Oyy Mr. Vampire - 3 in Hindi Fiction Stories by kusum kumari books and stories PDF | Oyy Mr. Vampire - 3

Featured Books
Categories
Share

Oyy Mr. Vampire - 3

Snow City :

रात का वक़्त…: 

ध्रुविका ने घूर कर लड़के की ओर देखा ! और फिर अपनी गर्दन टेढ़ी कर ली। और लड़के का  हाथ पकड़ लिया ! और उसको पूरा मरोड़ दिया। लड़का चीख पड़ा ! और कुछ ही देर बाद वहाँ बस चीखें ही सुनाई दे रही थीं।

ध्रुविका ने एक लड़के का हाथ पकड़कर उसकी पीठ से लगा दिया ! और अपना घुटना उस पर रखते हुए कहा "क्या हुआ? 10 मिनट में सारी मर्दानगी निकल गई क्या हााआ ?"

लड़के ने दूसरा हाथ ज़मीन पर मारते हुए कहा "छोड़ दो बहन… आज से किसी को भी नहीं छेड़ूँगा…!  आज से दुनिया की सारी लड़कियाँ मेरी बहन हैं… छोड़ दो!"

ध्रुविका ने एक गहरी साँस छोड़ी और उठकर खड़ी हो गई ! 
"अगर अगली बार मुझे इधर आस-पास दिखे ना तुम लोग… तो सबकी 206 हड्डियाँ जो हैं न… तोड़ दूँगी मैं… समझे ना!"
ध्रुविका ने अपने होंठों पर से खून पोंछते हुए कहा " ।

"ठीक है दीदी… हम नहीं दिखेंगे!" एक लड़के ने हाथ जोड़ते हुए कहा " ..।

ध्रुविका ने घूरकर उस लड़के को देखा। लड़का 17–18 साल का लग रहा था। "साले निब्बे… दाँत निकले नहीं और चला है लड़की छेड़ने… बे! अगली बार दिखे ना to एक राप्टा खिच कर डुंगी "...

ह्म्म्म… ध्रुविका ने गहरी साँस छोड़ी और आगे बढ़ गई।

पर ध्रुविका कहाँ जानती थी कि अब ये लड़के उसको कभी नहीं दिखेंगे…! 


क्योंकि कोई इनका शिकार करने के लिए बड़े बेसब्री से इंतज़ार कर रहा था।

ध्रुविका अपने खयालों से बाहर आई ! और घूरकर एक बार पूरे कोठारी को देखा और उठकर बैठ गई।
नींद नहीं आ रही… क्यों ना आज इस कोठारी को खंगाला जाए?

उसने अपना फ़ोन निकाला और टाइम देखा तो 12:00 बज रहे थे। उसने सिर हिला दिया ! 

"साला, सच में बोर हो रही हूँ… कोई भूत-प्रेत ही आ जाए… अरे कोई भटकती प्यासी आत्मा… लो मैं तुम्हारा आह्वान करती हूँ… मेरे पास आओ!" ध्रुविका चीख पड़ी। अब सच में उसको चड गई थी। 
उसने इधर-उधर देखा और अपने फ़ोन की लाइट ऑन कर दी।

उसने ऊपर देखा। ऊपर जाने के लिए सीढ़ियाँ थीं।
उसने ईस जगह को 2 साल पहले ढूँढा था। उसके बाद ये ऊसकी *fav* जगह बन गई। लोगों और शहर से दूर ये जगह शांति भरी थी।

इन सालों में उसने हॉल को पूरा साफ़ कर लिया था ! और सोफ़ा और ब्लैंकेट भी ले आई थी। एक लाइट भी लगा लिया था। सब मिलाकर उसने इसको रहने लायक बना लिया था।

सबका कहना था कि ये कोठारी राठौड़ परिवार की थी… जो सालों पहले इस शहर से चले गए थे। Snow City  में सबसे ज़्यादा प्रॉपर्टी राठौड़ परिवार की ही थी और वो सबसे 
ताक़तवर माने जाते थे ! और काफ़ी रहस्यमय भी। यह कोठारी शहर से दूर थी ! और सालों से बंद थी। यहाँ कोई आता नहीं था। सबका मानना था कि यहाँ भूत रहते हैं ! पर ध्रुविका को यह सब बस अफ़वाह लगती थी। उसने पूरी कोठारी को देखा ! पर एक कमरे का दरवाज़ा बंद था ! और उसके ऊपर लिखा था !  

" डू नॉट डिस्टर्ब me  इट्स डेंजरस " 

ध्रुविका ने वह कमरा खोलने की कोशिश की थी ! पर शिवाया ने उसको मना कर दिया था ! और यह कहा था कि अगर उसने दोबारा ऐसा किया तो उसका यहाँ आना बंद करवा देगी। उस वक़्त ध्रुविका ने उसकी बात मान ली थी और उसने वह दरवाज़ा नहीं खोला था।

पर आज वह उसी दरवाज़े के सामने खड़ी थी। उसने दरवाज़े को घूर कर देखा और खटखटाते हुए बोली  " अरे सुनो ! अंदर कौन है? दरवाज़ा खोलो! खोलो! खोलो!”  वो  दरवाज़े को पीटने लगी !  पर दरवाज़ा नहीं खुला।

**“तुम्हारी इतनी हिम्मत कि तुम मुझे !  ध्रुविका चौधरी को अंदर आने से मना करो! तेरी तो… मैं आ रही हूँ तुम्हें परेशान करने। जो उखाड़ना है, उखाड़ लेना।” 

यह कहकर वह लड़खड़ाते हुए पीछे हट गई ! और दरवाज़े को ऊपर से नीचे तक देखा। वह बहुत बड़ा, पुराने ज़माने का दरवाज़ा था!  और उस पर पेंट से लिखा हुआ था ! 

डू नॉट डिस्टर्ब me  इट्स डेंजरस " 



ध्रुविका ने दरवाज़े की ओर उंगली करते हुए कहा " तेरी तो अब खैर नहीं…”

और उसने अपने बालों से एक  पिन  निकाल ली। जंग लगे हुए ताले को ध्यान से देखा। बहुत बार कोशिश करने के बाद आखिरकार वह ताला खुल ही गया।

ध्रुविका ने ताला खोलकर दूर फेंक दिया और दरवाज़े को देखकर हँसते हुए बोली “लो, अब मैं तुम्हें परेशान करने आ रही हूँ।” 

One ,two ,three …और  उसने दरवाज़े पर एक ज़ोरदार लात मारी। दरवाज़ा चर्र-चर्र की आवाज़ के साथ खुल गया और ध्रुविका अंदर चली आई।

नशे में चूर ध्रुविका नहीं जानती थी कि वह क्या करने वाली है…

उसने पूरे कमरे में अपना फ़ोन घुमाया तो पूरा कमरा लगभग खाली था सिवाय बीच में रखे उस ताबूत और कुछ चीज़ के 
"जैसे कि मम्बाती स्टूल और और भी बहुत सारी चीज़ें।" 

“वोoooo देखो तो ये क्या है ?” 

उसने ताबूत के पास जाते हुए कहा  " “हेल्लो, क्या अंदर कोई मम्मी हो? मैं ध्रुविका चौधरी, नाजायज़… हेल्लो, सुनो, हेल्लो हेल्लो !” 

पर उस ताबूत से कोई आवाज़ नहीं आई।
ध्रुविका का मुँह बन गया  ! “तुम मुझसे बात नहीं करोगे? ओय, मिस्टर मम्मी, मुझसे बात करो! मिस्टर मम्मी, मिस्टर मम्मी!”

उसने ताबूत को लात मारना शुरू कर दिया।
और तब भी कुछ नहीं हुआ।

ध्रुविका ने एक लात जड़ दी उस ताबूत को, पर अब भी कोई आवाज़ नहीं आई। पर ध्रुविका के पैर में जरूर लगी !  " " " " "आउच " !  उसने अपना पैर पकड़ लिया।

“तेरी तो… तुमने मुझे मारा !  अब मैं तुम्हें नहीं छोड़ूँगी। तेरी तो… रुक! मैं बताती हूँ!” 

उसने ताबूत को गौर से देखा। ताबूत बहुत बड़ा था और काफी सुंदर भी। ताबूत में एक ताला लगा था।

“हााआ हााआ ” 
ध्रुविका हँस पड़ी। “मुझसे छुप रहे हो? इस ताबूत में बंद होकर रुको, मैं तुम्हें निकाल लूँगी..।” 

और उसने फिर अपनी पिन निकालकर, मुस्कुराते हुए ताबूत के ताले को देखा और उसमें पिन घुसा दी।
दो-तीन बार कोशिश करने के बाद ताला खुल गया।

उसने ताले को दूर फेंक दिया और ताबूत को उठाकर खोल दिया और कूद पड़ी ! 
“याह्हू! मैंने खोल लिया! मैंने तुम्हें खोज लिया!” 


"ताबूत के अंदर जो था ! उसे देखकर ध्रुविका के होश उड़ने वाले थे……..