Vardaan - 10 in Hindi Mythological Stories by Renu Chaurasiya books and stories PDF | वरदान - 10

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वरदान - 10

राजकुमारी मंदिर से लौटकर महल पहुँची,
पर वह अपने सुंदर कक्ष में नहीं ग
उसका मन भय, चिंता और उलझन से भरा हुआ था।
इसलिए वह सीधे कोप-भवन में चली गई।
उसने अपने आभूषण उतार दिए,
मणियों का हार एक ओर रख दिया,
और चुपचाप भूमि पर बैठ गई।
उसके चेहरे की चमक फीकी पड़ चुकी थी।
मंदिर में सुनी हुई वह दिव्य वाणी बार-बार उसके कानों में गूँज रही थी—
“एक सौ एक मणियों की माला, झुमके और कंगन पहनकर आना…”
राजकुमारी ने उसी क्षण भोजन और जल का त्याग कर दिया।
उसने न कुछ खाया, न कुछ पिया।
दासियाँ उसे बहुत समझाती रहीं—
“राजकुमारी जी, कुछ तो ग्रहण कीजिए…”
पर वह मौन बैठी रही।
महल में यह समाचार फैल गया कि राजकुमारी कोप-भवन में चली गई है और उसने अन्न-जल त्याग दिया है।
जब यह बात राजा तक पहुँची,
तो उनके हृदय में चिंता की लहर दौड़ गई।
वे तुरंत उठे और अपनी बेटी को मनाने कोप-भवन की ओर चल पड़े…अगली सुबह राजा ने अपने सैनिकों को आदेश दिया कि जौहरी को तुरंत दरबार में उपस्थित किया जाए।
उधर जौहरी को जैसे ही राजमहल से बुलावा मिला, उसके मन में प्रसन्नता की लहर दौड़ गई।
वह मन ही मन सोचने लगा—
"निश्चित ही महाराज मुझे इनाम देने के लिए बुला रहे हैं। आखिर मैंने उन्हें इतनी दुर्लभ मणियाँ जो भेंट की हैं।"
यह सोचकर उसने अपने सबसे अच्छे वस्त्र पहने।
रेशमी अंगरखा, कीमती पगड़ी और चमचमाते आभूषण पहनकर वह बड़े गर्व के साथ दरबार की ओर चल पड़ा।
उसके चेहरे पर आत्मविश्वास और लालच भरी मुस्कान थी।
कुछ ही देर में वह राजदरबार में पहुँच गया।
लेकिन आज दरबार का वातावरण कुछ अलग था।
जहाँ वह जय-जयकार और सम्मान की उम्मीद कर रहा था, वहीं पूरे दरबार में अजीब-सा सन्नाटा पसरा हुआ था।
राजा का चेहरा भी गंभीर दिखाई दे रहा था।
जौहरी ने सिंहासन के सामने झुककर प्रणाम किया और बोला—
"महाराज की जय हो! आपने मुझे स्मरण किया, यह मेरा सौभाग्य है।"
राजा ने कुछ क्षण तक उसे ध्यान से देखा।
फिर गंभीर स्वर में बोले—
"जौहरी, इनाम तो बाद में मिलेगा। पहले हमें यह बताओ कि तुम वे दोनों मणियाँ कहाँ से लाए थे?"
यह सुनते ही जौहरी का हृदय एक पल के लिए काँप उठाएक पल के लिए राजा चुप हो गए।
पूरा दरबार उनकी ओर देखने लगा।
फिर राजा ने गंभीर स्वर में पूछा—
"जौहरी, क्या तुम ऐसी ही एक सौ एक मणियाँ और ला सकते हो?"
यह सुनते ही जौहरी के चेहरे का रंग उड़ गया।
कुछ क्षण पहले तक जो व्यक्ति इनाम पाने के सपने देख रहा था, अब उसके माथे पर पसीने की बूंदें चमकने लगीं।

" महाराज... एक सौ एक मणियाँ?"
राजा ने कठोर स्वर में कहा—
"हाँ, एक सौ एक मणियाँ। बिल्कुल ऐसी ही।"
दरबार में बैठे मंत्री और दरबारी भी आश्चर्य से जौहरी को देखने लगे।
जौहरी ने काँपते हुए उत्तर दिया—
"महाराज, ऐसी मणियाँ अत्यंत दुर्लभ हैं। मैंने अपने जीवन में पहली बार ऐसी मणियाँ देखी हैं।"
राजा की भौंहें तन गईं।कुछ देर तक राजा उसे ध्यान से देखते रहे।
जौहरी की हालत देखकर उन्हें समझते देर न लगी कि वह कुछ छिपा रहा है।
उसका काँपता हुआ शरीर, पसीने से भीगा चेहरा और डरी हुई आँखें उसके मन का भेद खोल रही थीं।
राजा का चेहरा कठोर हो गया।
उन्होंने ऊँचे स्वर में आदेश दिया—
"सैनिकों!"
राजा की आवाज़ सुनते ही सैनिक सावधान होकर खड़े हो गए।
"इस जौहरी को पकड़कर कालकोठरी में डाल दो।"
पूरा दरबार स्तब्ध रह गया।
राजा आगे बोले—
"और इसे तब तक कैद रखा जाए, जब तक यह हमें यह न बता दे कि ये मणियाँ कहाँ से आई हैं।"
आदेश मिलते ही सैनिक आगे बढ़े और जौहरी को पकड़ लिया।
जौहरी भय से काँप उठा।
"महाराज! दया कीजिए... मैंने कोई अपराध नहीं किया..."
पर राजा ने उसकी एक न सुनी।
कुछ ही क्षणों में सैनिक उसे दरबार से बाहर ले गए।उसे कालकोठरी में डाल दिया गया।
राजा के आदेश के अनुसार उससे पूछताछ की जाने लगी।
रोज उससे एक ही प्रश्न पूछा जाता—
"सच-सच बता, ये मणियाँ तुझे कहाँ से मिलीं?"
और इस प्रकार जौहरी अंधेरी कालकोठरी में अपने भाग्य की प्रतीक्षा करने लगा।जब जौहरी तीन दिन तक घर नहीं लौटा, तो उसका बेटा बहुत चिंतित हो गया।
पहले दिन उसे लगा कि शायद उसके पिता किसी काम से बाहर गए होंगे।
दूसरे दिन भी उसने धैर्य रखा।
पर जब तीसरा दिन भी बीत गया और जौहरी का कोई समाचार नहीं मिला, तो उसका मन घबराने लगा।
आखिरकार उसने अपने पिता को खोजने का निश्चय किया।
अगली सुबह वह राजमहल की ओर चल पड़ा।
डरते-डरते वह दरबार के द्वार पर पहुँचा और वहाँ खड़े सैनिकों से बोला—
"मुझे मेरे पिता के बारे में जानना है। वे तीन दिन से घर नहीं लौटे हैं।"
सैनिकों ने एक-दूसरे की ओर देखा।
फिर उनमें से एक सैनिक बोला—
"क्या तुम्हारे पिता वही जौहरी हैं जो कुछ दिन पहले महाराज को दो मणियाँ भेंट करने आया था?"
लड़के ने सिर हिलाकर हाँ कहा।
यह सुनकर सैनिक ने गंभीर स्वर में उत्तर दिया—
"तुम्हारे पिता कालकोठरी में बंद हैं।"
यह सुनते ही लड़के के पैरों तले से जमीन खिसक गई।
उसकी आँखें फैल गईं और उसके चेहरे का रंग उड़ गया।
वह स्तब्ध खड़ा रह गया...।फिर उसने गहरी साँस ली, अपने आँसू पोंछे और खुद को संभाला।
वह सैनिकों के पास गया और दृढ़ स्वर में बोला—
"मुझे महाराज से मिलना है।"
सैनिकों ने आश्चर्य से उसकी ओर देखा।
"महाराज से? किस लिए?"
लड़के ने उत्तर दिया—
"मैं बता सकता हूँ कि वे मणियाँ कहाँ से आई थीं।"
यह सुनते ही सैनिक चौंक उठे।
उन्होंने तुरंत यह समाचार दरबार के अधिकारियों तक पहुँचाया।
कुछ ही देर बाद आदेश आया कि लड़के को महाराज के सामने प्रस्तुत किया जाए।
लड़के का हृदय तेज़ी से धड़क रहा था।
वह धीरे-धीरे दरबार की ओर बढ़ने लगा।आज उसे ऐसा सत्य बताना था जो बहुत दिनों से उसके हृदय पर बोझ बनकर पड़ा था।पर वह अपने पिता के लिए सत्य नहीं छिपा सकता था।
वह जानता था कि उसके पिता ने लालच में आकर बहुत बड़ी भूल की है।
उसके मन में अपने पिता के लिए प्रेम था, पर उससे भी अधिक उसके मन में सत्य के लिए सम्मान था।
वह सोच रहा था—
"यदि मैंने झूठ बोला, तो  अन्याय होगा। और यदि मैंने सच कह दिया, तो शायद मुझे भी अपने पिता के साथ जेल में डाल दिया जाएगा।"
लेकिन फिर भी उसने सत्य का मार्ग चुनने का निश्चय किया।
दृढ़ कदमों से वह दरबार में पहुँचा।
राजा के सामने पहुँचकर उसने हाथ जोड़कर प्रणाम किया और बोला—
"महाराज, मैं आपको सब कुछ सच-सच बताने आया हूँ।"
उसकी आवाज़ में भय था, पर उससे कहीं अधिक साहस था।राजा के सामने खड़े होकर लड़के ने काँपती हुई आवाज़ में कहा—
"महाराज, मेरा एक मित्र है। वह गाँव में गाय-बकरियाँ चराता है। ये दोनों मणियाँ उसी की हैं।"
पूरा दरबार स्तब्ध रह गया।
लड़के ने आगे कहा—
"मेरे पिता के कहने पर मैंने उसकी एक मणि चुरा ली थी। बाद में मेरे पिता ने मुझे दूसरी मणि भी लाने के लिए कहा।"
उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।
"लेकिन मैं अपने मित्र से चोरी नहीं करना चाहता था। जब मैंने उसे सारी बात सच-सच बता दी, तो उसने स्वयं ही अपनी दूसरी मणि मुझे दे दी।"
दरबार में सन्नाटा छा गया।
राजा ध्यान से उसकी बात सुन रहे थे।
लड़के ने आगे कहा—
"महाराज, उसने मुझसे कहा था कि यदि वह चाहे, तो ऐसी लाखों मणियाँ ला सकता है।"
यह सुनते ही दरबार में फुसफुसाहट होने लगी।
मंत्री एक-दूसरे की ओर देखने लगे।
राजा की आँखों में आश्चर्य झलक उठा।
उन्होंने गंभीर स्वर में पूछा—
"वह लड़का कौन है?"
लड़के ने सिर झुकाकर उत्तर दिया—
"महाराज, उसका नाम वरदान है।"फिर वह आगे बोला—
"वह हमारे पड़ोस के गाँव में अपनी माँ के साथ रहता है। उसके पिता नहीं हैं। उसकी माँ लोगों के घरों में काम करती है और उसी से अपना और अपने बेटे का पालन-पोषण करती है।"
"वरदान भी अपनी माँ की सहायता करता है। वह गाँव वालों की गाय और बकरियाँ चराता है।"
लड़के की बात सुनकर दरबार में बैठे सभी लोग आश्चर्य से एक-दूसरे का मुँह देखने लगे।
एक मंत्री अविश्वास से बोला—
"एक साधारण ग्वाला लड़का ऐसी दुर्लभ मणियों का स्वामी कैसे हो सकता है?"
लेकिन जौहरी का बेटा दृढ़ता से बोला—
"महाराज, मैं सत्य कह रहा हूँ। मैंने अपनी आँखों से उन मणियों को उसके पास देखा है। वह उन्हें कंचों की तरह खेल में इस्तेमाल करता था।"
यह सुनते ही पूरे दरबार में हलचल मच गई।
राजा कुछ देर तक गहरी सोच में डूबे रहे।
उनके मन में बार-बार एक ही प्रश्न उठ रहा था—
"आखिर एक गरीब चरवाहे के पास ऐसी अद्भुत मणियाँराजा ने कुछ क्षण तक विचार किया।
फिर उन्होंने अपने सैनिकों को बुलाया और आदेश दिया—
"तुरंत उस लड़के को हमारे सामने प्रस्तुत किया जाए।"
"जाओ, उस वरदान को उसके गाँव से सम्मानपूर्वक यहाँ लेकर आओ।"
सैनिकों ने झुककर आदेश स्वीकार किया और तुरंत महल से निकल पड़े।
उधर जौहरी का बेटा अब भी दरबार के बीच खड़ा था।
उसने जो कुछ जाना था, सब सच-सच बता दिया था।
राजा ने उसकी ओर देखा और बोले—
"जब तक इस बात की पूरी जाँच नहीं हो जाती, तुम यहीं दरबार में रहोगे।"
राजा के आदेश मिलते ही सैनिकों ने उसे चारों ओर से घेर लिया।
लड़का घबरा गया, लेकिन उसके मन में संतोष था।
उसने सत्य का साथ दिया था।
अब उसकी निगाहें दरबार के द्वार पर लगी थीं।
वह मन ही मन सोच रहा था—
"जब वरदान यहाँ आएगा, तब सबको सच्चाई पता चल जाएगी।"
और इसी बीच राजा द्वारा भेजे गए सैनिक तेज़ी से उस गाँव की ओर बढ़ रहे थे, जहाँ एक साधारण चरवाहे के वेश में रहने वाला वरदान अपनी गाय-बकरियाँ चराने गया हुआ था।राजा ने कुछ क्षण तक विचार किया।
फिर उन्होंने अपने सैनिकों को बुलाया और आदेश दिया—
"तुरंत उस लड़के को हमारे सामने प्रस्तुत किया जाए।"
"जाओ

और इसी बीच राजा द्वारा भेजे गए सैनिक तेज़ी से उस गाँव की ओर बढ़ रहे थे, जहाँ एक साधारण चरवाहे के वेश में रहने वाला वरदान अपनी गाय-बकरियाँ चराने गया हुआ था।