शिकागो की सुबह जितनी खूबसूरत दिखती है, जैक के लिए उतनी ही थकाने वाली होती है। सूरज की पहली किरण जब उसकी कांच की खिड़की से टकराकर सीधे उसके चेहरे पर पड़ी, तो जैक की नींद टूट गई। रात भर वह शहर के 'क्वींस ब्रिज' के पास एक एक्सीडेंट में फंसे लोगों की मदद कर रहा था। उसके कंधे पर एक बड़ा सा नीला निशान पड़ गया था, जो रह-रह कर टीस मार रहा था।
उसने अपने बिस्तर के पास रखे छोटे से मेज़ पर हाथ मारा। वहां उसकी पुरानी घड़ी पड़ी थी, जिसका कांच धुंधला हो चुका था।
"8 बज गए! शिट, आज लाइब्रेरी पहुँचने में फिर देर हो जाएगी," जैक ने बड़बड़ाते हुए अपने चेहरे पर पानी मारा।
जैक दिन में 'शिकागो पब्लिक लाइब्रेरी' के पुराने रिकॉर्ड रूम में काम करता था। यह काम उसे बहुत पसंद था क्योंकि वहां सन्नाटा होता था, पुरानी किताबों की महक होती थी और उसे किसी से ज्यादा बात नहीं करनी पड़ती थी। वहां उसे कोई 'मसीहा' नहीं कहता था, वहां वह सिर्फ 'जैक' था—वह लड़का जिसे फटे हुए जूते पहनना और चुपचाप कोने में बैठना पसंद था।
उसने जल्दी से अपनी पुरानी शर्ट पहनी, जिसके कॉलर थोड़े घिस चुके थे। तभी कमरे के दरवाज़े पर दस्तक हुई।
"जैक? बेटा, जाग गए तुम?"
यह उसकी फूफो आवाज़ थी। फूफो ही जैक की इकलौती दुनिया थीं। जैक के माँ-बाप के गुजर जाने के बाद उन्होंने ही उसे पाला था। वह जैक के कमरे के बाहर खड़ी थीं, उनके हाथ में नाश्ते की प्लेट थी।
जैक ने घबराकर पलंग पर बिखरे हुए अपने उस 'खास लिबास' को एक चादर के नीचे छुपाया और दरवाज़ा खोला।
"जी फूफो, बस निकल ही रहा था।"
फूफो ने उसे गौर से देखा। उनकी आँखों में ममता भी थी और एक अनजाना सा डर भी। "तुम्हारी आँखें बहुत लाल हैं जैक। क्या रात भर फिर वही 'शायरी' लिख रहे थे? इतनी मेहनत मत किया करो बेटा, सेहत भी कोई चीज़ होती है।"
जैक मुस्कुरा दिया। यह मुस्कुराहट झूठी थी, पर फूफो को तसल्ली देने के लिए काफी थी। वह कैसे बताता कि रात भर वह शायरी नहीं, बल्कि शहर की सलामती की दुआएं मांग रहा था और मौत से लड़ रहा था।
"फूफो, बस थोड़ा सा काम बाकी था। आप चिंता न करें, मैं ठीक हूँ।"
उसने मेज़ पर रखी अपनी चाय का एक घूँट भरा। चाय ठंडी हो चुकी थी और उसका स्वाद कड़वा था—बिल्कुल जैक की ज़िंदगी की तरह। उसने खिड़की के बाहर देखा, नीचे सड़कों पर गाड़ियाँ रेंग रही थीं। एक पल के लिए उसे लगा कि काश वह भी उन आम लोगों की तरह होता, जिनकी सबसे बड़ी परेशानी सिर्फ ऑफिस के लिए लेट होना होती है।
तभी उसकी नज़र मेज़ पर पड़ी अपनी डायरी पर गई। उसने जल्दी से एक लाइन लिखी:
"कंधों पर बोझ पूरे शहर का है, पर घर की दीवारों को मेरा इंतज़ार है।
दुनिया समझती है मैं हवाओं का मुसाफिर हूँ, पर हकीकत में मुझे एक सुकून भरी छाँव की तलाश है।"
डायरी बंद कर जैक ने अपना पुराना बैग उठाया और कमरे से बाहर निकल गया। उसे पता था कि आज दिन भर उसे उन भारी-भरकम किताबों के बीच अपनी थकान छुपानी है, ताकि रात को वह फिर से उस शहर के लिए 'जाग' सके जो सो रहा होता है।
शिकागो की ट्रेन (L-Train) की आवाज़ गूँजी और जैक भीड़ में कहीं खो गया। एक ऐसा मसीहा, जिसके पास खुद के लिए वक्त नहीं था, पर दूसरों के लिए उसकी पूरी ज़िंदगी हाज़िर थी।(जारी है )
लेखक _समीर खान