ग और आये थे, कहते थे, आँखे खोलो ऐसे जैसे -----------(चलदा )
नीरज शर्मा ---- यही से शरू करुँगा आपने पाठको के लिए। जरूरी है आपने पंच भुत जान जाओ... फिर ही कुछ कर सकते हो।