From Mumbai to UP: An Untold Journey – Part 4 in Hindi Love Stories by Avinash books and stories PDF | मुंबई से यूपी तक: एक अनकहा सफर - भाग 4

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मुंबई से यूपी तक: एक अनकहा सफर - भाग 4

भाग 4: रूपा: एक रहस्यमयी पहेली

भार्गव के लिए रूपा एक ऐसी किताब थी जिसे वह बार-बार पढ़ना चाहता था, लेकिन हर बार उसे एक नया पन्ना अधूरा मिलता। अब तक भार्गव ने रूपा को सिर्फ उसकी आवाज़ और उसके मैसेजेस के ज़रिए जाना था, लेकिन उसके मन की परतों में क्या चल रहा था, यह अब भी एक रहस्य था।

रूपा का संसार

रूपा का शहर उत्तर प्रदेश के एक ऐसे हिस्से में था जहाँ शाम होते ही बाज़ार बंद हो जाते थे और लोग अपने घरों में सिमट जाते थे। भार्गव ने गूगल मैप्स पर कई बार उसके शहर की गलियों को सैटेलाइट व्यू से देखा था। वह घंटों उन गलियों की धुंधली तस्वीरों को देखता और सोचता कि इनमें से कौन सा घर रूपा का होगा? कौन सी खिड़की से वह चाँद को देखती होगी?
एक दिन बातचीत के दौरान रूपा ने अपनी एक पुरानी डायरी के कुछ पन्ने भार्गव के साथ साझा किए। उन पन्नों में रूपा के सपने छिपे थे। वह एक छोटे शहर की लड़की ज़रूर थी, लेकिन उसकी सोच की उड़ान आसमान छूती थी। उसे पेंटिंग का शौक था, उसे पुरानी हवेली की दीवारों पर उकेरी गई नक्काशी में दिलचस्पी थी।
"भार्गव जी," रूपा ने एक बार कहा था, "यहाँ लोग समझते हैं कि लड़की का काम सिर्फ रसोई संभालना है। पर मैं चाहती हूँ कि मेरी भी अपनी एक पहचान हो। क्या मैं कभी कुछ बड़ा कर पाऊँगी?"
भार्गव ने बिना पलक झपकाए जवाब दिया था, "तुम जो चाहो वो कर सकती हो रूपा। तुम्हारी सादगी ही तुम्हारी सबसे बड़ी ताकत है।"

दूरी का बढ़ता अहसास

भार्गव ने महसूस किया कि रूपा के मन में उसके लिए सम्मान और गहरा भरोसा तो है, लेकिन क्या वह 'मोहब्बत' है? रूपा अक्सर भार्गव से अपनी परेशानियाँ साझा करती— कभी अपने छोटे भाई की पढ़ाई की चिंता, तो कभी अपनी माँ की सेहत का हाल। वह भार्गव को अपना 'मार्गदर्शक' (Guide) मानती थी।
पर भार्गव के लिए यह 'दोस्ती' का टैग अब भारी पड़ने लगा था। जब रूपा उसे 'भार्गव जी' कहकर संबोधित करती, तो उसे लगता जैसे वह उसके और अपने बीच एक अदृश्य मर्यादा की दीवार खड़ी कर रही है। वह चाहता था कि रूपा उसे सिर्फ 'भार्गव' कहे, उसे डांटे, उससे लड़े, पर वह हमेशा शिष्टाचार के घेरे में रहती।
एक बार भार्गव ने हिम्मत जुटाकर पूछा, "रूपा, क्या तुमने कभी किसी को पसंद किया है? मेरा मतलब है... क्या तुम्हें कभी किसी से प्यार हुआ है?"
फोन के दूसरी तरफ एक लंबी खामोशी छा गई। भार्गव की धड़कनें तेज़ हो गईं। उसे लगा शायद उसने कुछ गलत कह दिया।
फिर रूपा की धीमी आवाज़ आई, "प्यार... हमारे यहाँ यह शब्द बहुत भारी होता है भार्गव जी। हमारे लिए प्यार का मतलब है त्याग और जिम्मेदारी। मैंने कभी इस बारे में सोचा ही नहीं। मेरे लिए तो बस मेरे अपनों की खुशी ही सब कुछ है।"

एकतरफा जंग

भार्गव समझ गया कि रूपा के दिल के दरवाज़े तक पहुँचने का रास्ता उसकी भावनाओं से होकर नहीं, बल्कि उसके मूल्यों से होकर गुज़रता है। वह अब रूपा के लिए उन चीज़ों को सीखने लगा जो उसे पसंद थीं। उसने ऑनलाइन कुछ हिंदी कविताओं की किताबें मंगवाईं, उसने उत्तर प्रदेश की संस्कृति और वहां के त्यौहारों के बारे में पढ़ना शुरू किया।
वह चाहता था कि जब भी वह रूपा से बात करे, उसे यह न लगे कि वह किसी अनजान शहर के लड़के से बात कर रही है, बल्कि उसे लगे कि वह किसी अपने से बात कर रही है।
लेकिन इस प्रक्रिया में भार्गव अंदर ही अंदर टूट भी रहा था। वह फेसबुक पर देखता कि रूपा के फोटो पर कई लोग कमेंट करते, उसे 'सुंदर' कहते। उसे ईर्ष्या (Jealousy) होती, लेकिन वह जानता था कि उसे हक जताने का कोई अधिकार नहीं है। यह एकतरफा प्यार की सबसे बड़ी सजा थी— आप जलते भी खुद ही हैं और खुद को शांत भी खुद ही करना पड़ता है।
एक रात, रूपा ने उसे एक वॉयस नोट भेजा। वह अपनी छत पर थी और वहां हो रही तेज़ बारिश की आवाज़ सुनाई दे रही थी।
"सुनिए भार्गव जी, आज बादल बहुत गरज रहे हैं। मुझे डर लग रहा है।"

भार्गव ने तुरंत रिप्लाई किया, "डरो मत रूपा, मैं हूँ न। भले ही मीलों दूर हूँ, पर तुम्हारे डर को मुझ तक पहुँचने के लिए बहुत लंबी दूरी तय करनी होगी। तब तक मैं उसे रास्ते में ही रोक लूँगा।"
रूपा ने सिर्फ एक 'स्माइली' भेजी। उस छोटी सी स्माइली में भार्गव ने अपनी पूरी दुनिया ढूँढ ली। उसे लगा कि भले ही रूपा उसे प्यार न करे, पर उसका उस पर यह भरोसा ही उसके लिए सबसे बड़ी जीत है। वह रूपा की उस पहेली को सुलझाने में इतना मशगूल हो गया था कि उसे पता ही नहीं चला कि कब वह खुद उस पहेली का एक हिस्सा बन चुका है।