_लेखिका: डॉ वंदना शर्मा_---सब्र का फलएक समय की बात है। बिजनौर जिले के एक गाँव कुम्हारपुर में एक जमींदार के घर एक प्यारी सी लड़की शशिबाला का जन्म हुआ। शशी बचपन से ही मेधावी, गृहकार्य दक्ष और मृदु भाषी थी। बहुत बड़ा घर था उनका लेकिन उस समय लड़कियों को इतनी स्वतंत्रता नहीं थी कि बाहर जाके पढ़े, खेले। उस समय लड़कियों की जिन्दगी घर की चार दीवारियों में कैद हुआ करती थी। बस एक बात बढ़िया थी कि घर बड़े और खुले हुआ करते थे। पड़ोसी भी परिवार हुआ करते थे, दो घरों के बीच की दीवार छोटी रखी जाती थी।उसमें बात करने के लिए खिड़की होती। जिससे घरों की महिलाएं आपस में बात कर सकें अपने सुख-दुख साझा कर सकें। घरों की छत भी मिली होती थी जिसपर सबके बच्चे साझा खेल सके। उस समय घर के मुख्य द्वार के सामने एक खुला कमरा जरूर बनाते जिसमें एक खिड़की घर के अन्दर खुलती जिसका प्रयोग मेहमानों के लिए खाने की वस्तुएँ लेने के लिए होता। उस अतीथि कक्ष में घर के पुरुष अपनी बैठकें लगाते। महिलाओं को आने की अनुमति नहीं होती थी वहाँ। पढ़ने में मेधावी छात्रा रही शशी ने हाईस्कूल में पूरे गाँव में प्रथम स्थान प्राप्त किया। सिलाई, कढ़ाई, बुनाई, पाक कला में निपुण शशी गणित में भी बहुत तीव्र छात्रा थी। उस समय लड़कियों का विवाह जल्दी हो जाता था। मात्र 17 वर्ष की उम्र में शशी का विवाह एक गाँव में हो गया। आगे की पढ़ाई के लिए उसको मना कर दिया गया। --- उसने चोरी-छिपे सरकारी नौकरी का फार्म भरा था। प्राइमरी अध्यापिका के लिए उसका चयन भी हो गया था। लेकिन घरवालों के विरोध के कारण उसे मन मारकर रहना पड़ा। अध्यापिका बनने का ख्वाब वहीं दफन हो गया। उसकी शादी एक गरीब संयुक्त परिवार में हुई थी। जिस लड़की ने अपने मायके में अमीरी और लाड़-प्यार देखा, उस पर शादी होते ही जिम्मेदारियां आ गईं। विवाह के समय उसकी माँ ने एक ही सीख दी थी - बेटा खामोशी ही सब सवालों का जवाब है। मौन ही रहना। अगर ससुराल में कोई कुछ कहे तो प्रतिउत्तर ना करना। उसकी जेठानी बड़ी तेज तर्रार थी, चालाकी से अपना काम निकलवा लेती और सास के सामने उसे ही बुरा बना देती। वो अमीर घर की नाजुक सी लड़की जबसे गरीब घर की बहू बनी, चौका-चूल्हा सब काम करने लगी। अपने सपनों को तो जैसे भूल ही गई। उस समय चूल्हे पर खाना बनाया जाता था। उसकी दो ननदें थी, दोनों बहुत आलसी। घर के काम में कभो सहायता नहीं करतीं। दो देवर थे पढ़ाई में लापरवाह और नखरों में अव्वल। पूरे खानदान का खाना अकेले ही बनाती थी। घर के सारे काम चुपचाप करती रहती, अपनी किस्मत मानकर। कभी किसी से कुछ ना कहती। मन ही मन ईश्वर को याद करती रहती। एक दिन जब वो चौक में बर्तन माँज रही थी, तभी पीछे से उसकी जेठानी आई और बुरा-भला कहते हुए उसे पीठ पर लात मार दिया। शशि के बहुत चोट लगी। लेकिन वो कुछ ना बोली। जब उसकी पहली संतान हुई तो भी उसे आराम नहीं मिला। उस समय एक कहावत कहती थी - *"जिसका जापा आराम से कट जाय , उसका जीवन सुधर गया"* जब उसकी लड़की हुई, छ दिन की ही थी तभी उसकी बड़ी ननद ने उससे जबरदस्ती अपने लिए फ्रॉक सिलवाए, चूल्हे पर खाना बनवाया, घर का सारा काम करवाया। इन सबको करते हुए शशि का शरीर बहुत कमजोर हो गया। आँखे भी धुँधला देखने लगीं। सबकी सेवा करने में उसने अपने शरीर का ध्यान ही नहीं रखा। विवाह के पन्द्रह साल बाद जब उसके पति की नौकरी शहर में लगी तब उसका पति उसे भी साथ ले गया। लेकिन तब तक उसका शरीर बहुत कमजोर हो गया था। वह अक्सर बीमार रहने लगी। उसका पति पुलिस में था अक्सर बाहर ही रहता। घर और बच्चों की जिम्मेदारी उसी की थी। उन दोनों के पाँच बच्चे हुए तीन लड़की और दो लड़के। उसका पति हिटलर सा था। मुँह से बात निकली नहीं तुरंत आज्ञा का पालन हो। जरा सी भी देरी होने पर मार-पीट करता। शशि को शहर में भी आजादी नहीं थी। अपनी मर्जी से वह न तो कहीं जा सकती थी, न कुछ खरीद सकती थी। फिर भी वह स्वतंत्र विचारों वाली महिला थी। अपने बच्चों को उसने पढ़ाया, अच्छे संस्कार दिए। उसके बच्चों में ही उसकी जान बसती थी। शशि ने कभी अपने लिए आवाज नहीं उठाई, किसी बात का विरोध नहीं किया। अपने पति को ही परमेश्वर मानती थी। उनके चरणों में ही स्वर्ग चाहती थी। कभी मार-पीट का विरोध नहीं किया। अकेले में कभी छुपकर रो लेती बस। शशि का पति समाज में इज्जतदार आदमी था, लेकिन था पुराने विचारों का। वो अपनी पत्नी को गुलाम बनाकर रखता था। उसका मानना था कि पत्नी का फर्ज है उसकी सेवा करना, उसकी आज्ञा मानना। किसी भी बात का विरोध ना करना। जब तक शशि का पति घर नहीं आता था वो दरवाजा खोलने के लिए वही कुर्सी डालकर बैठी रहती, चाहे कितनी ही रात हो जाए। उसे डर की वजह से नींद ही नहीं आती थी। शशि बहुत ही धार्मिक महिला थी। वो अपना दुःख किसी को ना बताती। सबसे अपने पति की तारीफ करती, उसे भगवान बताती। जब सब बच्चों की शादी हो गई तो सारे बच्चे अपनी ससुराल में जाकर बस गए। और घर पर रह गए मात्र दो प्राणी - शशी और उसका पति। एक बार कसरत करते हुए शशि का पति घायल हो गया। उसकी कोई नस खिंच गई और उसे स्लिप डिस्क की समस्या हो गई। डॉक्टर ने उसे 6 महीने तक बिस्तर पर ही रहने की सलाह दी। ऐसे बुरे समय में कोई बच्चा नहीं आया उसका हाल पूछने, उसकी सेवा करने। शशि ही एकमात्र सहारा थी उसका, अब उसे इस लाचारी में उसके साथ किए गए गलत व्यवहार का एहसास हुआ। ऐसे बुरे समय में शशि ने उसकी बहुत सेवा की। वो तो अपने पति को भगवान मानती थी। रात-दिन एक कर दिया। अपने बारे में सोचना तो भूल ही गई। घर का सारा काम, मरीज की देखभाल, दवाई समय से देना, मरीज को नहलाना, साफ वस्त्र पहनाना, अच्छा खाना बनाना और रोज गीता, रामायण पढ़कर सुनाना। घर का भी, बाहर का भी जैसे राशन लाना, गेहूँ पिसवाना, दवाई लाना सब हँसकर करती। कभी शिकायत नहीं की ना ही कभी चेहरे पर शिकन आने दी। ईश्वर भी जैसे उसकी परीक्षा ले रहा हो। धीरे-धीरे उसकी मेहनत रंग लाई। उसके पति का स्वास्थ्य सुधरने लगा। लगभग एक वर्ष बाद अब वह पूरी तरह स्वस्थ था। सब काम स्वयं कर सकता था। उसे अपनी गलती पर पछतावा हुआ और उसने शशि से अपने किए गए व्यवहार के लिए माफ़ी माँगी और उसका पूरा ध्यान रखने लगा, उसका सम्मान करने लगा। जिन बच्चों ने उसके बुरे समय में खबर नहीं ली उनको उसने अपनी सम्पत्ति से बेदखल कर दिया और सारी सम्पत्ति वृद्धाश्रम को दान कर शशि के साथ तीर्थ यात्रा पर निकल गया। ———x——— डॉ वंदना शर्मा पांडव नगर new delhi