तारा बहुत देर तक उस लिफाफ़े को देखती रही।कमरे में केवल टेबल लैम्प की पीली रोशनी थी।घर सो चुका था।
घड़ी रात के दो बजा रही थी।और उसके हाथों में था,यामिनी का अंतिम पत्र।
धीरे-धीरे उसने लिफाफ़ा खोला।भीतर केवल एक काग़ज़ नहीं था।एक पुरानी तस्वीर भी थी।तस्वीर में यामिनी थीं।उम्र लगभग पच्चीस वर्ष।और उनके कंधों पर वही सफेद शॉल थी।तारा ने तस्वीर को अलग रखा।फिर पत्र खोला।ऊपर लिखा था,मेरी प्रिय तारा,
तारा की साँस अटक गई।यामिनी को पता था...कि यह पत्र वही पढ़ेगी।पत्र आगे बढ़ा,अगर तुम यह पढ़ रही हो,तो इसका अर्थ है कि मैं अब तुम्हारे प्रश्नों का उत्तर देने के लिए वहाँ नहीं हूँ।
इसलिए आज मैं तुम्हें वह सब बताना चाहती हूँ,जो मैंने जीवन भर किसी से नहीं कहा।तारा की आँखें नम हो गईं।सबसे पहले एक बात।मैंने तुम्हारे नाना से कभी झूठ नहीं बोला।तारा चौंक गई।यह उत्तर तो उसने पूछा भी नहीं था।
लेकिन शायद यामिनी जानती थीं कि उसके मन में यही प्रश्न उठेगा।पत्र आगे कह रहा था,विवाह के छह महीने बाद मैंने विवेक को सब बता दिया था।अनिरुद्ध के बारे में।अपने प्रेम के बारे में।उन पत्रों के बारे में।
तारा का दिल जैसे रुक गया।नाना जानते थे?सब कुछ?पत्र में अगली पंक्तियाँ थीं,उस रात मुझे लगा था कि मेरा विवाह समाप्त हो जाएगा।लेकिन विवेक बहुत देर तक चुप बैठे रहे।और फिर उन्होंने केवल एक प्रश्न पूछा।तारा का गला सूख गया।उन्होंने पूछा"क्या तुम आज भी उससे प्रेम करती हो?"
और मैंने उत्तर दिया"हाँ।"
तारा की आँखों से आँसू गिर पड़े।यह स्वीकार करना कितना कठिन रहा होगा।और उसे सुनना उससे भी अधिक।कुछ पंक्तियों बाद पत्र ने फिर लय पकड़ी।विवेक ने उस रात कोई क्रोध नहीं किया।कोई आरोप नहीं लगाया।बस इतना कहा,"मैं उस प्रेम से प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकता।जो मुझसे पहले आया था।"
तारा ने आँखें बंद कर लीं। और आज उसे पहली बार समझ आया।इस कहानी का सबसे महान पात्र शायद अनिरुद्ध नहीं था।शायद विवेक था।पत्र आगे बढ़ता गया।उस रात उन्होंने मुझसे एक वचन लिया।कि मैं अतीत में नहीं जिऊँगी।और मैंने उनसे एक वचन लिया,कि वे कभी मुझसे मेरे अतीत को मार देने के लिए नहीं कहेंगे।
हम दोनों ने अपने-अपने दुख के साथ समझौता कर लिया।
तारा बहुत देर तक चुप बैठी रही।फिर उसने पढ़ना जारी रखा।
लोग सोचते हैं कि विवाह केवल प्रेम से चलता है।यह सच नहीं है।कई विवाह सम्मान से चलते हैं।कुछ मित्रता से।और कुछ करुणा से।मेरा विवाह करुणा और सम्मान से चला।पत्र के शब्द अब धीरे-धीरे तारा के भीतर उतर रहे थे।
मैंने विवेक को प्रेम नहीं किया।लेकिन मैंने उनका गहरा सम्मान किया।और जीवन के अंतिम वर्षों में...शायद उनसे एक प्रकार का स्नेह भी करने लगी थी।तारा की आँखें भर आईं।कितनी जटिल होती है मनुष्य की आत्मा।प्रेम एक से,जीवन दूसरे के साथ,और दोनों ही सच।
फिर पत्र के अंत के पास सफेद शॉल का उल्लेख आया।अब इस शॉल की बात।तारा अनायास सीधी बैठ गई।यह शॉल मुझे अनिरुद्ध ने नहीं दी थी।तारा ठिठक गई।यह विवेक ने दी थी।
हमारी शादी की पहली सर्दियों में।कुछ क्षण तक तारा समझ ही नहीं पाई।लेकिन आगे की पंक्तियाँ सब स्पष्ट कर गईं।जिस दिन मैंने उन्हें अपने अतीत के बारे में बताया,उसके कुछ सप्ताह बाद उन्होंने यह शॉल मुझे दी।
और कहा,"कुछ स्मृतियाँ छीन ली जाएँ,तो मनुष्य अधूरा हो जाता है।इन्हें संभालकर रखना।"तारा अब रो रही थी....धीरे-धीरे,चुपचाप।क्योंकि यह प्रेम त्रिकोण नहीं था।यह तीन अच्छे लोगों की कहानी थी।और शायद इसी कारण इतनी दुखद थी।
पत्र की अंतिम पंक्तियाँ बची थीं।तारा,अगर इस कहानी में किसी को दोष देना चाहो,तो किसी को मत देना।न मेरे पिता को।न अनिरुद्ध को।न विवेक को।और न मुझे।क्योंकि जीवन में कुछ दुख ऐसे होते हैं,जिनका कोई अपराधी नहीं होता।वे केवल समय की गलती होते हैं।
तारा अब पत्र के अंतिम भाग तक पहुँच चुकी थी।और अगर कभी तुम प्रेम करो...तो साहसी होना।मुझसे अधिक साहसी।
अपने नाना से अधिक साहसी।और शायद...अनिरुद्ध से भी।
नीचे हस्ताक्षर थे।....... यामिनीऔर उसके नीचे एक आख़िरी पंक्ति।"प्यार हमेशा मिलना नहीं होता।कभी-कभी प्यार वह सम्मान होता है,जो हम किसी की स्मृति को देते हैं।"तारा ने पत्र बंद कर दिया।
सफेद शॉल अपनी गोद में रख ली।और आज उसे लगा,उसने अपनी नानी को जान लिया है।न उस रूप में जिस रूप में परिवार उन्हें जानता था।बल्कि उस स्त्री के रूप में...जो कभी प्रेम में थी।जो कभी टूटी थी।और जिसने फिर भी पूरी गरिमा के साथ जीवन जिया।
लेकिन कहानी अभी समाप्त नहीं हुई थी।क्योंकि तारा के मन में अब एक नया प्रश्न था।अनिरुद्ध का क्या हुआ?क्या वह जीवित था?क्या उसने विवाह किया?क्या उसने कभी यामिनी को फिर देखा?
और इस प्रश्न का उत्तर...अभी पत्रों में नहीं मिला था।
यामिनी का पत्र पढ़ने के बाद तारा पूरी रात सो नहीं सकी।सुबह की पहली रोशनी खिड़की से भीतर आई तो उसे एहसास हुआ कि वह अब भी फर्श पर बैठी है।सामने पत्र बिखरे पड़े थे।गोद में सफेद शॉल थी।और मन में एक ही नाम,अनिरुद्ध।उसे नहीं पता था कि वह जीवित है या नहीं?कहाँ है?कैसा है?लेकिन उसे यह पता था कि अब वह उसे खोजे बिना नहीं रह पाएगी।
शायद इसलिए नहीं कि वह जिज्ञासु थी।बल्कि इसलिए कि उसने यामिनी की आँखों के पीछे छिपे उस मौन को पढ़ लिया था।और अब वह उस मौन का दूसरा सिरा देखना चाहती थी।
अगले कुछ दिनों तक तारा पुराने कागज़ खंगालती रही,विश्वविद्यालय के अभिलेख...पुराने पत्र......पुरानी डायरियाँ।फिर एक दिन उसे एक संकेत मिला।अनिरुद्ध के एक पत्र पर एक पता लिखा था।शांतिनिकेतन,और नीचे.....इतिहास विभाग।
तारा का दिल ज़ोर से धड़क उठा।क्या वह वहीं होगा?क्या इतने वर्षों बाद भी?या यह केवल अतीत की कोई धूलभरी निशानी थी?
दो सप्ताह बाद तारा शांतिनिकेतन पहुँची।फरवरी की हल्की धूप थी।लाल मिट्टी के रास्ते,शाल के पेड़,धीमी हवा।पूरा शहर जैसे किसी कविता से बना हो।
तारा को अचानक लगा,अगर अनिरुद्ध कहीं रह सकता है...
तो शायद ऐसी ही किसी जगह।उसने विश्वविद्यालय में पूछताछ की।पुराने रिकॉर्ड देखे गए।फिर एक बुज़ुर्ग कर्मचारी ने कहा,
"अनिरुद्ध सेन?""इतिहास वाले?"
तारा की साँस रुक गई।"जी।"बूढ़े आदमी ने मुस्कुराकर कहा"प्रोफेसर सेन को कौन नहीं जानता था?"
था.....?वाक्य भूतकाल में था।तारा का दिल बैठ गया।
लेकिन अगले ही क्षण वह बोला"अब पढ़ाते नहीं हैं।रिटायर हो चुके हैं।यहीं पास में रहते हैं।"तारा को लगा जैसे उसके भीतर जमी हुई हवा अचानक चलने लगी हो।वह जीवित था,जीवित।पचपन वर्षों बाद भी वह मिल पाएगी।
उस शाम तारा उस छोटे-से घर के सामने खड़ी थी।सफेद दीवारें,हरा दरवाज़ा,बरामदे में रखी दो कुर्सियाँ।और एक कोने में खिले हुए रजनीगंधा के फूल।
सब कुछ अजीब तरह से शांत था।तारा ने घंटी बजाई।कुछ क्षण बाद दरवाज़ा खुला।सामने एक बूढ़ा आदमी खड़ा था।सफेद बाल।झुकी हुई पीठ।आँखों पर मोटा चश्मा।लेकिन उसकी आँखें...वे आँखें अभी भी वैसी थीं।तस्वीर वाली,गहरी। और धैर्य से भरी।
तारा कुछ क्षण कुछ कह ही नहीं सकी,फिर धीरे से बोली"क्या आप अनिरुद्ध सेन हैं?"
बूढ़े आदमी ने मुस्कुराकर सिर हिलाया।"हाँ।"
तारा का गला सूख गया।उसे नहीं पता था कि आगे क्या कहना चाहिए।कैसे बताना चाहिए।कहाँ से शुरू करना चाहिए।फिर उसने धीरे से कहा,"मैं यामिनी की दोहिती हूँ।"
समय रुक सा गया,सचमुच।तारा ने पहली बार किसी चेहरे पर समय को रुकते देखा।अनिरुद्ध की आँखें स्थिर हो गईं।होंठ हल्के-से काँपे।और बरामदे में खड़ी हवा भी जैसे ठहर गई।
बहुत देर बाद उन्होंने पूछा,"यामिनी..."उनकी आवाज़ फुसफुसाहट से भी धीमी थी।"कैसी है?"
तारा की आँखें भर आईं।क्योंकि उस प्रश्न में पचपन वर्षों की प्रतीक्षा थी।पचपन वर्षों का प्रेम।और पचपन वर्षों का मौन।उसने धीरे से कहा,"छह महीने पहले उनका निधन हो गया।"
अनिरुद्ध कुछ नहीं बोले।बस दरवाज़े के सहारे खड़े रहे।फिर बहुत धीरे से...इतना धीरे कि जैसे स्वयं से कह रहे हों,"तो अब सचमुच चली गई।"तारा ने देखा,उनकी आँखों में आँसू नहीं थे।
लेकिन कुछ दुख इतने पुराने हो जाते हैं कि आँसू भी उन्हें छोड़ देते हैं।
बहुत देर बाद अनिरुद्ध ने दरवाज़ा पूरा खोला।और कहा"अंदर आओ।"तारा भीतर चली गई।उसे अभी नहीं पता था कि इस घर में एक और रहस्य उसका इंतज़ार कर रहा है।क्योंकि अनिरुद्ध ने भी कुछ संभालकर रखा था।
कुछ ऐसा...जो पचपन वर्षों से किसी अलमारी में बंद था।
और जिसे देखकर तारा समझेगी,कि प्रेम केवल यामिनी ने ही नहीं निभाया था।
घर के भीतर किताबों की गंध थी।पुराने कागज़ों की।और उस अकेलेपन की, जो वर्षों तक किसी एक व्यक्ति के साथ रहने पर घर की दीवारों में उतर जाता है।अनिरुद्ध ने तारा को बैठक में बैठाया।फिर चुपचाप दो कप चाय बनाने चले गए।
तारा कमरे को देखती रही।हर तरफ किताबें थीं।दीवारों तक।खिड़कियों के पास,मेज़ों पर।लेकिन एक चीज़ ने उसका ध्यान खींचा।कमरे के कोने में एक पुरानी लकड़ी की अलमारी थी।उसके ऊपर एक फ्रेम रखा था।उसमें कोई तस्वीर नहीं थी।
सिर्फ एक सूखा हुआ रजनी गंधा का फूल।तारा का दिल अजीब तरह से धड़क उठा।
उसे याद आया,यामिनी के पत्रों में भी रजनीगंधा का ज़िक्र था।तभी अनिरुद्ध चाय लेकर लौटे।उन्होंने देखा कि तारा उस फ्रेम को देख रही है।उनके होंठों पर एक हल्की मुस्कान आई।"वह उसका है।"
तारा ने धीरे से पूछा,"नानी का?"
अनिरुद्ध ने सिर हिलाया।कुछ क्षण तक दोनों चुप रहे।फिर तारा ने वह प्रश्न पूछ लिया जो उसके भीतर सुबह से घूम रहा था।"क्या आपने विवाह नहीं किया?"
अनिरुद्ध मुस्कुराए।वह मुस्कान दुखी नहीं थी।बस बहुत पुरानी थी।"नहीं।"
"क्यों?"
उन्होंने खिड़की से बाहर देखा।जहाँ धूप पेड़ों के बीच से छन रही थी।बहुत देर बाद बोले"क्योंकि मैं किसी और से अन्याय नहीं करना चाहता था।"
तारा ने कुछ नहीं कहा।वह समझ रही थी।और शायद नहीं भी।
अनिरुद्ध धीरे-धीरे बोलते रहे"प्रेम समाप्त हो जाता तो विवाह कर लेता।""लेकिन प्रेम समाप्त नहीं हुआ।""बस जीवन उससे आगे निकल गया।"
कमरे में एक लंबा मौन उतर आया।फिर अचानक अनिरुद्ध उठे।
अलमारी तक गए।और भीतर से एक पुराना डिब्बा निकालकर लाए।
डिब्बा बहुत साधारण था।लेकिन उसे उठाते समय उनके हाथ वैसे थे...जैसे कोई पवित्र चीज़ उठा रहा हो।उन्होंने उसे मेज़ पर रखा।धीरे-धीरे खोला।तारा की साँस रुक गई।अंदर दर्जनों चीज़ें थीं।पुरानी टिकटें,सूखे फूल,लाइब्रेरी के कार्ड।कागज़ के छोटे-छोटे टुकड़े।और एक नीला रिबन।अनिरुद्ध ने रिबन उठाया।बहुत सावधानी से।फिर मुस्कुराए।"यह उसके बालों का रिबन है।"
तारा की आँखें भर आईं।"पचपन साल?"
अनिरुद्ध ने सिर हिलाया।"हाँ।"फिर जैसे खुद से बोले,
"कुछ चीज़ें समय से पुरानी हो जाती हैं।"
तारा कुछ कह नहीं पाई।वह बस उस बूढ़े आदमी को देखती रही।जिसने पूरी उम्र किसी अनुपस्थित व्यक्ति की स्मृति के साथ बिताई थी।फिर उसकी नज़र डिब्बे में रखी एक छोटी डायरी पर गई।
डायरी पर लिखा था"यामिनी के बाद"तारा ने चौंककर अनिरुद्ध की ओर देखा।उन्होंने धीरे से कहा"मैंने उसके जाने के बाद लिखना शुरू किया था।"
"सोचा था कि एक दिन उसे पढ़ाऊँगा।"एक क्षण रुका।फिर मुस्कुरा दिए।"लेकिन कुछ किताबें अपने पाठक से पहले बूढ़ी हो जाती हैं।"तारा की आँखें छलक पड़ीं।
अनिरुद्ध ने डायरी उसकी ओर बढ़ा दी।"रख लो।"
"नहीं..."वह उनकी यह एकमात्र निशानी भी कैसे छीन ले?
"रख लो।"उनकी आवाज़ बहुत कोमल थी।"अब यह मेरी नहीं,तुम्हारी पीढ़ी की विरासत है।"तारा ने डायरी हाथ में ले ली।
और तभी उसके भीतर एक प्रश्न उठा।वह प्रश्न जो शायद वर्षों से अनिरुद्ध के भीतर भी रहा होगा।उसने धीरे से पूछा"अगर आपको एक बार फिर उनसे मिलने का अवसर मिलता...तो आप क्या कहते?"
अनिरुद्ध बहुत देर तक चुप रहे।इतनी देर कि तारा को लगा शायद उन्होंने सुना नहीं।फिर उन्होंने खिड़की के बाहर देखा।
जहाँ हवा में एक पत्ता धीरे-धीरे गिर रहा था।और बोले,"कुछ नहीं।"
तारा चौंकी।अनिरुद्ध मुस्कुराए।"पचपन साल बाद शब्द बहुत छोटे पड़ जाते हैं।"फिर उनकी आँखें कहीं दूर चली गईं।
"मैं बस उसके पास बैठता।""और यह जानकर खुश होता कि वह अब भी इस दुनिया में है।"
तारा अब रो रही थी।
क्योंकि उसने पहली बार समझा,प्रेम हमेशा पाने की इच्छा नहीं होता।कभी-कभी प्रेम केवल किसी के अस्तित्व के लिए कृतज्ञ होना भी होता है।शाम ढलने लगी थी।और उस घर में...जहाँ एक बूढ़ा आदमी और उसकी स्मृतियाँ साथ रहते थे...तारा को लगा,कि कुछ प्रेम कहानियाँ अधूरी नहीं होतीं।
वे बस किसी और रूप में पूरी होती हैं।लेकिन उसे अभी नहीं पता था...कि अनिरुद्ध के पास यामिनी के लिए लिखा हुआ एक आख़िरी पत्र भी था।एक ऐसा पत्र...जो कभी भेजा नहीं गया।
और वही पत्र इस कहानी का सबसे गहरा घाव बनने वाला था।
उस रात तारा अतिथि-कक्ष में सो नहीं सकी।मेज़ पर रखी थी,
वही डायरी।"यामिनी के बाद"और उसके भीतर रखा था एक बंद लिफाफ़ा।पीला पड़ चुका।किनारों से घिसा हुआ।ऊपर अनिरुद्ध की लिखावट थी,"भेजना नहीं है।"
तारा देर तक उसे देखती रही।फिर धीरे से लिफाफ़ा खोला।
भीतर कई पन्ने थे।
पहली पंक्ति पढ़ते ही उसका गला भर आया।प्रिय यामिनी,
यह पहला पत्र है जो मैं तुम्हें लिख रहा हूँ,जबकि मुझे मालूम है कि तुम इसे कभी नहीं पढ़ोगी।तारा की उँगलियाँ काँप गईं।पत्र आगे बढ़ा,एक दिन या मैं नहीं या तुम नहीं...... होगा ही,
ऐसे लगेगा,जैसे दुनिया में एक दिशा कम हो गई हो।बाहर कहीं कोई पक्षी बोला।कमरे में एक गहरा सन्नाटा उतर आया।मुझे हमेशा लगता था कि तुम कहीं न कहीं हो।किसी शहर में,किसी घर में।किसी खिड़की के पास बैठी हुई।
कोई किताब पढ़ रही हो।किसी पौधे को पानी दे रही हो।और यह जानना ही पर्याप्त था।तारा की आँखें भर आईं।मैंने तुमसे मिलने की कभी कोशिश नहीं की।क्योंकि मैंने तुम्हारे निर्णय का सम्मान किया।लेकिन सच कहूँ?हर जन्मदिन पर मैं सोचता था,तुम कैसी दिखती होगी अब?क्या तुम्हारे बालों में भी सफेदी उतर आई होगी?क्या तुम अब भी कविता पढ़ते समय शब्दों को होंठों से दोहराती होगी? अब मेरी किताबों में सफ़ेद बाल मिलेंगे,
क्या तुम अब भी बारिश शुरू होते ही खिड़की खोल देती होगी?
तारा मुस्कुरा दी।
क्योंकि यामिनी सचमुच ऐसा ही करती थीं। हां उन्हें घुटन होती थी। वो घर बंद कम ही रखती थी।पत्र आगे बढ़ा,यामिनी,
लोग कहते हैं कि समय सब ठीक कर देता है।यह सच नहीं है।
समय कुछ भी ठीक नहीं करता।वह केवल हमें हमारे दुख के साथ जीना सिखा देता है।तुम मेरे जीवन से गई नहीं थीं।तुम बस मेरे दिनों से निकलकर मेरी आदतों में चली गई थीं।अब तारा की आँखों से आँसू लगातार बह रहे थे।जब मैं कोई अच्छी कविता पढ़ता था,मुझे तुम्हारी याद आती थी।
जब बसंत खिलता था,मुझे तुम्हारी याद आती थी।जब किसी लड़की को किताबों के बीच खोया देखता था,मुझे तुम्हारी याद आती थी।और जब याद नहीं आती थी...तब भी कहीं न कहीं तुम मौजूद रहती थीं।पत्र के बीच में एक जगह स्याही फैली हुई थी।मानो लिखते समय हाथ काँप गया हो।या शायद...आँसू की एक बूँद गिर गई हो।फिर अंतिम पन्ना आया।और वहाँ शब्द बदल गए।वे अब प्रेम-पत्र जैसे नहीं लग रहे थे।वे किसी जीवन के लेखे-जोखे जैसे थे।मैंने कभी विवाह नहीं किया।लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि मैंने जीवन नहीं जिया।
मैंने विद्यार्थियों को पढ़ाया।पेड़ लगाए,यात्राएँ कीं,किताबें लिखीं।
और इन सबके बीच...तुम्हें भी प्रेम करता रहा।दोनों काम साथ-साथ संभव थे......तारा कुछ क्षणों तक उस पंक्ति को देखती रही।फिर उसने आगे पढ़ा।इसलिए मुझे अपने लिए दुख नहीं है।दुख केवल एक बात का है।कि हम दोनों ने अपने जीवन का इतना बड़ा हिस्सा,दूसरों के लिए त्याग दिया,और कभी यह नहीं जान पाए कि अगर एक बार स्वार्थी हो जाते तो क्या होता?
लंबा मौन, और फिर आख़िरी शब्द।
लेकिन अब यह प्रश्न भी अर्थहीन है।क्योंकि जहाँ तुम हो,वहाँ शायद पछतावे नहीं पहुँचते होंगे।और फिर...अगर मृत्यु के बाद कुछ है,और अगर स्मृति वहाँ भी जाती है,तो मैं तुम्हें पहचान लूँगा।क्योंकि मनुष्य चेहरों से नहीं,अपने दुखों से पहचाना जाता है।और मेरा सबसे सुंदर दुख...तुम थीं।नीचे हस्ताक्षर थे.....अनिरुद्ध
और उसके नीचे अंतिम पंक्ति,"इस बार विदा नहीं कहूँगा।
क्योंकि पहली विदाई आज तक समाप्त नहीं हुई।"
तारा बहुत देर तक वहीं बैठी रही।पत्र उसकी गोद में था।
खिड़की के बाहर रात का अंतिम पहर उतर रहा था।और उसे लगा।यह प्रेम कहानी यामिनी और अनिरुद्ध की नहीं थी।
यह उन सभी लोगों की कहानी थी...जो एक-दूसरे से प्रेम करते हैं,लेकिन एक-दूसरे के जीवन नहीं बन पाते।
सुबह होने से पहले तारा ने पत्र वापस लिफाफ़े में रखा।और तभी उसकी नज़र डायरी के आख़िरी पन्ने पर गई।वहाँ केवल एक वाक्य लिखा था"यदि कभी कोई यह पढ़े,तो उसे कहना,प्रेम में साहसी होना।"तारा ने आँखें बंद कर लीं।
क्योंकि यही वाक्य उसे यामिनी भी कह गई थीं।और अचानक उसे लगा,जैसे दो अलग-अलग जीवनों ने,दो अलग-अलग दिशाओं से,उसे एक ही विरासत सौंपी है......साहस।
तीन वर्ष बाद।फरवरी की एक उजली सुबह।आँगन में गेंदे के फूल सजे थे।दीवारों पर आम के पत्तों की लड़ियाँ झूल रही थीं।
घर में मेहमानों की आवाजाही थी।आज तारा का विवाह था।
नंदिता इधर-उधर भाग रही थीं।रिश्तेदार हँस रहे थे।फोटोग्राफर निर्देश दे रहे थे।लेकिन इस सारी चहल-पहल के बीच तारा अपने कमरे में अकेली बैठी थी।उसके सामने बिस्तर पर एक सफेद शॉल रखी थी।वही शॉल,यामिनी की.....विवेक की दी हुई।
और पचपन वर्षों के प्रेम, त्याग और मौन की साक्षी।तारा ने उसे धीरे से उठाया।उसमें अब भी कपूर और पुराने काग़ज़ों की हल्की-सी गंध थी।और अचानक उसे लगा...जैसे यामिनी यहीं कहीं हों।खिड़की के पास,मुस्कुराती हुई।जैसे हमेशा बैठती थीं।
तारा ने शॉल अपने कंधों पर ओढ़ ली।आईने में देखा।और पहली बार उसे महसूस हुआ कि स्मृतियाँ कभी मरती नहीं।
वे पीढ़ियाँ बदलती हैं।
बस.....तभी दरवाज़ा खुला।नंदिता भीतर आईं।अपनी बेटी को देखकर कुछ क्षण ठिठकी रहीं।फिर उनकी आँखें भर आईं।"तुम बिल्कुल माँ जैसी लग रही हो।"
तारा मुस्कुरा दी।और उस क्षण दोनों ने कुछ नहीं कहा।
क्योंकि कुछ रिश्तों में मौन ही सबसे सच्ची भाषा होता है।
मां,मेरा नाम तारा क्यों रखा नानी ने?
नंदिता ने उसे देखा ,और मुस्कुराई ,मेरा नाम मां तारा रखना चाहती थी,लेकिन पापा को नंदिता पसंद था।फिर जब तुम हुई तो मां ने तुम्हारा नाम तारा रखा। कहती थी,यामिनी में तारों का होना जरूरी है......काली अंधेरी रातों में अमावस को जब चांद भी नहीं होता, तब भी आसमान में तारे टिमटिमा रहे होते हैं। वे उजाला होते हैं, आशा की निशानी और बस इसीलिए उन्हें तारा नाम भाया। और उन्होंने रख दिया। तुम लाडली थी ना उनकी।
तारा........ यामिनी के जीवन में उजियारा......उसकी विरासत की धारक।
विवाह संपन्न हुआ।संध्या उतरने लगी।मेहमान धीरे-धीरे लौटने लगे।और रात को...जब सारी रस्में समाप्त हो गईं...तारा अकेली बरामदे में आकर बैठ गई।आकाश साफ था।कुछ तारे चमक रहे थे।हवा में हल्की ठंडक थी।उसने अपने पास रखे छोटे डिब्बे को खोला।उसमें तीन चीज़ें थीं।यामिनी का अंतिम पत्र।अनिरुद्ध का अधूरा पत्र।और वह पुराना नीला रिबन।तारा ने उन्हें बहुत देर तक देखा।
फिर मन ही मन बोली,"आप तीनों को धन्यवाद।"यामिनी को,जिसने प्रेम किया।विवेक को,जिसने प्रेम का सम्मान किया।
और अनिरुद्ध को,जिसने प्रेम को स्मृति बनने दिया।
उसकी आँखें नम थीं।लेकिन आज उन आँसुओं में दुख कम था।
कृतज्ञता अधिक।क्योंकि अब वह समझ चुकी थी,प्रेम का सबसे ऊँचा रूप अधिकार नहीं होता।स्मरण होता है।और जीवन का सबसे बड़ा साहस यह नहीं कि हम प्रेम करें।बल्कि यह कि प्रेम के बाद भी जीवन जी सकें।
उस रात...तारा ने भी एक नया पत्र लिखा।किसी व्यक्ति को नहीं,भविष्य को।और उस पत्र की अंतिम पंक्तियाँ थीं,"मेरी नानी ने मुझे सिखाया कि प्रेम खोकर भी जिया जा सकता है,अनिरुद्ध ने सिखाया कि स्मृति भी एक घर होती है।और विवेक ने सिखाया कि प्रेम हमेशा पाने का नाम नहीं है।कभी-कभी किसी के अतीत के लिए जगह बना देना भी प्रेम होता है।"
उसने पत्र मोड़ा।और उसी पुराने संदूक में रख दिया।सफेद शॉल के नीचे।जहाँ कभी यामिनी ने अपने जीवन का सबसे बड़ा रहस्य छिपाया था।बरामदे में हवा चली।कहीं दूर रातरानी की खुशबू तैर गई।और तारा को लगा,जैसे तीन अधूरी ज़िंदगियाँ अंततः शांति में बदल गई हों।क्योंकि कुछ कहानियाँ मिलन से पूरी नहीं होतीं।वे समझे जाने से पूरी होती हैं।और शायद प्रेम की अंतिम परिभाषा यही है,किसी को अपने पास रखना नहीं,
बल्कि उसके लिए अपने भीतर एक जगह बचाए रखना।
"तुम्हारे हिस्से का मौन मेरे हिस्से में आया"एक प्रेम था जो मेरे मन में छाया। यह केवल यामिनी और अनिरुद्ध की कहानी नहीं थी।
यह उन सभी प्रेमों की कहानी थी ,जो जीवन में नहीं मिलते...
लेकिन स्मृति में कभी बिछड़ते भी नहीं। 🌿
समाप्त।