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“वत्सर ने सभी परीक्षणों की अनुमति दे दी है। अब सत्य प्रकट होकर रहेगा।” सपन ने कहा।
“मुझे तो प्रतीत होता है कि अनुमति देकर वत्सर स्वयं हमारे व्यूह में फंस गया है।” सोनिया ने उत्साह प्रकट किया।
“बस अब आठ दिन में सारा खेल समाप्त हो जाएगा। वत्सर को फांसी भी हो सकती है। हैं न कपिल जी?” नदीम ने पूछा।
“यह सब केवल इन परीक्षणों के परिणाम पर निर्भर है। हमें तब तक प्रतीक्षा करनी होगी।” कपिल ने वस्तु स्थिति कही।
“संभव है कि वत्सर निर्दोष हो या अति चतुर – चालाक हो और परीक्षणों में वह ऐसे प्रस्तुत हो कि हम जो चाहते हैं वह परिणाम मिले ही नहीं। तब क्या कर सकते हैं?” निहारिका ने संशय प्रकट किया।
“आप सब परिणामों की चिंता ना करें। वत्सर कुछ भी उत्तर देगा, परिणाम हमारी इच्छा अनुसार ही होगा।” राहुल ने सब को आश्वस्त करना चाहा।
“कैसे होगा?”
“न्यायाधीश हमारा नहीं है तो क्या हुआ? तंत्र तो हमारा ही है। हम अपनी इच्छानुसार परिणाम न्यायालय में प्रस्तुत कर देंगे।” सपन ने अट्टहास किया। सभी ने सुर मिलाया।
“तो यह निश्चय रहा कि परिणाम हमारे पक्ष में बनेगा और सपन जी, यह दायित्व आप पर रहा।” सोनिया ने कहा।
“आप निश्चिंत रहिए। मैं और सपन यह संभाल लेंगे।”
“ठीक है निहारिका जी। इस अवसर का आनंद लिया जाए?” नदीम ने प्रस्ताव रखा। सभी दो कक्ष में बंट गए। एक कक्ष में नदीम, राहुल और निहारिका तो दूसरे कक्ष में सपन, कपिल और सोनिया रातभर आनंद लेते रहे।
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वत्सर के सभी परीक्षण सम्पन्न हो गए। परीक्षणों का परिणाम तैयार कर रहे दल के नेता विनय के कक्ष में सपन, निहारिका और कपिल विनय के आतिथ्य का लाभ ले रहे थे।
“विनय जी, आप समझ रहे हो न कि हमें क्या करना है? हमने आपको जो कहा है वही परिणाम तैयार करके हमें मिलना चाहिए।”
“जी, जी। आपने कहा वही होगा। यह तंत्र आप ही का तो है। हम तो आपके सेवक हैं।” विनय ने कहा।
सभी ने विनय की बात का सस्मित स्वागत किया।
“बस, कुछ प्रतीक्षा कर लें।” कहकर विनय उठा और कक्ष से बाहर आ गया। अपने विश्वासु साथी विकास से कुछ बात की, कुछ दिशा निर्देश दिए और कक्ष में लौट आया।
“एक काम करते हैं। आप हमारे अतिथि हैं। क्यों न हम भोजन साथ में करें। तब तक परिणाम तैयार होकर आ जाएंगे।” विनय ने प्रस्ताव रखा। सभी ने भोजन किया।
विकास ने सारे परीक्षणों के परिणाम विनय के समक्ष रख दिए। विनय ने उसे सपन, निहारिका और कपिल को पढ़ने के लिए दिए। तीनों परिणाम से संतुष्ट थे। विनय ने उस पर हस्ताक्षर कर दिया। एक आवरण में उसे डालकर, उसे बंद कर दिया। उस पर अपनी मुद्रा लगा दी।
“यह परसों न्यायालय में प्रस्तुत कर दूंगा।” विनय ने कहा।
“जी, जी। अवश्य। आप तो हमारे साथी निकले, विनय जी। समय आने पर इसका पुरस्कार मिल जाएगा। अंतत: यह तंत्र तो हमारा ही है।” निहारिका ने कहा। सभी प्रसन्न होकर विदा हो गए।
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न्यायालय का कक्ष अनेक व्यक्तियों से भरा था। सपन, निहारिका, कपिल, सोनिया, राहुल, नदीम इस कांड के अपेक्षित न्याय से प्रसन्न थे। उनकी प्रसन्नता देखकर येला, शैल और सारा विचलित थे। हरीश समग्र स्थिति का आकलन कर आनेवाले समय को कैसे संभाला जाए उसकी चिंता में, चिंतन में मग्न था। वत्सर नि:स्पृह था। दूर कोने में विनय और विकास परिणामों का आवरण पकड़े निश्चल से बैठे थे।
न्यायाधीश ने प्रवेश किया। सभी का अभिवादन कर न्यायालय का कार्य आरंभ हुआ।
कपिल ने अत्यंत उत्साह से कहा, “महाशय, सभी परिक्षणों के परिणाम प्राप्त हो चुके हैं। मुझे अपेक्षा है कि आज न्यायालय वत्सर को उचित दंड दे ही देगा। इस कांड का आज अंतिम दिन होगा। मैं विनय जी से अनुरोध करता हूँ कि सारे परीक्षणों के परिणाम न्यायाधीश के समक्ष प्रस्तुत किए जाए। वत्सर ही हत्या ...।”
“रुकिए महोदय। आप न्यायाधीश हैं क्या? इतनी अधीरता क्यों? मुझे परिणाम देखने दीजिए, समझने दीजिए।” न्यायाधीश ने कपिल को टोका।
“महाशय, परिणाम तो स्पष्ट ही है। बस आपके अंतिम निर्णय की औपचारिकता शेष है।” कपिल के शब्दों को सुनकर हरीश चिंताग्रस्त हो गए। शैल – सारा – येला आश्चर्य से दिगमूढ़ हो गए। वत्सर अभी भी स्थितप्रज्ञ था।
“उचित समय तक प्रतीक्षा करना नहीँ सिखा आपने, कपिल महोदय?” न्यायाधीश ने पुन: कपिल को टोका।
“विनय महोदय, परिणामों को प्रस्तुत करो।” विनय ने बंद आवरण न्यायाधीश के हाथों में सौंप दिया। भूपेन्द्र ने उसे खोला, ध्यान से पढ़ने लगे। पश्चात बोले, “महोदय, इन सारे परीक्षणों के परिणामों से यह स्पष्ट हो जाता है कि ...।”
“वत्सर ही इस हत्या का दोषी है। उसे मृत्यु दंड ही मिलना चाहिए ऐसी मेरी प्रार्थना है इस न्यायालय से।” उत्साह और उत्तेजना से कपिल बोल पडा।
“महोदय कपिल, यदि आप इसी प्रकार अधिवक्ता से न्यायाधीश बनने का दु:साहस करते रहोगे तो मुझे आपका अधिवक्ता होने का अधिकार भी छिनना पड़ेगा।” न्यायाधीश ने कपिल को डांटा।
“क्षमा करें महाशय। अति उत्साह में ऐसा हो गया। मेरी इस धृष्टता के लिए मैं लज्जित हूं।” कपिल नत मस्तक हो गया। उसे उस स्थिति में देखकर भूपेन्द्र कहा।
“आप जैसे वरिष्ठ अधिवक्ता को संयम रखना चाहिए। यहाँ अनेक युवा अधिवक्ता हैं जो आपके ऐसे व्यवहार से क्या सीखेंगे?”
कपिल ने मौन रहना ही श्रेयस्कर समझा।
“इन परिणामों से स्पष्ट है कि मीरा की हत्या वत्सर ने नहीं की। वह निर्दोष है।” न्यायाधीश के शब्द सुनकर सारा – येला – शैल – हरीश प्रसन्न हो उठे। कपिल – राहुल – सोनिया – सपन – निहारिका – नदीम आघात से स्तब्ध हो गए। सभी एक दूसरे को ताकने लगे। सभी के मुख पर प्रश्न था – ‘यह कैसे हो गया?’
सभी ने विनय को देखा। विनय ने उसे भाव नहीं दिया। वत्सर अभी भी निर्लेप खड़ा था।
“महाशय, यह परिणाम मिथ्या है। वास्तविक परिणाम कुछ भिन्न हैं। परिणामों को बदल दिया गया है।” कपिल ने आक्रोश व्यक्त किया।
“विनय महोदय, क्या यह सत्य है कि आपने जो परिणाम यहाँ रखे हैं वह मिथ्या है, बदले गए हैं?”
विनय उठा, न्यायाधीश के सम्मुख आया, “यह सत्य है कि जो परिणाम कपिल एवं उनके सहयोगी देखकर गए थे वह यह नहीं है। परिणाम अवश्य बदले गए हैं किन्तु केवल सत्य परिणाम ही प्रस्तुत किया गया है।”
“महाशय, परिणामों को बदला गया है ऐसा विनय ने भी स्वीकार है।” कपिल ने कहा।
“महोदय, उसने यह भी कहा है कि यह परिणाम मिथ्या नहीं, सत्य है।” हरीश ने कपिल की बात काटी।
“महोदयों, कृपया शांत हो जाइए। विनय, क्या बात है? क्या है वास्तविकता? न्यायालय के समक्ष पूरी बात रखो।”
“जी महाशय। मैं पूरी कथा सुनाता हूं।”