Waiting for seven rounds - 6 in Hindi Love Stories by Bella books and stories PDF | सात_फेरो_का_इंतजार - 6

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सात_फेरो_का_इंतजार - 6




*शीर्षक: रेत की दीवार और मोहब्बत का समंदर*



मधुकर और किरण का रिश्ता उस दोराहे पर खड़ा था जहाँ एक तरफ गहरा प्रेम था और दूसरी तरफ मधुकर के गुस्से का पहाड़। मधुकर का प्यार जितना गहरा था, उसका गुस्सा उतना ही खौफनाक। वह किरण पर शादी के लिए इस कदर दबाव बना रहा था कि किरण को अपना दम घुटता महसूस होने लगा। किरण एक संस्कारी लड़की थी, जो अपने माता-पिता के आशीर्वाद के बिना जीवन की नई शुरुआत की कल्पना भी नहीं कर सकती थी।

मधुकर का व्यवहार दिन-ब-दिन 'साइको' होता जा रहा था। वह बात-बात पर चिढ़ जाता, चिल्लाता और फिर बाद में पछताता। किरण अक्सर सोचती, "क्या यह वही इंसान है जिससे मैंने प्यार किया था?" वह उसे छोड़ना नहीं चाहती थी, बल्कि उसे बदलना चाहती थी। उसे विश्वास था कि हर इंसान के भीतर एक कोमल कोना होता है, बस मधुकर का वह कोना उसके गुस्से के पीछे छिप गया था।



कई दिनों की अनबन के बाद, किरण ने एक बड़ा फैसला लिया। वह बिना बताए मधुकर के शहर पहुँच गई। रास्ते भर उसके मन में हज़ारों सवाल थे—क्या मधुकर फिर से चिल्लाएगा? क्या वह मेरी बात समझेगा?

शहर पहुँचते ही उसने मधुकर को फोन किया। मधुकर उसे लेने बस स्टैंड आया। उसकी आँखों में किरण को देखकर एक अजीब सी चमक थी, लेकिन चेहरे पर वही पुरानी शिकन। दोनों चुपचाप एक ऑटो में बैठे और शहर के सबसे ऊँचे 'रूफ-टॉप' रेस्टोरेंट की ओर चल दिए। चारों तरफ पहाड़ियाँ थीं और डूबता हुआ सूरज आसमान को नारंगी और लाल रंगों से सराबोर कर रहा था। ऐसा लग रहा था मानो कुदरत ने भी उस शाम को उनके लिए ही सजाया हो।



ऊपर पहुँचकर, ठंडी हवा के झोंकों के बीच दोनों एक कोने वाली टेबल पर बैठ गए। कुछ देर की खामोशी के बाद, किरण ने मधुकर का हाथ धीरे से अपने हाथों में लिया। उसकी आवाज़ दबी हुई थी, लेकिन उसमें एक दृढ़ता थी।

उसने कहा, "मधुकर, क्या तुम मेरी एक बात सुनोगे? मैं यहाँ लड़ने नहीं, बल्कि हम दोनों को बचाने आई हूँ। प्लीज... मुझ पर गुस्सा करना बंद कर दो। जब तुम चिल्लाते हो, तो मुझे बहुत हर्ट होता है। मुझे डर लगता है कि कहीं मैं तुम्हें खो न दूँ, या खुद को न खो दूँ।"

यह कहते-कहते किरण की आँखों में आँसू भर आए। मधुकर, जो हमेशा तर्कों से लड़ता था, आज निहत्था खड़ा था। किरण के उन चंद शब्दों ने उसके गुस्से की दीवार को ढहा दिया था। उसने किरण के गालों पर हाथ रखा और बेहद नर्मी से कहा—

"किरण, मैं जानता हूँ मैं कभी-कभी पागल हो जाता हूँ। पर सच ये है कि मैं तुम्हारे बिना रहने के ख्याल से ही डर जाता हूँ। मैं तुम्हें जानबूझकर कभी दुख नहीं पहुँचाना चाहता। अगर तुम्हें चोट लगती है, तो दर्द यहाँ मेरे सीने में होता है। मुझे माफ़ कर दो।"


उस रात की फिज़ा बदल गई थी। गुस्से की जगह अब सुकून ने ले ली थी। मधुकर ने वेटर को बुलाया और किरण की पसंद का पिज्ज़ा ऑर्डर किया। जब पिज्ज़ा आया, तो उसने छोटे-छोटे टुकड़े काटकर अपने हाथों से किरण को खिलाए। यह सिर्फ खाना खिलाना नहीं था, बल्कि एक वादा था—कि अब से वह उसका ख्याल रखेगा, उसे डराएगा नहीं।

रेस्टोरेंट से बाहर निकलते वक्त रात ढल चुकी थी। किरण ने आसमान में चमकते चाँद और नीचे टिमटिमाते शहर को देखकर कहा, "मधुकर, देखो कितना खूबसूरत है सब। मुझे बस एक ऐसा कमरा चाहिए जहाँ से मैं तुम्हारे साथ बैठकर ये पूरी दुनिया और ये चाँद-सितारे देख सकूँ।"

To be continued..........