Alvida Anand in Hindi Short Stories by Devendra Kumar books and stories PDF | अलविदा आनंद!

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अलविदा आनंद!

अलविदा आनंद !

 जीवन में कुछ चीजें आकस्मिक हो कर बुरी तरह से  झकझोर जाती हैं, जैसे अचानक एक तेज अंधड़ आकर कुछ तोड़ फोड़ कर चला गया फिर सब शांत जैसे कुछ आया  नहीं था, बस हुई हानि को सवांरने सँभालने में लग जाते है. सोचते रह जाते हैं कि अचानक क्या हो गया? कैसे हो गया? क्यों हो गया? पर  इस विषय में सोचने पर  उनका कुछ भी तो  स्पष्टीकरण दिमाग को नहीं सूझता. लोग यह भी कहते है कि सब कुछ पूर्व  निर्धारित ही हैं.  जो भी हो वह एक भूले बिसरे मित्र की सच्ची अजब दास्तान है जो अन्दर से मुझे उद्वेलित कर रही है. और लिखने को मजबूर कर रही है.

 हुआ यूं, दो सप्ताह पूर्व शुक्रवार के दिन, मैं  घर में आराम से बैठा रोजाना की तरह अखबार चाट रहा था. फ़ोन की घन्टी  बजी, मोबाइल पर जो नंबर आया वह  सेव्ड था, ए एस डागर’ अतः तुरंत पहिचान गया था, थोडा आश्चर्य ज़रूर  हुआ था कि बीस तीस साल  से इस पुराने मित्र डागर से कभी कोई बातचीत, न फ़ोन, न कुछ खोज  ख़बर थी, अब अचानक क्या बात टपक पड़ी है? मुझे यह तो पता था कि वह गुडगाँव में रहता होगा क्योंकि बहुत पहले ही जब साथ थे उसने प्लाट खरीद कर मकान बनाया था. हम सब उसके सेटल होने  के चुनाव के बारे में कोई अच्छी राय  नहीं रखते थे. खैर, पिछले  तीस  पैतीस साल में गुडगाँव बिलकुल बदल गया, उसका निर्णय ठीक रहा.

 इन दिनों  मैं भी द्वारका में अपने फ्लैट में न रह कर अपनी बेटी के पास गुडगाँव में ही रह रहा हूँ, सो हम पास ही रह रहे हैं, यही बात दिमाग में आई.

उसने छूटते ही पूछा आजकल  कहाँ हो? मेरे गुडगाँव में होने की बात सुन कर वह बहुत प्रसन्न हुआ. उसने  मेरे बारे में, मेरे बच्चों और परिवार के बारे में पूछा. मैंने संक्षिप्त रूप से सब बता दिया. मेरे तीनों बच्चे अब खुद ही बच्चों वाले हैं. उसने अपने बारे में बताया कि वह आजकल अपने पुराने घर गुडगाँव के सेक्टर 17 में रहता है, उसका छोटा बेटा और उसका परिवार साथ रह रहा है, अपने बच्चों के बारे में आगे काफी बताता रहा. गुडगाँव के पास में स्थित अपने फारुख नगर के 17 एकड़ के फार्म के  फार्म और फार्म हाउस में बारे में भी बताया, अपने बेटों की सफलता के बारे में बताया. बार बार यही रट लगाता रहा “भाई, तू  बस आजा, ज़रूर  मिल ले.”

मुझे आश्चर्य हो रहा था कि इतने लम्बे अरसे से आपस में कोई मेल मिलाप नहीं था, फिर अब क्यों इतना प्रेम उमड़ रहा है? कहानी के थोड़े बाद में ही आपको शायद समझ में आयेगा कि यह अकारण दिखने वाला कारण  किस लिए था, वह क्यों अचानक मिलने की ज़ल्दी कर रहा था. उस दिन तो मैं भी असमंजस में ही था तथा इसे ज्यादा  गंभीरता से नहीं लिया था.

 उसने  बताया, वह मेरे से मिलने खुद मिलने आ जाता पर शरीर से थोड़ी दिक्कत है. वैसे कई मर्सीडीज़  गाड़ियाँ घर में खड़ी हैं. बेटे बिगड़ गए हैं साधारण गाड़ियाँ उन्हें अब जंचती ही नहीं. बस शरीर कम साथ दे रहा है. मुझे यहाँ तक कहा कि मैं  उसी दिन ही तुरंत टैक्सी से उसके पास आ जाऊं, वापिस वह अपनी गाडी से भिजवा देगा. मुझे आश्चर्य हो रहा था कि अचानक इसे इतना प्यार क्यों  उमड़ रहा है? क्यों इतनी जल्दी मचा रहा है? जब कि बरसों से  कोई भी संपर्क नहीं था. न दुआ  न सलाम या बीच में कोई संपर्क, किसी फंक्शन में मिलने का या बुलाये जाने का कार्ड या निमंत्रण न उसकी और से ना मेरी और से. पूरी नौकरी में एक बार एन.एस.जी. मानेसर में ही तो बस  तीन साल साथ साथ रहे थे, उसमें  भी अलग अलग यूनिटों में थे-मैं ट्रेनिंग सेण्टर में था और डागर 12 एस.आर.जी.में. पहले  उसने अपनी  इंडक्शन ट्रेनिंग मेरे  पास ट्रेनिंग सेण्टर में की थी , फिर नार्मल  सरकारी ड्यूटी में अलग अलग कार्य में. उसी दौरान ही पहली बार मिले थे और ठीक ठाक आत्मीयता भी हो गयी थी.

  तीन साल बाद के डेपुटेशन को  ख़त्म होने पर वह अपनी बीएसएफ और मैं अपनी सीआरपीएफ को लौट  गया था . कहावत है ‘सुल्फय्या यार किसके दम लगाया खिसके’. दोनों ही सर्विस ऐसी थी मिलना और बिछड़ना बिलकुल साधारण  घटना  मानी जाती थी. उस समय मोबाइल वगैरा  या व्हाट्स  एप या ई-मेल आदि कहाँ  थे, घर से भी संपर्क मुश्किल से चिट्ठियों द्वारा रख पाते थे. 1988 के बाद बाद हम दोनों की कभी कोई मुलाकात नहीं हुई थी. बीच बीच में कोई कॉमन फ्रेंड मिल जाता तो बातों बातों में थोडा बहुत ठौर ठिकाना पता चल जाता था कि कौन पुराने साथी कहाँ कहाँ है. दोनों ही फोर्सों में हम सब जिंदगी भर यायावर ही तो बने रहते हैं. कभी कहीं कभी कहीं, सी.आर.पी. का आंतरिक नाम ‘चलते रहो प्यारे’ है. देखा देखी बी.एस.एफ. को भी ‘बिस्तर समेत फाल इन’ कहलाती हैं.  इसीलिये हमारी मित्रता थोड़े समय चल पाती है, फिर् नई  जगह नए मित्र बनते और बिछड़ते रहना ही सर्विस का नियम रहा था. इस मामले हम लोग  भावुक नहीं होते थे.   

    आनन्द  डागर मज़बूत कद काठी का  लम्बा तगड़ा था और ट्रेनिंग में विशेष रूप से आउटडोर में, बहुत टफ था. बस उसकी अपने सी.ओ. जो वहां ग्रुप कमांडर कहलाते थे, से अक्सर कहा सुनी हो जाती थी और यह अपना दुखड़ा आकर मुझे सुनाता रहता था. उस समय ट्रेनिंग के दौरान  मैं कई बार इसके और ग्रुप कमांडर के बीच बचाव में इसकी थोड़ी मदद करता रहता था. उन्ही दिनों  ही इसने अपना नया नया प्लाट  गुरुग्राम  सेक्टर 17 का मकान भी ले जाकर दिखाया था- जो उस समय बस कामचलाऊ ही बन पाया था. उनके आसपास के सब प्लाट बिलकुल खाली पड़े हुए थे. वह इलाका नया नया था तथा  पुराने खेत प्लाट बन गए थे, उस समय  बिलकुल भी अंदाज़ा नहीं था कि भविष्य में गुडगाँव इतना बड़ा और विकसित भीड़ भाड वाला  महानगर होने वाला है.

  उस दिन फोन पर बातचीत करते करते  हमें काफी देर हो गई थी. पर डागर की बातें ख़त्म होने का नाम ही नहीं ले रही थी. हार झक मार कर मैंने पूछ ही लिया कि “कैसे फ़ोन किया था, कैसे याद किया है?”

 उसने बताया “यह संयोग ही है कि मैं अपने डायरी में किसी एयर फोर्स के रिटायर्ड अफसर का नाम ढूढ़ रहा था बस वहीँ अचानक तुम्हारा नंबर दिखा सो एक दम मन किया और फ़ोन कर लिया है. कोई काम धाम के लिए नहीं किया” फिर कुछ सोच कर कहा कि उसकी दो विवाह योग्य पोतियाँ हैं, जो अच्छा पढ़ लिख कर जॉब कर रहीं है उनकी शादी करनी है, अगर कोई उपयुक्त अच्छे घर के लड़के तुम्हारी निगाह में हों तो बताना.

 “मेरी घर की सब ज़िम्मेदारी कब  की समाप्त हो चुकी हैं, अगर इन दोनों  पोतियों की शादी भी कर दूं तो गंगा नहा जाऊंगा.”  

मैंने कहा है कि बच्चे अब ज़ल्दी शादी नहीं करते और बहुत से शादी बिलकुल भी नहीं करते और पुराने ढंग की  बड़े लोगों द्वारा तय की हुई अरेंज्ड शादी  तो बिलकुल ही कम’ उसने कहा उसके परिवार में ऐसा अभी तक तो नहीं है न उसके होते हुए ऐसा होगा.   

  बातचीत करते करते कोई  बीस पच्चीस  मिनट हो गए थे, और उसके किस्से चालू थे, बीच बीच में कई बार घर पर आने का आग्रह भी करता रहा, वह भी उसी दिन ही आने के लिए जोर दे रहा था. मैंने उससे बताया कि उस  नहीं अगले दिन या किसी दिन ज़ल्दी ही आने की कोशिश करूंगा.

  फिर भी उसने बात बंद नहीं की  जैसे बातों की पिछली सारी कसर उसे  उसी दिन पूरी करनी हो वह अभी भी लगातार बातों में लगा हुआ था. मैंने दुबारा से कहा,“डागर भाई, अगर हम सब बातें आज ही फ़ोन पर ही कर लेंगें तो जब मिलंगे तब क्या बात करेंगें, कुछ कल परसों  के लिए भी छोड़ दो?”  

बात खत्म करने से पहले उसने अगले दिन आने का पक्का वायदा मेरे से ले लिया था. मुंह से बोल कर अपना एड्रेस मुझे लिखने को कहा. मैंने कहा मुझे एड्रेस और लोकेशन फ़ोन पर शेयर कर दें. उसने बताया “मुझे  ये काम नहीं आते,  मेरे घर  का नंबर है 788, सेक्टर 17 में , मार्किट के पास है, बस इसे याद कर ले नहीं तो लिख ले.”

मैं अगले दिन सुबह तक दो मन में था कि मिलने जाऊं या न जाऊं, मुझे लग रहा था कि डागर अपनी बोरियत को दूर करने के लिए बुला रहा है, कुछ काम धाम नहीं है, बस उसे केवल श्रोता चाहिए.

मुझे पोस्ट ऑफिस  से एक स्पीड पोस्ट करनी थी, और सेक्टर 17 में एक पोस्ट ऑफिस भी था, सो मैंने उसे  फ़ोन पर आने के लिए बता दिया, फ़ोन उसके छोटे बेटे ने उठाया और अपना नाम विजय भी बताया. वहां जाने पर देखा कि उसकी सड़क पर दोनों तरफ बहुत बड़े बड़े आलिशान तिमंजले मकान हैं, इसके घर के सामने पहुँचने पर भी इसके 500 मीटर प्लाट पर अब एक बहुत शानदार तिमंज़ली कोठी थी, घर गेट पर उसका नाम और रैंक लिखे थे,  अब वह बड़ा पोश एरिया था, घंटी बजाने पर उनके बेटे विजय ही ने गेट खोला और मुझे अपने खूबसूरत  व अच्छे बड़े ड्राइंग रूम ले जा कर बैठाया. तुरंत ही एक सर्वेंट पानी सर्व कर गयी थी .

 थोड़ी देर में बेंत के सहारे हिलते डुलते खरामा खरामा  डागर साहेब आये और बडी आत्मीयता से गले मिले, कस कर हाथ  भी मिलाया, ग्रिप में अच्छी मजबूती थी. उसे देख कर मेरी पहली प्रतिक्रिया थी कि डागर की लम्बी मूंछे, जिसके लिए वे एन.एस.जी. में जाने जाते थे, अब छोटी हो गयी थी, सिर के बाल भी बहुत कम रह गए थे. पर काले रंगें हुए थे. कमर भी झुक गयी थी पर आवाज़ में पुरानी कडकी बदस्तूर बरकरार थी. अपने आप ही बताया कि गोल्फ खेलते हुए कमर में एक  झटके से चोट लग गयी थी एक रीढ़ जॉइंट पर नस दब गयी है, इसलिए  सीधा चलने में थोड़ी दिक्कत है बाकी सब ठीक है.

उसने अपने बारे में बताया कि सर्विस में उसने काफी बड़े बड़े काम भी किये  कुछ सराए भी खूब गए और बहुत सा नुक्सान भी उठाया. मैंने मजाक में कहा अपने सीनियर्स से भी तो तुम ज़ल्दी से भिड जाते होगे, जैसे एन.एस.जी. में अपने ग्रुप कमांडर के साथ. याद कर खुश हुआ कहा रद्दी आदमी था. मैंने उसे याद दिलाया कि एक दो बार तो मैंने भी उसका  बीच बचाव किया था, हंस कर बोला सब खूब याद है, और कहा “ अगर तुम उस दिन तुम बीच में न आये होते तो उस दिन  मैं उस के ऊपर हाथ छोड़ने वाला था. उसने बाद में भी मेरी रिपोर्ट ख़राब न कर गुड ग्रेड में रक्खी पर  प्रमोशन के लिए चाहिए थी ‘वैरी गुड’, उस का भी मुझे प्रमोशन के लिए बड़ा नुक्सान हुआ था. मैं सुपर सीड हो गया था.

 बातचीत करते करते उसने व अपने परिवार के बारे में खूब बातें की और बताया,“मेरी शादी बहुत बहुत ज़ल्दी हो गयी थी मैं केवल 13 वर्ष की कम उम्र का था. पहले दो बड़ी बेटियाँ हुई फिर दो बेटे हुए. सब अच्छी तरह सेटल कर दिए थे. सबको अपने अपने भाग्य का मिलता है सब अपना भाग्य लेकर आते हैं, बड़ा बेटा इंजीनियरिंग कॉलेज चला रहा है उसे मैंने एम् टेक करा दिया था, यह कॉलेज हमारे फार्म की ज़मीन पर बनवा दिया था, फारूख नगर में वही उस कॉलेज का प्रिंसिपल है. उसकी पत्नी भी वहीँ प्रोफेसर है. वह ही अपने फार्म हाउस में रहता है जिसमें 10 बेडरूम मैंने बनवा दिए थे. दो दो चारों बच्चो के लिए तथा दो मेरे और मेरी पत्नी के लिए. कोविड  के समय ये  हमारे बहुत काम आये थे. मैंने पूरे टब्बर को वहीँ लेकर रक्खा हुआ था और हम सब साथ भी रहे और कोविड से बच भी गए थे.”

 थोडा साँस लेकर कहा “मैं  रिटायरमेंट के बाद आठ साल वहीँ रहा था, फार्म को  मैंने ही अच्छी तरह डवलप किया है और वहीँ से मैं  बीएसफ कैंप छावला जाकर नियमित खूब गोल्फ खेला करता रहा था. उस इलाके में  खूब डवलपमेंट हो रहा है, बड़े बड़े वेयर हाउस बनते जा रहे हैं, मेरी ज़मीन के लिए डवलपर मेरे पीछे पड़े हुए हैं, दो साल पहले 110 करोड़ ऑफर कर रहे थे अब तो काफी और भी दाम बढ़ चुके हैं” मैंने कहा तुम्हारी तो मौज आई हुई है बेच दो और खूब मौज करो,जो उसे अच्छा नहीं लगा,“मैं हरगिज जीते जी नहीं बेचूंगा” बात करते डागर चुप हो गया था, थोडा विश्राम लिया उसको बैठे बैठे ही एक झपकी आ गई थी.

 मैं सोफे से उठ कर अपने से पीछे की दीवार पर लगे दो वृद्ध पगड़ीधारी बुजुर्ग सज्जनों की फोटो देखने लगा, एक की लम्बी सफ़ेद मूछें थी जो डागर के दादा थे तथा दूसरे बिना मूछों वाले डागर के पिता. थोडा पलट कर देखने के बाद मैंने  वहां रखी एक  किताब पर बंद कर रख ली थी. थोड़ी देर उसके बेटे और पत्नी से बात की, वे धीरे धीरे बात कर रहे थे, जाहिर था कि घर में रौब केवल डागर का चलता है, घर में भी बटालियन के सी ओ के अंदाज़ से रहते  हैं, पचास से ज्यादा उम्र का बेटा विजय और यहाँ तक की पत्नी  शादी के लगभग 63 वर्ष  बाद भी उनसे ऐसा पूरा घबरा रहे थी है जैसे  हवलदार आदि अपने सी ओ से, फुल कमांड घर में भी चला रक्खी थी .

अचानक डागर थोडा सोने के बाद जाग गए थे. एक जंभाई ली आँखें रगड़ी और हमसे  पूछा क्या टाइम हुआ है.? ‘11 बजे’ बताने पर पर पूछा,“दिन के या रात के?” विजय उन्हें बताता रहा तथा उसने डागर को अच्छी तरह सहारा देकर सीधा बैठा कर ठीक किया, ताकि वह आराम से बैठ जाए और उसके अगल बगल में तकिये लगा दिए थे.

मैंने बाद में बगल में बैठे विजय से धीरे धीरे पूछा कि डागर को क्यों समझ में नहीं आ रहा था कि शाम है या सुबह है? उसने बताया कि पापा की कमर में काफी दर्द रहता है. और जो एक स्ट्रोंग दर्द निवारक दवाई  उन्हें दी हुई है  उसमें सिडेटिव तथा एंटीडीप्रेस्सेंट भी था, हो सकता है शायद उसी के असर से थोडा बिचल गए होंगें. डॉक्टर पापा से कहते हैं कि बहुत ज्यादा तक बातें नहीं करनी चाहिए पर वे सुनते कहाँ हैं, ख़ास तौर पर मोबाइल पर लोगों को ढूंढ ढूंढ कर फ़ोन मिला घंटों बातें करते हैं. पर घर में इन्हें रोकने की हिम्मत किस में हैं? ये तो घर में सब को अपनी कमांड के नीचे दबा कर रखते हैं?

मेरे से बात करते करते बातों बातों में हमारे पुराने समय के साथियों विशेष रूप से एन.एस.जी. के बीएसफ  से  आर.पी. सिंह का ज़िक्र आया जो डागर के नज़दीक गुडगाँव में ही रहते है. और  मेरे साथ वे ट्रेनिंग सेंटर में थे. डागर ने बतया  कि वे आर.पी. से  बात नहीं करना चाहते, क्योंकि आर.पी. अपने बी.एस.एफ. के ग्रुप में हमेशा मरने मारने की दुखद बातें लिखते रहते हैं,“कौन मर गया है? कौन मरने वाला है? कौन बिमार होकर अस्पताल में मरने वाला है? यह सब  मरने मारने की बातें उसे ख़राब लगती हैं सो मैं उससे अगर बात करूंगा वही नेगेटिव सुनने को मिलेगी, दूसरे वह आई.जी. बन गया था उसकी ईगो होगी.? मैंने कहा कि ऐसा नहीं है वह तो बहुत डिसेंट और योग्य साथी रहा था. अपने काम में भी होशियार.पर सुन कर उसने कोई प्रतिक्रिया न देकर विषय बदल दिया.

 इसी प्रकार एक दूसरे बैच मेट एस के दत्ता के बारे में खुद ही बताया है कि वह बहुत बिमार हैं किसी दिन भी जाने वाला है. दत्ता के बारे जिस बेरुखी और बेदर्दी से उसके मरने की बात कही जो मुझे अजीब लगी और चुभी भी. पर अजीब तो मुझे सारा माजरा ही लग रहा था. मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि उसने मुझे ही क्यों इतना आग्रह से बुलाया जबकि अन्य अपने साथ वालों के बारे में में वह विमुख है. गुडगाँव में कम से कम् आधा दर्ज़न से ज्यादा बीएसएफ के पुराने जानने वाले या पुराने सहयोगी ज़रूर रहते होंगें. शायद हमारी कुछ एक तरह की बैकग्राउंड हो सकती है, क्योंकि हम दोनों के बड़े खेती और फौज यह ही दो व्यवसाय जानते थे दोनों के पूर्वज खेती करते आये थे .  

थोड़ी देर के लिए विजय अन्दर चला गया था, मैं और वह अकेले रह गए थे तब उसने बताया कि सर्विस के  दौरान उसको न्याय नहीं मिला वह नाजायज़ तौर से सुपरसीड किया गया था, अपनी एसीआर को इसके लिए ज़िम्मेदार मानता था. मैंने से कई बार उसे बताया कि अब अठारह बीस साल बाद इन बातों में क्या रक्खा है. अपनी अच्छी चीजों को याद रखो कि अब तुम कितने अमीर हो गए हो कितना आलिशान मकान है  कितना कीमती फार्म हाउस  है. और न कितनी प्रॉपर्टी तुम्हारे पास है. और तुम्हारे बेटे बहू सब तुम्हारा ख्याल रख रहे हैं. संसार में सब चीज़े तो किसी को नहीं मिलती. मैंने अपना रटा रटाया  निदा फाजली की ग़ज़ल की दो लाइन सुना दी,“कभी किसी को मुकम्मल ज़हां नहीं मिलता, किसी को ज़मीं किसी को आसमां नहीं मिलता” सो जो मिल गया वह बहुत है, जैसी जगह और  परिस्थितियों में रहे उनमें बचकर साबुत शरीर आ गए वही क्या कम है. अब पेंशन के साथ नौ टेंशन भी तो ऊपर वाले की बड़ी कृपा ही तो है. सुनकर वह बस मुस्करा दिया.

 चाय आ गयी थी, उनकी पत्नी भी अन्दर से भी आकर चाय में शामिल हो गयी थी. चाय पान के बाद मैंने  जाने की इजाजत मांगी, डागर पहले अड़ा की लंच के बाद ही जाने दूंगा. फिर मुश्किल से यह तय हुआ कि आधा पौने     घंटा और रुकूँ और फिर बेटे  कुछ और बनवाने का हुकुम दे डाला. बात का सिलसिला चलता जा रहा था.

 उसने मुझ से पूछा तुम किताब भी लिखते हो मैंने भी लिखी है और  विजय को हुकुम दिया लाने के लिए, मुझे आश्चर्य हुआ पर एक पुस्तक लाई गयी बहुत खूब सूरत ऊपर  का कवर जिसमें  स्वयं डागर का यूनिफार्म में भव्य ज़चाऊ  फोटो, अन्दर पहले  पेज पर फिर उसी का फुल पेज फोटो, फिर अगले दो  पेजों में उनके दादा और पिताजी के फोटो. अपनी पत्नी को किताब का समर्पण, अन्दर परिवार के तथा अपनी व अपनी सर्विस के फोटो, और अन्दर जो लिखा न वह अंग्रेजी मैं था न वह हिंदी में  बल्कि रोमन में लिखा था, अर्थात लिपि अंग्रेजी  वर्णमाला, भाषा बोलचाल की बेलाग हिंदी. मैंने पलट कर देखा, मज़ेदार लगी, बिलकुल नई चीज़ थी, न पूरी  तरह से किताब, न एल्बम न कॉफ़ी टेबल बुक पर थोड़ी थोड़ी तीनों चीज़ें  एक साथ  एक जगह. उसने बताया  “केवल 10-12 कॉपी छपाई हैं घर वालों के लिए, टाइप का काम पोती से करवाया, मैं तो सिर्फ मुंह से बोलता  रहा था. एक एक कॉपी कई हज़ार में पड़ी”

फिर रूक कर कहा,“तुम तो पहले से ही लिखा पढ़ी करने वाले थे, तुम इसे पढ़ लो, और कुछ अच्छा लगे तो पढ़ कर मेरे जीवन के ऊपर भी एक कहानी लिख देना, हाँ पढ़ कर मेरी पुस्तक मुझे ज़ल्दी वापिस कर देना, मेरे पास मेरी बस यही एक  कॉपी है. “मैंने हामी भर ली और पुस्तक अपने पास रख ली.

 सरसरी  तौर से देखने पर किताब में लिखित मसाला कम था. डागर की जिंदगी की हर स्टेज के फोटो थे. ट्रेनिंग के समय के, 26 जनवरी की  परेड कमांड करते हुए, अन्य  सर्विस में  मिले  प्रशंसा पत्र, बच्चो के, पत्नी के, बेटों की शादी के समय के फोटो आदि के फोटो थे.

थोड़ी देर में मेंगो शेक आया, पीते पीते फिर डागर ने  कहा, “मैं चाहता हूँ मैं अपनी कम से कम एक पोती का ब्याह देख लूं. मैं चुप रहा, फिर कहा कि  कोई सुयोग्य लड़का नज़र में आया तो ज़रूर बता देना  पर दिल्ली एनसीआर में तब ही अच्छा रहेगा. क्या ज़माना आ गया है अब लड़की को कराटे और लड़के को पराठे सिखाने चाहिए” उसकी बात  सुनकर मुस्काये बिना नहीं  रहा गया. उसने फिर दोहराहा, अब ज़ल्दी ज़ल्दी आते रहना. पता  नहीं कब तम्बू उखड जाए”

  मैं जाने के लिए उठ खड़ा हुआ, इतनी आत्मीयता इतने वर्ष के बाद सोच सोच कर बड़ा अजीब सा लग रहा था. चलने से पहले हाथ मिलाया.

मैंने अपने घर आकर उस की लिखी किताब के फोटो देखे, उसमें शुरू का हिस्सा पूरा आत्मकथात्मक था, अपने अंदाज़ से उसने शुरू किया था “ मेरा गाँव मैदान गढ़ी है जो अब दक्षिण दिल्ली का हिस्सा है, साकेत से लगा हुआ है. इंदिरा गाँधी नेशनल ओपन यूनिवर्सिटी भी बिलकुल समीप ही है. किसी समय यह गाँव भरतपुर राज की एक गढ़ी हुआ करता था. सन 1757 में नज़फगढ़ के पास के ईसापुर गाँव से बुला कर हमारे पूर्वजों को इसे भरतपुर की गढ़ी का मालिक बनाया गया था. इस पूरे इलाक़े में पाली के गूजर जेलदार के 24 गाँव थे. वे  पशुओं को पालते  और चोरी करते. गूज़रों ने दस बार इस  गाँव को उजाडा था. हमारे पूर्वजों ने जेलदार को मार कर उसके सिर को काट कर गाँव की चौपाल की पहली सीढ़ी के नीचे गाढ़ दिया था. मेरे दादा के अकेले बेटे मेरे पिताजी थे और अकेला बेटा था मेरे चार बहिनें थी. मैं अपने मां बाप की बुढाप्पे की संतान हूँ, मेरे से पहले जितने भी बेटे हुए थे वे दो साल के अन्दर मर जाते थे. मुझे बचाने के लिए मुझे लड़की बना कर रखा जाता था, नाक कान बिंधवा दिए थे नाक में बाली पहना दी गयी थी, पांच साल तक लड़कियों के कपडे पहने थे वे भी दूसरों से मांगे हुए. सात साल का होने तक मां मर गयी थी, मरने से पहले कह कर गयी थी कि जो भी मेरा सबसे पहले रिश्ता आएगा उसी से  शादी तय कर देना. पहिला रिश्ता 13 वर्ष की उम्र में आया उसी से तभी 13 साल की उम्र में ही शादी कर दी गयी थी. मेरे नाक में जो बाली थी उसे शादी होने पर मेरी सास को ही निकालने का विधान था, शादी  के समय  ही मेरी सास ने ही वह बाली मेरे नाक से निकाली थी.” 

 आनन्द डागर ने अपने गाँव  के निकट के प्राइमरी क्लास की पढाई की थी और महरौली के स्कूल से हायर सेकंड्री की फिर बीए किया था कालकाजी से, तब तक हज़रत डागर पढाई में कम खेल आदि में ज्यादा दिलचस्पी रखने लगे थे.साथ में शादी के बाद घर में बीवी के होते हुए कॉलेज में शोभा नाम की लड़की से इश्क लड़ाया था जो  दोनों की शादी बाद में भी काफी दिन चलता रहा, और उस पर तुर्रा यह अपनी किताब में भी अपने प्रेम प्रसंग को   लिख मारा था. अपने अच्छे कार्य और उपलब्धियों जैसे 1972 में रिपब्लिक डे या गणतंत्र दिवस की परेड में बी.एस.एफ. की टुकड़ी की कमांड करने का गौरव उसे मिला था. उसने परेड की रिहर्सल और फाइनल के दिन भी जब टुकडियां जी.बी. रोड के रेड लाइट इलाके से गुजरती अनेक वेश्याएं कोठों से इशारे करने की बात भी लिखी है. इस महत्वपूर्ण परेड के लिए पूरी फ़ोर्स से चुना जाना डागर के लिए बड़े सम्मान की बात रही होगी. इसी तरह इसी ने ही बी.एस.एफ. के लिए कलर प्रेजेंटेशन सेरेमनी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी तथा उसकी ड्यूटी के लिए प्रशंसा पत्र प्रदान किया था, निश्चित रूप से परेड और पर्सनलिटी के मामले में डागर आगे रहे. ड्रेस और मूंछों के साथ वः खूब जचते थे.ऑपरेशन दक्षता और साहस भी भरपूर था. 1971 की लड़ाई में भी पश्चिमी मोर्चे पर अच्छा काम किया और बाद में भी नार्थ ईस्ट में कई  विद्रोही ग्रुप के सदस्यों से आत्म समर्पण कराया  बस प्रमोशन के मामले में  उसके अनुसार ऊपर के अधिकारियों  के मक्खन लगाने वाले खुशामदी उस से आगे निकल गए थे.  

1971 के भारत पाकिस्तान युद्ध में डागर कुपवाड़ा सेक्टर में तैनाती पर था. तीन दिसम्बर  की शाम यह और इसकी पोस्ट के लोग शाम को मज़े से  एक हरियाणवी गाना सुन कर उसके इन बोलों पर झूम् रहे  थे, वह गाना था ‘मने आवे हिचकी, मने  आवे हिचकी परदेश गए बालम की याद  सतावे हिचकी. ....,’

अचानक गाना बीच में रोक कर रेडियो पर  एलान हुआ कि पाकिस्तानी एयर फ़ोर्स  ने हमारे हवाई अड्डों आदमपुर ,अवन्तिपुर अम्बाला, आदि पर हमला कर किया है तथा देश में इमरजेंसी डिक्लेअर कर दी गयी है. तथा पाकिस्तान के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी गयी है. यह सुनते ही इसकी पलटन के लोग अपनी अपने पोस्ट पर भागे और पाकिस्तानी फौज को अपने इलाके में घुसने ही नहीं दिया बल्कि बहुत बहादुरी का अंजाम दिया.

उन्ही दिनों घर के लोग इसकी फ़िक्र न करें सोच कर एक बड़ी गलती कर दी थी. अपने एक  एनसीओ को कह दिया कि अब लड़ाई शुरू हो गयी है कोई कुशलता की  चिट्ठी तो नहीं लिख पाऊंगा इसलिए मेरे  पते पर एक टेलीग्राम  हेड क्वार्टर जाकर भेज देना. ‘ I am fine.’

 जैसे ही  इसके गाँव में  घर पर टेलीग्राम दे कर डाकघर का पोस्टमैन  गया डागर के पिताजी का आर्मी से रिटायर्ड सूबेदार मित्र वहां बैठा हुआ अख़बार पढ़ रहा था, जैसे ही इसके पिताजी अन्दर से नहा कर वहां से आये सूबेदार यह कह कर कि टेलीग्राम आया है, ज़ल्दी से  निकल गए. गाँव में लड़ाई के दौरान आने का अर्थ हमेशा होता था बुरी खबर. टेलीग्राम मरने की सूचना माना  जाता था. डागर के पिता भी सुन कर हिल गए, उनके आंखों के आगे  अँधेरा छा गया कि ले देकर एक ही बेटा था, वह भी ख़त्म हो गया. आनन्द डागर की पत्नी अपने पहले बच्चे के लिए छः महिने की गर्भवती थी, पिता ने सोचा बेटा तो गया, टेलीग्राम की सुन आनन्द की पत्नी पर पता नहीं  क्या बीतेगी, क्या पता एक पोता आ जाये उसके सहारा ही बुढाप्पा कट जाएगा. इसलिए किसी को कुछ नहीं बताया और टेलीग्राम छुपा कर बिना खोले रख लिया, पर फिकर में खाना पीना छुट  गया, गुमसुम हो गया  शरीर पीला पड गया, आनन्द  की पत्नी ने बार बार पूछा पर वे टाल गए  कुछ नहीं बताया. उसे भी कुछ अनिष्ट की आशंका हुई. उसने एक बुज़ुर्ग परिवार के बड़े भाई को बुला कर अपनी व ससुर की परेशानी बताई . उस बुजुर्ग ने जब आकर पूछा तो उसके पिता ने बताया टेलीग्राम आया है कह कर रोने लगे, इनके बुजुर्ग  भाई ने जब टेलीग्राम लेकर जब खोल कर पढ़ा और बताया  की मरने का नहीं कुशलता की खबर है . तब टेलीग्राम देखा पढ़ा और फिर  ख़ुशी से रोये क्योंकि वे तो उसे मरा मान कर इस व्यथा से दिन रात अकेले बैचैन और परेशान थे और किसी को बता भी नहीं रहे थे. और भी बहुत से किस्से उसने अपनी याद से लिखे हुए हैं.

 मुझे भी पढ पढ़ कर जब हम  साथ एन एस जी  में  याद आये जिसमे गुस्सा होने पर यह जूनियर देखता था ना सीनियर  बस भिड़ जाया करता था  उसने बताया था की  अपने एक दो अपने सीनियर को पीट चुका था,  पर यह भी सावधानी बरतता था कि ऐसे समय और जगह ऐसा करता जहाँ कोई सुबूत इसके विरुद्ध न मिले. अपनी किताब में इसका  स्वयं लिखा एक किस्सा पढ़ा  जिसमें इसने त्रिपुरा में एक एम.एल.ए. को भी गाली देकर थप्पड़ रसीद किया था, जिसका हल्ला गुल्ला त्रिपुरा  की विधान सभा  तक में उठा था वहां इसके मित्र एस.के. दत्ता ने ही जो तब वहां आई.जी., बीएसएफ थे, ने मुख्यमंत्री तथा स्पीकर से मिल मिला कर रफा दफा कराया था. इसे इस की सहायता वाले भी समय समय पर मिल जाते थे.

  इसकी मेरी मुलाक़ात और पहले दिन बात के बाद भी, सच पूछिए तो तब तक मैंने उससे मिलने को ज्यादा अहमियत नहीं दी थी, 38 वर्ष की सर्विस में हम मिलते बिछड़ते रहे कि कम ही लोगों से लम्बा परिचय रहा सो इन मामलों में हम आम लोगों से कम भावुक होते हैं, अगले दिन शाम तक तो ऐसा ही रहा पर जब शाम की सैर के बाद घर आ रहा था और यू हीं व्हाट्स एप  मेसेज देखने लगा. एक नया मेसेज अजय डबास से आया हुआ था जिससे तब तक मिला ही नहीं था. देख कर सन्न रह गया कार्ड था उस पर डबास का किताब के कवर वाला फोटो था लिखा था  ‘हमारे पूज्य पिताजी ए एस डागर का स्वर्गवास आज 3.5.26 को स्वर्गवास हो गया है ........

देख कर बड़ा धक्का लगा, क्या पता था की वो इतना ज़ल्दी जाने वाला है. प्रश्न मन में बार बार उठ रहा था कि  क्या उसे कुछ  पूर्वाभास था जो मिलने के लिए इतना जोर दिया या बस यह मेरा बहम है, क्या सब पूर्व निर्धारित था, या पूर्व जन्म का  उसका कोई उधार मेरे जिम्मे था . एक दिन पहले ही तो उस से मिल कर आया था.

 मैं उसके अंतिम संस्कार से पहले उनके घर  बुलाया गया था. उसी कमरे में एक शीशे के कास्केट में उसका मृत शरीर था, शांत सौम्य, जैसे अभी बोल उठेगा. वह कास्केट लगभग उसी स्थान पर था जहाँ एक दिन पहले बैठे हम आपस में बात कर रहे थे साथ चाय पी रहे थे. कोई ऐसा लक्षण नहीं था कि 24 घंटे से कम में ही वह अपनी अनंत यात्रा में जाने वाला है.  

दिमाग पर बड़ा असर पड़ा क्या जीवन इतना क्षण भंगुर और अनिश्चत है, कई  सौ करोड़ के फार्म  की बात पहले दिन बताई थी. अपनी बेटों द्वारा बनाई प्रॉपर्टी और जाने क्या कुछ और अगले दिन ही सब छोड़ कर चला गया जैसे कुछ नहीं हुआ हो.

 अंतिम यात्रा सेक्टर 17 से चल कर मैदान गढ़ी श्मशान घाट आई, वहीँ अंतिम संस्कार हुआ. बी.एस.एफ. से आयी हथियार बंद टुकड़ी ने दिवंगत को  सलामी दी, बिगुल ने लास्ट पोस्ट बजाया, गाँव के लोगों, परिवार के सदस्यों और अन्य उपस्थित लोगों ने हाथ जोड़ कर दिवंगत विदा किया. श्मशान घाट के शब्द  चिल्ला चिल्ला कर  मानों सुना रहे थे-‘ मंजिल तो तेरी  यही थी, बस जिंदगी  गुज़र गयी  आते आते. क्या मिला इस दुनिया से, अपनों ही ने जला दिया जाते जाते.’

अंतिम यात्रा के बाद फार्रुख नगर के डागर फार्म पर बड़े स्तर पर तेहेरवीं भी संपन्न हुई उस दिन बडी संख्या में लोग शामिल हुए, मैं भी वहां गया, पहली बार ही मैं इस इलाके में आया था, गुडगाँव वहीँ तक फैलता जा रहा है. निश्चित रूप से यहाँ सम्पति के दाम बहुत बढ़ते ही जायेंगे. डागर की कई अगली पीढियां घर बैठे मौज कर सकती हैं.

डागर ने अपनी संस्मरणात्मक किताब के लेखन के अंत में  स्वयं ही ये अंतिम शब्द लिखे थे –“अलविदा आनन्द” वही उसके जीवन की  कहानी का सबसे सटीक शीर्षक मुझे लगा, वही शीर्षक मैंने  कहानी को दिया है. ‘अलविदा आनन्द’ यही  मेरे मित्र को  मेरी हार्दिक श्रद्धांजलि है. देखो  भई डागर  मैंने तुम्हारी कहानी  तुम से ही सुन कर तुम्हारी पुस्तक से जान  कर ही लिखी है, मेरा इसमें कुछ नहीं है सब मसाला तुमने ही दिया है ‘त्वदीयं वस्तु आनन्द,  तुभ्यमेव समर्पये’ सो तुम्हारी दी वस्तु तुम्ही को समर्पित. अलविदा अलविदा.