Barbaad Ishq Pyar khel nahi - 2 in Hindi Love Stories by kajal jha books and stories PDF | बर्बाद इश्क प्यार खेल नहीं - एपिसोड 2

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बर्बाद इश्क प्यार खेल नहीं - एपिसोड 2

बर्बाद इश्क

एपिसोड 2 — मुंबई के तीन शहज़ादे

20 साल बाद।

मुंबई बदल गई थी।

लेकिन धारावी की वह गलियाँ आज भी वैसी ही थीं। वही तंग रास्ते, वही शोर, वही भीड़। लेकिन इन्हीं गलियों से निकले तीन लड़के आज मुंबई के सबसे खतरनाक नाम बन चुके थे।

रणवीर। आदित्य। दानिश।

तीन भाई। तीन शहज़ादे। और मुंबई उनका राज।

रात के ग्यारह बज रहे थे।

मुंबई के सबसे महँगे इलाके — बांद्रा में एक बड़ी सी बिल्डिंग थी। ऊपर से नीचे तक काले शीशों से ढकी हुई। बाहर दस-बारह गाड़ियाँ खड़ी थीं। दरवाज़े पर चार-चार गार्ड।

यह था — मेहता एम्पायर।

विक्रम मेहता ने जो साम्राज्य बनाया था — वह आज इन तीनों भाइयों के हाथ में था।

ऊपर एक बड़े से हॉल में रणवीर कुर्सी पर बैठा था।

छह फुट का कद। चौड़े कंधे। चेहरे पर एक गहरा ज़ख्म का निशान जो बाईं आँख से ठोड़ी तक आता था। आँखें ठंडी — बिल्कुल ठंडी। जैसे उनमें कोई जज़्बात नहीं।

सामने एक आदमी घुटनों पर बैठा काँप रहा था।

"भाई साहब।" उस आदमी की आवाज़ थरथरा रही थी। "मैंने जानबूझकर नहीं किया। बस एक गलती हो गई।"

रणवीर ने कुछ नहीं कहा।

बस उसकी तरफ देखता रहा।

वह ख़ामोशी — वह ख़ामोशी किसी भी चीख़ से ज़्यादा डरावनी थी।

फिर धीरे से बोला — "गलती।"

बस एक शब्द।

"हाँ भाई साहब। माफ़ कर दीजिए। बच्चे हैं मेरे।"

रणवीर उठा। धीरे-धीरे उस आदमी के पास आया। उसके कंधे पर हाथ रखा — और इतने आराम से कहा जैसे मौसम की बात कर रहा हो —

"अगली बार गलती हुई तो बच्चों को बाप की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। समझ गए?"

वह आदमी काँपते हुए सिर हिलाने लगा।

रणवीर वापस अपनी कुर्सी पर आ गया।

उसी वक़्त दरवाज़ा खुला और आदित्य अंदर आया।

रणवीर से दो साल छोटा। लेकिन दिमाग़ में उससे भी तेज़। आदित्य वह था जो पूरे गैंग का दिमाग़ था। रणवीर ताक़त था — आदित्य चाल।

उसने एक फ़ाइल मेज़ पर पटकी।

"नया माल कल सुबह पोर्ट पर आएगा। लेकिन पुलिस को भनक लग गई है।"

रणवीर ने फ़ाइल उठाई। पलटी। वापस रख दी।

"कौन सा अफ़सर?"

"शर्मा।"

"उसे संभालो।"

आदित्य ने हल्की सी मुस्कान दी — "पहले से संभाल लिया है।"

दोनों भाइयों की नज़रें मिलीं। बिना कुछ कहे सब समझ आ गया।

तभी हॉल का दरवाज़ा एक बार फिर खुला।

और दानिश अंदर आया।

सबसे छोटा। चौबीस साल का। लेकिन जिस तरह वह चलता था — जिस तरह वह मुस्कुराता था — उसमें एक अलग ही खतरा था।

उसके साथ एक लड़की थी। खूबसूरत। मुस्कुराती हुई।

रणवीर ने एक नज़र देखा और समझ गया।

"दानिश।" उसने सख़्त आवाज़ में कहा।

"भाई।" दानिश ने बेफ़िक्री से जवाब दिया।

"काम।"

"हो जाएगा।" दानिश ने लड़की की तरफ देखा और धीरे से कहा — "बाद में आना।"

लड़की मुस्कुराती हुई चली गई।

आदित्य ने सिर हिलाया — "यह कभी नहीं सुधरेगा।"

दानिश ने हँसते हुए कहा — "सुधरने की ज़रूरत नहीं है भाई। ज़िंदगी छोटी है — एन्जॉय करो।"

रणवीर ने उसे घूरा।

दानिश की हँसी थोड़ी धीमी हो गई — लेकिन गई नहीं।

यही था दानिश।

मुंबई की हर गली में उसका नाम था। हर लड़की उसे जानती थी। वह किसी को seriously नहीं लेता था। किसी के साथ ज़्यादा वक़्त नहीं बिताता था।

एक रात। बस एक रात।

उसके बाद? अगली सुबह वह अकेला होता था।

लोग कहते थे — दानिश का दिल है ही नहीं।

लेकिन सच यह था कि जिसने चार साल की उम्र में माँ को जाते देखा हो — उसका दिल किसी पर भरोसा करना भूल जाता है।

रात के बारह बजे तीनों भाई एक साथ बैठे थे।

यह उनकी पुरानी आदत थी। चाहे कुछ भी हो — रात को एक बार साथ बैठना ज़रूरी था।

दानिश ने व्हिस्की का गिलास उठाया।

"आज विक्रम भाई का फ़ोन आया था।"

रणवीर और आदित्य दोनों सीधे हो गए।

विक्रम मेहता — वह आदमी जिसने उन तीनों को उस टूटे हुए घर से उठाया था। जिसने उन्हें पाला था। जिसने उन्हें यह दुनिया दिखाई थी।

"क्या कहा?" रणवीर ने पूछा।

"कहा कि एक नया दुश्मन उठ रहा है। ज़ाफ़र।" दानिश ने गिलास नीचे रखा। "वह हमारी टेरिटरी पर नज़र गड़ाए हुए है।"

हॉल में ख़ामोशी छा गई।

आदित्य ने धीरे से कहा — "तो फिर?"

रणवीर की आँखों में एक चमक आई — वह ठंडी, खतरनाक चमक।

"तो फिर उसे दिखाएंगे कि मुंबई में तीन भाइयों की इजाज़त के बिना पत्ता भी नहीं हिलता।"

उसी रात।

मुंबई के एक और कोने में।

एक लड़की अपनी छत पर खड़ी थी। हँसती हुई। फ़ोन पर बात करती हुई। बेफ़िक्र।

यह थी नायरा।

"अरे यार सुन!" वह फ़ोन पर चिल्लाई। "आज मैंने उस लड़के को क्या जवाब दिया! वो बोला — तुम बहुत खूबसूरत हो। मैंने बोला — हाँ पता है, आगे बोलो!"

दूसरी तरफ से हँसी आई।

नायरा खिलखिलाई।

उसे नहीं पता था कि कल सुबह उसकी ज़िंदगी में एक तूफ़ान आने वाला है — जिसका नाम रणवीर है।

उसी वक़्त शहर के एक अस्पताल के बाहर।

रिया अपनी माँ की व्हीलचेयर धकेल रही थी। थकी हुई। लेकिन चेहरे पर शिकायत नहीं।

बाप बीमार था। माँ चल नहीं सकती थी। छोटा भाई पढ़ रहा था।

रिया अकेली थी — सबके लिए।

उसे प्यार करने का वक़्त नहीं था।

लेकिन दिल को कौन समझाए?

उसकी नज़र अस्पताल के अंदर गई — जहाँ एक लड़की बैठी थी। मेघा।

रिया की आँखें एक पल के लिए रुकीं।

और दिल ने कुछ ऐसा महसूस किया जो उसे डरा गया।

और शहर के सबसे महँगे होटल में।

ईशानी बार में अकेली बैठी थी।

इकतीस साल। तलाकशुदा। ज़िंदगी से थकी हुई।

बारटेंडर ने उसकी तरफ देखा — "मैम, एक और?"

ईशानी ने गिलास आगे कर दिया।

उसे प्यार नहीं चाहिए था।

उसे किसी की ज़रूरत नहीं थी।

कम से कम — यही वह सोचती थी।

तीन हीरो। तीन हीरोइ

न। तीन अलग दुनियाएँ।

और एक कहानी — जो अभी शुरू हुई थी।

बर्बाद इश्क।

(एपिसोड 3 जल्द आएगा...)