Antarnihit 46 in Hindi Classic Stories by Vrajesh Shashikant Dave books and stories PDF | अन्तर्निहित - 46

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अन्तर्निहित - 46

[46]

“मैं जानता हूँ। वेदों में राधा का नाम है। ऋग्वेद में है जो सबसे प्राचीन ग्रंथ है।” सहसा स्वामीजी ने उठकर कहा। 

“क्या आप वह श्लोक सुना सकते हैं?”

“एकम ज्योति राभू द्विधा, राधा माधव रूपकम। जिसका अर्थ है – एक मात्र तेज परब्रह्म राधा और माधव के रूप में देदीप्यमान है।”

“उत्तम, स्वामीजी। आपने ऋग्वेद की बात कही। ऋग्वेद के किस अध्याय में किस मण्डल में, कौन से सूक्त में, कौन सी ऋचा में यह श्लोक है? इसके ऋषि कौन हैं? देवता कौन हैं?”

“क्या तात्पर्य है तुम्हारा वत्स?”

“ऋग्वेद की सरंचना के विषय में आप कुछ जानते हैं?”

“संरचना क्या होती है?”

“ऋग्वेद कुल दस मंडलों में है। प्रत्येक मण्डल में अनेक अध्याय होते हैं। प्रत्येक अध्याय में सूक्त होते हैं। सूक्त का अर्थ तो आपको विदित ही होगा स्वामीजी?”

स्वामीजी ने कोई उत्तर नहीं दिया। किन्तु उनके मुख भावों से उनकी अज्ञानता प्रकट हो रही थी। 

“सूक्त का अर्थ है देवों की स्तुति। प्रत्येक सूक्त में मंत्र होते हैं। जिसे ऋचा कहा जाता है। हैं न स्वामीजी?”

स्वामीजी ने उत्तर तो नहीं दिया किन्तु उनके मुख पर कुछ तीव्र रेखाएं प्रकट हो गई जिन्हें सारे न्यायालय ने देखा। 

“प्रत्येक सूक्त के एक या एक से अधिक ऋषि होते हैं। प्रत्येक सूक्त का एक देवता होता है। तो 

 ‘एकम ज्योति राभू द्विधा, राधा माधव रूपकम’

इस श्लोक का मण्डल, अध्याय, सूक्त का नाम, ऋचा का क्रम, इसके ऋषि का नाम और इसके देवता का नाम बताइए, स्वामीजी।”

स्वामीजी के पास वैसे तो कोई उत्तर नहीं था तथापि वे बोले, “वह सब तो, मैं तो, इस श्लोक...।” स्वामीजी बोल नहीं पाए। 

“यह श्लोक ऋग्वेद में कहीं नहीं है, न ही किसी अन्य वेदों में। यह श्लोक ऋग्वेद के परिशिष्ट में है ऐसा कहा जाता है जो पूर्णतया मिथ्या है।”

“सत्य क्या है?”

“किसी भी वेद के परिशिष्ट नहीं है। वेद स्वयं में पूर्ण है अत: उसे किसी परिशिष्ट की आवश्यकता ही नहीं है।”

“यह परिशिष्ट कहाँ से आया है?” 

“संस्कृत के कुछ मिथ्या रचयिताओं ने अपनी मनसा पूर्ति के लिए ऐसे अनेक श्लोकों को रचा है जिसे वेद के श्लोकों के रूप में प्रचलित करने का प्रयास भी किया है। वेदों में कभी कोई श्लोक नहीं होते, मंत्र होते हैं जिसे ऋचा कहते हैं। जैसे आजकल अनेक रचनाएं कवि गुलजार या हररिवंशराय या गालिब के नाम से घूम रही है।”

“इससे क्या सिद्ध करना चाहते हो?”

“यही कि राधा रानी नाम का कोई उल्लेख वेदों में भी नहीं है। यही कारण है कि श्री शूकदेवजी के कोई गुरु राधा नाम से थे ही नहीं। अत: राधा नामक कोई व्यक्ति – विशेष रूप से स्त्री का अस्तित्व ही नहीं था। कृष्ण के साथ उसकी लीलाओं का, प्रेमकथाओं का भी कोई अस्तित्व नहीं है।”

“यदि इन तर्कों पर विचार करें तो मुझे भी प्रतीत होने लगा है कि राधा जी का कभी भी अस्तित्व नहीं रहा होगा।” न्यायाधीश ने अपने मन की बात कही। 

“किन्तु मुझे एक जिज्ञासा है, संशय है।” एक युवती ने कहा। सब ने उसकी तरफ देखा। 

“यह मेरी पुत्री पारुल है। वत्सर, क्या पारुल अपनी बात रखे तो तुम्हें कोई आपती है?” न्यायाधीश ने पूछा। 

“जी नहीं, महाशय। पारुल, कहो क्या संशय है?” 

“हमारे देश के अनेक पुराणों में, अनेक कथाओं में, गीतों में राधा कृष्ण की बात कही गई है। यदि राधा मिथ्या है तो राधा का पात्र इन सब में कहाँ से आया? कैसे आया?”

“पुराणों, कथाओं और गीतों में राधा का पात्र कैसे आया यह अनुसंधान का विषय है जो मेरा कार्य नहीं है। किसी विद्वान को यह कार्य करना चाहिए। और सत्य को संसार के समक्ष रखना चाहिए। इससे मिथ्या कथाओं से रचित भ्रमणाओं को तोड़ा जा सके। क्या तुम ऐसा अनुसंधान करने को तत्पर हो?” 

“मैं?” पारुल चौंक गई। 

“हाँ, तुम। तुम क्यों नहीं?” पारुल निरुत्तर रही। 

“पुराणों, कथाओं और गीतों के रचयिता हमारे जैसे मनुष्य ही हैं। इनमें कोई भी ऋषि या वेद व्यास या वाल्मीकि जैसे सक्षम रचनाकार नहीं है। अत: वह सब काल्पनिक बातें लिखते हैं जिसका सत्य से कोई संबंध नहीं होता।”

“कवियों ने राधा का पात्र सर्जन क्यों किया? यदि वे ऐसा नहीं करते तो क्या होता?” पारुल ने नई जिज्ञासा प्रकट की। 

“राधा के पात्र द्वारा उन कवियों ने अपनी अतृप्त वासना को ही प्रकट किया है और उसे कृष्ण के साथ जोड़कर अपनी वासना को पवित्र सिद्ध करने का प्रयास भी किया है। यदि किसी भारतीय व्यक्ति को कविता करनी है, कवि के रूप में स्वयं को प्रस्तुत करना है तो वह सर्व प्रथम राधा कृष्ण के विरह की बात कहेगा क्यों कि वह सरल है, सस्ता विषय है और सहज स्वीकार्य भी है। जिसे कुछ नहीं आता है उसे श्री कृष्ण के साथ राधा की कथा और कविता करना अवश्य आता है, भले न वह पूरी बात मिथ्या क्यों न हो?”

“यह तो अत्यंत गंभीर बात है, राधा पर प्रतिबंध होना चाहिए।” पारुल ने निर्दोष भाव से कहा। 

“महाशय, यदि राधा नाम पर प्रतिबंध लगा दिया जाए तो अनेक कथाकार, अनेक स्वामीजी, अनेक कवि, अनेक व्यक्ति, अनेक रचयिता विधवा हो जाएंगे, अनाथ हो जाएंगे। उनकी दुकान बंद हो जाएगी।” वत्सर ने चिंता प्रकट की। 

“राधा नाम के उपयोग करने पर कोई हानी है क्या?” कपिल ने पूछा। 

“राधा के नाम से कोई हानि नहीं है। हानि तो तब है जब उसे श्रीकृष्ण के साथ जोड़ा जाता है, उसे कृष्ण की त्यक्ता प्रेयसी के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। शृंगार रस के अति निम्न स्तर पर राधा का उपयोग किया जाता है। इससे राधा के पात्र के चरित्र का ही हनन होता है। और श्री कृष्ण के साथ उसे जोड़ने पर योगेश्वर श्रीकृष्ण के चरित्र का भी हनन किया जा रहा है। विडंबना तो यह है कि ऐसे कवि स्वयं को कृष्ण भक्त भी कहते हैं। अपने आराध्य के चरित्र का ह्रास करना और आरध्य के भक्त के रूप में स्वयं को प्रस्तुत करना, इससे बढ़कर लज्जा की बात क्या हो सकती है?”

“कृष्ण का चरित्र कैसा था?” पारुल की जिज्ञासा बढ़ रही थी।