अध्याय 21 निखिल जोशी का प्रस्ताव
अचानक आए इन छह लोगों के समूह में से विराज की नजर दूसरे नंबर के व्यक्ति पर पड़ी। हॉल की रोशनी में उस व्यक्ति का चेहरा साफ दिख रहा था, अहंकार से भरी मुस्कान, और उस चाल में वही परिचित घमंड जिसने कुछ दिन पहले चौराहे पर विराज को टक्कर मारी थी।
यह व्यक्ति कोई और नहीं बल्कि राघव जोशी था, लेकिन विराज बाकी में से किसी को भी नहीं जानता था। पर ये सभी जोशी परिवार के ही कुछ खास सदस्य या अधीनस्थ प्रतीत हो रहे थे।
राघव जोशी की भी नजर विराज पर पड़ी, और विराज को अपनी तरफ देखता पाकर उसे अपनी पिटाई याद आ गई। उसकी पीठ पर अभी भी उस दिन के घावों के निशान मौजूद थे। इसीलिए उसने अपनी नज़रें हटाकर आगे चल रहे व्यक्ति पर टिका दी।
पल्लवी ने फिर से कहा, "निखिल जोशी तुम यहां क्या कर रहे हो, और तुम बिना मेरी मर्जी के मेरी पार्टी में कैसे आ सकते हो?"
निखिल जोशी पल्लवी के पास आते हुए, अपने हाथ आगे करते हुए - जैसे वह कोई अनमोल उपहार पेश कर रहा हो - कहता है, "मेरी जान जन्मदिन मुबारक हो, और आज मैं तुम्हें शादी के लिए प्रपोज करता हूं।" उसने अपना सिर थोड़ा झुकाया, अपनी आंखें छोटी कीं, और पल्लवी को ऐसे देखा जैसे कोई शेर अपने सामने खड़े हिरण को देखता है।
यह सुनने के बाद लता, उषा और रूपा, सभी के हाथ उनके मुंह पर आ गए, और उनके चेहरे सफेद पड़ गए। उन्हें ऐसा कुछ होने की आशंका नहीं थी। जन्मदिन की पार्टी में शादी का प्रस्ताव? वह भी उस निखिल जोशी से जिसकी बदनामी पूरे इंदौर में मशहूर थी?
परंतु अनूप का क्रोध बाहर निकल आता है। उसके अंदर का ज्वालामुखी फूट पड़ा। वह मेज पर इतनी जोर से मुक्का मारता है कि पूरा हॉल गूंज उठता है, गिलास और प्लेटें हिल जाती हैं, और फिर वह गुस्से में खड़ा होते हुए कहता है, "तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई पल्लवी से यह सब कहने की?"
निखिल गुस्से से उसकी तरफ देखते हुए पूछता है, "यह पागल कौन है? क्या इसे नहीं पता है कि निखिल जोशी कौन है?"
राघव जोशी तुरंत आगे बढ़ता है और निखिल के कान में धीरे से कहता है, "बड़े भाई, यह लड़का अनूप है, और यह भाभी पल्लवी का बहुत अच्छा दोस्त है। परंतु यह बाजार रक्षक दल प्रमुख भानु का बेटा है।"
यह सुनने के बाद निखिल अनूप की तरफ बढ़ते हुए आता है। वह बिल्कुल सामने आकर रुकता है और कहता है, "बाजार रक्षक दल प्रमुख भानु का मैं बहुत सम्मान करता हूं। उनकी खातिर मैं तुम्हारी इस गलती को माफ कर देता हूं, और तुम्हें सलाह देता हूं कि इन सब से दूर रहो। क्योंकि यह मामला साम्राज्य का नहीं है, यह इंदौर शहर के दो परिवारों के बीच का मामला है। तुम्हारे पिता भी इसमें कुछ नहीं कर पाएंगे।"
अनूप अभी कुछ कहने ही वाला था, कि तभी उसके कंधे पर किसी का हाथ आ जाता है। अनूप उस व्यक्ति की आभा को महसूस करते हुए पीछे की तरफ देखता है। यह व्यक्ति कोई और नहीं बल्कि निखिल के साथ आया हुआ उसका एक अधीनस्थ था। वह निखिल के साथ आए हुए सभी लोगों में सबसे शक्तिशाली था, वह उच्च लड़ाकू योद्धा के चौथे स्तर पर था, और अनूप अभी उच्च लड़ाकू योद्धा के दूसरे स्तर पर था, ताकत में अंतर साफ था।
इसीलिए उसने अभी चुप रहना ही चुना। लेकिन उसने मन ही मन एक प्रण कर लिया कि अगर हालात ज्यादा बिगड़ते हैं तो वह पल्लवी के साथ खड़ा हो जाएगा, चाहे फिर इसके लिए कोई भी कीमत क्यों न देनी पड़े।
अनूप के शांत हो जाने के बाद निखिल जोशी फिर से पल्लवी के पास चला गया। पल्लवी अभी भी पहले हुई घटनाओं के कारण एक मूर्ति की तरह शांत थी।
जैसे ही निखिल उसके पास आता है, तब जाकर पल्लवी को होश आता है। वह चिल्लाते हुए कहती है "तुम यह क्या बकवास कर रहे हो? मुझे तुमसे कोई शादी नहीं करनी है!" उसका शरीर कांप रहा था, उसकी आंखों से आंसू छलकने को थे, लेकिन उसने खुद को रोक रखा था, वह उसके सामने कमजोर नहीं दिखना चाहती थी।
निखिल जोशी जोर-जोर से हंसते हुए कहता है, "इसमें तुम और मैं कुछ नहीं कर सकते हैं। यह मेरे पिता की ख्वाहिश है। वह चाहते हैं कि तुमसे मेरी शादी हो जाए, और तुम्हारे दादीजी के जन्मदिन पर मेरे पिता यह प्रस्ताव तुम्हारे पिता के सामने रखने वाले हैं। मुझे नहीं लगता है कि तुम्हारे पिताजी इस प्रस्ताव को ठुकरा पाएंगे।"
फिर उसने अपना हाथ बढ़ाया। पल्लवी ने पीछे हटने की कोशिश की, लेकिन उसके पैर जवाब दे गए, वह डर से जकड़ गई थी। निखिल का हाथ धीरे-धीरे उसके गाल पर फिरने लगा। जैसे कोई कीड़ा किसी फूल पर रेंगता है। उसका स्पर्श घिनौना था, चिकना था, उसमें कोई गर्माहट नहीं थी - सिर्फ एक ठंडा, गणना किया हुआ अहसास था।
और उसने कहा, "अगर तुम जैसा सुंदर फूल मेरे घर के बगीचे में होगा तो यह मेरे लिए बहुत अच्छा होगा। इस फूल से मैं जब चाहे, जैसे चाहे खेल सकता हूं।" उसका हाथ धीरे-धीरे पल्लवी के गाल से उसकी ठुड्डी तक आया, फिर उसकी गर्दन की तरफ बढ़ा। उसकी उंगलियां उसकी गर्दन पर टिक गईं, हल्के से दबाती हुई - मानो वह किसी वस्तु को परख रहा हो, किसी इंसान को नहीं। उसकी आंखों में एक अजीब सी चमक थी - वह चमक किसी प्रेमी की नहीं थी, वह उस मालिक की चमक थी जिसे अपनी गुलाम पर पूरा अधिकार हो। उसने अपना अंगूठा पल्लवी के होठों पर फिराया - एक धीमा, कामुक, घिनौना स्पर्श - और कहा, "बहुत मुलायम हो तुम, पल्लवी। सोचो, जब तुम पूरी तरह मेरी हो जाओगी तो कितना मजा आएगा।"
उसने उसके कान में धीरे से कहा, इतनी धीरे कि सिर्फ वही सुन सके, "तुम्हारी चीखें सुनने के लिए मैं बहुत दिनों से इंतजार कर रहा हूं, पल्लवी। बहुत जल्द वह दिन आएगा।"
पल्लवी का पूरा शरीर ठंडा पड़ गया था। उसके रोंगटे खड़े हो गए थे, उसकी आंखें फैल गई थीं, उसे ऐसा लग रहा था जैसे कोई जहरीला सांप उसके चारों ओर लिपट रहा हो, धीरे-धीरे, कसकर, उसकी सांसें रोकते हुए।
निखिल को ऐसा करता हुआ देखकर अनूप फिर से खड़ा होना चाह रहा था।
लेकिन तभी उसी ताकतवर व्यक्ति ने फिर से उसे वहीं रोक लिया। उसका हाथ अनूप के कंधे पर इतने जोर से दब गया कि उसकी हड्डियां चरमरा गईं। अनूप कुछ नहीं कर पाया, बस देखता रहा, अपनी आत्मा में बेबसी के साथ।
हॉल में जो कुछ भी चल रहा था, विराज को उनसे कोई मतलब नहीं था। वह अभी भी वहां शांति से बैठा हुआ था, उसकी मुद्रा में कोई बदलाव नहीं था, उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं था, उसकी आंखों में कोई उत्तेजना नहीं थी। वह ऐसे बैठा था जैसे वह इस हॉल में मौजूद ही न हो - जैसे वह कोई निर्जीव वस्तु हो। क्योंकि यह चौहान परिवार और जोशी परिवार का मामला था, दो बड़े परिवारों के बीच का राजनीतिक और सामाजिक खेल था। उसका इन सब से कोई लेना-देना नहीं था।
लेकिन अगर यह मामला उसे तकलीफ देता, या फिर यह मामला किसी तरीके से रवीना को तकलीफ पहुंचाता, तो विराज इस मामले में पूरी तरह से हस्तक्षेप कर सकता था।
निखिल जोशी ने पल्लवी से कहा "मैंने तुम्हें सब कुछ बता दिया है। अब मैं जिस मुख्य काम के लिए आया हूं, वह करता हूं।"
यह कहकर उसने अपनी नजर विराज की तरफ टिका दी, उन आंखों में अब पल्लवी के लिए कोई जगह नहीं थी, उसका शिकार बदल चुका था। जैसे कोई लकड़बग्घा अपने असली निशाने पर पहुंच गया हो।
जैसे ही सभी छः सदस्य विराज की तरफ जा रहे थे, पल्लवी की तीनों सहेलियां और अनूप उसके पास आकर उसे सहानुभूति देने लगे। लता ने उसका हाथ पकड़ लिया, उषा ने उसके कंधे पर हाथ रख दिया, रूपा उसके बगल में खड़ी हो गई, और अनूप सामने आकर खड़ा हो गया - जैसे वे उसके चारों ओर एक सुरक्षा घेरा बना रहे हों।
क्योंकि पल्लवी की आंखों से हल्के-हल्के आंसू आ रहे थे। वे आंसू उसकी आंखों में थम नहीं पा रहे थे, एक-एक करके वे उसके गालों पर लुढ़क रहे थे।
वह सोच रही थी, अगर निखिल जोशी ने जो कहा था, अगर वह सब उसी तरीके से होता है, और उसे पूरा यकीन था कि होगा, तो उसके पिता कभी भी इस शादी के लिए इनकार नहीं करेंगे। वह अपने पिता को जानती थी, उनके लिए परिवार की इज्जत, सामाजिक स्थिति, और व्यापारिक संबंध सबसे ऊपर थे। उनके लिए उनकी बेटी की खुशी एक छोटी सी बात थी, एक ऐसी चीज जिसे कुर्बान किया जा सकता था।
विराज ने हल्की सी अपनी कुर्सी घुमाई। क्योंकि वह जानता था कि अब क्या होने वाला है। उसने अपने सामने खड़े हो चुके छह लोगों को देखा, उनकी मुद्राओं में एक जंग की तैयारी थी।
निखिल विराज से कुछ दूर खड़ा होकर राघव से पूछता है, "छोटे भाई, तू तो कह रहा था कि यह मुफ्तखोर घर जमाई लघु लड़ाकू योद्धा के तीसरे स्तर पर है। परंतु अब इसकी आभा को महसूस करते हुए यह पता चल रहा है कि यह लघु लड़ाकू योद्धा के शून्य स्तर पर है। तुमसे कोई गलती तो नहीं हो गई है, या फिर तुम्हें किसी और ने पीटा था और तुमने इस बेकार व्यक्ति को उसका श्रेय दे दिया है?" उसके शब्दों में एक ताना था, लेकिन साथ ही एक सच्ची उलझन भी थी।
राघव जोशी जल्दी से हिचकिचाते हुए कहता है, "नहीं भाई, नहीं। मुझसे कोई गलती नहीं हुई है। उस दिन जब चौराहे पर यह मुझसे टकराया था, तब इसका साधना चरण लघु लड़ाकू योद्धा के शून्य स्तर पर था। परंतु हमसे लड़ते समय इसका साधना चरण लघु लड़ाकू योद्धा के तीसरे स्तर तक आ गया था।"
यह सुनने के बाद वहां मौजूद काफी लोग हैरान रह जाते हैं। पल्लवी ने भी विराज की आभा को महसूस किया था, उसे भी उसका स्तर लघु लड़ाकू योद्धा का शून्य ही महसूस हुआ था। लेकिन अगर राघव जोशी की बात को सत्य मान लिया जाए, तो इससे साफ पता चल रहा था, कि विराज अपनी असली साधना को छुपा रहा है।
यह उनके लिए बहुत महत्वपूर्ण बात थी। ऐसी तकनीक - जो किसी की असली ताकत को छुपा सके, जो उसे शून्य स्तर की तरह दिखा सके - केवल चुनिंदा योद्धाओं के पास ही होती थी।
निखिल जोशी विराज की तरफ देखते हुए कहता है, "तुम वाकई में बहुत रहस्यमय प्रतीत होते हो।" उसने अपना सिर थोड़ा झुकाया और एक ठंडी मुस्कान के साथ कहा, "पर शायद तुम भूल गए हो - तुम चौहान परिवार के एक घर जमाई हो, और मेरा छोटा भाई जोशी परिवार का खून है।" फिर आगे कहा, "उसकी प्रतिष्ठा तुमसे कहीं ज्यादा ऊंची है। जरा सोचो - एक परिवार का असली खून, और दूसरा परिवार का घर जमाई। एक का नाम सुनते ही लोग झुक जाते हैं, दूसरे का नाम सुनते ही लोग मुंह फेर लेते हैं। यह अंतर तुम्हें दिखता है न?"
उसकी आवाज में वह मीठा जहर था - वह बातें करने का ढंग जिसमें वह आपको नीचा दिखाते हुए भी ऐसा लगता है जैसे वह आपकी ही भलाई सोच रहा है।
"यही कारण है कि मैं चाहता हूं कि तुम होटल के बाहर जाकर मेरे छोटे भाई राघव के पैरों में झुक कर उससे माफी मांगो।" उसने अपनी उंगली दरवाजे की तरफ उठाई, और फिर अपनी आवाज में एक नाटकीय गंभीरता लाते हुए कहा, "और सारी जनता को देखने दो - कैसे मेरे छोटे भाई ने तुम्हें अपने पैरों में झुका कर तुमसे अपना बदला पूरा किया है।"
यह बोलने के बाद निखिल के साथ आए चारों अनुयाई मुस्कुराए। राघव सबसे जोर से मुस्कुराया - उसका मुंह लगभग कानों तक चला गया था, उसकी आंखों में चमक थी, क्योंकि उसे लग रहा था कि उसके अपमान का बदला लेने का दिन आखिरकार आ गया है।
वहीं दूसरी ओर पल्लवी और उसके दोस्त अभी भी उसी हॉल में शांत खड़े थे। लेकिन उनके समझ में नहीं आ रहा था कि उन्हें इस मामले में बोलना चाहिए या नहीं। क्योंकि यह मामला विराज और राघव के बीच था, जिससे उनका कोई लेना-देना नहीं था। इसीलिए उन्होंने चुप रहने का रास्ता चुना।
विराज अभी भी पहले की तरह ही बैठा हुआ था। जैसे उसके आस-पास चल रहा यह पूरा नाटक उसके लिए कोई अर्थ नहीं रखता था।
विराज को कुछ भी ना करते हुए देखकर राघव का गुस्सा बढ़ता जा रहा था। वह विराज पर चिल्लाते हुए कहता है, "कमीने, पिटाई से अपनी जान बचाना चाहता है, तो चुपचाप वैसा कर जैसा बड़े भाई निखिल ने कहा है!"
इसके बाद भी विराज कुछ नहीं करता है। इस स्थिति को देखते हुए राघव अपने भाई निखिल की ओर आशा भरी नजरों से देखता है।
निखिल अपने छोटे भाई को आश्वासन देते हुए कहता है - "लातों के भूत बातों से नहीं मानते।" यह बोलते हुए निखिल ने अपने एक अनुयाई को इशारा किया।
वह अनुयाई विराज की ओर तेजी से बढ़ता है। उसके दाहिने हाथ की मुट्ठी भिंच गई, उसकी बांह की मांसपेशियां तन गईं, उसकी कमर मुड़ी, उसके कंधे घूमे - उसने अपनी पूरी ताकत एक ही घूंसे में लगा दी। उसका लक्ष्य साफ था - विराज का चेहरा।
परंतु विराज बिजली की तेजी से उठ खड़ा होता है। उसका दाहिना पैर पीछे हटा, उसकी कमर मुड़ी। और फिर उसने लात मारी।
उसके पैर का प्रहार सीधे उस अनुयाई के पेट में लगता है। लात का प्रभाव इतना जबरदस्त था कि अनुयाई का शरीर झटके से मुड़ गया, उसके मुंह से हवा के साथ-साथ एक दबी हुई चीख निकली, उसकी आंखें बाहर निकल आईं, उसका चेहरा सफेद पड़ गया। वह हवा में उड़ा - उसकी बांहें फैल गई थीं, वह पूरी तरह बेकाबू था। वह सीधे सामने की दीवार पर जा लगा - इतनी जोर से कि दीवार में एक गड्ढा सा बन गया, प्लास्टर के टुकड़े उड़ गए, पूरे हॉल में एक धमाके की गूंज फैल गई।
और फिर वह नीचे रखी हुई टेबल पर गिर जाता है, वह टेबल ताश के पत्तों की तरह बिखर जाती है, उसके पैर टूट जाते हैं, उसकी लकड़ी चरमरा जाती है, उसके ऊपर रखे गिलास और प्लेटें चकनाचूर हो जाती हैं। अनुयाई वहीं पड़ा रहता है, उसके मुंह से खून भरी खांसी निकलने लगती है ।
सभी लोग अचानक से बदले हुए माहौल को देखने लगते हैं। हॉल में एकदम सन्नाटा छा जाता है, क्योंकि विराज ने जिस अनुयाई को मारा था, वह उच्च लड़ाकू योद्धा के शून्य स्तर का साधक था।
इस समय सबसे ज्यादा विचलित पल्लवी और उसके दोस्त थे। पल्लवी कुछ दिन पहले ही लघु लड़ाकू योद्धा के शून्य स्तर पर पहुंची थी - उसने अपनी नई ताकत पर गर्व महसूस किया था, उसे लगा था कि अब वह कमजोर नहीं रही। लेकिन आज उसने देखा कि उसके स्तर का एक योद्धा, कैसे एक ही लात में मिट्टी में मिल गया।
यह देखकर निखिल गुस्से में आ जाता है। उसने कहा, "सभी लोग इस पर फिर से हमला करो, और एक साथ हमला करो!"
वह घायल अनुयाई भी उठकर उनके साथ शामिल हो जाता है।
पहला अनुयाई आता है - वही घायल अनुयाई जो बदला लेने की आग में जल रहा है। वह अपनी पूरी ताकत से एक घूंसा मारता है। विराज बस थोड़ा सा बायीं तरफ हटता है - इतना थोड़ा सा कि घूंसा उसके कान से एक इंच दूर से गुजरता है। और फिर उसकी हथेली सीधे उस अनुयाई की छाती पर लगती है एक सटीक प्रहार। अनुयाई हवा में उड़ता है, फिर से दीवार पर गिरता है, और इस बार वह उठ नहीं पाता।
दूसरा और तीसरा अनुयाई एक साथ आते हैं - एक ऊपर से घूंसा मारता है, दूसरा नीचे से लात मारता है। विराज एक ही चाल में अपना हाथ ऊपर उठाकर पहले का घूंसा रोकता है, और अपना पैर घुमाकर दूसरे की लात को काट देता है। और फिर - दो हथेलियाँ, दो छातियाँ, दो शरीर हवा में। वे दोनों एक ही समय में विपरीत दिशाओं में जा गिरते हैं - एक मेज पर, दूसरा एक कुर्सी पर। लकड़ी के टुकड़े उड़ते हैं, शीशे चटकते हैं, शोर गूंजता है।
चौथा अनुयाई - जो सबसे ताकतवर है, उच्च लड़ाकू योद्धा के चौथे स्तर पर - अब समझ गया है कि यह कोई साधारण आदमी नहीं है। वह अपनी सारी ताकत लगाकर आता है - उसकी मुट्ठी में हवा का दबाव बन गया है, उसकी आभा पूरे हॉल में फैल गई है, उसकी चाल में एक जानवर की क्रूरता है। वह तीन घूंसे एक साथ मारता है - ऊपर, बीच, नीचे।
विराज पहले घूंसे को अपने बाएं हाथ से हटाता है, दूसरे को अपने दाहिने हाथ से मोड़ता है, और तीसरे के सामने अपनी कोहनी रख देता है। घूंसा उसकी कोहनी पर लगता है - और हमलावर की उंगलियों के टूटने की आवाज आती है। विराज उसका हाथ पकड़ता है, घुमाता है, और फिर एक लात उसके घुटने पर देता है। घुटना टूटता है, हमलावर चीखता है, और फिर विराज की हथेली उसके माथे पर लगती है - एक धक्का जो उसे सीधे निखिल जोशी के पैरों पर गिरा देता है।
निखिल जोशी पीछे से आता है - वह विराज की पीठ पर कूदने की कोशिश करता है। विराज बिना पीछे देखे अपने दाहिने हाथ से उसका हाथ पकड़ लेता है, उसे अपने कंधे के ऊपर से उछालता है, और वह सीधे छत से जा लगता है। वह ऊपर चिपकता है, एक सेकंड के लिए - और फिर नीचे गिरता है, फर्श पर इतनी जोर से कि फर्श की टाइल्स चटक जाती हैं।
राघव अपनी आंखों पर विश्वास नहीं कर पा रहा है। और विराज पर हमला करने की कोशिश नहीं करता है ।