Tumse Mohabbat he - 1 in Hindi Love Stories by Deepshikha Kedia books and stories PDF | तुमसे मोहब्बत है - 1

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तुमसे मोहब्बत है - 1









रात के ठीक 12 बज रहे थे।
सिंहानिया ऑफिस में अफरा–तफरी मची हुई थी।
हर तरफ टेंशन… बेचैनी… और एक ही डर—बॉस।

किसी ने घड़ी देखते हुए कहा,
“आज तो बॉस छोड़ेगे नहीं… literally खा जाएंगे सबको।”

दूसरा कर्मचारी झुंझलाया,
“हमारी गलती क्या है भला? एक प्रोजेक्ट ही तो था!”

पास खड़ी एक लड़की तुरंत बोली,
“तुम जानते हो ये प्रोजेक्ट बॉस के लिए कितना ज़रूरी था! पूरा एम्पायर दांव पर लगा है!”

कोई और बुदबुदाया,
“पर इतनी रात को बुलाने का मतलब क्या है? घर वाले सोच रहे होंगे मैं किडनैप हो गई हूँ!”

एक और लड़की भरी सांस लेकर बोली,
“यार ये बॉस है या राक्षस? हम पर तो जरा भी दया नहीं आती इन्हें…”


तभी पीछे से एक और लड़की झल्लाई,
“तुम लोग जाओ भाड़ में! अगर मैं अच्छी तरह से नहीं सोई ना… मेरी आंखों के नीचे DARK CIRCLES आ जाएंगे! फिर मुझसे शादी कौन करेगा??”

सब हंसते हैं, तभी एक लड़का बोलता है,
“शादी बॉस की भी नहीं हुई है, न कोई गर्लफ्रेंड… यही वजह है कि दूसरों के टाइम की कीमत समझते ही नहीं!”

कर्मचारियों की बातें सुनकर एक लड़का
वह लगभग 25 वर्ष का होगा—
वही उम्र, जब जवानी अपने पूरे शबाब पर होती है।

उसके चेहरे पर एक ऐसी नई चमक थी, जो पहली नज़र में ही किसी को भी अपनी ओर खींच ले।
उसका रंग दूध जैसा गोरा और एकदम नर्म–नाज़ुक था, मानो किसी ने उसके चेहरे पर उजली चाँदनी मल दी हो।

इस गोरे, दमकते रंग ने उसकी सुरुचिपूर्ण सुंदरता को और भी निखार दिया था।
कभी-कभार ऑफिस की रोशनी उसके चेहरे पर पड़ती…
तो ऐसा लगता जैसे वो खुद रोशनी फैला रहा हो।

5'10 की ऊंचाई, सिर से पैर तक सलीके का सौंदर्य…
उसमें कुछ ऐसा था कि कोई भी लड़की उसकी तरफ खिंची चली आए।

तेज़ कदमों से बॉस के केबिन में घुसता है।

डेस्क पर फाइल फेंकते हुए कहता है—
“ये लोगों से फालतू बकवास करवा लो! आज तो भगवान ही बचाए सबको उससे!”

वह सर पकड़कर चेयर पर ढह-सा जाता है…

तभी पीछे से हल्की-सी हँसी सुनाई देती है।

वह मुड़कर देखता है और कहता है—
“आप क्यों हंस रहे हैं, daddu ?”
सोफे से 75 साल का बुज़ुर्ग आदमी उठता है।
चेहरे पर अनुभव की रेखाएँ, आँखों में गहरी समझ।

वह मुस्कुराते हुए कहता है,
“मैंने तुम सबको पहले ही समझाया था… उस जगह होटल बनने के सपने देखना नामुमकिन है।
वहाँ के लोग उस ज़मीन से प्यार करते हैं… वो कभी इसे होने नहीं देंगे।”

लड़का चिढ़कर आँखें घुमाता है—
“और ये बात उसे कौन समझाएगा?
Daddu  वैसे भी सबके भले के लिए ही तो है! होटल बनेगा तो काम मिलेगा, तरक्की होगी!”

बुज़ुर्ग धीरे से सिर हिलाते हुए बोले,
“बेटा, तुम समझोगे नहीं… वहाँ के लोग पैसों से ज़्यादा अपने जज़्बातों को value देते हैं।
आख़िर मैं भी उसी गाँव में पल-बढ़ा हूं… मैं जानता हूँ वो कैसे हैं।”

लड़का झुँझलाकर बोला—
“daddu वो हवेली… वो ज़मीन आपके पापा की थी।
अब आपकी है।
हम उस पर कुछ भी बनाएँ…
तो फिर गाँव वालों को problem क्यों है?”

Daddu गहरी सांस लेते हैं…
और उनके चेहरे पर एक रहस्य, एक कसक, एक कहानी साफ झलकती है—

“क्योंकि बेटा… वो ज़मीन सिर्फ़ जमीन नहीं है…
किसी का वादा है… किसी की यादें हैं…
Daddu ने गहरी सांस ली… आँखों में बीती ज़िंदगियों की परछाई उतर आई।

“बेटा… जिस गाँव की तुम बात कर रहे हो न… उसका नाम है शाजापुर।
मध्य प्रदेश का एक छोटा-सा, पर बहुत दिलों से भरा हुआ गाँव।
वही शाजापुर… जहाँ मेरी पूरी जड़ें बसती हैं।

तुम जिस ज़मीन और हवेली को ‘हमारी संपत्ति’ कहते हो…
वो हमारी नहीं है,
वो मेरे पिता—अमरनाथ सिंहानिया—का दिया हुआ उपहार है गाँव वालों के लिए।”

कमरे में बैठे लड़के की भौंहें सिकुड़ गईं,
“उपहार…? लेकिन क्यों?”

Daddu धीरे-धीरे बोलने लगे—
“बेटा, उस जमाने में मेरे दादा जी के पास कुछ खास पैसा नहीं था।
पर मेरे पिता जी के पास एक सपना था—
कुछ बड़ा बनने का…
अपनी किस्मत बदलने का।

पर पढ़ाई का उतना चलन नहीं था,
और हमारे पास खर्च उठाने लायक पैसा भी नहीं था।”

Dadddu की आवाज़ में अपनापन घुल आया—
“मेरे दादा जी—तुम्हारे परदादा—गाँव के सरपंच थे।
लोग उनका बहुत सम्मान करते थे।

जब उन्हें पता चला कि मेरे पिता आगे बढ़ना चाहते हैं,
तो पूरे गाँव ने…
हाँ, पूरे गाँव ने
थोड़ा-थोड़ा करके पैसे इकट्ठे किए।”

लड़का हैरान रह गया,
“पूरे गाँव ने…?”

“हाँ बेटा,” daddu की आँखों में चमक आ गई,
“हर घर से किसी ने कुछ न कुछ दिया—
किसी ने मुट्ठी भर अनाज बेचकर,
किसी ने पुरानी बकरियाँ,
किसी ने अपनी बचत…
उन्हें बस इतना कहना था—
‘अमरनाथ को आगे बढ़ना है’।

और मेरे पिता वो पैसे लेकर मुंबई चले गए।
वहीं पढ़ाई की… कड़ी मेहनत की…
फिर एक बड़ी construction कंपनी में नौकरी मिली।”

Daddu के चेहरे पर हल्की मुस्कान आई—
“कंपनी के मालिक को जब पिता जी का काम पसंद आया,
तो उन्होंने अपनी बेटी की शादी उनसे करा दी।
वही थीं तुम्हारी दादी—जया सिंहानिया।

फिर दोनों ने मिलकर
पसीने, मेहनत और प्यार से
सिंहानिया एम्पायर खड़ा किया।”

वह थोड़ा सीधा बैठ गए—
“और फिर… मैं पैदा हुआ।
कमल सिंहानिया।
तुम्हारा daddu…
चोटा नवाब!”
उन्होंने हल्के से मुस्कुराते हुए कहा।

लड़का भी मुस्कुरा दिया।

Daddu फिर गंभीर हुए—
“मुंबई शिफ्ट होने के कुछ दिन पहले,
मेरे जन्म की खुशी में
मेरे पिता ने वो ज़मीन और पूरी हवेली
गाँव वालों को सौंप दी थी।

क्योंकि वही लोग थे
जिन्होंने हमारे सपने को उड़ान दी थी।
वो ज़मीन…
उनकी मोहब्बत की निशानी है बेटा,
हमारी नहीं।”


Daddu की इतनी लंबी बातें सुनकर
वो लड़का—धीरे से बड़बड़ाया,

“तो आप ही हैं वजह…
जिसकी वजह से करोड़ों की प्रॉपर्टी फ्री में चली गई…”

उसकी आवाज़ धीमी थी,
पर तंज साफ़ सुनाई दे रहा था।

डैडू का चेहरा पल भर में सख़्त हो गया।
आँखें गहरी… और आवाज़ कड़क।

“मैंने सब सुन लिया है, vansh ।
तुम आजकल ज़्यादा नहीं बोलने लगे हो?”

पूरे कमरे में सन्नाटा पसर गया।
वंश ने होंठ भींच लिए…
उसे पता था, daddu जब ऐसे बोलते हैं
तो मामला गंभीर हो जाता है।

और अब ज़रूरी है कि हम हमारे कैरेक्टर्स से आपको मिलवाए
हाँ, वही जिसने अभी-अभी तंज कसा—
यही लड़का वंश सिंहानिया है।

कमल सिंहानिया का छोटा पोता।
जो ज्यादा बोलता है, ओर जब भी बोलता है तो दिल पर चोट करता है।
तेज़ दिमाग, स्मार्ट, मस्त मौला ओर खुशमिजाज अंदाज़ वाला।

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कमल सिंहानिया (daddu)
उनके दो बेटे :
1. अजय सिंहानिया – इंडिया में रहता है
2. विजय सिंहानिया – लंदन में बस गया है
और
वंश, अजय Singhaniya का बेटा है—
यानी कमल सिंहानिया का छोटा पोता।
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कहानी अच्छी लगे तो रेटिंग ओर समीक्षा जरूर दे।

स्टोरी के सभी पार्ट्स पढ़ेंगे तो अच्छे लगेंगे।

अगर आप न्यू रीडर है तो हमारी एक ओर स्टोरी मेरा क्या कसूर जरूर पढ़े।

राजपुर गांव का नाम चेंज कर के हमने शाजापुर  कर दिया है ।