कहते हैं कि किस्मत का लिखा और समय का बीता हुआ पल न कोई टाल सकता है, न वापस ला सकता है।
पर क्या हो जब ऊपरवाला खुद आपके साथ हो… जब वह खुद चाहे कि आपकी पूरी ज़िंदगी बदल जाए और अब आपके साथ सब अच्छा हो?
कुछ ऐसा ही हुआ हमारी डिंपल के साथ। उसकी किस्मत पलक झपकते ही बदल गई… सब कुछ एक ही पल में बदल गया।
जिस दिन उसकी मृत्यु हुई, उस दिन उसने अपने पति और अपनी सबसे अच्छी दोस्त को एक साथ अपने ही कमरे में देखा।
वे दोनों हँसते हुए कह रहे थे—
“वह तो वैसे भी ब्लड कैंसर से मरने वाली है। फिर उसके कमाए हुए पैसे और कंपनी के सारे शेयर हमारे हो जाएँगे… और हम अपनी आगे की ज़िंदगी साथ में खुशी से बिताएँगे।”
यह सुनते ही डिंपल के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
वह अस्पताल से सिर्फ दो घंटे की छुट्टी लेकर अपने पति से मिलने घर आई थी।
डिंपल को ब्लड कैंसर था, और वह उसकी आख़िरी अवस्था में थी।
वह बहुत भोली और जल्दी विश्वास कर लेने वाली लड़की थी।
अपने पति अनुज और अपनी सबसे अच्छी दोस्त नेहा के मुँह से यह सब सुनकर वह पूरी तरह टूट गई।
वह लड़खड़ाते कदमों से जल्दी से कमरे के अंदर गई और काँपती आवाज़ में बोली—
“ये… ये सब क्या कह रहे हो तुम दोनों?
क्या तुम चाहते हो कि मैं मर जाऊँ…?”
डिंपल को अचानक कमरे में देखकर नेहा घबरा गई, लेकिन अगले ही पल वह मुस्कुराकर बोली—
“तुम तो वैसे भी मरने वाली हो… और मैं तुम्हारी सबसे अच्छी दोस्त हूँ।
क्या तुम मेरे अच्छे भविष्य के लिए मर भी नहीं सकती?”
यह कहकर दोनों ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगे।
डिंपल अपनी कमजोर हालत में अनुज की ओर बढ़ी, लेकिन अनुज ने उसे धक्का दे दिया।
वह ज़मीन पर गिर पड़ी… और उसी पल उसकी साँसें थम गईं।
मरते हुए उसकी आँखों में सिर्फ एक ही सवाल था—
“क्या मेरी ज़िंदगी बस चालीस साल की ही थी…?
जिसमें मुझे खुशी और सुकून के नाम पर कुछ भी नहीं मिला…
जिन्हें मैं अपना मानती थी, उन्होंने ही मुझे इतना बड़ा धोखा दिया…
क्यों…? आखिर क्यों…?”
तभी उसकी आँख खुलती है…
लेकिन यह क्या…?
उसकी आँखें पंद्रह साल पीछे खुली थीं।
वह अपने पुराने घर में थी।
डिंपल घबराकर अपने शरीर को महसूस करती है। उसकी साँसें तेज़ हो जाती हैं।
वह जल्दी से उठती है, शीशे में खुद को देखती है, फिर काँपते हाथों से फोन उठाकर तारीख देखती है।
उसकी आँखें हैरानी से फैल जाती हैं।
“ये… ये कैसे हो सकता है…?
सब कुछ पंद्रह साल पहले जैसा क्यों लग रहा है…?
और ये तारीख…!
आज तो मेरे इंटरव्यू का दिन था…
लेकिन मैं तो मर चुकी थी… ना?
फिर मैं यहाँ कैसे…?”
इतना सोचते ही उसका सिर चकराने लगता है और वह बेहोश होकर नीचे गिर पड़ती है।
बेहोशी में भी उसके दिमाग में वही सब घूमता रहता है—
कैसे उसके पति अनुज और उसकी सबसे अच्छी दोस्त नेहा ने उसे धोखा दिया…
कैसे वह अपने ऑफिस में ऊँचे पद पर थी, लेकिन नेहा के कहने पर उसे अपनी पोस्ट उसे देनी पड़ी और खुद नौकरी छोड़नी पड़ी…
कैसे स्कूल में सब उसे तंग करते थे…
कैसे उसकी पूरी ज़िंदगी में उसके साथ सिर्फ बुरा ही होता गया…
फिर अचानक उसके मन में एक ख्याल आता है—
“शायद… यही मौका है।
शायद भगवान ने मुझे दूसरा अवसर दिया है।
मैं समय में पीछे आ गई हूँ…
और मुझे सब कुछ याद है।
अब मैं समझ गई हूँ कि मुझे अपनी ज़िंदगी कैसे बेहतर बनानी है…”
तभी उसकी आँखें खुलती हैं।
वह तुरंत इंटरव्यू के लिए तैयार होने लगती है।
अचानक उसे याद आता है कि इसी इंटरव्यू में उसकी मुलाकात अनुज से हुई थी।
उसे यह भी याद आता है कि उस दिन उसने वही कपड़े पहने थे जो नेहा ने उसे “ब्रांडेड” कहकर गिफ्ट किए थे, जबकि वे असल में थर्ड कॉपी थे।
उन्हीं कपड़ों की वजह से उसके घमंडी और सख्त एचआर पर गलत प्रभाव पड़ा था।
इस बार डिंपल कोई गलती नहीं करना चाहती थी।
वह खुद जाकर अच्छे और सलीकेदार कपड़े खरीदती है और पूरे आत्मविश्वास के साथ इंटरव्यू देने पहुँचती है।
इंटरव्यू के दौरान उसके जवाब सुनकर एचआर भी हैरान रह जाता है।
उसने पहली बार किसी लड़की को इतनी समझदारी और आत्मविश्वास के साथ जवाब देते देखा था।
डिंपल एक बेहतरीन आर्किटेक्ट थी, और अपने काम में बहुत कुशल भी।
इंटरव्यू खत्म होने के बाद जब उसे उसकी सीट मिलती है, तो उसकी आँखों में खुशी छलक उठती है।
उसे यकीन नहीं हो रहा था कि वह सच में अपनी पुरानी ज़िंदगी में वापस आ चुकी है।
वह मुस्कुराते हुए ऑफिस की अपनी पसंदीदा जगह जाकर बैठ जाती है।
तभी पीछे से एक आवाज़ आती है—
“हेलो…”
वो पीछे मुड़कर देखती है और पीछे उसे अनुज दिखता है, जो उसे देखकर बहुत इम्प्रेस हुआ था। हाँ, उसे यह भी याद आता है कि शुरुआत में वह उसके साथ बहुत अच्छा था। उसने कंपनी में सबसे मिलने में डिंपल की मदद की थी।
डिंपल को लगा, “अगर मैं नेहा और अनुज को न मिलाऊँ और अपने आप पर ध्यान दूँ, तो शायद ये दोनों मिलकर मुझे मारने का प्लान न बनाएँ और न ही मुझे धोखा दें।”
इसीलिए वह उससे अच्छे से बात करती है और मुस्कुराकर उसे ग्रीट करती है। पिछली ज़िंदगी में वह डरी-सहमी रहती थी, पर इस बार वह आत्मविश्वास से भरी हुई थी।
वह बोली,
“हेलो…”
अनुज मुस्कुराकर बोला,
“आप यहाँ नई हैं क्या? कब से आपकी ही बातें हो रही हैं। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ… लेकिन सच में, आपसे मिलकर अच्छा लगा। आपका नाम क्या है?”
डिंपल उसका फिर से अच्छा व्यवहार देखकर बहुत खुश होती है, लेकिन उसके मन में थोड़ा डर अब भी था। फिर भी हिम्मत करके वह बोली,
“मेरा नाम डिंपल है… और आपका?”
अनुज आगे हाथ बढ़ाता है, उससे हाथ मिलाने के लिए। वह अपना नाम बताने ही वाला होता है —
“मेरा नाम अनुज…”
तभी……