Nakaab aur Tanhaai - 3 in Hindi Thriller by Shaziya Khan books and stories PDF | नकाब और तन्हाई - 3

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नकाब और तन्हाई - 3

किस्त 3: लाइब्रेरी की वो अजनबी



शिकागो पब्लिक लाइब्रेरी का 'सेक्शन 4'—यहाँ रोशनी कम और पुरानी किताबों की खुशबू ज़्यादा थी। जैक एक ऊँची सीढ़ी पर चढ़कर 19वीं सदी के कुछ पुराने रिकॉर्ड्स तरतीब से रख रहा था। उसके हाथ धूल से सने थे और ज़हन में अभी भी रात वाले हादसे की टीस बाकी थी।


तभी, नीचे से एक आवाज़ आई। साफ़, मीठी और थोड़ी सी झिझकती हुई।


"एक्सक्यूज़ मी... क्या आप बता सकते हैं कि 'उर्दू शायरी का इतिहास' (History of Urdu Poetry) वाली शेल्फ कहाँ मिलेगी?"


जैक ने नीचे झुककर देखा। सीढ़ी के ठीक नीचे एक लड़की खड़ी थी। उसने सफ़ेद रंग का ओवरकोट पहना था और उसके हाथ में एक छोटा सा स्केचबुक था। उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी—ऐसी चमक जो जैक ने शिकागो की भीड़ भरी सड़कों पर कभी नहीं देखी थी।


जैक सीढ़ी से नीचे उतरा और अपनी शर्ट से धूल झाड़ते हुए बोला, "उर्दू शायरी? यहाँ इस सेक्शन में लोग अक्सर सिर्फ पुराने नक्शे ढूंढने आते हैं। आप... आप इसे क्यों ढूंढ रही हैं?"


उस लड़की ने मुस्कुराकर अपनी स्केचबुक खोली। उसमें एक अधूरी पेंटिंग थी—एक ऊँची इमारत की खिड़की, जहाँ से डूबता हुआ सूरज दिख रहा था। "मैं पेंटर हूँ, मेरा नाम एली (Ellie) है। मैं अपनी पेंटिंग्स के लिए कुछ गहरे लफ़्ज़ ढूंढ रही हूँ। सुना है उर्दू शायरी में वो बात है जो पेंट ब्रश नहीं कह पाता।"


जैक एक पल के लिए ठिठक गया। उसे अपनी वो डायरी याद आ गई जो उसके बैग में दबी पड़ी थी। उसने धीरे से हाथ बढ़ाकर एक मोटी सी किताब निकाली—'दीवान-ए-ग़ालिब'।


"इसे पढ़िए," जैक ने किताब बढ़ाते हुए कहा। "इसमें वो दर्द है जो शिकागो की इन ऊँची इमारतों में भी नहीं समाएगा।"


एली ने किताब हाथ में ली और जैक को गौर से देखा। "आप यहाँ सिर्फ किताबें रखते हैं, या उन्हें पढ़ते भी हैं? आपकी आँखों में वो सन्नाटा है जो सिर्फ एक पढ़ने वाले या... फिर बहुत कुछ सहने वाले के पास होता है।"


जैक सकपका गया। उसने अपनी आस्तीन नीचे कर ली ताकि कंधे का वो नीला निशान छुप जाए। "मैं बस... अपना काम करता हूँ।"


"शुक्रिया, मिस्टर...?" एली ने नाम जानने की चाह में सवाल अधूरा छोड़ा।


"जैक। मेरा नाम जैक है," उसने संभलकर जवाब दिया।
एली जाने के लिए मुड़ी, फिर रुककर बोली, "जैक, कभी अपनी आँखों का सन्नाटा कागज़ पर उतार कर देखिएगा। शायद आपको जवाब मिल जाए।"


वो चली गई, लेकिन उसकी बातों की गूँज उस अंधेरे कोने में रह गई। जैक वहीं खड़ा रहा। उसे महसूस हुआ कि एली की आँखों में भी एक तरह की तन्हाई थी, शायद वो भी इस बड़े शहर में अपनी पहचान ढूंढ रही थी।


जैक ने अपनी जेब से कलम निकाली और लाइब्रेरी के एक पुराने पर्चे के पीछे कुछ शब्द लिखे:


"वो अजनबी थी, पर उसकी बातों में अपनापन था,
जैसे रेगिस्तान में भटकते मुसाफिर को दरिया का वहम था।
उसने पूछा मेरा नाम, और मैं बस मुस्कुरा दिया,
नकाब के पीछे का सच, मैंने फिर से छुपा दिया।"


शाम ढल रही थी। जैक को पता था कि कुछ ही देर में उसे अपना नकाब पहनना होगा। लेकिन आज पहली बार, उसे नकाब पहनने की उतनी जल्दी नहीं थी। उसे लग रहा था कि शायद इस शहर में कोई और भी है, जो शब्दों और रंगों के पीछे का दर्द समझता है। (जारी है )
लेखक _समीर खान