Sip ka Moti - 2 in Hindi Love Stories by manasvi Manu books and stories PDF | सीप का मोती - 2

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सीप का मोती - 2

भाग २ 

सुनी को दोस्ती करने की आदत ही थी। वह जगत मित्र थी। उसकी बहुत सी सहेलियां थीं, और वह उन सब के बीच ऐसे रहती थी जैसे वह सबकी लीडर हो। सारी सहेलियां सुनी के पीछे -पीछे घूमा करती थीं। ये वो दौर था जब किसी लड़की का कोई दोस्त हो यह अपवाद ही होता था , और मैं सुनी के जीवन का वो अपवाद था। वह मेरे साथ उतनी ही फ्री रहती थी जितनी अपनी सहलियों के साथ रहती थी। इसका कारण जो मुझे लगता था वह... मैं उसकी हर बात मानता था। अपना दिमाग खुद के लिए इस्तेमाल ना करते हुए वह जो बोले उसे करने में खर्च करता था। 

वैसे हमारे घर भी एक दूसरे के आसपास ही थे, इसलिए हम तो नर्सरी से साथ थे, लेकिन बड़े होने के बाद भी लड़का - लड़की होने का फर्क कभी हमारे बीच आया ही नहीं। बल्कि हमारे बीच की दोस्ती समय के साथ और गहराती गई। 

उस साल सातवी कक्षा की परीक्षा खत्म होने के बाद रिजल्ट का दिन था। मुझे 78% और सुनी को 85% मिले थे। स्कूल के नियमानुसार मैं अब H सेक्शन से  B सेक्शन में भेज दिया गया था। सच कहूं तो मैं परीक्षा से पहले पढ़ाई करता ही नहीं था। मुझे पढ़ाई करने में बड़ा आलस आता था, हां पर ज्ञान के नाम पर दिमाग में बहुत कुछ इकट्ठा करता रहता था। बाकी लड़कों की तरह दूसरों को परेशान करना या टीचर पढ़ाते समय ध्यान इधर उधर भटकाना ये मुझसे कभी हुआ ही नहीं। मैं क्लास में मन लगाकर पढ़ता था। एक तरह से मेरा रवैया धीमा था। 

लेकिन पता नहीं क्यूं...??  जैसे जैसे मैं बड़ा होने लगा और सुनी भी सब सहेलियों के बीच रहकर बड़ी होने लगी। तब से लगने लगा कि कम से कम सुनी के साथ उसकी क्लास में तो भी मुझे होना चाहिए, पता नहीं क्यूं अब मुझे उससे दूर रहना अच्छा नहीं लगता था। दोस्त के नाम पर बस एक वही तो थी। 

अब आठवीं क्लास में मैंने संस्कृत विषय लिया था पर मेरे लिए वह उतना जरूरी नहीं था। मैं सुनी की क्लास में था और अब सिर्फ हमारे घर ही पास पास नहीं थे बल्कि अब हम क्लास में भी साथ रहने वाले थे। मेरा यह लक्ष पूरा होने का मुझे बड़ा समाधान था। 

और सुनी... सुनी मुझे क्लास में देख कर जो मेरी तरफ भागी। मुझे आज भी याद है... बेंच पर से उछलती कूदती किसी बेसुध बछडे की तरह भागती सुनी को देखकर सभी अचंभित थे। 

वैसे तो ये H सेक्शन का 78% वाला मोटू सुनी का दोस्त है ये मुझे और सुनी को अक्सर साथ देखकर ही सबको पता था, पर इतना पक्का दोस्त की क्लास की सबसे सुंदर और बुद्धिमान लड़की उससे इस तरह मिले। उसे इतना महत्व दे, उसके आने की इतनी खुशी हो । ये बात किसी को भी हजम नहीं हो रही थी।

पर वो दौड़ती हुई आई और मेरा हाथ पकड़ कर ज़ोर से चिल्लाई.." welcome to B section मोटूssss" 

मैंने नहीं सोचा था कि उसे इतनी खुशी होगी। उसने अपनी खुशी सारी क्लास के सामने जताई थी। कौन, क्या सोचेगा इस बात की परवाह उसने कभी की ही नहीं। और मैं उसके सेक्शन में हूं मेरे लिए तो इतना ही बहुत था। मैं भी बहुत खुश था। उस दिन मैंने मेरे H सेक्शन के दोस्तों को छोड़कर सुनी के साथ टिफिन खाया। 

पल्लवी नाम की उसकी सहेली ने मुझे यूं ही पूछा...
" मोटू!! तूने संस्कृत क्यों लिया...?? " 

इससे पहले कि मैं जवाब देता सुनी जोर से चिल्लाई...
" पल्लू... सिर्फ मैं उसे मोटू बोलती हूं और मैं ही बोलूंगी। बाकी किसी ने मोटू कहा तो अच्छा नहीं होगा। उसे उसके नाम से बुलाओ। और हां एक बात और... उसे जो मार्क्स मिले हैं ना वो उसकी बौद्धिक क्षमता के हिसाब से कम ही हैं। ये तुझे नहीं मालूम उसने अगर ठान लिया ना, तो वह क्या कुछ नहीं कर सकता। 

उसने मुझ पर उसकी दोस्ती का हक़ सीधे सीधे दिखा दिया था। उसे मेरे बारे में यह अच्छी और पक्की तरह पता था कि मैं बस थोड़ा सुस्त था। पर अपनी ज़िद पर आया ना तो मैं और भी अच्छे मार्क्स ला सकता था। इसलिए वह यह बात इतने निश्चित रूप से बोल सकती थी।

पल्लवी को इस तरह सुनने के कारण यह बात तो पक्की तरह से सिद्ध हो गई थी कि मुझे कोई कुछ कहे यह बात सुनी को बिल्कुल पसंद नहीं थी। उसका इस तरह मुझ हक़ जताना मेरे लिए ऐसा था जैसे मैंने फूलों का भार उठाया हो। सबके बीच होते हुए भी मुझे खास महसूस करते हुए मुझे अच्छी तरह पहचानना सुनी की यह बात मुझे उसके प्रति अपनेपन से भर देती थी।

शायद उस उम्र में इतना कुछ दिमाग में आता भी नहीं था, फिर भी मुझ पर उसका यूं हक़ जताना मुझे कभी भी गैर वाजिब नहीं लगा। सच कहूं तो हमारी दोस्ती को कोई पसंद करें या ना करे इस बात की परवाह ना उसने कभी की और ना मैंने। 

" क्यूं की दोस्ती में ना रूप देखा जाता है और ना गुण वह तो उस वस्तु की परछाई जितनी सहज होती है जो रोशनी पड़ने पर बनती है।" 

उसी तरह हमारी दोस्ती किसी को खलने वाली नहीं थी, क्योंकि मैं सीधा-साधा सुनी की दोस्ती की छत्रछाया में रहने वाला लड़का था। यह बात हमारी पूरी क्लास जानती थी। किसी कम लागत वाले भारी सामान की तरह मेरा अस्तित्व था। पर कोई था जो हमारी दोस्ती पर नज़र रखें हुए, हमारे बीच के अंतर का जायज़ा ले रहा था । उसे शायद दोस्ती की गंभीरता समझ में आ रही थी, ऐसा मुझे लगता है। 

उस दिन जब सुनी मेरे तरफ़ दौड़ती हुई आ रही थी, तब उसे देखकर आश्चर्यचकित होने वाली एक और नज़र थी। उस नज़र पर सुनी की खूबसूरती का रंग चढ़ा था। निश्चल होकर 'वह' मेरे पीछे खड़ा था। सुनी के चेहरे पर फैली हुई मुस्कुराहट को निहारता, मेरे हाथ को पकड़ा हुआ उसका हाथ देखकर रोकी हुई सांस और बढ़ी हुई दिल की धड़कन को लेकर। 

उस क्लास में मेरे ही सेक्शन से मेरे पीछे आया हुआ 76% हासिल किया हुआ सचिन गाडे। सुनी की तरफ देखते हुए विस्मित अवस्था में उसने न जाने कितना समय निकाल दिया। 

दोस्ती में गुण और रूप नहीं देखा जाता लेकिन... प्यार में..???

मैं प्रेम को दोस्ती की अगली सीढ़ी कभी नहीं कहूंगा। सच पूछो तो प्रेम और दोस्ती ये समांतर रेखाएं हैं। मैं और सुनी बड़े ही नैसर्गिक ढंग से दोस्ती की सीमारेखा पर आए थे। पर किसी और ने भी उसी सीमारेखा पर चलना चाहिए ऐसा बिल्कुल नहीं... जरूरत ही नहीं। वैसे देखा जाए तो मैं खुद भी यह तय नहीं कर पा रहा था की मुझे भी उस नैसर्गिक रेखा में रहना चाहिए या नहीं। लेकिन उस सीमारेखा को तोड़ने का साहस मुझसे हो पाना असम्भव था। 

उस साल सचिन ने सभी को आश्चर्यचकित कर दिया था। H सेक्शन में मैं फर्स्ट और वह सेकंड था। उसने अचानक जो गति पकड़ी थी, उसके कारण सभी अचंभित थे। वैसे वो गेम्स में बहुत जबरदस्त था। खो-खो, कबड्डी, रेस इन सब में उसका हाथ कोई नहीं पकड़ सकता था। ऊंचा पूरा सांवला सा सचिन जब ग्राउंड पर होता था तो वह जीत की निशानी था। वह हमारे H सेक्शन का हीरो था। पर उसने अपनी पढ़ाई का करिश्मा इसी साल दिखाया था। सीधे दस बारह परसेंट की छलांग लगाकर वह भी B सेक्शन में आ गया था। 

उसने मुझ से कभी बात नहीं की क्योंकि वह क्लास का हीरो था और मैं आम सा लड़का। वह हमेशा अकड़ में रहता था। मेरे मोटापे की वजह से मेरा मज़ाक बना कर भूल जाना, यह सभी लड़कों के लिए आम बात थी, इसलिए मैं हमेशा टारगेट बनता था। मुझे उसकी तरफ से कभी कोई महत्व नहीं मिला, या उसने कभी मेरा जिक्र भी नहीं किया। लेकिन इस सेक्शन में मेरी रक्षा करने के लिए सुनी मेरी अंग रक्षक की तरह थी। उस सेक्शन जैसा व्यवहार इस सेक्शन में मेरे साथ नहीं होगा, यह मैं जानता था।

ना जाने क्यूं सुनी को देखकर उसका इस तरह खो जाना, मेरे मन के ठहरे हुए पानी में तरंग पैदा कर गया। कुछ तो महसूस हुआ। कोई तो मेरी सीमारेखा में घुसने की कोशिश कर रहा था, यह महसूस हुआ। सचिन ने अच्छे नंबर केवल संस्कृत विषय पढ़ने के लिए, लिए थे या उसके दिमाग में कुछ और ही ध्येय प्राप्त करने की तैयारी चल रही थी, यह समझना अभी बाकी था। 

मैं... मेरे स्वभाव के कारण और मेरे व्यक्तित्व की अनदेखी अवस्था के कारण... अनदेखा ही रहता था। और शायद इसीलिए मेरे आस-पास घटने वाली घटनाओं पर मेरी बारीक नज़र रहती थी। मुझे आदत ही थी वैसी, और शायद तब मैं सुनी का ज्यादा विचार करता था, इसलिए मुझे वैसा लगा होगा। पर सुनी के दिमाग में दूर-दूर तक ऐसे कोई विचार न होने के कारण सचिन के सुनी की तरफ अलग नजर से देखने की कृति से वह अनजान थी। 
🍁🍁🍁🍁

बादलों को कहां पता,
बूंदें कहा तबाही लाईं।
उसका काम बरसना था,
उसने जिम्मेदारी निभाई।

क्रमशः 

मूल लेखक :- शब्द भ्रमर 

अनुवाद :- शब्द सरिता