Ek Pyar ki Adhuri Dastaa - 1 in Hindi Love Stories by Mukul Tiwari books and stories PDF | एक प्यार की अधूरी दास्तां - 1

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एक प्यार की अधूरी दास्तां - 1

एक प्यार की अधूरी कहानी / एक किराएदार ऐसा भी
लेखक: मुकुल तिवारी
                   (भाग संख्या - 1)
मैं आज श्वेत पन्नों पर जो कुछ भी उकेर रहा हूँ, वह महज़ शब्द नहीं हैं। यह मेरा संचित दर्द है, यह मेरी एक लंबी ख़ामोशी है, और मेरे भीतर का वह कोलाहल है जिसे मैं ताउम्रो किसी और को सुना न सका।
उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ जिले में बसा एक छोटा, शांत सा कस्बा था—इगलास। इसी कस्बे की तंग मगर आत्मीय गलियों के बीच विनय नाम का एक लड़का रहता था। विनय—अपने नाम की ही तरह शांत, गंभीर और बेहद ईमानदार। वह उन लड़कों में से नहीं था जो बेवजह चौराहों पर ठहाके लगाते या आवारागर्दी करते दिखें। एक कुलीन ब्राह्मण परिवार का वह अनुशासित बेटा था। पिता का साया सिर से जल्दी ही उठ गया था, इसलिए जिम्मेदारियों का एक अनकहा बोझ घर में हमेशा तैरता रहता। परिवार में पूजनीय माता जी, एक छोटी बहन और चार भाई थे। दो बड़े भाई परदेस में रहकर आजीविका कमाते थे, और दो भाई माँ के आंचल की छांव में घर पर ही रहते थे। विनय जितना सीधा और मर्यादित था, उससे छोटा भाई स्वभाव से उतना ही थोड़ा चंचल और बिगड़ा हुआ था। सबसे छोटी एक बहन थी, जो अभी अपनी पढ़ाई में व्यस्त रहती थी।
विनय की दुनिया बहुत महदूद थी। उसके गिने-चुने चार दोस्त थे, जिनके इर्द-गिर्द उसकी दिनचर्या घूमती थी। कभी तपती दोपहर में किसी खुले फील्ड में क्रिकेट का मैच जम जाता, तो कभी शाम ढले मंदिर के विशाल प्रांगण में खेलों का दौर चलता। दोपहर की तीखी धूप भी उनके उत्साह को कम नहीं कर पाती थी। दोस्तों की इस टोली में अमित और दीपक उसके दिल के सबसे करीब थे। इसी हंसते-खेलते और अल्हड़पन के माहौल में वक्त अपनी रफ्तार से गुजरता रहा और विनय कब लड़कपन की दहलीज़ लांघकर 17 साल का हो गया, उसे खुद भी पता न चला।
उस शाम का पहला स्पंदन: 18 जून 2017
तारीख शायद 18 जून 2017 रही होगी। जून की उमस भरी शाम के करीब 5 बज रहे थे। विनय अपने कमरे में खाट पर लेटा सुस्ता रहा था। तभी आंगन में कुछ अजनबी पदचाप और एक महिला की गंभीर आवाज गूंजी। वह महिला अपनी बेटी के साथ उनके घर आई थी और विनय की माता जी से किसी बात पर गंभीर चर्चा कर रही थी।
कौतूहलवश विनय अपने कमरे के परदे को हटाकर बाहर आया। जैसे ही उसने आंगन की तरफ देखा, उसकी नजरें वहीं ठहर गईं। वहां लाल रंग के बेहद खूबसूरत आकस्मिक सूट में एक लड़की बैठी थी। उसकी सादगी में एक गजब का आकर्षण था। वह महिला दरअसल विनय की माँ से मकान का एक कमरा किराये पर लेने के सिलसिले में बात करने आई थीं। विनय कुछ दूरी पर जाकर एक स्टूल पर बैठ गया और नजरें चुराकर उस लड़की को देखने लगा।
तभी उस लड़की ने भी नजरें उठाईं। दोनों की आंखें मिलीं। एक अजीब सा संकोच हवा में तैर गया। कभी विनय उसे देखकर पलकें झुका लेता, तो कभी वह लड़की शरमाकर अपनी ओढ़नी संभालने लगती। आंगन के उस छोटे से मौन में एक अनकही कहानी की शुरुआत हो चुकी थी।
कुछ देर बाद माता जी की स्नेहिल आवाज गूंजी, "लाला विनय! जा बेटा, लाली को ऊपर वाला रूम दिखा दे।"
विनय ने अपनी धड़कनों को संभाला और कहा, "जी मम्मी, अभी दिखाता हूँ।" फिर वह उस लड़की की तरफ मुड़ा और बेहद धीमे स्वर में बोला, "चलिए, आपको कमरा दिखा दूँ।"
दोनों सीढ़ियों की तरफ बढ़ गए। कमरे का दरवाजा खोलकर विनय ने अंदर प्रवेश किया और औपचारिकता निभाते हुए बोला, "देखिए, यही कमरा है। कैसा लगा आपको?"
लड़की ने कमरे की चारों दीवारों और खिड़की से आती हवा को महसूस किया और धीमे से मुस्कुराकर बोली, "अच्छा है।"
विनय के चेहरे पर एक अनजानी तसल्ली आ गई। उसने कहा, "ठीक है, चलिए फिर नीचे चलते हैं।"
जब दोनों वापस आंगन में आए, तो उस महिला ने अपनी बेटी को दुलारते हुए पूछा, "लाली मोनिका! कैसा लगा कमरा?"
मोनिका ने अपनी मां की तरफ देखा और कहा, "अच्छा है मम्मी जी, साफ-सुथरा है।"
(इधर, अपनी डायरी के पन्नों पर इस दास्तान को शब्द देते हुए लेखक मुकुल के चेहरे पर एक गहरी मुस्कान तैर जाती है, मोनिका का नाम आज भी दिल में वही हलचल पैदा करता है!)
कुछ देर की औपचारिक बातचीत के बाद मोनिका की मम्मी उठ खड़ी हुईं और विनय की माँ से बोलीं, "अच्छा बहन जी, अब हम चलते हैं। कल सुबह अपना सारा साजो-सामान लेकर आ जाएंगे।"
विनय की माँ ने सहृदयता से कहा, "ठीक है बेटा, आराम से आओ।"
जब मोनिका और उसकी माँ मुख्य द्वार की तरफ बढ़ने लगीं, तो कुछ कदम दूर जाकर मोनिका अचानक रुकी। उसने मुड़कर पीछे देखा। विनय वहीं खड़ा था। मोनिका की नजरें जैसे ही विनय से मिलीं, उसके अधरों पर एक बेहद हसीन और आत्मीय मुस्कान खिल उठी। विनय भी खुद को रोक नहीं पाया और मंद-मंद मुस्कुरा दिया। मोनिका ने लजाकर अपनी नजरें घुमाईं और वह अपनी मां के पीछे-पीछे गली में ओझल हो गई।
एक नया सफर और छत की वह पहली गुफ्तगू
अगले ही दिन, वादे के मुताबिक दोनों मां-बेटी अपना गृहस्थी का सामान लेकर विनय के घर पहुंच गईं। मुख्य द्वार से मोनिका की खनकती आवाज आई, "कोई है घर में?"
आवाज पहचानकर विनय तुरंत बाहर आया। उसने देखा कि सामान की कुछ पेटियां और बक्से बाहर रखे थे। विनय ने कहा, "अरे, आप लोग आ गए! मम्मी तो अभी किसी काम से बाहर गई हैं, वह घर पर नहीं हैं। आप एक काम कीजिए, अपना यह सारा सामान फिलहाल इस बाहर वाले कमरे में व्यवस्थित कर लीजिए।"
विनय ने आगे बढ़कर भारी सामान उठवाने में उनकी मदद की। जब सामान रख गया, तो वह मर्यादावश अपने कमरे में चला आया, जबकि मोनिका और उसकी मां अपने नए आशियाने को सजाने में व्यस्त हो गईं।
उसी शाम, जब दिन का उजाला मद्धम पड़ चुका था, विनय अपनी छोटी बहन नंदनी के साथ छत की मुंडेर पर बैठा ठंडी हवा के झोंके ले रहा था। तभी सीढ़ियों से पैरों की आहट हुई और मोनिका भी छत पर आ गई। वह सीधे नंदनी के पास गई और बड़ी आत्मीयता से उससे बातें करने लगी—उसका नाम, उसकी पढ़ाई और उसकी सहेलियों के बारे में पूछने लगी। थोड़ी ही देर में नंदनी मोनिका से घुल-मिल गई।
तभी नीचे से नंदनी के दोस्तों ने उसे आवाज दी। नंदनी चहकते हुए बोली, "भैया! मैं नीचे गली में खेलने जा रही हूँ।"
विनय ने सिर हिलाकर कहा, "ठीक है, जाओ, लेकिन जल्दी वापस आना।"
नंदनी के जाते ही छत पर एक सन्नाटा पसर गया। अब सिर्फ विनय था, मोनिका थी और डूबते सूरज की लालिमा। विनय ने हिचकिचाहट की बर्फ को तोड़ते हुए पूछा, "वैसे... तुम मूल रूप से कहां की रहने वाली हो?"
मोनिका ने आसमान की तरफ देखते हुए कहा, "मैं दिल्ली की रहने वाली हूँ, हमारा अपना घर वहीं है।"
विनय ने थोड़ा अचरज से पूछा, "अच्छा? तो फिर दिल्ली जैसी बड़ी जगह छोड़कर इस छोटे से इगलास कस्बे में कैसे आना हुआ?"
मोनिका के चेहरे पर एक उदासी की लकीर खिंच गई। उसने लंबी सांस लेकर कहा, "कुछ पारिवारिक बातें हैं... मम्मी और पापा के बीच कुछ अनबन हो गई थी, बहुत झगड़ा बढ़ गया था। इसलिए मम्मी परेशान होकर मुझे मेरी नानी के घर ले आईं। पर नानी के घर में जगह कम थी, कोई कमरा खाली नहीं था, इसीलिए हम आपके यहां किराए पर रहने चले आए।"
विनय ने उसकी आंखों में छिपे दर्द को पढ़ा और सांत्वना देते हुए बोला, "कोई बात नहीं। अब इसे ही अपना घर समझो। जब तक मन करे, बिल्कुल आराम से रहो यहां।"
मोनिका ने उस सहानुभूति के लिए विनय को धन्यवाद दिया और मुस्कुराकर पूछा, "वैसे, आपका पूरा नाम क्या है?"
विनय ने गर्व और शालीनता से कहा, "मेरा नाम विनय तिवारी है।"
"बहुत सुंदर नाम है!" मोनिका ने प्रशंसा की, "और आपकी पढ़ाई-लिखाई कहां तक हुई है?"
विनय ने बताया, "मैं अभी यहीं के स्कूल में 11वीं कक्षा का छात्र हूँ।"
मोनिका ने अपनी आँखों को सिकोड़ते हुए कहा, "अच्छा! मैंने तो दिल्ली में केवल 9वीं तक ही पढ़ाई की है। मेरे परिवार में कुल पांच लोग हैं—मैं, मेरी दो बड़ी बहनें जिनकी शादी हो चुकी है, और मेरे माता-पिता।"
दोनों के बीच बातों का सिलसिला ऐसा चल पड़ा कि आधा घंटा कैसे बीत गया, पता ही नहीं चला। दिल्ली की तड़क-भड़क और इगलास के सीधेपन के बीच एक अनकहा पुल बन रहा था। तभी नीचे से रसोई के बर्तनों की आवाज आई। मोनिका चौंककर उठी और बोली, "मुझे अब नीचे जाना चाहिए, शायद मम्मी रसोई में मुझे ढूंढ रही होंगी।" इतना कहकर वह सीढ़ियों से नीचे उतर गई।
ऋतु परिवर्तन और बदलता हुआ विनय
उस शाम छत पर हुई उस लंबी बातचीत ने दोनों के बीच के संकोच की दीवार को पूरी तरह ढहा दिया था। अब औपचारिकता की जगह एक सहज सखा-भाव ने ले ली थी। दिन अपनी गति से बीतने लगे। जून की वह चिलचिलाती, झुलसाती दोपहरियाँ अब धीरे-धीरे जुलाई की रिमझिम फुहारों और सोंधी मिट्टी की खुशबू में तब्दील होने लगी थीं। मोनिका और उसकी मां को इगलास आए अब लगभग एक महीना पूरा हो चुका था।
मोनिका का स्वभाव इतना मिलनसार और पवित्र था कि उसने बहुत जल्दी सबका दिल जीत लिया। वह सुबह-सवेरे विनय की मां के साथ रसोई और घर के कामों में हाथ बंटाने लगी थी, और छोटी नंदनी तो अब अपनी सहेलियों का साथ छोड़कर दिन-रात मोनिका के ही कमरे में डेरा डाले रहती थी।
लेकिन इस एक महीने के भीतर, सबसे बड़ा और खामोश बदलाव विनय के भीतर आया था। जो विनय पहले दोपहर की घंटी बजते ही अपने अजीज दोस्तों—अमित और दीपक के साथ मैच खेलने के लिए मैदान की तरफ भाग जाता था, अब वह अक्सर कोई न कोई झूठा बहाना बनाकर घर की चारदीवारी में ही रुकने लगा था। उसके पैर अब मैदान की तरफ नहीं बढ़ते थे। उसकी नजरें हर वक्त घर के सूने आंगन, सीढ़ियों और रसोई के चक्कर काटती रहती थीं कि कहीं से मोनिका का एक दीदार हो जाए।
एक दोपहर, बाहर सूरज आग उगल रहा था। अमित और दीपक पसीने से लथपथ विनय के दरवाजे पर आए और चिल्लाए, "अरे विनय! चल यार, देर हो रही है। आज मंदिर वाले मैदान पर बड़ा मैच है, तेरी बल्लेबाजी की जरूरत है।"
विनय ने अपने कमरे के अंदर से ही एक सुस्त आवाज निकाली, "नहीं भाई, आज तुम लोग जाओ। मेरी तबीयत कुछ नासाज है, सिर में बहुत तेज दर्द है।"
बाहर खड़े दोस्त निराश होकर लौट गए।
लेकिन विनय यह नहीं जानता था कि कमरे की खिड़की के परदे के पीछे खड़ी मोनिका यह सारा नजारा देख रही थी और मंद-मंद मुस्कुरा रही थी। दोस्तों के जाते ही वह दबे पांव विनय के कमरे के चौखट पर आकर खड़ी हो गई। उसने अपनी कमर पर हाथ रखा और शरारत से आंखें चमकाकर बोली, "झूठ बोलना कब से सीख गए तिवारी जी? लोग तो कहते थे कि आप बहुत सीधे और सच्चे हैं!"
विनय अचानक मोनिका को अपने सामने देखकर सकपका गया। आज मोनिका ने गहरे हरे रंग का सूट पहना था, और उसके भीगे बालों की एक आवारा लट बार-बार हवा के झोंके से उसके गोरे गालों को चूम रही थी। विनय का दिल किसी नगाड़े की तरह तेज़ी से धड़कने लगा। वह नजरें चुराते हुए हड़बड़ाहट में बोला, "नहीं... वह... सचमुच... बाहर धूप बहुत तेज है ना, इसलिए बस जाने का मन नहीं था।"
मोनिका ने उसकी इस घबराहट पर एक मधुर ठहाका लगाया और बोली, "अच्छा बाबा, मान लिया आपका झूठ! वैसे, मैं दिल्ली से अपनी 9वीं कक्षा की कुछ पुरानी किताबें साथ लाई हूँ। गणित के कुछ सवाल मुझे बिल्कुल समझ नहीं आ रहे। क्या आप मेरी थोड़ी मदद कर देंगे? मैंने आपकी मम्मी से सुना है कि आप पढ़ाई में बहुत होशियार हैं।"
विनय को तो जैसे मुंह मांगी मुराद मिल गई। उसने तुरंत हामी भरते हुए कहा, "हाँ-हाँ, क्यों नहीं! यह भी कोई पूछने की बात है? शाम को जब मौसम थोड़ा ठंडा हो जाए, तो किताबें लेकर छत पर आ जाना, वहीं बैठकर सब देख लेंगे।"
किताबों की आड़ में पनपता अहसास
अब यह उनकी दिनचर्या का एक खूबसूरत हिस्सा बन चुका था। हर रोज शाम को दोनों छत की मुंडेर के पास चटाई बिछाकर बैठ जाते। कहने को तो सामने गणित और विज्ञान की किताबें खुली होती थीं, लेकिन किताबों के पन्नों से ज्यादा उनकी नजरें एक-दूसरे के चेहरों को पढ़ती थीं। पढ़ाई तो महज एक बहाना थी, असल में वहां बातों का एक अंतहीन दरिया बहता था।
विनय मोनिका को इगलास के प्रसिद्ध बुढ़िया के मेले, वहां की तंग गलियों की कहानियां और यहां की मशहूर चमचम और मिठाइयों के किस्से बड़े चाव से सुनाता। बदले में मोनिका उसे दिल्ली की तेज रफ्तार जिंदगी, अंडरग्राउंड मेट्रो का सफर, चांदनी चौक की तीखी चाट और आसमान छूती बड़ी-बड़ी इमारतों की जादुई दुनिया की कहानियां सुनाती। दोनों एक-दूसरे की दुनिया में खो जाते।
एक शाम, मौसम ने अजीब करवट ली। आसमान में काले बादलों का डेरा था और हल्की-हल्की बूंदें गिरने लगी थीं। ठंडी हवाएं तन-मन को छू रही थीं। नंदनी नीचे मां के पास रसोई में थी, इसलिए छत के उस एकांत में सिर्फ विनय और मोनिका थे।
बातें करते-करते अचानक मोनिका चुप हो गई। हवा में एक अजीब सी गंभीरता घुल गई। उसने अपनी बड़ी-बड़ी, गहरी आँखों से विनय की आँखों में सीधे झांका और बेहद भारी आवाज में पूछा, "विनय... अगर एक दिन मेरी मम्मी का गुस्सा शांत हो गया, या पापा हमें बुलाने आ गए... और मुझे अचानक हमेशा के लिए दिल्ली वापस जाना पड़ा... तो क्या तुम मुझे याद करोगे?"
यह सवाल सुनते ही विनय का दिल जैसे एक पल के लिए धड़कना भूल गया। उसके सीने में एक अजीब सी टीस उठी। उसने मोनिका की उदास, सजल आँखों में देखा, जहाँ एक अजीब सी मासूमियत, खौफ और बेपनाह अपनापन साफ झलक रहा था। विनय के पास इस वज्रपात जैसे सवाल का शब्दों में कोई जवाब नहीं था। उसका गला सूख गया था। लेकिन उसकी वह मुकम्मल खामोशी, उसकी थमी हुई सांसें और मोनिका की तरफ देखने का वह तड़प भरा अंदाज़ सब कुछ बयाँ कर रहा था कि वह मोनिका के बिना अपनी जिंदगी की कल्पना भी नहीं कर सकता था।
तभी नीचे के आंगन से मोनिका की मां की कर्कश आवाज गूँजी, "लाली मोनिका! नीचे आजा बेटी, शाम ढल गई है, अंधेरा हो रहा है।"
मोनिका जाने के लिए मुड़ी, लेकिन इस बार उसने हमेशा की तरह मुड़कर कोई चुलबुली मुस्कान नहीं बिखेरी। उसकी आँखों में एक गहरा, बोझिल अहसास था जो विनय के दिल के आर-पार हो गया था। उस शाम, जब मोनिका सीढ़ियों से नीचे उतरी, तो विनय वहीं खड़ा रह गया। उसे समझ आ गया था कि जिसे वह अब तक महज एक अच्छी दोस्ती समझ रहा था, वह वास्तव में प्रेम का पहला और गहरा अहसास था... उसे मोनिका से बेपनाह प्यार हो गया था।
अब स्थिति यह थी कि विनय जब भी मोनिका को देखता, उसकी दुनिया जैसे एक बिंदु पर थम सी जाती। मोनिका की आँखों की वह मासूमियत विनय के अशांत दिल में एक अजीब सा रूहानी सुकून भर देती थी। वह अक्सर रातों को करवटें बदलते हुए इसी सोच में डूबा रहता कि वह एक अदना सा लड़का, कैसे अपने दिल के इस विशाल जज़्बात को मोनिका तक पहुँचाए। क्या वह उसका प्रस्ताव स्वीकार करेगी या हमेशा के लिए दूर चली जाएगी?
अनुष्का का आगमन और प्रेम का गुप्त दूत
कुछ दिनों बाद, विनय के पड़ोस वाले हिस्से में एक नया परिवार किरायेदार बनकर रहने आया। वह मकान पुराना था और कभी विनय के दादाजी के समय उनके ही परिवार से जुड़ा हुआ था। नए किरायेदार एक अत्यंत सम्मानीय पंडित जी का परिवार थे। उस परिवार में एक बहुत ही चुलबुली, हंसमुख और प्यारी सी लड़की थी, जिसका नाम अनुष्का था।
चूँकि दोनों परिवार एक ही सनातनी पृष्ठभूमि से थे और दीवारें आपस में सटी हुई थीं, इसलिए धीरे-धीरे दोनों घरों के बीच आना-जाना और बातचीत बढ़ने लगी। देखते ही देखते अनुष्का की मम्मी और विनय की मम्मी के बीच एक सहेली जैसा गहरा रिश्ता बन गया। दोनों दोपहर में बैठकर सुख-दुख साझा करती थीं।
माहौल इतना मधुर और पारिवारिक हो गया था कि अनुष्का विनय को बड़े आदर से 'विनय भैया' कहकर पुकारने लगी। विनय के दिल में भी अनुष्का के लिए एक सगे भाई जैसा पवित्र स्नेह और सम्मान उमड़ आया। वह उसे अपनी छोटी बहन नंदनी की तरह ही मानता था और उसकी हर छोटी-बड़ी जरूरत का ख्याल रखता था। अनुष्का का विनय के घर में बेधड़क आना-जाना रोज का काम था। वह सचमुच विनय को अपना रक्षक और भाई मानती थी और अपने कॉलेज की हर छोटी-बड़ी बात उससे शेयर करती थी।
एक शाम, जब सूरज ढल चुका था, अनुष्का विनय के कमरे में अपनी कॉलेज की कोई जरूरी प्रोजेक्ट फाइल ढूंढने आई। उसने देखा कि विनय अपनी मेज पर झुका हुआ, एक पुरानी डायरी में कुछ लिख रहा था और लिखते-लिखते उसके चेहरे पर एक अजीब सी, रसीली मुस्कान खेल रही थी।
अनुष्का ने दबे पांव पीछे जाकर देखा और शरारत से चुटकी लेते हुए बोली, "अरे वाह विनय भैया! आजकल कौन सी ख्याली किताबों और शायरी में खोए रहते हो? जरा हमें भी तो बताओ, हमारी होने वाली प्यारी भाभी कौन हैं? किसका जादू चल गया है आप पर?"
विनय अचानक अनुष्का की आवाज सुनकर बुरी तरह सकपका गया। उसने झट से अपनी डायरी बंद की और उसे तकिये के नीचे छुपाने लगा। शर्म और पकड़े जाने के डर से उसका पूरा चेहरा टमाटर की तरह लाल हो गया था। अनुष्का की इस चुलबुली बात ने विनय को अंदर तक झकझोर दिया। उसे अहसास हुआ कि दिल के इस बवंडर को अब वह अकेले ज्यादा दिनों तक छुपा कर नहीं रख पाएगा। उसने मन ही मन एक फैसला किया। उसने सोचा कि अनुष्का की मदद ली जाए, क्योंकि एक लड़की ही दूसरी लड़की के दिल के गुप्त कोनों को और उसकी भाषा को बेहतर ढंग से समझ सकती है।
विनय ने एक गहरी, लंबी साँस ली, अपनी घबराहट को समेटा और बेहद संजीदगी से पूछा, "अनुष्का... एक बात बताओगी? सच-सच बताना।"
अनुष्का ने उत्सुकता से अपनी आँखें बड़ी कीं, "हाँ भैया, पूछो ना।"
"अगर... अगर किसी लड़के को कोई लड़की बहुत ज्यादा पसंद आती हो... वह उससे प्यार करता हो, तो उसे इस बात का इजहार कैसे करना चाहिए? लड़कियां क्या पसंद करती हैं?" विनय ने पूछा।
अनुष्का की आँखें खुशी और उत्साह से चमक उठीं। उसने ताली बजाते हुए कहा, "ओहो! तो मेरा तीर बिल्कुल निशाने पर लगा था। भैया, पहले उनका नाम तो बताओ! कौन है वह खुशनसीब?"
विनय ने अपनी नजरें झुका लीं और बेहद धीमे, कांपते होठों से कहा, "मोनिका..."
अनुष्का के चेहरे पर एक बड़ी सी मुस्कान फैल गई, "मोनिका जी! अरे वाह भैया, पसंद तो आपकी लाजवाब है। सही है विनय भैया, बिल्कुल परफेक्ट जोड़ी है! अच्छा बताओ, अभी कहाँ पर हैं हमारी मोनिका जी? मैं अभी जाकर उनसे आपके दिल की वकालत करती हूँ।"
विनय ने इशारे से कहा, "वह शायद अपने कमरे में कपड़े तय कर रही होगी।"
अनुष्का बिना एक पल गंवाए, हवा के झोंके की तरह मोनिका के कमरे की तरफ दौड़ गई। वहां जाकर दोनों लड़कियां बैठ गईं और न जाने क्या-क्या गुप्त गुफ्तगू करने लगीं। विनय अपने कमरे में बैठा अपनी उंगलियां चटका रहा था और उसका दिल किसी घड़ी के पेंडुलम की तरह डोल रहा था।
तभी करीब बीस मिनट बाद अनुष्का वापस लौटी। उसके हाथ में सफेद कागज का एक मुड़ा हुआ पुर्जा (लेटर) था। उसने विनय की तरफ रहस्यमयी मुस्कान के साथ उसे बढ़ाते हुए कहा, "यह लीजिए भैया, यह मोनिका जीजी ने विशेष रूप से आपके लिए भेजा है।"
विनय के हाथ कांप रहे थे। उसने धड़कते दिल से उस लेटर की तह को खोला। उसमें नीली स्याही से, बेहद खूबसूरत लिखावट में लिखा था:
"मैं भी आपको बहुत पसंद करने लगी हूँ, विनय। मुझे खुद पता नहीं चला कि कब मुझे आपसे बेपनाह प्यार होने लगा है। आई लव यू, विनय।"
उस पत्र की एक-एक पंक्ति को पढ़ने के बाद विनय की खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा। वह पागलों की तरह अपने कमरे में ही उछलने-कूदने लगा। उसका रोम-रोम बल्लियों उछल रहा था। जिस लड़की के ख्यालों में वह दिन-रात गलता था, उसने खुद सामने से अपने प्रेम का इकरार कर लिया था। और वह मन ही मन मुस्कुराया—करती भी क्यों नहीं, विनय आखिर था ही इतना शालीन और स्मार्ट!
अब विनय के भीतर का प्रेमी जाग चुका था। उसने तुरंत अपनी मेज से एक कोरा कागज उठाया और पेन से अपने दिल के जज्बात लिख डाले:
"मैंने तो तुम्हें उसी पहले दिन, उस लाल सूट में देखते ही अपना दिल दे दिया था मोनिका। बस मेरे भीतर इतनी हिम्मत नहीं थी कि बोल पाता। आज तुमने पहल कर दी, मेरी जिंदगी मुकम्मल हो गई। मैं बहुत खुश हूँ। इस वक्त मेरा मन कर रहा है कि दौड़कर आऊं और तुम्हें अपनी बाहों में भींच लूँ, तुम्हें गले लगा लूँ।"
पत्र को मोड़ने के बाद उसने बाहर आंगन की तरफ आवाज दी, "अनुष्का! जरा इधर आना।"
अनुष्का जैसे ही कमरे में आई, विनय ने वह पत्र उसके हाथ में थमाते हुए कहा, "यह पत्र तुरंत जाकर मोनिका को दे दो।"
अनुष्का एक बार फिर प्रेम की डाकिया बनकर मोनिका के कमरे में पहुंची। मोनिका ने जैसे ही विनय का वह संदेश पढ़ा, उसकी आंखों में खुशी के आंसू आ गए और वह शरमाकर अपने होठों को चबाने लगी। फिर कुछ सोचकर उसने उसी कागज के पीछे एक छोटी सी लाइन लिखी और अनुष्का को थमा दी।
अनुष्का विनय के कमरे में आई, वह पुर्जा उसकी तरफ उछाला और हंसते हुए बोली, "ये लो भैया आखिरी चिट्ठी! अब मैं अपने घर जा रही हूँ, मम्मी बुला रही हैं। मुझे बीच में मत घसीटना अब।"
विनय ने कहा, "ठीक है, बहुत-बहुत धन्यवाद तेरी इस मदद का, तू जा।"
विनय ने उत्सुकता से उस कागज को पलटा। उस पर मोनिका की लिखावट में एक शरारती और आमंत्रण भरी पंक्ति लिखी थी:
"तो फिर लगा लो ना गले... अब किसका इंतज़ार कर रहे हो?"
मिलन के वे प्रथम स्पंदन
यह पढ़ना था कि विनय के भीतर का सारा संयम जैसे बह गया। वह अभी उस पत्र को चूम ही रहा था कि अचानक उसके कमरे का परदा हटा और मोनिका खुद अंदर दाखिल हो गई। कमरे में एक सन्नाटा छा गया, लेकिन वह सन्नाटा भावनाओं से भारी था।
दोनों एक-दूसरे की आँखों में झांक रहे थे। दूरी धीरे-धीरे सिमटने लगी। कदमों की आहट के साथ दोनों के जिस्म एक-दूसरे के बेहद करीब आ गए। विनय ने बिना एक पल गंवाए, आगे बढ़कर मोनिका की पतली कमर पर अपने दोनों हाथ टिकाए और उसे पूरी शिद्दत से अपनी छाती से सटा लिया, उसे गले लगा लिया।
जैसे ही दोनों के शरीर का स्पर्श हुआ, विनय के पूरे वजूद में मानो बिजली का एक तेज, कौंधता हुआ झटका लगा। एक ऐसा रूहानी अहसास जो उसने जिंदगी में पहले कभी महसूस नहीं किया था। उसने अपनी पकड़ और मजबूत कर ली, जैसे वह मोनिका को खुद में विलीन कर लेना चाहता हो। मोनिका ने भी अपनी आंखें बंद कर ली थीं और अपना सिर उसकी मजबूत छाती पर टिका दिया था। समय जैसे उस कमरे में थम गया था। दोनों लगभग आधे घंटे तक उसी आलिंगन में बंधे रहे, जहां सांसें एक-दूसरे से गुफ्तगू कर रही थीं। फिर धीरे-धीरे, स्वाभाविक रूप से उनके होंठ एक-दूसरे के करीब आए और वे एक-दूसरे को चूमने लगे—एक अत्यंत पवित्र, निष्पाप प्रेम का चुंबन।
तभी अचानक इस सम्मोहन को तोड़ते हुए बाहर के मुख्य दरवाजे पर एक तेज दस्तक हुई—खट-खट-खट!
दोनों झटके से अलग हुए। दोनों की सांसें फूल रही थीं। विनय ने अपने कपड़े ठीक किए और पूछा, "कौन है बाहर?"
बाहर से एक जानी-पहचानी, कर्कश आवाज आई, "अरे मैं हूँ बे! गेट खोल जल्दी।"
विनय ने मोनिका की तरफ देखा और घबराए स्वर में कहा, "तुम चुपके से पीछे के रास्ते से अपने कमरे में चली जाओ, जल्दी।" मोनिका मुस्कुराती हुई वहां से निकल गई।
विनय ने जाकर जैसे ही मुख्य दरवाजा खोला, सामने उसका लंगोटिया और परम कमीना दोस्त अमित खड़ा था। अमित ने अपनी उंगली से बैट घुमाते हुए कहा, "चल बे तिवारी! आजा, मैदान पर सब आ गए हैं, मैच खेलेंगे।"
विनय ने चिढ़कर और अपना हाथ माथे पर मारते हुए कहा, "अरे यार तू भी ना! किस वक्त आ जाता है। चल, तू जा, मैं थोड़ी देर बाद आता हूँ।"
अमित ने अपनी आंखें छोटी कीं और शक के दायरे से पूछा, "क्यों बे? अभी ऐसा क्या तीर मार रहा है घर में? क्या कर रहा है अभी?"
विनय ने इधर-उधर देखा और अमित के कान के पास जाकर इशारों-इशारों में बात समझा दी कि अंदर मामला कुछ और चल रहा है।
अमित के चेहरे पर एक कुटिल और कमीनी मुस्कान तैर गई। उसने विनय के कंधे पर थपकी दी और हंसते हुए बोला, "अच्छा बेटा! यह बात है? ठीक है, लगा रह, लगा रह! जल्दी अपना काम ख़त्म करके मैदान पर आना मेरे पास, समझे? ऑल द बेस्ट!"
विनय ने राहत की सांस ली, "ठीक है यार, आता हूँ, तू अब कट ले यहाँ से।"
अमित खिलखिलाकर हंसता हुआ गली में आगे बढ़ गया।
विनय ने मुख्य दरवाज़ा बंद किया और वापस अपने कमरे में आ गया। अभी वह बिस्तर पर बैठा ही था कि मोनिका फिर से दबे पांव उसके कमरे में आ पहुंची। अब उनके बीच का डर पूरी तरह खत्म हो चुका था। दोनों बेड पर बैठ गए और बातों का ऐसा अंतहीन सिलसिला शुरू हुआ कि दोपहर की धूप कब मद्धम हुई और कब शाम ने इगलास कस्बे को अपने आगोश में ले लिया, उन्हें समय का भान ही नहीं रहा।
साज़िश, छत की रात और तारों का शहर
रात को पूरे परिवार ने आंगन में बैठकर एक साथ भोजन किया। जब सब सोने के लिए अपने-अपने कमरों की तरफ बढ़ने लगे, तो विनय ने अपनी योजना के अनुसार एक मासूम सा चेहरा बनाया और अपनी मम्मी से कहा, "मम्मी! मेरे कमरे का छत वाला पंखा पता नहीं क्यों अचानक खराब हो गया है, बहुत भयंकर गर्मी और उमस है अंदर। इसलिए मैं आज रात अपनी चादर लेकर छत पर सोने जा रहा हूँ।"
मम्मी ने अचरज से उसकी तरफ देखा और पूछा, "अरे! अभी शाम को तो भला-चंगा चल रहा था, हवा दे रहा था। अचानक क्या हुआ उसे?"
विनय ने दुनिया भर की मासूमियत अपने चेहरे पर बटोरी और बोला, "अब मुझे क्या पता मम्मी, मशीन ही तो है, अचानक खट-खट आवाज हुई और बंद हो गया। चल ही नहीं रहा।"
...भोली माँ क्या जानती थीं कि वह पंखा किसी तकनीकी खराबी की वजह से नहीं, बल्कि विनय के शातिर दिमाग की एक आशिकाना साज़िश थी! उसने खुद शाम को उसकी ताड़ हिला दी थी ताकि उसे छत पर खुले आसमान के नीचे सोने का एक सुनहरा बहाना मिल सके। खैर, अपनी योजना को शत-प्रतिशत सफल होते देख विनय मन ही मन मुस्कुराता हुआ अपनी चादर और तकिया लेकर छत की तरफ भाग गया।
रात के करीब बारह-एक बजे का समय रहा होगा। पूरे कस्बे की लाइटें बुझ चुकी थीं और चारों तरफ एक गहरा सन्नाटा पसर गया था। तभी सीढ़ियों पर चूड़ियों की हल्की सी खनक हुई और मोनिका दबे पाँव, चुपचाप काली परछाई की तरह छत पर आ गई। उसने देखा कि मद्धम चांदनी में विनय अभी तक सोया नहीं है, बल्कि अपनी आँखें मूँदे, किसी खास पदचाप का इंतजार कर रहा है। वह उसके ठीक पास जाकर बैठ गई और हौले से फुसफुसाई, "अरे! तुम अभी तक सोए नहीं?"
विनय ने झटके से अपनी आँखें खोलीं, उसके चेहरे पर एक रूहानी मुस्कान आई और उसने मोनिका का हाथ थामते हुए कहा, "भला मुझे नींद कैसे आ सकती थी? मैं तुम्हारा ही तो बेताबी से इंतजार कर रहा था कि तुम कब आओगी। आख़िर तुम्हारे हुस्न के दीदार के लिए ही तो मैंने अपने कमरे का भला-चंगा पंखा खुद खराब किया था!"
यह सुनते ही मोनिका लज्जा से दोहरी हो गई। उसने विनय की छाती पर हल्की सी चपत मारी और प्यार भरे उलाहने से बोली, "अच्छा जी! इतनी बड़ी साज़िश रचते हो हमारे लिए? बड़े शातिर हो गए हो!"
इसके बाद, दोनों मुंडेर के पास लेट गए और काले आसमान में चमकते हुए दूधिया चाँद और टिमटिमाते तारों को निहारते हुए मीठी-मीठी बातें करने लगे। माहौल में एक अजीब सा नशा था। बातों-बातों में विनय का दिल हिलोरे लेने लगा और वह बेहद सुरीली मगर धीमी आवाज में गुनगुनाने लगा:
"आओ ले चलें तुम्हें तारों के शहर में...
धरती पर ये दुनिया हमें प्यार ना करने देगी..."
रात की उस मखमली, ठंडी हवा के झोंकों, मौन वादियों और विनय के इस रूमानी गाने के बीच, बातें करते-करते कब विनय की आँख लग गई और वह गहरी नींद के आगोश में चला गया, उसे खुद पता नहीं चला। जब मोनिका ने देखा कि विनय सो चुका है, तो उसने प्यार से उसके माथे को चूमा और चुपके से नीचे आकर अपने कमरे में सो गई।
सुबह की धूप और आँगन की नोक-झोंक
अगली सुबह जब विनय की तंद्रा टूटी, तो सूरज की तीखी किरणें उसके चेहरे पर पड़ रही थीं। उसने घड़ी देखी—सुबह के आठ बज रहे थे। वह झटपट बिस्तर से उठा, अपनी चादर समेटी और नीचे आया। नीचे का नजारा हमेशा की तरह आत्मीय था; उसकी मम्मी रसोई में चूल्हा जलाकर गरमा-गरम चाय बना रही थीं, जिसकी सोंधी खुशबू पूरे घर में फैली थी।
विनय ने हाथ-मुँह धोया और आंगन में बिछी सूत की खाट पर पैर लटकाकर बैठ गया। मम्मी ने मातृत्व भरे स्नेह से उसके हाथ में चाय का मिट्टी का कुल्हड़ थमाया और फिर रसोई की तरफ रुख करके आवाज लगाई, "अरे लाली मोनिका!—(जिसे विनय की मम्मी प्यार से 'मोना' कहकर बुलाती थीं)—मोना आजा बेटी, चाय तैयार है, पी ले।"
तभी बगल के कमरे से मोनिका की मधुर आवाज आई, "बस दो मिनट में आ रही हूँ आंटी!"
मोनिका जैसे ही रसोई में आई, आंटी ने उसके हाथ में भी चाय का गर्म गिलास थमा दिया। वह चाय लेकर सीधी आंगन में आई और बिना किसी हिचकिचाहट के विनय के पास खाट पर ही बैठ गई। जैसे ही मम्मी की पीठ घूमी, मोनिका ने दबी आवाज में विनय के कान के पास फुसफुसाकर पूछा, "कहो तिवारी जी, रात को नींद कैसी आई छत पर?"
विनय ने चाय की चुस्की लेते हुए शरारत से मुस्कुराकर कहा, "बहुत ही लाजवाब और जन्नत जैसी नींद आई।"
पास ही खड़ी मम्मी के कान में कुछ फुसफुसाहट की भनक पड़ी, तो उन्होंने चौंककर पूछा, "क्या कहा बेटा? क्या बात हो रही है?"
विनय ने तुरंत बात को संभालते हुए ऊंचे स्वर में कहा, "कुछ नहीं मम्मी! मैं तो बस यह कह रहा था कि आज तुम्हारे हाथ की चाय बहुत ही स्वादिष्ट और कड़क बनी है, मजा आ गया।" यह सुनकर माँ के चेहरे पर एक आत्मसंतोष की मुस्कान आ गई। थोड़ी देर बाद मोनिका अपनी चाय खत्म कर बर्तनों को रखने अपने कमरे में चली गई और विनय भी तौलिया लेकर नहाने-धोने की तैयारी में लग गया।
कुछ घंटे बीते। दोपहर होते-होते विनय की मम्मी और मोनिका की मम्मी, दोनों किसी जरूरी सामाजिक और घरेलू काम के सिलसिले में बाजार की तरफ निकल गईं। विनय की छोटी बहन नंदनी और छोटा भाई भी अपनी पढ़ाई के लिए ट्यूशन चले गए थे। अब उस विशाल, शांत घर में सिर्फ मोनिका ही अकेली बची थी, जो फुर्सत पाकर अपने कपड़े धोने और घर की सफाई में व्यस्त हो गई थी।
थोड़ी देर में विनय भी बाहर दोस्तों के पास से घूमकर वापस लौटा। उसने देखा कि घर में सन्नाटा है। वह सीधे अपने कमरे में चला गया और खाट पर लेटकर कोई किताब पलटने लगा। तभी मोनिका छत पर गीले कपड़े सुखाकर नीचे उतरी। उसने पूरे घर में पसरे सन्नाटे को भांपकर आवाज लगाई, "कोई है क्या अन्दर?"
विनय ने अपने कमरे के भीतर से ही आवाज दी, "हाँ, मैं हूँ यहाँ कमरे में, विनय।"
मोनिका ने बाहर आंगन से ही कहा, "अच्छा, तुम अन्दर ही रहना, बाहर मत आना। मैं बस अभी नहाने जा रही हूँ।"
विनय ने वहीं से शरारती लहजे में जवाब दिया, "ठीक है, बिल्कुल निश्चिंत होकर नहा लो, मैं पहरेदारी कर रहा हूँ।"
श्वेत सूट में लिपटी अप्सरा और वर्जित सीमाएं
कुछ देर बाद मोनिका स्नान करके बाहर आई। आज उसने सफेद रंग का एक बेहद खूबसूरत चिकनकारी सूट और चूड़ीदार पजामी पहन रखी थी। वह बालकनी के पास, धूप की मद्धम किरणों के बीच खड़ी होकर अपने लंबे, काले और भीगे बालों को झटककर सुखा रही थी। पानी की कुछ बूंदें उसके चेहरे से टपक रही थीं।
ठीक उसी वक्त विनय को तेज प्यास लगी और वह पानी पीने के लिए अपने कमरे से बाहर निकला। जैसे ही उसकी नज़र बालकनी पर खड़ी मोनिका पर पड़ी, वह जहां का तहां जड़ हो गया। उसके हाथ से पानी का लोटा छूटते-छूटते बचा। सफेद रंग के उस लिबास में, खुले भीगे बालों के साथ मोनिका बला की खूबसूरत, किसी स्वर्ग से उतरी अप्सरा जैसी लग रही थी। विनय पानी का घूंट भरते हुए खुद पर काबू नहीं रख पाया और उसके मुंह से निकला, "सच में... आज तो तुम हद से ज्यादा सुन्दर लग रही हो मोनिका!"
यह अप्रत्याशित तारीफ सुनते ही मोनिका के गोरे गालों पर शर्म की एक गहरी लाली छा गई। उसने अपनी नजरें झुका लीं और बेहद धीमे से कहा, "धन्यवाद!" और मुस्कुराती हुई झटके से अपने कमरे के अन्दर चली गई और दरवाजा बंद कर लिया।
कुछ देर बाद, जब घड़ी की सुइयां दोपहर के 12 बजा चुकी थीं, मोनिका के कमरे का दरवाजा खुला। वह बाहर आई, उसने विनय की तरफ देखा जो कमरे में बैठा किताब पढ़ने का नाटक कर रहा था। मोनिका ने पूछा, "खाना खा लिया तुमने?"
विनय ने किताब से नजरें हटाए बिना, थोड़ा सा मुंह बनाकर कहा, "नहीं, अभी कहाँ खाया है।"
"तो फिर कब खाओगे? दोपहर के 12 बज चुके हैं, पेट में चूहे नहीं कूद रहे?" मोनिका ने हल्के से डांटते हुए कहा।
वह तुरंत रसोई में गई और दो पीतल की थालियों में गरमा-गरम भोजन परोस लाई। एक थाली विनय की तरफ बढ़ाते हुए बड़ी आत्मीयता से बोली, "लो, अब ज्यादा नखरे मत करो, खा लो।"
दोनों आंगन में एक साथ बैठकर खाना खाने लगे। विनय ने जैसे ही पहला निवाला मुंह में लिया, उसकी आंखें फैल गईं। उसने तारीफ करते हुए कहा, "वाह! खाना तो सचमुच बहुत ही स्वादिष्ट बना है। किसने बनाया है इसे?"
मोनिका ने अपनी ठुड्डी पर उंगली रखकर मुस्कुराते हुए कहा, "तुम्हारी इस दासी ने ही बनाया है जनाब!"
विनय ने सहर्ष सिर हिलाया, "बहुत बढ़िया! तुम तो सर्वगुण संपन्न हो।"
अभी दोनों की यह रसमयी बातचीत चल ही रही थी कि अचानक वहां पड़ोस से अनुष्का आ धमकी। उन दोनों को एक साथ, एक ही खाट पर बैठकर खाना खाते और बतियाते देखकर उसने तुरंत अपनी कमर पर हाथ रखा और चुटकी लेते हुए बोली, "अरे वाह! सही है भाई, दोनों प्रेमी-प्रेमिका साथ बैठकर गप्पें मार रहे हो, दुनिया से कोई मतलब नहीं। हमें तो अब इस घर में कौन ही याद करेगा! हम तो पराये हो गए।"
मोनिका खिलखिलाकर हंस पड़ी और उसका हाथ खींचते हुए बोली, "अरे नहीं बाबा, ऐसा कुछ नहीं है, आ जाओ तुम भी हमारे साथ बैठो।" इसके बाद दोनों लड़कियां हाथ पकड़कर अंदर कमरे में चली गईं और अपनी सहेली वाली बातें करने लगीं, और विनय वापस अपने कमरे में जाकर किताब के पन्नों में खो गया।
कुछ देर बाद...
अनुष्का अपने घर लौट चुकी थी। घर में फिर से वही एकांत पसर गया था। मोनिका ने बाहर का मुख्य लकड़ी का दरवाजा बंद किया, कुंडी चढ़ाई और सीधे विनय के कमरे में आ गई। वह बिना किसी संकोच के विनय के ठीक पास, बेड पर बैठ गई। उसने विनय के कंधे को हिलाते हुए पूछा, "और बताओ तिवारी जी, क्या चल रहा है दिमाग में?"
विनय ने एक गहरी, अधूरी सांस ली, "कुछ नहीं यार, आज पता नहीं क्यों किसी काम में मन नहीं लग रहा था, तो सोचा टाइमपास के लिए कोई कहानी की किताब ही पढ़ लूं।"
"पर तुम्हारा मन क्यों नहीं लग रहा? कोई परेशानी है क्या?" मोनिका ने उत्सुकता और चिंता से पूछा।
"बस, ऐसे ही... कोई खास वजह नहीं है, तुम सामने नहीं थी शायद इसलिए," विनय ने बात को एक रूमानी मोड़ देना चाहा।
मोनिका ने मुस्कुराकर बात आगे बढ़ाई, "अच्छा! और बताओ?"
विनय ने मोनिका के उस सफेद सूट और उसकी मादक आंखों को गौर से देखा। उसके भीतर की उत्तेजना और शरारत जाग उठी थी। वह थोड़ा और करीब खिसक आया और शरारती लहजे में बोला, "आज तुम कुछ ज्यादा ही कातिलाना लग रही हो... सच कहूँ तो, मेरा कुछ... कुछ करने का मन कर रहा है।"
मोनिका ने अपनी भौंहें सिकोड़ीं और उसकी नीयत को भांपते हुए पूछा, "अच्छा? और क्या करने का मन कर रहा है तुम्हारा, जरा साफ-साफ बताओ?"
"अब तुम इतनी समझदार हो, खुद ही समझ जाओ ना... सब कुछ शब्दों में कहना जरूरी है क्या?" विनय मंद-मंद मुस्कुराया।
मोनिका ने तुरंत उसके बढ़ते कदमों को टोकते हुए, बेहद गंभीर होकर कहा, "देखो विनय! कोई उल्टा-सीधा दिमाग मत चलाना, अपनी मर्यादा में रहना। वैसे भी मैं अपनी कुछ शारीरिक दिक्कतों से परेशान हूं, आज ही मेरे पीरियड्स शुरू हो गए हैं, पेट में बहुत दर्द है।"
यह अनपेक्षित बात सुनकर विनय के मुंह से अचानक निकला, "अच्छा है।"
मोनिका यह सुनकर चिढ़ गई, उसने विनय को धक्का दिया और बोली, "इसमें क्या अच्छा है भाई? मैं यहाँ दर्द से इतनी परेशान हूँ, चिड़चिड़ी हो रही हूँ और तुम्हें इसमें भी मज़ाक सूझ रहा है! लड़के सचमुच बहुत मतलबी होते हैं।"
विनय ने तुरंत स्थिति को संभाला, उसका हाथ थामकर कहा, "अरे बाबा! मेरा वो मतलब नहीं था जो तुम समझ रही हो। मैं कुछ गलत या शारीरिक नहीं सोच रहा था। तुम लड़कियां हमेशा हर बात का गलत मतलब ही क्यों निकालती हो?"
विनय की इस सफाई और मासूम सूरत को देखकर मोनिका का गुस्सा काफूर हो गया। दोनों एक-दूसरे की इस नोक-झोंक पर खुलकर हंस पड़े और काफी देर तक यूं ही बातें करते रहे।
सांसों का तूफान और पहली कसम
बातों ही बातों में, हवा में रोमांस का रंग इतना गाढ़ा हो गया कि दोनों के बीच की बची-कुची दूरियां भी मिट गईं। धड़कनें बेकाबू हो चुकी थीं। दोनों ने बिना कुछ कहे, एक-दूसरे की आँखों में छिपे आमंत्रण को पढ़ा और एक-दूसरे को अपनी बाहों के पाश में पूरी ताकत से भर लिया। धीरे-धीरे उनके तपते हुए होंठ आपस में मिल गए। एक गहरा, मदहोश कर देने वाला चुंबन शुरू हुआ।
इसी मदहोशी के बीच, विनय का हाथ अनियंत्रित होकर धीरे से मोनिका की चूड़ीदार पजामी की रेशमी डोरी पर गया और उसने उसे एक झटके में खींच दिया। डोरी के खुलते ही मोनिका के भीतर का संकोच और भय अचानक जाग उठा। वह थोड़ी असहज हुई, उसने विनय के मजबूत हाथों को अपने सीने से पीछे धकेलते हुए कांपती आवाज में कहा, "नहीं विनय... प्लीज रुक जाओ... यह सही नहीं है... अभी हम इस सीमा को पार नहीं कर सकते... रुक जाओ।"
विनय ने उसे अपनी बाहों में संभालते हुए, उसके गालों को चूमा और प्यार से फुसफुसाया, "अरे यार, समझा करो ना। कुछ नहीं होगा, मैं हूँ ना तुम्हारे साथ। मैं तुम्हें कोई नुकसान नहीं पहुँचाऊंगा।"
मोनिका ने उसकी आँखों में अपनी बड़ी-बड़ी आँखें डालकर, अत्यंत मासूमियत और फिक्र से कहा, "बहुत कुछ हो जाएगा यार... तुम नहीं समझते। अभी हमारी उम्र ही क्या है! हम अभी करियर और पढ़ाई के इस मोड़ पर कोई बड़ी गलती नहीं कर सकते।"
मोनिका की इस परिपक्व फिक्र और पवित्रता को देखकर विनय के भीतर का वेग शांत हो गया। वह मुस्कुराया और बोला, "अच्छा, बाबा ठीक है! शांत हो जाओ।" उसने बड़े आदर के साथ मोनिका की पजामी की डोरी को वापस ठीक किया, उसे बांधा और कहा, "अब तो ठीक है ना? अब तो गुस्सा नहीं हो?"
मोनिका ने एक राहत की लंबी सांस ली, उसकी आंखों में विनय के प्रति सम्मान और बढ़ गया। वह शरमाते हुए मुस्कुराई और बोली, "हाँ... तुम बस मुझे ढेर सारा किस कर सकते हो, उसकी छूट है।"
विनय ने शरारत से आंख मारी, "धत्त! मुझसे सिर्फ उतने से सब्र कहाँ होने वाला है!"
मोनिका ने हंसकर कहा, "अरे, कोशिश करके देखो, कुछ नहीं होगा।"
विनय ने उसे चुनौती देते हुए कहा, "अच्छा, सोच लो! मैं जब किस करना शुरू करता हूँ, तो मुझे वक्त और दुनिया का होश नहीं रहता।"
मोनिका ने भी अपनी ठुड्डी ऊपर उठाकर कहा, "अच्छा जी! देखते हैं आपकी इस छिपी हुई कला को भी आज।"
अगले ही पल, दोनों एक-दूसरे की गर्म सांसों के तूफान में खो गए। विनय ने मोनिका को अपनी बाहों में और कस लिया, जैसे वह उसे हमेशा के लिए अपने वजूद का हिस्सा बना लेना चाहता हो। वक्त जैसे उस बेड के चारों तरफ ठहर गया था। काफी देर तक वे दोनों एक-दूसरे के प्यार की इस रश्मि में डूबे रहे। जब मोनिका की सांसें पूरी तरह फूलने लगीं, उसका दम घुटने लगा और वह थोड़ा छटपटाने लगी, तब जाकर विनय ने धीरे से अपने होठों को अलग किया और अपनी पकड़ ढीली की।
दोनों बुरी तरह हांफ रहे थे। कमरे की उमस और प्यार के इस वेग में मोनिका पसीने से तर-बतर हो चुकी थी। उसने गहरी सांस लेते हुए मजाकिया और हांफते हुए लहजे में कहा, "बाप रे बाप! आज तो तुमने सचमुच मेरी जान ही निकाल दी होती तिवारी जी!"
विनय ने गर्व से अपनी छाती चौड़ी करते हुए मुस्कुराकर कहा, "मैंने तो तुम्हें पहले ही चेतावनी दी थी कि मेरी मोहब्बत की आदतें जरा गहरी और जानलेवा हैं।"
मोनिका उसके इस मर्दाने अंदाज पर मुस्कुराए बिना नहीं रह सकी। दोनों बेड पर सीधे लेट गए और एक-दूसरे का हाथ मजबूती से थाम लिया। कमरे में फैले कुछ पलों के सन्नाटे को तोड़ते हुए मोनिका ने विनय की तरफ करवट ली और पूछा, "सच-सच बताना विनय, क्या मुझसे पहले भी किसी लड़की को ऐसे ही किस किया है तुमने?"
विनय ने उसकी तरफ मुड़कर, अपनी पूरी संजीदगी और पवित्रता को अपनी आवाज में घोलकर कहा, "ईश्वर की कसम मोनिका, कभी नहीं। यह मेरी जिंदगी का पहला, सबसे अच्छा और सबसे खूबसूरत लम्हा था, जिसे मैं ताउम्र, मरते दम तक नहीं भूलूँगा।"
मोनिका ने जैसे ही यह सुना, उसका दिल भर आया। उसने शर्माकर अपना पूरा चेहरा विनय की चौड़ी छाती में छुपा लिया और धीरे से बोली, "मेरा भी... यह जिंदगी का पहला ही एहसास था।"
आलू के पराठे और बत्ती गुल रात
कुछ देर बाद मोनिका बेड से उठी, अपने बिखरे हुए बालों को करीने से संभाला, अपनी ओढ़नी ठीक की और बोली, "चलो, अब बहुत देर हो गई है, मैं अपने कमरे में जाती हूँ। मम्मी के आने का वक़्त हो गया है, ज़रा घर में झाड़ू-पोछा कर लूँ, वरना वह आते ही डांटना शुरू कर देंगी।"
विनय ने तकिये को अपने सिर के नीचे दबाते हुए कहा, "हाँ, ठीक है, तुम अपना काम कर लो।"
मोनिका के जाते ही विनय भी बिस्तर से उठा, बाथरूम में जाकर हाथ-मुँह धोया, कपड़े बदले और सुस्ताने के बहाने बाहर गली में अपने दोस्तों की महफ़िल में निकल गया ताकि चेहरे का रंग सामान्य हो सके।
धीरे-धीरे दिन की वह तपिश ढली और शाम ने धीरे से रात की काली चादर ओढ़ ली। जब विनय काफी देर बाद घर लौटा, तो आँगन में कदम रखते ही उसकी माँ की त्योरियाँ चढ़ी हुई थीं। माँ का चेहरा गुस्से से तमतमाया हुआ था। उन्होंने डांटते हुए लहज़े में पूछा, "कहाँ मर गया था इतनी देर से? यह लड़की (मोनिका) घर पर बिलकुल अकेली थी। तुझे जरा भी जिम्मेदारी का अहसास है?"
विनय ने तुरंत बात को संभालते हुए मासूमियत से कहा, "अरे अकेली कहाँ थी मम्मी? हमारी छोटी लाली (नन्दिनी) भी तो ट्यूशन से आकर इसी के पास बैठी थी। और वैसे भी, मैं कोई शहर से बाहर थोड़ी गया था, यहीं पास में ही तो दोस्तों के साथ था।"
माँ का ममतामयी गुस्सा पल भर में पिघल गया। उन्होंने प्यार से उसके सिर पर हाथ मारा और डांटते हुए बोलीं, "अच्छा ठीक है, अब आ गया है तो ज्यादा बहाने मत बना। चल, हाथ-मुँह धोकर खाना खा ले।"
विनय के चेहरे पर तुरंत उत्सुकता आ गई, उसने पूछा, "क्या स्वादिष्ट बनाया है आज मम्मी?"
"तेरी पसंद के आलू के पराठे," माँ ने रसोई की तरफ़ इशारा करते हुए कहा।
"अरे वाह! फिर तो एक काम करो मम्मी, पराठों के साथ थोड़ी कड़क, अदरक वाली चाय भी बना लो, तभी असली मज़ा आएगा," विनय ने लाड़ जताते हुए हुक्म चलाया।
माँ ने मुस्कुराकर उसकी तरफ़ देखा और बोलीं, "अरे नवाब जादे! बड़े हुक्म चला रहे हो। चल बैठ खाट पर, बना रही हूँ तेरी चाय भी।"
माँ की ममता और पराठों की ख़ुशबू के बीच विनय सीढ़ियाँ चढ़कर छत पर चला गया। उन दिनों उसके पास मोबाइल जैसी कोई चीज़ नहीं थी, जो उसका ध्यान भटकाती। वह बस छत की मुंडेर के पास, रात की उस ठंडी और सुकूनभरी हवा के झोंकों को महसूस करते हुए बैठ गया।
कुछ ही देर में सीढ़ियों पर पायल की छम-छम हुई। विनय की छोटी बहन नन्दिनी थाली सजाकर ले आई। थाली में गर्मा-गरम आलू के पराठे और कुल्हड़ वाली चाय की भाप उठ रही थी—विनय की सबसे पसंदीदा चीज़। विनय ने तृप्ति के साथ खाना शुरू किया। निवाले ख़त्म होने के बाद उसने सीढ़ियों की तरफ़ देखते हुए आवाज़ लगाई, "नन्दिनी! ज़रा पानी लेकर आना ऊपर।"
आवाज़ तो नन्दिनी को दी गई थी, लेकिन सीढ़ियों से जो साया उभर कर आया, वो मोनिका का था। उसके एक हाथ में पानी का जग था और दूसरे में कांच का गिलास। मोनिका ने आगे बढ़कर गिलास में पानी उड़ेला और विनय की तरफ़ बढ़ाते हुए हौले से बोली, "लो, पानी पी लो।"
विनय की आँखों में एक शरारती चमक उभरी और वह मुस्कुरा दिया। मोनिका ने भी उस मुस्कुराहट का जवाब अपनी एक शर्मीली मुस्कान से दिया और बिना कुछ और कहे, पैर पटकती हुई नीचे चली गई।
नीचे सबने खाना-पीना ख़त्म किया और सोने की तैयारी कर ही रहे थे कि अचानक पूरे मोहल्ले की बत्ती गुल हो गई। चारों तरफ़ घाघ अंधेरा छा गया और उमस बढ़ने लगी।
तभी मोनिका के कमरे से टॉर्च की एक पीली रोशनी छनकर बाहर आई। हाथ में टॉर्च थामे मोनिका ने आवाज़ दी, "चलो, सब छत पर चलते हैं, नीचे तो दम घुट जाएगा।"
देखते ही देखते पूरा परिवार चादरें और चटाइयां समेटकर छत की तरफ़ कूच कर गया। कुछ ही पलों में छत का मंज़र बदल चुका था। विनय, उसकी माँ, छोटी लाली (नन्दिनी) और छोटा भाई—सब वहाँ पहुँच चुके थे। माँ और बच्चों ने विनय के पास ही अपनी चटाई बिछाई और आसमान के तारों को निहारते हुए लेट गए।
रात की उस ख़ामोशी में, हवा के एक झोंके के साथ विनय अपनी माँ की तरफ़ करवट बदलते हुए बोला..."मम्मी, एक कहानी सुनाओ न!" विनय ने ज़िद की।
मम्मी ने टालते हुए कहा, "मुझे कोई कहानी-वहानी नहीं आती, चुपचाप सो जाओ विनय।"
"छोटे बच्चे की तरह मत करो मम्मी, प्लीज़ एक कहानी सुनाओ!" विनय ने फिर मनुहार की।
आखिरकार मम्मी मुस्कुराईं और बोलीं, "अच्छा बाबा चलो, सुनाती हूँ।" मम्मी जैसे ही कहानी सुनाने लगीं, उनकी आवाज सुनकर मोनिका भी हमारे पास आ गई। वह भी पास में ही लेटकर बड़े ध्यान से कहानी सुनने लगी। कहानी सुनते-सुनते मोनिका ने मज़ाक में विनय की तरफ हाथ बढ़ाकर उसे चिकोटी काटनी (नोचना) शुरू कर दी। विनय भी कहाँ कम था, उसने भी उसे नोचना शुरू कर दिया। दोनों में हल्की नोंक-झोंक होने लगी।
कुछ देर बाद अनुष्का और उसकी मम्मी भी हमारी छत पर आ गईं। अब विनय की मम्मी, मोनिका की मम्मी और अनुष्का की मम्मी—तीनों पास में बैठकर अपनी बातों में मग्न हो गईं। दूसरी तरफ विनय, मोनिका, अनुष्का और विनय की छोटी बहन नंदनी, चारों एक साथ लेटे हुए थे। वे सब आसमान की तरफ देखते हुए तारों को गिन रहे थे और मज़ाक में कह रहे थे—"वह तारा मेरा है!", "नहीं, वह वाला मेरा है!"
इसी हँसी-मज़ाक के बीच छोटी नंदिनी को नींद आ गई और वह सो गई। कुछ देर में कॉलोनी की लाइट भी आ गई। लाइट आते ही विनय की मम्मी ने कहा, "चलो बच्चों नीचे चलें, light आ गई है।"
यह सुनकर अनुष्का बोली, "मौसी, आप लोग चलिए, हम थोड़ी देर में नीचे आ जाएँगे।"
इसके बाद तीनों माएँ नीचे चली गईं। विनय ने सोई हुई नंदिनी को गोद में उठाया और उसे नीचे सुलाने के लिए ले गया। छत पर अब सिर्फ मोनिका और अनुष्का लेटी हुई बातें कर रही थीं।
थोड़ी देर बाद विनय नीचे से वापस छत पर आया और उनसे थोड़ी दूरी पर लेट गया। रात का मौसम बेहद सुहाना था। ठंडी-ठंडी हवा चल रही थी और वह रात वाकई बहुत खूबसूरत थी।
विनय को यूँ गुमसुम लेटा देख अनुष्का ने पूछा, "विनय भैया, आप इतने चुपचाप क्यों लेटे हो?
विनय ने आसमान के अंतहीन विस्तार को देखते हुए कहा, "कुछ नहीं, बस सोच रहा था... काश! मेरे पास भी एक रॉकेट होता, तो मैं भी इस आसमान की सैर पर चला जाता।"
तारों का शहर और संगीत की महफ़िल
विनय की रॉकेट वाली बचकानी मगर प्यारी बात सुनकर मोनिका के होठों पर एक ख़ूबसूरत मुस्कान तैर गई। उसने आँखें सिकोड़कर लाड से कहा, "अच्छा! अकेले ही उड़ जाते तारों के शहर में? और हमारा क्या?"
"अरे नहीं बाबा! तुम्हें कैसे छोड़ सकता हूँ? तुमको भी साथ लेकर जाता। फिर उस दुनिया में सिर्फ तुम होती और मैं होता," विनय ने उसकी आँखों में झांकते हुए पूरी शिद्दत से जवाब दिया।
पास ही बैठी अनुष्का दोनों की इस रोमांटिक गुफ़्तगू को देख रही थी। उसने बनावटी नाराज़गी के साथ अपना मुँह फुलाया और चुलबुले अंदाज़ में बोली, "सही है! यहाँ तो हमारी कोई कद्र ही नहीं है। हमको तो कोई पूछता ही नहीं!"
मोनिका ने खिलखिलाकर अनुष्का का हाथ थाम लिया और उसे मनाते हुए बोली, "अरे नहीं मेरी जान! तुम क्यों उदास होती हो? तुम भी चलना हमारे साथ।" इस बात पर छत का माहौल हल्का हो गया और तीनों एक साथ हंस पड़े।
तभी अनुष्का की आँखों में एक उत्सुकता चमकी। उसने विनय की तरफ रुख किया, "अच्छा विनय भैया, सच बताओ, आपका सबसे पसंदीदा गाना कौन सा है?"
विनय ने सादगी से मुस्कुराते हुए कंधे उचकाए, "मैं तो सीधा-साधा लड़का हूँ, जो भी रेडियो या मोबाइल पर बज जाए, सुन लेता हूँ।"
"ना... यह डिप्लोमैटिक जवाब नहीं चलेगा!" अनुष्का ने ज़िद पकड़ ली, "फिर भी कोई एक गाना तो ऐसा होगा जो दिल के सबसे करीब हो? बोलो ना, शर्माओ मत!"
विनय ने कुछ पल के लिए आसमान के तारों को देखा, मानो शब्दों को ढूँढ रहा हो। फिर मुस्कुराकर बोला, "वह जो आजकल हर तरफ गूँज रहा है ना..."
"कौन सा वाला भैया?" अनुष्का ने उत्सुकता से पूछा।
विनय की आवाज़ थोड़ी धीमी हुई और वह गुनगुनाने लगा:
"आओ ले चलें तुम्हें तारों के शहर में...
धरती पे ये दुनिया हमें प्यार ना करने देगी..."

गाने के बोल जैसे ही हवा में घुले, मोनिका के चेहरे का रंग बदल गया। अनुष्का ने मुस्कुराते हुए कहा, "वाह भैया, चॉइस तो कमाल की है आपकी!" फिर वह तुरंत मोनिका की तरफ मड़ी, "दीदी, अब आपकी बारी। आपको कौन सा गाना पसंद है?"
मोनिका के गालों पर हया की सुर्खी दौड़ गई। उसने नज़रें झुकाकर बेहद धीमे स्वर में कहा, "मुझे तो बस एक ही पसंद है—तू मेरा है सनम, तू ही मेरा हमदम, मेरे साथ ही रहना सातों जनम..."
अनुष्का तो जैसे इसी मौके के इंतज़ार में थी। उसने चुटकी लेते हुए कहा, "ओहो! वाह दीदी, क्या बात है! यह तो सीधे-सीधे विनय भैया के लिए सीधा इशारा है ना?" यह सुनते ही मोनिका का चेहरा शर्म से लाल हो गया। उसने शर्माकर एक तिरछी नज़र विनय पर डाली, जो खुद को मुस्कुराने से रोक नहीं पा रहा था।
तभी नीचे के आंगन से अनुष्का की माँ की ऊँची आवाज़ गूँजी, "लाली! अरे ओ लाली! आजा अब नीचे, बहुत रात हो गई है। बाकी की बातें सुबह अम्मा से कर लेना।"
अनुष्का ने छत की मुंडेर से नीचे की तरफ मुँह करके चिल्लाया, "आई मम्मी! बस दो मिनट में आ रही हूँ!"
वह अपनी जगह से उठी, दोनों के चेहरे देखे और एक शरारती मुस्कान के साथ बोली, "ठीक है विनय भैया और होने वाली भाभी जी... गुड नाइट! अब आप दोनों तसल्ली से बात कीजिए, मैं चलती हूँ।" और वह सीढ़ियों से नीचे उतर गई।
रात का सन्नाटा और खामोश वादे
अब छत पर सिर्फ सन्नाटा था, और उस सन्नाटे के बीच विनय और मोनिका की धड़कनें। दोनों ने एक-दूसरे को देखा और बिना कुछ कहे मुस्कुरा दिए। हवा में थोड़ी ठंडी रंगत घुलने लगी थी। मोनिका ने अपनी चुनरी को थोड़ा ठीक करते हुए कहा, "मुझे भी अब नीचे जाना चाहिए विनय, वरना मम्मी ऊपर आ जाएँगी।"
विनय का दिल अभी भरा नहीं था। उसने थोड़े हक से कहा, "थोड़ी देर और रुक जाओ ना... प्लीज। बस मुझे नींद आ जाए, फिर चली जाना।"
मोनिका ने प्यार भरा उलाहना देते हुए अपनी भौंहें चढ़ाईं, "अच्छा जी! अब हमारे बिना नींद भी नहीं आती आपको? बड़े साहब हो गए हो!"
विनय ने बात को संभालते हुए, उसकी आँखों में आंखें डाल कर बेहद संजीदगी से कहा, "मज़ाक नहीं कर रहा यार। कुछ दिनों से तुम्हारी ऐसी आदत हो गई है कि जब तक तुम सामने ना हो, ये आँखें मूँदने का नाम नहीं लेतीं।"
मोनिका का दिल इस मासूम इकरार पर पिघल गया। उसने मुस्कुराकर कहा, "अच्छा बाबा ठीक है, चलो अब चुपचाप आँखें बंद करो और सो जाओ।"
विनय के चेहरे पर एक शरारती मुस्कान आई। उसने कहा, "ऐसे नहीं... पहले अपना हाथ मेरे मुँह पर रखो।"
मोनिका ने बिना देर किए अपना कोमल हाथ विनय के होठों पर रख दिया। जवाब में विनय ने भी अपना हाथ मोनिका के मुँह पर रख दिया। दोनों ने एक-दूसरे के स्पर्श को महसूस किया और आँखें बंद कर लीं। कुछ पलों की खामोशी के बाद मोनिका के मन का डर ज़ुबान पर आ गया, "विनय... जब मैं यहाँ से चली जाऊँगी, तब कैसे सोया करोगे तुम?"
विनय ने झटके से अपनी आँखें खोलीं। उसकी आवाज़ में एक अजीब सी बेचैनी थी, "तुम कहीं नहीं जाओगी मोनिका। और सुनो, यह बात दोबारा अपने मुँह पर मत लाना, ठीक है?"
मोनिका ने उसकी व्याकुलता को भांप लिया। उसने बात को संभालते हुए कहा, "अच्छा बाबा, अब कभी नहीं कहूँगी। चलो, अब सो जाओ।"
कुछ ही देर में विनय गहरी नींद की आगोश में चला गया। उसे सोता हुआ देख मोनिका चुपके से उठी और दबे पाँव नीचे अपने कमरे में चली गई।
सुबह की धूप और कमरों की शरारत
रात के सन्नाटे में, करीब दो बजे के आसपास विनय की नींद टूटी। वह छत से नीचे आया और अपने कमरे के बिस्तर पर दोबारा सो गया।
अगली सुबह जब सूरज की किरणें खिड़की से कमरे में दाखिल हो चुकी थीं, करीब आठ बजे मोनिका सोकर उठी। वह फ्रेश होकर सीधे विनय के कमरे में आई और उसके बेड के कोने पर बैठ गई। वहाँ विनय की अम्मी पहले से मौजूद थीं। मोनिका चालाकी से अम्मी से बातें करने लगी, लेकिन उसका हाथ चादर के अंदर गया और उसने सोए हुए विनय को ज़ोर से चिकोटी काट ली।
विनय हड़बड़ाकर नींद से जाग गया। आँखें मलीं तो देखा सामने मोनिका बैठी अम्मी से ऐसे बात कर रही है जैसे कुछ हुआ ही ना हो। बदला लेने के इरादे से, विनय ने लेटे-लेटे ही तकिये की आड़ से हाथ निकाला और मोनिका की पीठ पर ज़ोर से नोच लिया।
"आह! आंटी!" मोनिका ज़ोर से चीख पड़ी। उसने अपनी पीठ को सहलाते हुए कहा, "देखो ज़रा आंटी, लगता है बिस्तर पर किसी ज़हरीले कीड़े ने काट लिया! बहुत तेज़ दर्द हुआ।" वह अपनी पीठ आंटी की तरफ घुमाने लगी।
मम्मी ने सरसरी नज़र से देखा और प्यार से डाँटते हुए बोलीं, "कुछ नहीं है लाली, तुम्हारा वहम है।" मोनिका मुंह बनाकर फिर वहीं बैठ गई।
जैसे ही मम्मी की नज़र घूमी, विनय ने शरारत से आँखें खोलीं, मोनिका की तरफ देखा और दोबारा उसे नोच लिया। इस बार मोनिका पूरी तरह तैयार थी। उसने विनय का रंगे हाथों हाथ पकड़ लिया और बदले में उसे ऐसा नोचा कि विनय की बची-खुची नींद भी काफूर हो गई।
विनय झटके से बेड पर उठकर बैठ गया। अपनी हार को छिपाने के लिए उसने ज़ोर से आवाज़ लगाई, "अम्मी! मेरी चाय कहाँ है?"
मम्मी ने हाथ में झाड़ू थामे हुए तंज कसा, "ले अंग्रेज़ बहादुर! चाय के दीवाने... जाग गए पूरे दस बजे! रात भर ऐसा क्या तीर मारते हो जो सुबह इतनी लेट आँख खुलती है तुम्हारी?"
विनय ने टेबल से चाय का गिलास उठाया, एक लंबी चुस्की ली और बड़ी संजीदगी से बोला, "अम्मी, आपको क्या पता? रात भर जागकर मैं इस घर की चौकीदारी करता हूँ। कल को कोई चोर-उचक्का आ गया, तो कौन बचाएगा?"
विनय का यह झूठा और गंभीर चेहरा देखकर मोनिका अपनी हंसी नहीं रोक पाई और खिलखिलाकर हंस पड़ी।
विनय ने चिढ़कर कहा, "हंस क्यों रही हो तुम? मैं बिल्कुल सच कह रहा हूँ!"
विनय की इस मासूम शक्ल और झूठी बहादुरी पर मोनिका का हंसते-हंसते बुरा हाल हो गया और कमरे में उसकी हंसी और तेज़ गूँजने लगी।
पानी की बौछारें और अल्हड़ सा खेल
कुछ दिन और बीते। अब मोनिका का एक नया सलोना सिलसिला शुरू हो चुका था। वह रोज़ की तरह बाहर गेट पर आकर खड़ी होती, कुछ पल ठहरती, विनय को देखती और फिर चुपके से अपने कमरे में लौट जाती। दिन इसी सलोने सिलसिले के साथ गुज़रते रहे। वक़्त के साथ दोनों की मोहब्बत की जड़ें इतनी गहरी हो चुकी थीं कि उनके बीच की दूरियां मिट चुकी थीं। वे महज़ दो इंसान नहीं रहे थे—मानो दो जिस्म और एक ही जान हो गए थे।
एक रोज़ शाम ढलते ही, क़रीब पांच बजे जब पानी का वक़्त हुआ, तो मोनिका रोज़मर्रा की तरह टंकी से पानी भरने लगी। विनय बाहर गेट पर खड़ा, बेफ़िक्री से इधर-उधर की दुनिया को निहार रहा था। मोनिका पानी भरते-भरते उसके पास आकर रुक गई। उसने विनय की आँखों में झाँका और एक मीठी सी चुनौती देते हुए बोली, "तुम्हारे बस की बात नहीं है... जो कहते हो, वो कर सको, इतनी हिम्मत नहीं है तुममें।"
विनय ने मुस्कुराकर उसकी आँखों में देखा और कहा, "क्या करना है, बस ये बताओ। हिम्मत की कमी नहीं है मुझमें।"
मोनिका ने छेड़ते हुए कहा, "अच्छा! तो फिर यहीं, इसी वक़्त कुछ ऐसा करके दिखाओ कि मुझे यक़ीन हो जाए।"
विनय असमंजस में पड़ गया। उसने पल भर को सोचा—'ऐसा क्या करूँ?' उसने एक सरसरी निगाह आसपास की सूनी गली पर डाली और बिना एक पल गंवाए, आगे बढ़कर मोनिका के गालों पर अपने होंठ रख दिए। इस अचानक हुए हमले से मोनिका सकपका गई। उसने बनावटी ग़ुस्से से आँखें तरेरीं और अंदर भाग गई। लेकिन अंदर जाते ही, पानी भरते हुए उसकी ओठों पर एक ख़ूबसूरत सी मुस्कान तैर गई।
विनय भी उसके पीछे-पीछे अंदर चला आया और शरारत से पूछा, "अब हुआ यक़ीन?"
मोनिका ने हँसते हुए जवाब दिया, "हाँ, हो गया। अब तो तुम बहुत ताक़तवर हो गए हो!" और इसके साथ ही उसने पास रखे जग से पानी का एक झोंका विनय के ऊपर दे मारा।
विनय पल भर में सराबोर हो गया। उसने हैरान और भीगी हुई नज़रों से मोनिका को देखा। पास ही पानी से लबालब भरी एक बाल्टी रखी थी; विनय ने आव देखा न ताव, बाल्टी उठाई और पूरी की पूरी मोनिका पर पलट दी। अब मोनिका भी पूरी भीग चुकी थी। इसके बाद दोनों ने दौड़कर घर का मुख्य दरवाज़ा बंद किया और फिर शुरू हुआ पानी की बौछारों के बीच एक अल्हड़ सा खेल। दोनों एक-दूसरे पर पानी डालते रहे, खिलखिलाते रहे।
यादों का भंवर और अधूरापन
दिन इसी तरह अपनी रफ़्तार से पंख लगाकर उड़ते रहे। वे दोनों अपनी ही एक मुकम्मल दुनिया में बेहद ख़ुश थे। साथ उठना-बैठना, साथ खाना-पीना और हर लम्हे को एक-दूसरे के नाम कर देना—वो बेहद हसीन दौर था।
आज जब वो गुज़रे हुए दिन याद आते हैं, तो ये कमबख्त आँखें भर आती हैं। सच कहूँ तो... इस दास्तां को पन्नों पर उतारते हुए भी मेरी आँखों से आंसू छलक पड़े हैं। क्या कमाल के दिन थे वो! काश, वक़्त का पहिया उल्टी दिशा में घूम पाता, काश वो गुज़रा हुआ कल फिर लौट आता... तो ज़िंदगी में वो खोई हुई ख़ुशियाँ फिर से दस्तक दे देतीं।
खैर, यादों के इस भंवर को यहीं छोड़ता हूँ। कहानी का अगला हिस्सा... अब अगले पन्ने पर दर्ज करता हूँ। रात ज्यादा हो गई है, शायद घड़ी की सुइयां रात के 12:46 बजा चुकी हैं... मिलते हैं आगे........समय अपनी सहज गति से बीत रहा था। मोनिका को विनय के आशियाने में रहते हुए करीब दो से तीन महीने बीत चुके थे। हवाओं में घुली उस मोहब्बत की महक अब विनय की माँ तक भी पहुँचने लगी थी। उन्हें दोनों के दरमियां पनपते इस अनकहे रिश्ते का थोड़ा-बहुत आभास होने लगा था। मगर इस शक में कोई कड़वाहट नहीं थी, क्योंकि माँ के दिल में मोनिका ने अपनी एक खास जगह बना ली थी। एक रोज़ बातों ही बातों में माँ के दिल की चाह जुबां पर आ ही गई, उन्होंने मोनिका से कहा, "मैं तो विनय के लिए तुम्हारे जैसी लड़की ही बहू बनाकर लाऊंगी।" सच में, वह दिल की बेहद अमीर और प्यारी लड़की थी।
दिन ढले और जुलाई-अगस्त की वो रिमझिम फुहारें अपने साथ 'नवरात्रि' का पावन महीना ले आईं। उन दिनों जब मोनिका सज-धज कर पूजा के लिए निकलती, तो ऐसा प्रतीत होता मानो साक्षात कोई देवी धरती पर उतर आई हो। उसकी वह छवि आज भी आँखों में वैसी ही ताज़ा है। सच कहूँ तो, वह मेरे लिए हमेशा से एक देवी जैसी ही रही है... आज भी, जब हमारे रास्ते पूरी तरह जुदा हो चुके हैं।
फिर वह आखिरी दिन भी आ गया। नवरात्रि की पूर्णाहुति के बाद मोनिका घर लौटकर सहज भाव से भोजन कर रही थी। तभी अचानक दिल्ली से उसके पिता का आगमन हुआ, जो उसे वापस ले जाने आए थे। शुरुआत में तो मोनिका की माँ ने जाने से साफ इंकार कर दिया, मगर पिता ने नाना-नानी को ढाल बनाया और अपनी ज़िद के आगे सबको मना ही लिया। अगली ही सुबह, एक टेम्पो में गृहस्थी का सारा सामान लादकर वे लोग दिल्ली के लिए रुखसत हो गए।
मोनिका का इस तरह अचानक चले जाना मुकुल के लिए किसी वज्रपात से कम नहीं था। उसका पूरा वजूद जैसे बिखर गया। आने वाले चार-पेंट दिनों तक न तो उसके हलक से निवाला नीचे उतरा, और न ही उसका दिल कमरे की चारदीवारी से बाहर निकलने को हुआ। वह बस सुबकता हुआ अपनी तन्हाई में मोनिका की यादों को समेटे रोता रहा। वक्त का पहिया घूमता रहा, और उस चौखट पर मोनिका की राह तकते-तकते, मुकुल को पूरा एक साल बीत गया... पर वो इंतज़ार आज भी वहीं ठहरा था।न कोई खत, न कोई पैगाम, और न ही कोई सुगबुगाहट... क्योंकि विनय के पास मोनिका का कोई संपर्क नंबर ही नहीं था। वह सुलगती हुई यादों की भट्टी में इस कदर झुलसा कि बीमार पड़ गया। न जीने की चाह बची, न भूख की तलब, और न प्यास का अहसास। मानो उसके जिस्म से किसी ने रूह ही खींच ली हो। इसी बेबसी में वक्त की कड़ियाँ सरकती रहीं। फिर आया नवंबर का वो महीना, जब ढलती हुई गुनगुनी धूप और सर्द हवाओं के साथ साल 2018 ने दस्तक दी। और उसी जाड़े की एक सुबह, मोनिका एक बार फिर विनय के आशियाने में लौट आई।
वापसी का पहला दिन तो यूं ही अनजाने में बीत गया। मोनिका ने देखा कि विनय बस अपने कमरे में बेसुध सोया रहता है। वह इस बात से पूरी तरह अनजान थी कि विनय की इस हालत की मुजरिम खुद उसकी जुदाई ही थी। अगले दिन, जब दोनों की माताएं किसी काम से घर से बाहर गईं, तो मोनिका दबे पांव विनय के अंधेरे कमरे में दाखिल हुई। उसने धीरे से अपना ठंडा हाथ विनय के तपते माथे पर रखा। उस छुअन की शिद्दत ने उसे चौंका दिया—विनय बुखार में तप रहा था। इधर, अपने माथे पर एक चिर-परिचित, मखमली अहसास पाकर विनय ने भारी पलकें उठाईं। सामने मोनिका को खड़े देख उसे लगा जैसे वह कोई ख्वाब देख रहा हो।
"तुम...? मोनिका! कब आईं तुम?" विनय के सूखे होंठों से बस यही लफ्ज़ निकल पाए। अगले ही पल, दोनों बिना कुछ कहे एक-दूसरे के आगोश में सिमट गए। वह महज़ एक मिलन नहीं था, बल्कि दो जज़्बातों का समंदर था जो आँखों के रास्ते बह रहा था। मोहब्बत की ताकत भी अजीब होती है; जो लड़का हफ़्तों से बेजान मूर्ति बना दीवार को तकता रहता था, अपने प्यार का दीदार करते ही उसकी रगों में ज़िंदगी की लहर दौड़ गई।
विनय ने उलाहना देते हुए कहा, "बहुत अरसा लगा दिया तुमने लौट कर आने में..." मोनिका ने नजरें झुकाकर धीरे से कहा, "हाँ, पापा ने ज़िद पकड़ ली थी, आने ही नहीं दे रहे थे।" विनय ने उसकी आँखों में झांकते हुए पूछा, "अब कब तक रुकोगी यहाँ?" उसने मासूमियत से जवाब दिया, "पता नहीं... अभी तो तुम ठीक हो जाओ।" विनय की बिखरी हालत देखकर मोनिका का दिल भर आया, वह डाँटते हुए बोली, "यह क्या हाल बना रखा है अपना? इतनी तबीयत खराब है और दवा को हाथ तक नहीं लगाया!"
वह भागकर दवा ले आई और ज़िद करके विनय को खिलाई। फिर मुस्कुराकर तंज़ कसते हुए बोली, "कुछ पेट में गया भी है, या यहाँ बस 'देवदास' बनकर लेटे रहने का इरादा है?" विनय ने बच्चे की तरह ना में सिर हिला दिया। मोनिका रसोई में गई, अपने हाथों से गर्मागर्म पराठे सेंके, और बड़े चाव से विनय को एक-एक निवाला खिलाने लगी। उस कमरे का सन्नाटा अब दोनों की धड़कनों की सुरीली गूँज में बदल चुका था।पराठे का पहला निवाला गले से उतरते ही विनय की आँखों में एक अजीब सी तृप्ति तैर गई। उसने मोनिका की तरफ देखा और धीमे से बोला, "पराठे सचमुच बहुत लजीज हैं... कितने ही अरसे बाद तुम्हारे हाथ का स्वाद चखा है यार।" मोनिका ने उसके गाल को हल्के से थपथपाया और मुस्कुराकर बोली, "अब इस शिकन को माथे से हटा दो। अब रोज़ तुम्हें मेरे ही हाथों का बना खाना खाना है और मेरे ही हाथों से पानी पीना है।" यह कहकर उसने पानी का ग्लास विनय के होंठों से लगा दिया।
पानी पीने के बाद जैसे ही विनय ने बिस्तर से उठकर खड़े होने की कोशिश की, कमज़ोरी के मारे उसका सिर चकरा गया और वह लड़खड़ाकर गिरने लगा। मोनिका ने फुर्ती से उसे थामा और फिक्रमंद होकर कहा, "अरे! यह क्या ज़िद है? अभी जिस्म में इतनी जान नहीं है कि खुद संभाल सको।" विनय ने सहमकर कहा, "मैं बस वॉशरूम जा रहा था।" मोनिका ने धीमे से डांटते हुए कहा, "तो मुझसे कहने में क्या परहेज़ था? चलो, मैं सहारा देती हूँ।" उसने विनय का कांपता हुआ हाथ थामकर अपने मजबूत कंधे पर टिका लिया और कदम आगे बढ़ाते हुए बोली, "अब संभालकर... धीरे-धीरे चलो।"
जब विनय वापस आया, तो मोनिका उसे सहारा देकर बिस्तर पर ले गई। अचानक उसकी नज़र विनय के चेहरे पर पड़ी; उसकी आँखें आंसुओं से डबडबा रही थीं। मोनिका का दिल पसीज गया, उसने पूछा, "क्या हुआ? तुम रो क्यों रहे हो?" विनय ने बच्चों की तरह सुबकते हुए उसका हाथ पकड़ लिया, "जब तुम नहीं थीं, तो मैंने हर पल तुम्हें बहुत शिद्दत से याद किया है। बस एक बात बताओ... अब तुम मुझे कभी तन्हा छोड़ कर तो नहीं जाओगी ना?" मोनिका की आँखें भी भीग गईं। उसने विनय को पूरी आत्मीयता से अपने सीने से लगा लिया और उसके बालों को सहलाते हुए बोली, "नहीं मेरे पागल... अब कहीं नहीं जाऊँगी। अब सब भूलकर आराम करो।" विनय ने उसके आगोश में सुस्ताते हुए कहा, "तुम यहीं रुकोगी ना, मेरे पास?" मोनिका ने हामी में सिर हिला दिया। सुकून की उस छाँव में विनय की भारी आँखें मूँद गईं और वह सो गया। उसके सो जाने के बाद मोनिका दबे पाँव अपने कमरे की तरफ बढ़ गई।
दिन पंख लगाकर उड़ने लगे। अपनों का साथ और मोहब्बत की छुअन क्या नहीं कर सकती! कुछ ही दिनों में विनय की सेहत सुधरने लगी। मोनिका की मौजूदगी ने उसके चेहरे की खोई हुई रौनक और हंसी वापस लौटा दी थी। हँसते-खेलते नवंबर का महीना बीत गया और दिसंबर की कँपकँपाती रातों ने दस्तक दे दी। ठंड अपने पूरे शबाब पर थी। एक सुबह, मोनिका जल्दी नहा-धोकर, बालों से पानी निचोड़ती हुई विनय के कमरे में आई। सिहरते हुए वह विनय से बोली, "उफ़! आज तो गज़ब की ठंड है, कहीं से थोड़ी आग का इंतज़ाम करो ना!" विनय ने उसे सिर से पैर तक देखा और शरारत भरी मुस्कान के साथ कहा, "अरे! तुम लड़कियों को भी भला ठंड लगती है? तुम लोग तो खुद हुस्न की आग लेकर चलती हो... ठंड तो हम जैसे सीधे-साधे लड़कों को...""...लगती है।" मोनिका ने बनावटी गुस्सा दिखाते हुए कहा, "अब अपनी इस शायराना बयानबाज़ी को रोको यार, और जल्दी से आग जलाने का कोई जतन करो।" विनय ने शरारती लहज़े में अपनी आँखें नचाईं और कहा, "आग यूँ ही नहीं सुलगती साहिबा, इस कँपकँपाती ठंड में मेहनत करने का कुछ 'हर्जाना' लगेगा।" मोनिका ने भी खेल को आगे बढ़ाते हुए कहा, "अच्छा जी! तो अपनी कीमत बताओ, हम भी देखें कि क्या हम उसे अदा कर सकते हैं?" विनय ने उसके चेहरे के करीब आते हुए आहिस्ता से कहा, "कीमत बहुत मामूली है... बस अपनी मखमली छुअन से मेरे होंठों पर एक मोहब्बत की मुहर लगा दो।" मोनिका का चेहरा लाज से सुर्ख हो गया, वह मुस्कुराकर पीछे हटी और बोली, "तुम न सुधरने वाले... कसम से, पूरे पागल हो तुम!" विनय ने पूरी शिद्दत से उसकी आँखों में झाँका, "पागल तो मैं पहले से था तुम्हारे इश्क़ में, बस आज थोड़ा और बहक गया हूँ।" मोनिका ने हार मानते हुए कहा, "अच्छा बाबा अच्छा! ले लेना अपना हर्जाना, पहले ठंड का कोई इंतज़ाम तो करो।"
विनय के कमरे में एक हीटर रखा था। उसने फौरन स्विच ऑन किया और हीटर की लाल होती रॉड्स की तरफ इशारा करते हुए कहा, "लो, हुज़ूर की ख्वाहिश पूरी हुई... आ जाओ, आग रोशन हो चुकी है।" मोनिका उसकी फुर्ती देखकर चौंक गई, "अरे वाह! इतनी जल्दी बाज़ी मार ली तुमने?" उसने पास आकर हीटर की गुनगुनी लहरों को महसूस किया और खुश होकर बोली, "चलो, कम से कम जान में जान आई।" इसके बाद, दोनों उस कृत्रिम आग के घेरे के पास बेहद करीब बैठ गए। हीटर की लाल रोशनी उनके चेहरों पर एक अजीब सी कशिश बिखेर रही थी और हवाओं में उनकी धीमी बातें तैरने लगीं।
कुछ देर गुज़री, तो विनय की आँखों में फिर वही नटखटपन लौट आया। उसने फुसफुसाकर याद दिलाया, "अब यह बताओ, मेरा वो उधार कब चुकता कर रही हो?" मोनिका ने शर्माते हुए अपनी पलकें झुका लीं और बेहद धीमे स्वर में कहा, "अब माँगना क्या... जो तुम्हारा है, उसे खुद ही ले लो।" उस एक जुमले ने जैसे कमरे का तापमान और बढ़ा दिया। दोनों की नज़रें मिलीं, धड़कनें बेकाबू हुईं और दूरियाँ सिमटने लगीं। विनय ने आहिस्ता से अपना हाथ मोनिका की जुल्फ़ों के पीछे, उसकी नाज़ुक गर्दन पर टिकाया और उसके चेहरे को अपने करीब खींच लिया। अगले ही पल, दोनों के होंठ एक-दूसरे में इस कदर मुकम्मल हुए कि वक़्त जैसे वहीं ठहर गया। वह एक ऐसा लंबा, रूहानी और मदहोश कर देने वाला चुंबन था जिसमें सदियों की तड़प घुली थी। मिनट, लम्हों की तरह फिसलते रहे। जब साँसें उखड़ने लगीं, तो वे एक पल को पीछे हटे, एक-दूसरे को निहारा और फिर से उसी आगोश में खो गए। मोहब्बत के उस बेसाख्ता सैलाब में आधा घंटा कैसे बीत गया, दोनों में से किसी को होश नहीं रहा। आखिरकार, थके और मदहोश कदमों से वे एक लंबी और गहरी साँस खींचते हुए बिस्तर पर ढह गए।
मोनिका ने अपने माथे पर आई पसीने की बूंदों को पोंछते हुए हैरान होकर कहा, "कुदरत का करिश्मा भी अजीब है... अभी कुछ देर पहले मैं ठंड से काँप रही थी, और अब जिस्म पसीने से भीग रहा है।" विनय ने उसकी तरफ करवट ली और मंद-मंद मुस्कुराते हुए कहा, "मैंने तो पहले ही खबरदार किया था कि असली तपिश हीटर में नहीं, बल्कि तुम्हारे खुद के वजूद में है... अब यकीन आया?" मोनिका ने उसके सीने पर अपना सिर टिकाते हुए कहा, "हाँ, सौ फीसदी यकीन आ गया।" विनय ने उसके कान के पास झुककर शरारत से पूछा, "अगर इस कँपकँपी का इलाज अभी पूरा न हुआ हो, तो इससे भी गहरी राहत दे सकता हूँ... कहो तो?" मोनिका ने शरमाकर अपना चेहरा उसके सीने में और छुपा लिया और हल्का सा मुक्का मारते हुए बोली, "बस करो अब... और नहीं, आज के लिए इतनी मोहब्बत काफी है।" कुछ "आने वाले कल के लिए बचा कर रखो, अभी ज़िंदगी का एक लंबा सफ़र बाकी है।" अभी दोनों इस खुमार से उबर ही रहे थे कि अचानक बाहर के मुख्य दरवाज़े से एक आवाज़ गूँजी, "मोनिका... ओ मोनिका! दरवाज़ा खोलना बेटा।" मोनिका सकपकाई और तुरंत जवाब दिया, "आई मम्मी!" उसने आईने के सामने खड़े होकर झटपट अपनी बिखरी जुल्फ़ों को सँभाला, चेहरे के हाव-भाव दुरुस्त किए और लपककर किवाड़ खोल दिए। सामने मम्मी को देख उसने अचरज से पूछा, "मम्मी, आप तो शाम ढले लौटने वाली थीं ना?" उन्होंने मुस्कुराते हुए भीतर कदम रखा और बोलीं, "हाँ, पर आज दफ़्तर में काम का बोझ थोड़ा कम था, तो जल्दी छुट्टी मिल गई।" इसके बाद, माहौल को सामान्य रखते हुए दोनों अपने-अपने कमरों की तरफ बढ़ गईं।
धीरे-धीरे दिन ढला और शाम की स्याही गगन पर बिखरने लगी। इस बीच विनय की माँ भी घर लौट आईं। लेकिन अब घर का नियम बदल चुका था; ढलती शाम के बाद माँ को रसोई या घर के किसी काम में हाथ भी नहीं लगाना पड़ता था। मोनिका ने पूरे घर की ज़िम्मेदारी अपने नाज़ुक कंधों पर उठा ली थी। झाड़ू-पोछा से लेकर गरमा-गरम मुकम्मल रसोई तैयार करने तक, वह हर काम इतनी आत्मीयता से करती मानो वह कोई किरायेदार या मेहमान न हो, बल्कि इसी घर की ब्याह कर आई लक्ष्मी हो। उसके इस निस्वार्थ समर्पण और बेपनाह मोहब्बत को देखकर विनय के दिल में उसके लिए सम्मान और चाहत कई गुना और गहरी हो गई थी।
मगर वक्त की फितरत हमेशा एक जैसी नहीं रहती। एक दोपहर, विनय की छोटी बहन नन्दनी काँच की एक खाली बोतल हाथ में लिए सीढ़ियों पर खेल रही थी। अचानक पैर फिसलने से वह उस खतरनाक बोतल समेत सीढ़ियों से नीचे आ गिरी। उस वक्त विनय, मोनिका और माँ कमरे में बैठे किसी गुफ़्तगू में मसरूफ थे। तभी सन्नाटे को चीरती हुई काँच के बिखरने और नन्दनी के चीखने की खौफनाक आवाज़ आई।
आवाज़ सुनते ही विनय और मोनिका बदहवास होकर सीढ़ियों की तरफ भागे। सीढ़ियों पर काँच के नुकीले टुकड़े बिखरे पड़े थे, पर मोनिका को इस खतरे का रत्ती भर भी होश नहीं रहा। उसने बिना सोचे-समझे नन्दनी को अपनी आगोश में उठाया और दौड़कर भीतर कमरे में ले आई। वह पागलों की तरह नन्दनी के बदन को टटोलकर यह देखने लगी कि बच्ची को कहीं गहरी चोट तो नहीं आई। इस हड़बड़ाहट में उसने अपने खुद के वजूद को भुला दिया था। वह बेखबर थी कि नन्दनी को बचाने की इस कशमकश में काँच का एक नुकीला टुकड़ा उसके अपने पैर में गहरे तक धँस चुका था और वहाँ से खून का फव्वारा बह निकला था। तभी विनय की नज़र ज़मीन पर फैलती सुर्ख लाली पर पड़ी, और वह काँपती आवाज़ में चीख उठा, "हे भगवान! मोनिका... नन्दनी ठीक है, पहले खुद को देखो... तुम्हारे पैर से तो खून की धार बह रही है
"...शायद कोई गहरा ज़ख्म है, ज़रा पैर दिखाओ मुझे।" विनय का दिल बैठ गया। उसने जब मोनिका के नाज़ुक पैर को सहलाया, तो माँस में धँसा काँच का एक नुकीला टुकड़ा बाहर निकल आया। विनय ने तड़पकर उस ज़ख्म को साफ़ किया और आहिस्ता से दवा लगा दी।
उस चीख-पुकार को सुनकर पास के मकान में रहने वाली अनुष्का भी वहाँ आ पहुँची थीं। माहौल के तनाव को थोड़ा हल्का करने के लिए उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, "क़यामत भी अजीब है... आफ़त मचाई नन्दनी ने और उसे खरोंच तक न आई, पर हमारी इस भली और बेचारी देखने वाली जान को चोट लग गई।" उनकी बात सुनकर कमरे की उदासी थोड़ी कम हुई। धीरे-धीरे शाम ने रात की चादर ओढ़ ली और सब भोजन करके अपनी-अपनी दुनिया में सो गए।
!"अधूरी दास्तान और वक़्त का सन्नाटा
मगर वो सुकून महज़ एक तूफ़ान के आने से पहले की खामोशी थी। कुछ ही दिनों बाद, दिसंबर की उस ठंडी और आख़िरी सुबह वक़्त ने एक ऐसा बेरहम मोड़ लिया जिसने सब कुछ बदल दिया। मोनिका ने भारी कदमों से विनय के करीब आकर रुआँसी आवाज़ में कहा, "आज... आज हम हमेशा के लिए दिल्ली लौट रहे हैं।" विनय का वजूद जैसे काँप उठा। उसने बेहद उदास और भीगी आँखों से उसकी तरफ देखा, "अब फिर कब मिलोगी तुम मुझसे?" मोनिका ने अपनी बेबसी छुपाते हुए धीमे से कहा, "अगर तक़दीर को गँवारा हुआ और क़िस्मत ने साथ दिया, तो बहुत जल्द लौटूँगी..." और इन अधूरे अलफ़ाज़ों के साथ वह ओझल हो गई, अपने पीछे सिर्फ सन्नाटा छोड़ कर।
इस विछोह ने विनय को भीतर तक तोड़ दिया। उसकी पढ़ाई के सिलसिले पर पहले ही विराम लग चुका था, सो उसने खुद को बिखरने से बचाने के लिए 'डेकोरेशन' के काम में झोंक दिया। दिन भर वह मसरूफ़ रहता, मगर जैसे ही रात की तन्हाई डसने आती, वह मोनिका की यादों के समंदर में डूब जाता। उस बेतहाशा दर्द से भागने के लिए उसने दिन के साथ-साथ रातों में भी काम करना शुरू कर दिया—महज़ इसलिए कि दिमाग़ को फ़ुरसत न मिले और मोनिका का ख़याल न आए। मगर मोहब्बत की यादें कोई लिबास नहीं जिसे उतार फेंका जाए; वह लाख कोशिशों के बाद भी उन स्मृतियों के साए से आज़ाद न हो सका।
उसकी यह वीरानी अब दोस्तों से भी छुपी न रही। एक शाम उसके अजीज दोस्तों ने उसके कंधे पर हाथ रखकर पूछा, "यार विनय, अरसा हो गया तेरे होठों पर वो पुरानी हँसी देखे... ऐसा क्या गँवा दिया तूने कि तू खुद को ही भूल गया?" विनय अपनी उदासी को छुपाने के लिए ज़हरीली मुस्कान ओढ़
 लेता, कभी कोई बहाना बनाता तो कभी शायरी के परदे में अपने जज़बात छुपाकर कह देता—वो शायरी जॉन एलिया की थीं 
"किसी के प्यार ने छीन ली हमारे चेहरे की मुस्कान ऐ दोस्त,
वरना कभी हमारी मुस्कान भी महफ़िलों में लाजवाब थी।"
अब मैं सब के लिए मुसीबत हूँ
सब मेरे हाल पर तरसते हैं

वक्त का पहिया थमा नहीं। दिन हफ़्तों में और हफ़्ते सालों में बदलते चले गए। देखते-देखते एक साल, फिर दो साल का लंबा अरसा गुज़र गया... मगर दिल्ली की उस दिशा से मोनिका की कोई ख़बर, कोई ख़त विनय तक नहीं पहुँचा। विनय भीतर से पूरी तरह टूट चुका था, पर बेबसी की कशमकश यह थी कि एक तरफ उसका वो अधूरा, तड़पता हुआ प्यार था और दूसरी तरफ बूढ़ी मां एक छोटी बहन और पूरे घर की ज़िम्मेदारी का भारी बोझ। वह एक ऐसे दोराहे पर खड़ा था जहाँ से आगे कोई रास्ता नहीं सूझता था—

अध्याय: राख में सुलगती चिंगारी

अगर वह अपने उस खोए हुए प्यार को तलाशने शहर छोड़ देता, तो पीछे इस बिखरते हुए घर को कौन संभालता? इसी कशमकश और खामोश तड़प के साए में विनय को मोनिका की राह तकते-तकते पूरे चार साल बीत गए। वक़्त की रफ्तार के साथ दुनिया बदल रही थी। एक दिन, विनय ने भी एक नया स्मार्टफोन खरीदा और डिजिटल दुनिया के उस मशहूर झरोखे 'इंस्टाग्राम' पर अपनी किस्मत आज़माने की सोची। उसने काँपते हाथों से सर्च बार में 'मोनिका' नाम के न जाने कितने ही अक्षरों को ढूँढा, मगर वो चेहरा कहीं ओझल था। हाँ, तलाश करते-करते उसकी नज़र मोनिका के चचेरे भाई की एक आईडी पर थमी, मगर मुकद्दर की मार देखिए कि मोनिका उस लिस्ट में भी कहीं शामिल नहीं थी।
उम्मीद की एक महीन डोर के सहारे एक और साल रेत की तरह हाथों से फिसल गया, मगर मोनिका का कोई सुराग न मिला। फिर आया साल 2022... तारीख शायद 25 मार्च थी। वसंत की उस उदास शाम, मोनिका के भाई की प्रोफाइल पर एक नई तस्वीर नुमाया हुई। विनय ने जैसे ही उस तस्वीर पर क्लिक किया, उसकी साँसें जहाँ की तहाँ थम गईं। स्क्रीन पर मोनिका बैठी थी—लाल सुर्ख शादी के जोड़े में लिपटी, हाथों में पराए नाम की मेहंदी सजाए, किसी और की मल्लिका बनने को तैयार। उस एक तस्वीर ने विनय के काँच जैसे दिल पर आखिरी और सबसे गहरा वार किया था। उसका वजूद तड़क कर बिखर गया। वह बेसाख्ता रो पड़ा और बदहवास सा अपनी तन्हाई के अंधेरे कमरे की तरफ भाग खड़ा हुआ।
वह रात विनय की ज़िंदगी की सबसे लंबी और खौफनाक रात थी। आँखों से आँसू नहीं, मानो लहू बह रहा था। वह रात भर टकटकी लगाए उस बेरहम तस्वीर को निहारता रहा और भीतर ही भीतर गलता रहा। आख़िरकार, वह करता भी क्या? बेबसी की हद हो चुकी थी। वह अंदरूनी तौर पर इस कदर टूट चुका था कि धीरे-धीरे गहरे अवसाद (डिप्रेशन) के उस दलदल में धँस गया जहाँ सारे अहसास सुन्न हो जाते हैं। अब न तो जिस्म पर लगने वाली चोटों का कोई दर्द बचा था, और न ही पेट की भूख की कोई फिक्र। वह ज़िंदा तो था, मगर इस दुनिया से बहुत दूर किसी ऐसी जगह चला गया था जहाँ सिर्फ सन्नाटा था।
इस हादसे को गुज़रे अब कई साल बीत चुके हैं। मगर विनय का दिल अब एक ठंडे पत्थर जैसा हो गया है। अब कोई उसकी ज़िंदगी में आए या उसे अकेला छोड़कर चला जाए, उसके जज़बातों में कोई हलचल नहीं होती। मानो उसकी सादगी भरी दुनिया से वह एक शख्स क्या विदा हुआ, अपने साथ विनय के हिस्से की पूरी कायनात ही समेट ले गया। वक्त गुज़र रहा है, घाव पुराने हो रहे हैं, मगर मोनिका की यादें आज भी उसकी रूह से वैसी ही लिपटी हैं। समझ नहीं आता कि यह मोहब्बत थी या कोई साज़िश, पर उसकी हँसती-खेलती ज़िंदगी में ऐसा तूफ़ान आया कि तबाही के बाद अब सिर्फ राख का ढेर बाकी रह गया था...

 इसी कशमकश में वक्त का कारवां आगे बढ़ता रहा और देखते-देखते एक साल और गुज़र गया। साल 2024 अपनी पूरी रफ़्तार से चल रहा था और फिषाओं में 'होली' के त्योहार की आहट गूँजने लगी थी। पास के ही मकान में रहने वाली वो चुलबुली लड़की, अनुष्का, अब वक्त के साथ सयानी हो चुकी थी। शायद उसे विनय की इस वीरान हालत पर तरस आ रहा था या फिर उसके दिल में कोई और जज़्बात करवट ले रहा था। 

अध्याय: एकतरफ़ा चाहत की दहलीज़

एक दिन होली की उस शाम, अचानक विनय के फोन की स्क्रीन चमकी और अनुष्का का एक पैगाम नुमाया हुआ, "हेलो... क्या कर रहे हो आप?"
विनय ने बेरुखी से जवाब टाइप किया, "कुछ विशेष नहीं... बस अकेले छत पर बैठा हूँ और दूर जलती हुई होलिका की लपटों को देख रहा हूँ। तुम बताओ, तुम्हारी होली कैसी कट रही है?" अनुष्का ने लिखा, "बस यूं ही... कहीं दिल नहीं लग रहा था, तो ख़याल आया कि क्यों न आपसे थोड़ी गुफ़्तगू कर लूँ।" विनय का ज़ख्मी दिल इस बेतुकी बात पर थोड़ा चिढ़ गया, उसने लिखा, "अच्छा! तो अपना जी बहलाने के लिए तुम्हें मैं ही मिला? क्या मैं कोई खिलौना हूँ, जिससे जब चाहा थोड़ा खेला और मन भर जाने पर किनारे कर दिया?" अनुष्का घबरा गई, उसने फौरन लिखा, "अरे नहीं-नहीं, आप तो नाहक ही रूठ गए। मैं तो बस आपसे अपने दिल की कोई बात साझा करना चाहती थी।"
विनय ने संजीदगी से पूछा, "कैसी बात? कहो, क्या कहना है?" अनुष्का ने थोड़ी झिझक के बाद पूछा, "मैं बस यह जानना चाहती थी कि... क्या आपकी मोनिका दीदी से अब भी कोई बात होती है? या सब ख़त्म हो गया?" विनय के सीने में एक टीस उठी, उसने लिखा, "पूरे पाँच साल का लंबा अरसा बीत चुका है अनुष्का... उस मोड़ के बाद आज तक हमारी एक भी बात नहीं हुई।" अनुष्का ने बस इतना लिखा, "अच्छा जी..." और विनय ने भी बात ख़त्म करने के लहज़े में लिख दिया, "हाँ जी सरकार।"
लेकिन अनुष्का आज रुकने वाली नहीं थी। उसने अपनी पूरी हिम्मत बटोरी और स्क्रीन पर वो शब्द लिख दिए जिसकी विनय को उम्मीद नहीं थी, "मैं... मैं आपको पसंद करने लगी हूँ।" विनय ने ज़हर के घूंट जैसी एक फीकी मुस्कान के साथ जवाब दिया, "चलो, यह तो जानकर अच्छा लगा कि इस मतलबी दुनिया में कोई तो है जिसे मुझ जैसा हारा हुआ इंसान पसंद आया।" अनुष्का ने तुरंत बात को सुधारा, "आप समझ नहीं रहे हैं... वह महज़ एक आम पसंद नहीं है। मैं आपसे बेपनाह मोहब्बत करने लगी हूँ।"
इस पैगाम को पढ़कर विनय के हाथ कुछ पलों के लिए ठिठक गए। उसने एक गहरी साँस ली और तल्ख़ी से पूछा, "मोहब्बत? कैसा प्यार और कैसी मोहब्बत? आख़िर क्या बला होती है यह? मैं इन सब वादों और शब्दों से अब बहुत दूर आ चुका हूँ।" अनुष्का ने बड़ी मासूमियत से उसे समझाने की कोशिश की, "वही प्यार जो दो रूहों के दरमियां होता है विनय... जहाँ दो दिल एक-दूसरे में इस कदर मिल जाते हैं कि जुदा नहीं हो पाते, उसे ही तो प्यार कहते हैं।"
विनय ने बिना पल गँवाए, बेहद सलीके और दो-टूक अंदाज़ में अपनी किस्मत का आखिरी सच उसके सामने रख दिया, "अगर दिल के मिलने को ही मोहब्बत कहते हैं अनुष्का, तो मेरा यह सौदा बहुत पहले ही मुकम्मल हो चुका है। मेरा यह दिल तो बरसों पहले ही किसी और के पास गिरवी रखा जा चुका है... और यह हकीकत तो शायद तुमसे बेहतर कोई नहीं जानता।"
अनुष्का ने स्क्रीन पर शब्दों को पिरोते हुए लिखा, "हाँ विनय, मैं मोनिका दीदी के अतीत से भली-भाँति वाकिफ़ हूँ। मगर हक़ीक़त यह है कि वो अब किसी और के आँगन की लक्ष्मी बनकर अपनी गृहस्थी में खुश हैं। और एक आप हैं, जो आज भी एक ख़ामोश साए की तरह उनकी राह तक रहे हैं। मैं किसी और के बारे में नहीं जानती, पर मैं आपसे सचमुच बेपनाह मोहब्बत करती हूँ।"
विनय ने एक ठंडी आह भरी और दो-टूक शब्दों में जवाब दिया, "अनुष्का, मोहब्बत एकतरफ़ा तराज़ू पर नहीं टिकती। अगर तुम्हारे दिल में मेरे लिए जज़्बात हैं, तो वैसी ही हलचल मेरे सीने में भी तो होनी चाहिए? पर सच तो यह है कि मेरे हिस्से का प्यार सिर्फ और सिर्फ मोनिका के नाम पर ख़त्म हो चुका है, अब किसी और के लिए वहाँ कोई गुंजाइश नहीं है। मेरे दिल के सूने कौने में तुम्हारे लिए प्यार वाली वो कशिश आज तक पैदा नहीं हुई, यार।"
अनुष्का का दिल जैसे तड़प उठा, उसने अपनी पूरी रूह उड़ेलते हुए लिखा, "आपके दिल में नहीं है तो क्या हुआ, मेरे दिल में तो आपके नाम की धड़कनें चौबीसों घंटे चलती हैं ना! मैं बरसों से इस एहसास को सीने में छुपाए घूम रही थी, पर कभी लबों तक लाने का हौसला नहीं मिला। आज ज़माने भर की हिम्मत बटोर कर कह रही हूँ— आई लव यू। खुदा के लिए एक बार... बस एक बार आप भी कह दीजिए ना कि आपको मुझसे मोहब्बत है।"
विनय ने बेबसी से सिर झुकाया और टाइप किया, "अरे पगला गई हो क्या, मैं झूठ कैसे कह दूँ? इस ज़ख्मी दिल के खंडहर में अब किसी नई चाहत के बसर करने के लिए कोई जगह बाकी नहीं बची है। सच कहूँ तो अब किसी और से इश्क़ करने का मेरा हौसला ही टूट चुका है। पर मैं हैरान हूँ अनुष्का, मुझ जैसे बिखरे और बेनूर इंसान में तुम्हें ऐसा क्या दिख गया, जो तुम इस कदर दीवानी हो रही हो?"
अनुष्का की आँखों से शायद इस मोड़ पर आँसू छलक आए होंगे, उसने लिखा, "मोहब्बत वज्र नहीं ढूँढती विनय, वह तो सादगी पर ठहरती है। मैं आपको तब से चाहने लगी हूँ जब मैंने होश सँभाला था। दुनिया के लिए आप जैसे भी हों, पर मेरी नज़र में आप बेहद नायाब और पाक दिल इंसान हैं। आपका यह ठहराव, आपका गंभीर स्वाभिमान और लोगों से बात करने का यह सलीका... यह सब इस मतलबी दुनिया में सबसे जुदा है। मैं आपके इसी अनूठे वजूद से बेइंतहा प्यार करती हूँ।
"अध्याय: समझौतों के रंग और यादों की बंदिश

अनुष्का के बेसाख्ता इक़रार से घबराकर विनय ने खुद को पीछे खींचने की आखिरी कोशिश की। उसने जानबूझकर एक झूठ का ताना-बाना बुना और लिखा, "अनुष्का, ज़रा दुनिया को खुली आँखों से देखो, बाहर मुझसे कहीं बेहतर और मुकम्मल लड़के मिल जाएँगे। आख़िर मुझ जैसे टूटे हुए इंसान में ही तुम्हें ऐसा क्या दिखता है? मैं कोई भला लड़का नहीं हूँ, मुझमें बेहिसाब ऐब और बुरी आदतें हैं। सच तो यह है कि मेरी ज़िंदगी में पहले से ही चार-पाँच लड़कियाँ हैं... मैं तुम्हारे जज़्बातों के काबिल नहीं हूँ यार, मुझे मेरे हाल पर छोड़ दो।"
मगर अनुष्का की दीवानगी इस बनावटी सच से डिगने वाली नहीं थी। उसने बिना पल गँवाए साफ़ शब्दों में लिख दिया, "आप खुद को बुरा कहें या गुनहगार, मेरे दिल पर इसका कोई असर नहीं होने वाला। इस ज़माने की भीड़ में मुझे किसी और से कोई सरोकार नहीं, मुझे तो बस आपका वो साथ चाहिए जिसे आप छुपा रहे हैं। मेरी मोहब्बत सिर्फ आप पर शुरू होती है और आप ही पर ख़त्म... आई लव यू।"
विनय ने जब देखा कि उसके सारे तीर नाकाम हो चुके हैं, तो उसने थककर एक बीच का रास्ता निकाला। उसने लिखा, "अगर तुम्हारी यही ज़िद है, तो फिर एक काम करते हैं। हम दोनों आने वाले एक महीने तक एक-दूसरे के करीब रहकर देखते हैं, बातें करते हैं। अगर इन दिनों में हमें लगा कि हम एक-दूसरे के अनुकूल हैं, तो सोचेंगे; वरना बिना किसी शिकायत के अपनी-अपनी राहें जुदा कर लेंगे, मंज़ूर है?"
अनुष्का की आँखों में उम्मीद की एक नई किरण जागी, उसने तुरंत हामी भरते हुए लिखा, "हाँ, यह सौदा मुझे मंज़ूर है। हम इन दिनों महज़ अच्छे दोस्त बनकर रोज़ बातें करेंगे। इस आज़माइश से सच भी सामने आ जाएगा और दिल को तसल्ली भी मिल जाएगी।"
वक़्त का पहिया घूमा और अगली सुबह ढोल-नगाड़ों की गूँज और रंगों की बौछार के साथ 'होली' का त्योहार लेकर आई। सूरज की पहली किरण के साथ ही अनुष्का का एक चुलबुला पैगाम विनय के फोन पर चमका, "आपको होली की ढेरों शुभकामनाएँ... हैप्पी होली।"
विनय ने भी शिष्टाचार निभाते हुए जवाब दिया, "तुम्हें भी रंगोत्सव की बहुत-बहुत बधाई। और बताओ, आज सुबह-सुबह क्या मसरूफ़ियत है?"
अनुष्का ने मानो मन ही मन मुस्कुराते हुए लिखा, "कोई मसरूफ़ियत नहीं... बस पलकें बिछाए आपके इसी एक पैगाम का इंतज़ार कर रही थी।"
विनय ने थोड़ा ठिठककर तंज़ कसते हुए लिखा, "अच्छा सरकार जी! हमारे एक छोटे से मैसेज के लिए इतनी व्याकुलता? वैसे, सुबह की रसोई का क्या हुआ, कुछ भोजन वगैरह किया तुमने या नहीं?"
अनुष्का ने जवाब दिया, "नहीं विनय, अभी पेट में एक निवाला भी नहीं गया है। आज होली का हुड़दंग है ना, इसलिए घर के सारे लोग सुबह से ही रंगों में सराबोर होकर होली खेलने में व्यस्त हैं, रसोई तो अब इसके बाद ही सँभाली जाएगी।"
होली के रंगों के बीच विनय और अनुष्का की यह आज़माइशी दास्तान एक नया रुख ले रही है।

अध्याय: बेरंग रातों में नए सवेरे की आहट

विनय ने बात को आगे बढ़ाते हुए पूछा, "आज फागुन का इतना बड़ा त्योहार है, तुम रंगों से दूर क्यों बैठी हो अनुष्का?"
अनुष्का ने थोड़ा नाक-भौं सिकोड़ते हुए जवाब दिया, "मुझे ये हुड़दंग और रासायनिक रंग बिल्कुल पसंद नहीं हैं विनय। इनसे सिर्फ त्वचा खराब होती है और चेहरा बिगड़ जाता है। छोड़ो मेरी बात, तुम बताओ, तुम क्यों इस उत्सव से खुद को अलग किए बैठे हो?"
विनय ने एक लंबी और उदास साँस खींची, फिर स्क्रीन पर लिखा, "मेरा मन इन सब चीज़ों से बहुत पहले ही उचट चुका है। और सच तो यह है कि मेरी जिंदगी में अब ऐसा कोई अज़ीज़ बचा ही नहीं, जिसके गालों पर मैं मोहब्बत का गुलाल मल सकूँ। जब तक़दीर ने साये ही बेरंग कर दिए हों, तो फिर क्या होली और कैसी दीवाली!"
विनय के इस गहरे दर्द को भाँपते हुए अनुष्का ने आहिस्ता से कुरेदा, "क्या... क्या इस वक़्त भी आपको मोनिका जीजी की याद सता रही है?"
"नहीं तो! भला मैं उन्हें क्यों याद करूँगा? मैं तो उन्हें कब का अपने दिलो-दिमाग़ से मिटा चुका हूँ।"— विनय ने ऊपर से तो यह लिख दिया, मगर सच यह था कि वह केवल अपने ज़ख्मी दिल को झूठी सांत्वना दे रहा था।
अनुष्का ने उसे संभालते हुए लिखा, "आप बिल्कुल सही कह रहे हैं विनय। वो अब किसी और के संसार को रोशन कर रही हैं, अपनी अलग दुनिया में मसरूफ़ हैं। अब वक़्त आ गया है कि आप भी इस अतीत के पिंजरे से आज़ाद हों और अपनी ज़िंदगी का एक नया सफ़र शुरू करें। सफ़र-ए-ज़िंदगी में मुसाफ़िर तो आते-जाते ही रहते हैं।"
विनय को अनुष्का की बातों में एक गहरा सच महसूस हुआ। उसने हार मानते हुए लिखा, "शायद तुम ठीक कह रही हो अनुष्का। अब इस अधूरे अतीत का बोझ ढोते-ढोते थक चुका हूँ, अब एक नई शुरुआत करनी ही होगी। बरसों बीत गए किसी परछाईं के पीछे खुद को पागल बनाए हुए। किसे पता, जिसके लिए मैं पल-पल घुटता रहा, उसे अब मेरा ख़याल आता भी होगा या नहीं।"
माहौल को ज़्यादा भारी होता देख अनुष्का ने बात का रुख मोड़ा और लिखा, "हाँ विनय! चलिए, अब यह बातें बाद में करेंगे, पहले मैं रसोई सँभाल लूँ और कुछ भोजन कर लूँ, ठीक है?"
विनय ने जवाब दिया, "हाँ बिल्कुल, जाओ, पहले खाना खा लो।"
होली की उस अनकही बातचीत ने उनके बीच की जमी हुई बर्फ को पिघला दिया था। इसके बाद अगले दो-तीन दिनों तक उनके बीच फोन पर बातों, हँसी-मज़ाक और ठिठोलियों का एक अनवरत सिलसिला चल पड़ा। जो पुराना पड़ोस का रिश्ता था, वह अब एक बेहद रूहानी और गहरी दोस्ती में तब्दील हो चुका था। आलम यह था कि दोनों बिना एक-दूसरे की आवाज़ सुने या संदेश पढ़े रह नहीं पाते थे। रात के सन्नाटे में, जब पूरी दुनिया सो जाती थी, तब घड़ी में एक और दो बजे तक उनकी सरगोशियाँ चलती रहती थीं। कभी-कभी तो बात यहाँ तक पहुँच जाती थी कि 
बातें करते-करते कब रात ढल जाती और कब सुबह की पहली किरण खिड़की से झाँकने लगती, दोनों को वक़्त का गुज़रना महसूस ही नहीं होता था।

अध्याय: मर्यादा की लकीर और उम्र भर का मलाल

 विनय को इस बात की भनक भी नहीं लगी कि कब, कैसे और किस पल अनुष्का ने उसके वीरान दिल में मोनिका की खाली छोड़ी हुई जगह को धीरे-धीरे भरना शुरू कर दिया था। वह बेख़बर था कि उसका ज़ख्मी दिल किसी नए मरहम को कुबूल कर रहा है।_ लेखक: मुकुल तिवारी जी की एक शायरी है __
ज़ख्म पुराना था, मगर मरहम नया होने लगा,
विनय बेखबर था, और दिल अनुष्का का होने लगा।
मोनिका की छोड़ी खाली जगह, अब भरने लगी है,
पता न चला कब वीरान दिल में, अनुष्का रहने लगी है।

मगर कुछ दिनों बाद अचानक विनय के भीतर सोए हुए अतीत ने करवट ली और उसके विचारों का रुख बदल गया। उसे आत्मग्लानि होने लगी कि वह जो कुछ भी कर रहा है, वह बहुत बड़ी ख़ता है। उसने अपनी रूह को केवल एक ही स्त्री (मोनिका) के नाम पर समर्पित किया था, तो फिर आज उसकी ज़िंदगी में यह दूसरी लड़की कैसे दाखिल हो रही है? यह द्वंद्व उसे भीतर ही भीतर कचोटने लगा। उसने मन ही मन फैसला किया कि उसे अनुष्का से दूरी बना लेनी चाहिए। मगर रास्ता क्या था? उसने सीधे-सीधे मना करके देख लिया था, पर अनुष्का की निश्छल मोहब्बत टस से मस नहीं हुई थी। जब उसने 'चार-पाँच दिन' का वो समझौता किया था, तब उसे कहाँ अंदाज़ा था कि महज़ चंद दिनों की ये सरगोशियाँ उनके दरमियां इस कदर प्यार का जाल बुन देंगी! वह इस अनचाहे मोड़ से बिल्कुल बेख़बर था।
आखिरकार एक रात, वही हुआ जिसका डर था। अनुष्का का एक सहज पैगाम आया, "क्या कर रहे हो आप?" विनय ने संक्षेप में लिखा, "कुछ नहीं।" औपचारिक बातों का सिलसिला शुरू हुआ, लेकिन विनय के दिमाग़ में एक भयानक साज़िश चल रही थी। उसने ठान लिया था कि आज वह कोई ऐसा कड़वा तीर छोड़ेगा जिससे अनुष्का हमेशा के लिए उसका दामन छोड़ दे। वह दिल से ऐसा नहीं चाहता था, पर उसने अपनी मर्दानगी और मर्यादा को ताक पर रखकर अनुष्का को कुछ ऐसा लांछन लगा दिया, कुछ ऐसा घिनौना बोल दिया जिसे मैं यहाँ कागज़ पर उतारने की हिमाक़त नहीं कर सकता; क्योंकि यहाँ बात एक मासूम लड़की की अस्मत और इज़्ज़त की है।
उस अपमानजनक शब्द को पढ़ते ही अनुष्का के स्वाभिमान को गहरी ठेस लगी। उसका ग़ुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया और उसने विनय से अपने सारे राब्ते, सारी बातें हमेशा-हमेशा के लिए ख़त्म कर दीं। विनय का क्रूर पैंतरा कामयाब हो चुका था; जैसा उसने चाहा था, ठीक वैसा ही हुआ।
इस खामोशी को ओढ़े पूरा एक साल का लंबा अरसा बीत गया। न तो उस पार से कभी अनुष्का का कोई संदेश आया और न ही इस पार से विनय ने उसे मनाने की हिम्मत की। फिर एक उदास शाम, तन्हाई से घिरे विनय ने पुरानी यादों के झरोखे को टटोला और वह अनुष्का के साथ बिताए उन चंद हसीन दिनों की चैट पढ़ने लगा। स्क्रोल करते-करते उसकी नज़र अचानक उसी ज़हरीले शब्द पर जाकर ठहर गई, जो उसने एक साल पहले अनुष्का को ज़लील करने के लिए कहा था। उस शब्द को देखते ही विनय का सीना अपराधबोध और गहरे अफ़सोस से भर गया। आँखें भीग गईं और रूह चीख उठी कि मैंने अपनी वफ़ादारी साबित करने के चक्कर में, एक बेगुनाह दिल के साथ बहुत बड़ा अनर्थ कर दिया..
अध्याय: अधूरी माफ़ी और तक़दीर का बुलावा
...वह कठोर शब्द उसके होठों से निकल तो गए, पर उसके तुरंत बाद विनय का ज़मीर जाग उठा। उसे शिद्दत से अहसास हुआ कि वफ़ादारी के नाम पर जो तीर उसने चलाया था, उसने एक बेगुनाह रूह को लहूलुहान कर दिया है। वह एक आत्मग्लानि थी, एक ऐसी भूल जो उसे हर पल भीतर ही भीतर दीमक की तरह खाए जा रही थी। इस पश्चाताप से मुक्ति पाने के लिए उसने आख़िरकार अनुष्का से माफ़ी माँगने का इरादा किया और काँपते हाथों से उसे एक संदेश भेजा। पूरे एक साल के लंबे सन्नाटे के बाद उसने सिर्फ अपनी उस एक खता की माफ़ी के लिए दस्तक दी थी। मगर अनुष्का के दिल पर लगा ज़ख्म गहरा था; उसने विनय के उस 'हेलो' का कोई जवाब नहीं दिया और खामोशी की चादर ओढ़े रखी।
वक़्त का पहिया घूमता रहा और कैलेंडर के पन्नों पर अब साल 2025 दर्ज हो चुका था। इन बीते दिनों ने विनय को उम्र से पहले ज़िम्मेदार और समझदार बना दिया था, और उधर अनुष्का भी अब लड़कपन की दहलीज़ लांघकर एक बेहद शालीन और अतीव ख़ूबसूरत युवती में ढल चुकी थी। नववर्ष की सुबह, विनय ने एक बार फिर उम्मीद का दामन थामा और उसे "हैप्पी न्यू ईयर" का संदेश भेजा। इस बार तक़दीर थोड़ी मेहरबान हुई और अनुष्का का संक्षिप्त सा जवाब आया— "सेम टू यू"।
इस एक संदेश ने विनय के हौसले को हवा दी। उसने तुरंत लिखा, "अनुष्का, क्या आज शाम तुम मुझसे मिलने पार्क आ सकती हो? मुझे तुमसे बहुत ज़रूरी बात करनी है।" दरअसल, विनय का व्याकुल दिल उसके सामने हाथ जोड़कर अपनी उस पुरानी घिनौनी भूल की माफ़ी माँगना चाहता था। अनुष्का ने कुछ देर बाद पूछा, "कितने बजे आना है?" विनय ने उत्सुकता से जवाब दिया, "ठीक शाम 5 बजे।"
विनय नियत समय पर सज-धज कर पार्क पहुँच गया। घड़ी की सुइयाँ आगे बढ़ती रहीं, सूरज ढलने लगा, मगर अनुष्का का दूर-दूर तक कोई सुराग नहीं था। इंतज़ार की घड़ियाँ कड़े इम्तिहान में बदल गईं; शाम के 5 से 7 बज गए, पार्क में अंधेरा पसर गया, पर वह नहीं आई। विनय भारी कदमों और उदास मन के साथ वापस अपने सूने घर लौट आया। उसने अपने दिल को तसल्ली दी कि शायद वह किसी घरेलू काम में व्यस्त हो गई होगी। इसके बाद भी विनय ने कई बार मुलाक़ात के प्रयास किए, पर अनुष्का ने हर बार उसकी उम्मीदों पर पानी फेर दिया।
थक-हारकर विनय ने अब कोशिशें करना छोड़ दिया था। उसने सोच लिया कि शायद किस्मत को यही मंज़ूर है। मगर वह गुनाह, वो कड़वा शब्द आज भी उसके सीने में एक फाँस की तरह चुभता था। वह जानता था कि जब तक वह आमने-सामने अनुष्का की आँखों में देखकर उससे माफ़ी नहीं माँग लेता, उसकी आत्मा को चैन नहीं मिलेगा। दिन यूँ ही बेरंग गुज़रते रहे और विनय अपने डेकोरेशन के काम में दिन-रात खुद को झोंकता रहा। फिर एक दिन, काम के सिलसिले में एक मैरिज होम में सजावट करते समय, अचानक उसकी नज़रें उठती हैं और भीड़ के बीच उसे अनुष्का खड़ी दिखाई देती है...
अध्याय: अजनबी शहर, खोए हुए पते
मैरिज होम की उस भीड़ में विनय बदहवास सा अनुष्का के पीछे भागा, मगर तक़दीर की आँखमिचौली देखिए, वह पलक झपकते ही नज़रों से ओझल हो गई। उस दिन के बाद भी वह कई मर्तबा शहर के अलग-अलग कोनों में विनय को दिखाई तो दी, पर दोनों के बीच बातचीत की कोई दहलीज़ दोबारा न सज सकी। वक्त गुज़रता गया और वह अपने पुराने ठिकाने को छोड़कर भी कहीं दूर जा चुकी थी। वह अब किस आसमान के नीचे सांस ले रही है, इस बात से विनय पूरी तरह बेख़बर था। कई बार विनय के पछताते दिल ने चाहा कि वह उसके घर जाकर घुटनों के बल बैठकर अपनी उस एक भूल की माफ़ी माँग ले, पर वह मजबूर था; क्योंकि वह अनुष्का का नया पता तक नहीं जानता था। यह थी अनुष्का और विनय के दरमियां गुज़री वो अधूरी दास्तान, यानी— 'एक किराएदार ऐसा भी' जो आया तो जीवन में रंग भरने था, मगर एक गहरी कसक बनकर हमेशा के लिए विदा हो गया।
अनुष्का का अध्याय बंद होने के बाद, यह दास्तान एक बार फिर मुड़कर उसी पुराने ज़ख्म पर आ ठहरती है— मोनिका और विनय की कहानी। मोनिका, जिसकी शादी हो चुकी है और विनय, जो आज भी अपनी रूह के उस छूटे हुए हिस्से को एक बार छूने के लिए बेकरार है। ज़माने वाले सच ही कहते हैं कि "अगर दिल में सच्चा जज़्बा हो, तो दिल्ली दूर नहीं होती"। मगर विनय की बदकिस्मती देखिए, उसके लिए दिल्ली सात समंदर पार जितनी दूर हो गई थी। पूरे आठ साल का एक लंबा और थका देने वाला अरसा बीत चुका था मोनिका से बिछड़े हुए, मगर वह आज तक इस बात से महरूम था कि दिल्ली के किस कोने में उसकी मोनिका बसती है...
वक़्त की सुइयां सरकती रहीं और कुछ ही दिनों में साल 2026 ने भी दस्तक दे दी, मगर मोनिका का कोई सुराग, कोई ख़त, कोई पता विनय के हाथ न लगा। विनय का अकेलापन अब एक भयानक हताशा और अवसाद में बदलने लगा था। उसकी यह बेबसी देखकर उसकी बूढ़ी माँ का कलेजा भी काँप उठता था और वह बेटे के इस बिखराव से बुरी तरह तंग आ चुकी थीं। अपने भीतर सुलगती इस बेचैनी और मन की शांति को ढूँढने के लिए विनय बंजारा बन गया— उसने कभी राजस्थान की रेतीली हवाओं में ख़ामोशी तलाशी, कभी मथुरा की गलियों में कान्हा को पुकारा, तो कभी दूर सुदूर तमिलनाडु के समंदर किनारे जाकर रोया, पर न जाने क्यों, उसके कदम कभी उस 'दिल्ली' की तरफ नहीं उठ पाए जहाँ उसका दिल धड़कता था।
फिर भटकते हुए एक दिन, अचानक अंधेरी रात में विनय के ज़हन में उम्मीद का एक जुगनू चमका। उसे याद आया कि उसका एक पुराना दोस्त था, मोनू। मोनू कोई आम दोस्त नहीं, बल्कि रिश्ते में मोनिका के सगे मामा का बेटा था। विनय के डूबते दिल को जैसे एक तिनके का सहारा मिल गया; उसने सोचा कि क्यों न मोनू के सामने अपने दिल के सारे साफ़ पन्ने खोलकर रख दिए जाएँ, शायद वही उसे मोनिका के शहर और घर का पता दे दे। एक नई उम्मीद के साथ, विनय ने धड़कते दिल से मोनू को मिलने के लिए बुलावा भेजा। जब दोनों आमने-सामने बैठे, तो विनय ने गहरी साँस ली और उसकी आँखों में झाँकते हुए कहा, "मोनू... मुझे तुमसे अपनी ज़िंदगी की एक बेहद अज़ीज़ और ज़रूरी बात साझा करनी है..."अध्याय: सुलगते सवाल और दोस्ती का साया
विनय ने फोन पर संक्षिप्त सी गुज़ारिश की, "मोनू, तू आज शाम को बस किसी तरह 'शिव पार्क' आ जा।" मोनू ने बिना किसी हिचकिचाहट के गहरी आत्मीयता से जवाब दिया, "ठीक है भाई, मैं वक़्त पर पहुँच जाऊँगा।"
शाम ढलते ही जब विनय पार्क की ओर बढ़ा, तो उसने देखा कि मोनू पहले से ही एक बेंच पर बैठा उसका इंतज़ार कर रहा था। इस मायूस दौर में एक पुराने अज़ीज़ चेहरे को देखकर विनय के बुझे हुए चेहरे पर मुस्कान तैर गई। उसने लपक कर मोनू का हाथ थाम लिया। दोनों ने एक-दूसरे को गले लगाया, हाल-चाल पूछा और कुछ देर तक पुरानी बेफ़िक्र यादों की बातें इधर-उधर तैरती रहीं।
मगर विनय के सीने में जो तूफ़ान सुलग रहा था, वह ज़्यादा देर छुपा न रह सका। उसने माहौल की गंभीरता को भाँपते हुए कहा, "मोनू, तू महज़ मेरा यार नहीं, मेरे बचपन का वो हिस्सा है जिससे मैंने अपनी ज़िंदगी का कोई पन्ना आज तक ओझल नहीं रखा। आज जो सच मैं तेरे सामने खोलने जा रहा हूँ, उसे भी दिल में नहीं छुपा पाऊँगा... बस मेरी एक बात मानना, सब कुछ सुनकर मुझसे खफ़ा मत होना।" मोनू ने विनय के कंधे पर ढाढस का हाथ रखते हुए कहा, "अरे यार! तू बेझिझक बोल, भला मैं तुझसे क्यों बुरा मानने लगा? मैं तेरा दोस्त हूँ, तेरी परछाईं हूँ भाई।"
इस भरोसे के मिलते ही विनय के सब्र का बांध टूट गया। उसने मोनिका के साथ बिताए उन हसीन लम्हों से लेकर, उसके बिछड़ने और आठ साल की इस भयानक तड़प की पूरी दास्तान मोनू के सामने उड़ेल दी। आख़िर में अपनी भीगी आँखें उठाकर उसने पूछा, "मोनू... तू तो उसका रिश्तेदार है। क्या तुझे इल्म है कि मेरी मोनिका अब किस शहर में, किस हाल में है? उसकी शादी कहाँ हुई है और वो ठीक तो है ना?"
विनय का यह दर्द देखकर मोनू का दिल भी भर आया। उसने थोड़े शिकवे के साथ कहा, "यार विनय, तूने यह कड़वा सच मुझसे इतने साल क्यों छुपाया? अगर यह बात तूने मुझे पहले बताई होती, तो अब तक मैं कब का सब कुछ ढूँढ निकालता! पर ख़ैर, अब तू अपने इस भारी दिल को थोड़ा आराम दे और चिंता छोड़। मैं तुझसे वादा करता हूँ कि कल सूरज ढलने से पहले मैं पता लगा लूँगा कि वो कहाँ है, कैसी है और अपनी ज़िंदगी में क्या कर रही है।"
विनय की रूआँसी आँखों में कृतज्ञता के भाव उभर आए, उसने गद्गद होकर कहा, "मोनू... तू सच में एक अनमोल दोस्त है यार।" मोनू ने ज़ोर से हँसते हुए विनय का हौसला बढ़ाया और कहा, "अरे छोड़ यार, तू तो मेरे लड़कपन का यार है, तेरे लिए यह छोटा सा काम क्या मायने रखता है! तू अगर मुझसे आज किसी जानी-दुश्मन को मिटाने के लिए भी कहता, तो तेरा यह भाई पीछे नहीं हटता। और यह तो मोहब्बत का मामला है। मोहब्बत तो एक ऐसी रूहानी चीज़ है, जो दिल को भा जाए, बस उसी से बेसाख्ता हो जाती है। चल अब ये उदासी छोड़, कल तक का सब्र रख, तेरा भाई सब खबर लेकर आएगा।"मोनू की इस पक्की दोस्ती ने विनय के सूने जीवन में फिर से एक उम्मीद की अलख जगा दी है।
अध्याय: मासूम अक्स और सुदूर दक्षिण का बुलावा
उम्मीद की एक नई किरण लिए अगले ही दिन विनय और मोनू एक बार फिर उसी पार्क में आमने-सामने बैठे थे। मोनू ने कुछ हिचकिचाते हुए गंभीर लहज़े में कहा, "भाई, मोनिका इस वक़्त ठीक किस जगह रह रही है, वह पुख्ता पता तो हाथ नहीं लग सका। मगर हाँ, उसके ननिहाल के सूत्रों से यह खबर ज़रूर मिली है कि उसकी एक बेहद प्यारी सी बेटी है और वह अपने परिवार के साथ कुशल-मंगल है।" यह कहते हुए मोनू ने जेब से अपना फोन निकाला और स्क्रीन पर एक तस्वीर चमकाकर विनय के आगे कर दी।
विनय ने जैसे ही उस तस्वीर पर नज़र डाली, उसका दिल धक से रह गया। उसकी आँखें भीग गईं और होंठों पर एक रूहानी मुस्कान तैर उठी। उसने गद्गद स्वर में कहा, "अरे! यह मासूम तो हूबहू अपनी माँ पर गई है यार... बिल्कुल वैसी ही आँखें, वैसा ही भोलापन।" ज़माने की नज़रों में शायद यह एक कड़वा सच था कि मोनिका की डोली किसी और के आँगन उतरी थी और यह बच्ची भी किसी और के नाम का अक्स थी, मगर मोहब्बत के पाकीज़ा तराज़ू में विनय का दिल आज भी मोनिका को उसी शिद्दत से सजदा करता था, जैसा वह आठ साल पहले किया करता था। सच्चा प्यार भला कहाँ किसी बंधन या अधिकार का मोहताज होता है!
तस्वीर को कुछ देर निहारने के बाद विनय ने भारी मन से फोन मोनू को लौटाया और आहिस्ता से कहा, "यह अक्स मेरे पास सहेज कर रख दे भाई, मुझे भेज देना।" मोनू ने तस्वीर साझा करते हुए उसके कंधे पर हाथ रखा और तसल्ली देते हुए बोला, "तू फिक्र मत कर मेरे भाई। यह मोनू का वादा है, एक न एक दिन मैं तुझे मोनिका से रूबरू ज़रूर कराऊँगा। अब अतीत के इन काले बादलों को छटने दे, खुलकर मुस्कुरा और अपनी ज़िंदगी को एक नया मोड़ दे। अब तू तन्हा नहीं है, तेरा यह यार हर कदम पर तेरे साये की तरह साथ खड़ा है।" विनय का मन कुछ हल्का हुआ, उसने सिर हिलाकर हामी भरी, "चल, अब घर की ओर कदम बढ़ाते हैं।" मोनू खड़ा होते हुए बोला, "हाँ यार, काफी देर हो गई। कल सुबह मुझे काम के सिलसिले में नोएडा के लिए भी निकलना है।" दोनों दोस्त एक नई उम्मीद का दामन थामे घर की ओर चल पड़े।
अगली सुबह सूरज की पहली किरण के साथ ही मोनू का फोन विनय के मोबाइल पर बजा। उसने हड़बड़ी में कहा, "भाई, मैं नोएडा के लिए बस में बैठ चुका हूँ। वहाँ से जैसे ही मेरा चक्कर पूरा होगा, मैं लौटकर सीधा तुझे मोनिका से मिलवाने ले चलूँगा, बस तू अपना हौसला बनाए रखना, ठीक है?" विनय ने मुस्कुराते हुए कहा, "ठीक है भाई, अपना ख़याल रखना।" और इसके साथ ही संवाद का वह सिरा कट गया।
वक़्त अपनी बेलगाम रफ़्तार से भागता रहा, कैलेंडर के पन्ने पलटते रहे और देखते ही देखते साल 2026 ने दस्तक दे दी। फरवरी का सुहावना महीना चल रहा था, जब एक दोपहर विनय के बड़े भाई गौरव का फोन आया। भाई की आवाज़ में एक अलग ही उत्साह था, उसने कहा, "विनय, बधाई हो! मैंने यहाँ एक प्रतिष्ठित बैंक में तेरी नौकरी पक्की करवा दी है। अब इस उदासी के शहर को छोड़, अपना बोरिया-बिस्तर समेट और सीधे सुदूर दक्षिण के राज्य तमिलनाडु आ जा... तेरी ज़िंदगी की एक नई शुरुआत यहाँ तेरा इंतज़ार कर रही है।"

कहानी अब उत्तर भारत की इन तंग गलियों और यादों के साए से निकलकर सीधे सुदूर दक्षिण यानी तमिलनाडु की ओर रुख कर रही है।
अध्याय: मरुस्थल में बारिश और अधूरी दास्तान (भाग-1 का समापन)
वक़्त के बदलते ही विनय उत्तर भारत की इन तंग गलियों को छोड़, सात समंदर पार जैसी दूरी समेटकर सुदूर दक्षिण के राज्य तमिलनाडु पहुँच गया और वहाँ एक बैंक में अपनी नौकरी की ज़िम्मेदारियों में मसरूफ़ हो गया। अभी ज़िंदगी पटरी पर लौट ही रही थी कि एक शाम उसके मोबाइल की स्क्रीन पर मोनू का नाम चमका। फोन उठाते ही मोनू ने उत्सुकता से पूछा, "भाई! तू इस वक़्त कहाँ है?"
विनय ने एक शांत साँस लेकर कहा, "मैं तो बहुत दूर, तमिलनाडु आ गया हूँ भाई।"
मोनू ने अफ़सोस जताते हुए कहा, "अरे यार! तू इतनी दूर चला गया? वहाँ से कब लौट रहा है? दरअसल, मैं विक्की (दिल्ली के पास) घूमने का मन बना रहा था और सोच रहा था कि तुझे भी साथ ले चलूँ; वहीं लगे हाथ तेरी मुलाक़ात तेरी मोनिका से भी करवा देता।"
यह सुनते ही विनय अचंभित और निराश होके सोच रहा होता हैं जिस मंज़िल को वह आठ साल से ढूँढ रहा था, जब उसका रास्ता खुला, तो तक़दीर ने उसे हज़ारों किलोमीटर दूर लाकर पटक दिया था। उसने बेहद मायूसी से कहा, "यार मोनू, तूने भी किस मोड़ पर यह खबर दी! मेरी नई नौकरी है, चाहकर भी इस वक़्त छुट्टी लेकर नहीं आ सकता।" मोनू ने दिल छोटा न करते हुए कहा, "चल कोई बात नहीं भाई, निराश मत हो, फिर कभी सही।"
विनय के सब्र का बाँध टूट गया, उसने रुँधे हुए गले से कहा, "यार मोनू, समझ नहीं आता कि तक़दीर का यह कैसा खेल है! न जाने कौन सी अदृश्य दीवार है जो मुझे चाहकर भी कभी दिल्ली की सरज़मीं पर कदम रखने नहीं देती। ऐसा एक बार नहीं, कई बार हुआ है कि मैं दिल्ली के मुहाने तक, उसके आस-पास तक भटक कर लौट आता हूँ, पर उस शहर के भीतर दाखिल नहीं हो पाता। कभी-कभी रूह काँप उठती है यह सोचकर कि क्या इस जन्म में मेरी आँखें दोबारा मोनिका को देख भी पाएँगी या नहीं..."
मोनू ने अपनी दोस्ती की पूरी ताक़त विनय के लड़खड़ाते हौसले में झोंकते हुए कहा, "पागल जैसी बातें मत कर भाई! जब तक तेरा यह यार ज़िंदा है, मैं तब तक चैन की सांस नहीं लूँगा जब तक तुझे तेरी मोहब्बत से मिला नहीं देता। मेरे इस दिल को रूहानी सुकून तभी मिलेगा, जब मैं तेरी आँखों के सामने उसे खड़ा देखूँगा।"
विनय ने एक गहरी और दार्शनिक साँस खींची और कहा, "ठीक है भाई, वक़्त के हाथ में छोड़ देते हैं कि इस जीवन के सफ़र में हमारा मिलना मुमकिन लिखा भी है या नहीं। पर हाँ, दिल के किसी कोने से बस यही आवाज़ आती है कि—
अगर वो मेरी तकदीर में नहीं भी है, तो भी मेरी इस मोहब्बत की कहानी का अंत अधूरा नहीं हो सकता. वो मिले या न मिले, उसे टूटकर चाहने का जो सुकून मुझे मिला है, वो इस पूरी कायनात की किसी भी मंजिल से बढकर है।
विनय की आँखों में एक अजीब सी चमक आ गई थी, जिसमें दर्द भी था और एक गहरा सुकून भी. उसने मोनू के कंधे पर हाथ रखा और थोडा मुस्कुराते हुए आगे कहा, तेरी दोस्ती ने आज मुझे बिखरने से बचा लिया भाई. तू कहता है न कि तू चैन की साँस नहीं लेगा? पर सच तो यह है कि जब तक तेरे जैसा यार मेरे साथ खडा है, मेरी किस्मत मुझसे मुंह मोड ही नहीं सकती. अब सफर चाहे जो भी मोड ले, मुझे मंजिल की परवाह नहीं, क्योंकि राहों में मेरे पास तू है और यादों में वो।
मोनू ने विनय की बात सुनी, तो उसका दिल भर आया. उसने बिना कुछ कहे विनय को गले से लगा लिया. रात की उस खामोशी में, उन दोनों दोस्तों की खामोशियाँ जैसे एक- दूसरे से कह रही थीं कि मोहब्बत भले ही वक्त और तकदीर के फैसलों की मोहताज हो जाए, लेकिन सच्ची दोस्ती कभी घुटने नहीं टेकती.
फिर मोनू ने कहा विनय से तू अब Tension मत ले अब मैं हू तेरे साथ में मिलबाऊंगा तुझे मोनिका से.
विनय ने मुस्कुराते हुए कहा देखते हैं यार हमारा मिलना मुमकिन है या नहीं
मोनू ने कहा यार मुमकिन नहीं हुआ तो मैं उसे भी मुमकिन कर दूंगा तू अब ज्यादा Tension मत लिया कर
विनय बोल ठीक है दोस्त तेरी बात तो माननी पडेगी
तू मेरा वो दोस्तो है जिसे मैं जिंदगी भर याद रखूंगा
बस तू मुझे एक बार मोनिका से मिलवा दे बस.
वो कहते हैं एक शायरी में. joun eliya की जो है.

कि एक नजर देख लें तुझको तो चले जाएँगे,
कौन आया है यहाँ उम्र बिताने के लिए.

इस दर्दभरी शायरी को सुनकर मोनू भी भावुक हो उठा, उसने बस इतना ही कहा, वाह मेरे भाई, वाह मेरे शायर! और इसके बाद. ठीक है चल अब बहुत हो गया तेरा अब शायरी फायरी छोड और जिंदगी में मजे कर और सुन तू जब लौट कर आए तो एक बार मुझसे बात जरूर कर लेना.
विनय बोल ठीक दोस्त चल अब ठीक है मुझे बैंक जाना है मैं तुझे बाद में Call करता हूं
मोनू बोला ठीक है और Call काट दिया
ये कहानी यहां समाप्त होती.
(यहाँ इस दास्तान का पहला भाग विश्राम लेता है. )
विनय, मोनिका और अनुष्का की जिंदगी के इस त्रिकोण में आगे क्या हुआ? क्या तमिलनाडु की वादियाँ विनय के जख्मों को भर पाएँगी? क्या मोनू अपना वादा पूरा कर पाएगा? इन सब सुलगते सवालों के जवाब जानने के लिए प्रतीक्षा करें इस कहानी के दूसरे भाग की—" एक प्यार की अधूरी कहानी- एक किराएदार ऐसा भी" मेरे अजीज पाठकों, यदि विनय के इस दर्द ने आपके दिल को छुआ हो, तो मुझे जरूर बताइएगा ताकि मैं इसका अगला भाग जल्द ही आपके समक्ष ला सकूँ.
— एम. एम. तिवारी
मुकुल तिवारी
यह तिवारी जी (M. M. Tiwari) मुकुल तिवारी जी द्वारा लिखी गई एक बेहद भावुक डायरी का पहला भाग था, जो एक बहुत ही सुंदर मोड और शायरी के साथ समाप्त हुआ है.
कुछ शायरियां नीचे दी गई हैं, जिन्हें आप कहानी के अलग- अलग अध्यायों के अनुसार शामिल कर सकते हैं:
एक. विनय और मोनिका का छत पर वह रोमांस और तारों का शहर (शुरुआती दौर)
तारों की महफिल सजी थी, आसमां भी हैरान था,
हवाओं में घुला उस रात, मोहब्बत का नया पैगाम था.
वह मांग रहे थे उडने को रॉकेट जमाने से,
पर उनका तो सारा जहां, बस एक- दूसरे के नाम था.

दो. मोनिका के अचानक चले जाने पर विनय (मुकुल) का दर्द और तन्हाई
न कोई खत आया उस शहर से, न कोई पैगाम आया,
मेरी वफाओं का हिस्से में, बस ये सूना मकाम आया.
वो जो कल तक धडकन थे इस सूने आशियाने की,
आज उनकी यादों के साए में, बस ये रोता हुआ नाम आया.

तीन. चार साल बाद शादी के जोडे में मोनिका को देखकर विनय के दिल का टूटना
सजी थी वो सुर्ख जोडे में, किसी और की तकदीर बनकर,
मेरे ख्वाब टूट गए आँखों में, महज एक तस्वीर बनकर.
जिस हाथ को थामा था कभी मैंने अपनी लकीरों में,
वो आज महक रहा था किसी और की लकीर बनकर.

चार. अनुष्का का विनय के लिए एकतरफा प्यार और इकरार
तुम ढूंढते रहे जिसे अतीत के उन पिंजरों में,
मैं खडी थी वहीं, तुम्हारी उदास नजरों में.
माना कि तुम्हारा दिल गिरवी है किसी और के पास,
पर मेरी तो हर सांस धडकती है, बस तुम्हारी फिक्रों में.

पाँच. विनय का अनुष्का को दूर करने के लिए कडवे शब्द बोलना और मर्यादा का द्वंद्व
अपनी ही वफा के जाल में, मैं ऐसा उलझता चला गया,
एक बेगुनाह दिल को दुखाने का, गुनाह करता चला गया.
मर्यादा की लकीर बचाने को, जो जहर मैंने जुबां से उगला,
उस एक लफ्ज से मैं खुद अपनी ही नजरों में गिरता चला गया.

छह. कहानी का अंत: अपराधबोध, अफसोस और सन्नाटा
वक्त गुजर गया पर वो जहरीला लफ्ज आज भी जिंदा है,
पुरानी चैट के पन्नों पर, मेरा वजूद आज भी शर्मिंदा है.
न मोनिका मिली, न अनुष्का का वो निश्छल साथ रहा,
हाथों में अब बस यादों का खाली, बेरंग सा हाथ रहा.

इस कहानी का अगला भाग दो जल्दी ही आएगा.
पर आपको भाग एक कैसा लगा ये जरूर बताएं और हमे फॉलो करना न भूलें धन्यवाद आपका प्यारा लेखक मुकुल तिवारी.
मिलते हैं अगले भाग दो में.
क्या विनय दिल्ली जा पाएगा क्या उसे मोनिका मिल पाएगी. या. फिर. अनुष्का फिर विनय की जिन्दगी में वापस आएगी
उसे माफ करके उससे फिर प्यार करेगी.
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