Run Or Hide? - 2 in Hindi Thriller by silent script books and stories PDF | Run Or Hide? - 2

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Run Or Hide? - 2

रोनी की बात सुनकर बाकी लड़के एक-दूसरे को देख कर हंसने लगे। क्लास में हो रहे इस शोर और मज़ाक के बीच तभी टीचर अंदर आए। टीचर के आते ही सब शांत होकर अपनी सीटों पर बैठ गए, लेकिन उन हंसी के तीरों ने विक्रम के दिल को छलनी कर दिया था।


‎दोपहर के लंच की घंटी बजी। कैंटीन की तरफ भागते बच्चों के शोर के बीच विक्रम अपनी बेंच पर ही बैठा रहा। उसने अपना टिफिन खोला, लेकिन फिर उसे बंद कर दिया। उसके मन में एक कड़वा विचार आया— "अगर मैं ज्यादा खाऊँगा, तो और लंबा-चौड़ा हो जाऊँगा... फिर तो ये लोग मेरा और भी ज्यादा मज़ाक उड़ाएंगे। शायद इसीलिए मुझसे कोई बात नहीं करता।"


‎छुट्टी के समय जब वह भारी मन से स्कूल के गेट से बाहर निकल रहा था, तो उसकी नज़र एक बेसहारा कुत्ते पर पड़ी। वह मासूम जानवर भूख से बेहाल था—कभी कचरे के ढेर में मुँह मारता, तो कभी नाली के पास कुछ ढूँढने की कोशिश करता।

‎विक्रम रुक गया। उसने अपना वही टिफिन निकाला जो उसने खुद नहीं खाया था। उसने बड़े प्यार से वह सारा खाना उस कुत्ते के सामने रख दिया। कुत्ते ने पूंछ हिलाते हुए बड़े चाव से वह खाना खाना शुरू किया। उस पल, उस पूरी दुनिया में, सिर्फ वही बेजुबान जानवर था जिसने विक्रम को नफरत या मज़ाक भरी नज़रों से नहीं देखा था।


‎अगले दिन:

‎जब विक्रम उसी रास्ते से गुज़रा, तो वह कुत्ता वहीं बैठा उसका इंतज़ार कर रहा था। विक्रम ने आज भी अपना आधा खाना उसे खिला दिया। उसे महसूस हुआ कि दुनिया में कोई तो है जो उसे देखकर हँसता नहीं, बल्कि उसका इंतज़ार करता है।

‎जैसे ही विक्रम वहां पहुँचा, कुत्ता उसे देखते ही अपनी पूंछ हिलाने लगा और खुशी से उसके चारों तरफ घूमने लगा। विक्रम ने डरते-डरते अपना विशाल हाथ कुत्ते के सिर पर रखा। कुत्ते ने प्यार से अपना सिर उसके हाथ पर टिका दिया। विक्रम की आँखों में आंसू आ गए

"फिर विक्रम उस कुत्ते को अपने साथ घर ले गया। एक रात जब विक्रम अपने दोस्त के साथ था, तब उसने अपने कुत्ते को गौर से देखा और उसके चेहरे को एक मुखौटे की तरह सोचा।


उसने सोचा कि ,अगर मैं ऐसा दिखूँ तो, उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक आ गई। 'अगर मेरा चेहरा एसे भयानक राक्षस जैसा होता, जो दुनिया को सिर्फ दहशत दिखा सके, तो क्या ये लोग तब भी मुझ पर हँसेंगे?'"


 



25 साल बाद...

वक़्त का पहिया घूम चुका था। एक बस पहाड़ी रास्तों पर दौड़ रही थी। बाहर घनघोर अंधेरा छाने लगा था और पेड़ों के साये बस के शीशों से टकरा रहे थे। बस के अंदर सन्नाटा था। सीटों पर पाँच नौजवान—2 लड़कियाँ और 3 लड़के—बेसुध पड़े थे, जैसे किसी गहरी नींद में हों।



ड्राइवर की सीट पर एक विशालकाय, चौड़ी पीठ वाला आदमी बैठा था। उसने रियर-व्यू मिरर में उन बच्चों को देखा। उसके चेहरे पर एक अजीब, ठंडी मुस्कान थी। उसने बस एक ऐसी जगह रोकी जहाँ से सिर्फ ऊँचे पेड़ और जंगली झाड़ियाँ नज़र आती थीं। एक-एक करके, उसने उन बच्चों को घसीटकर बाहर ज़मीन पर डाल दिया।