down to arth in Hindi Poems by Vandna Sharma books and stories PDF | चारपाई की व्यथा

Featured Books
Categories
Share

चारपाई की व्यथा

नया काव्य संग्रह -चरपाई की व्यथा *- डॉ वंदना शर्मा*कविता लिखना मेरे लिए शब्दों का खेल नहीं, एक जिम्मेदारी है। आज जब मैं चारों ओर देखती हूँ तो पाती हूँ कि हम बहुत तेजी से भाग रहे हैं। इतनी तेजी से कि अपनी परछाई, अपनी मिट्टी, अपनी 'चारपाई' तक को पीछे छोड़ आए हैं। मोबाइल की स्क्रीन पर उगते बच्चों को देखकर मन काँप जाता है। रिश्ते रील बन गए हैं और संस्कार रूल्स लगने लगे हैं। इसी दर्द से जन्मा है मेरा यह काव्य संग्रह। *यह संग्रह उन सब चीजों की 'व्यथा-कथा' है जिन्हें हमने आधुनिकता की अंधी दौड़ में खो दिया है।* इसमें चारपाई का एकांत है जो पूछती है कि 'क्यों नहीं देती मैं आज दिखाई?' इसमें 'अगर बचाना है तो...' का वह शंखनाद है जो सोते हुए समाज को जगाना चाहता है - कि देश, युवा, संस्कृति, गाँव, पर्यावरण बचाने हैं तो हमें लौटना होगा अपनी जड़ों की ओर।मैं कोई उपदेशक नहीं हूँ। मैं सिर्फ एक माँ हूँ, एक बेटी हूँ, एक शिष्या हूँ जो देख रही है कि फास्ट-फूड ने सेहत छीनी है, सोशल मीडिया ने बचपन छीना है, और शहरीकरण ने गाँव का सुकून छीन लिया है। मेरी कलम उसी छीने हुए सुकून को वापस लाने का एक छोटा सा प्रयास है।*इस संग्रह की कविताएँ प्रश्न पूछती हैं और समाधान भी देती हैं।* ये बताती हैं कि डिप्रेशन से बचना है तो खुश रहो और सबको हँसाओ। अकेलेपन से बचना है तो प्रकृति को दोस्त बनाओ। मोटापा भगाना है तो योग सीखो और सिखाओ। भारत की आत्मा उसके मूल्यों में बसती है - गुरु का सम्मान, माँ का स्नेह, प्रकृति की पूजा, अतिथि का सत्कार। यदि मेरी ये कविताएँ किसी एक बच्चे को मोबाइल छोड़कर दादी की गोद में बैठा दें, किसी युवा को रील बनाने से रोककर पेड़ लगाने भेज दें, किसी भटके मन को गुरु के चरणों तक ले आएँ, तो मैं समझूँगी कि मेरा लिखना सफल हुआ।अंत में, यह संग्रह मेरे उन सभी गुरुओं, माता-पिता और इस मिट्टी को समर्पित है जिन्होंने मुझे 'तराशा, निखारा, सँवारा'।*क्योंकि कविता का काम सिर्फ आह वाह करना नहीं, सोई हुई आत्मा को जगाना भी है।*आपकी,  *डॉ वंदना शर्मा*  दिल्ली  =.=.================1. अंतिम सत्य -जन्म के समय ही लिख जाती नियति कितनी है साँसे और कब है गति  जिंदगी भर इंसान दौड़ता माया के पीछे  और अंत में खाली हाथ ही जाता है  मोह माया, धन दौलत सब यहीं रह जाती  बस कर्म ही है साथ जाता है  जानते हैं सब यह अंतिम सत्य  फिर क्यूँ ईर्ष्या, द्वेष, हिंसा जैसे कृत्य  मंजिल कभी सुन्दर नहीं होती, क्यूँ  क्योंकि ये तो ठहराव है, भ्रम है  रास्ते ही सुन्दर होते हैं क्यूँ  क्योंकि उनमें संघर्ष की गाथा है  फिर क्यों इतराता है इंसान  ये शरीर भी तो एक दिन राख हो जाना है  बने किसी का सहारा वो जिंदगी है  कोई मुस्काये तुम्हारी वजह से वो जिंदगी है  मौत है अंतिम मंजिल  वहाँ तक पहुँचने का सफर जिंदगी है।  *वन्दना शर्मा*  *12/6/26*======================-ये गरीबी भी कितनी बुरी है*ये गरीबी भी कितनी बुरी है  कोई अन्न बेकार करता थाली में  तो गरीब भूख मिटाने को खड़ा लाइन में  ये बारिश सबके लिए एक सी नहीं होती  अमीरों के लिए अच्छा मौसम  चाय-पकौड़ा साथ लाती  कहीं गरीब देखकर अपनी टपकती छत  सर पकड़ बैठा सोच रहा  कब रुकेगी ये बारिश  बारिश में लाइन में लगे  एक छोटे बच्चे को देख  जी भर आया, आँखें नम  ठंड से काँप रहा, कब से लाइन में खड़ा था  बेबसी झलक रही आँखों से  हाथ में खाली प्लेट लिए  भंडारे की लाइन में छोटी सी आस लिए  कब से भूखा होगा, चेहरा बता रहा था  ठंड से काँप रहा था कब से लाइन में खड़ा था  भूख भी कितना तोड़ देती है बचपन  मासूम आँखें लड़ रही हों जैसे  कुछ मिले जल्दी से तो भूख मिटे  इस लाइन में खड़े-खड़े तो आस मिटे  उफ! ये बारिश और उम्मीद  से भरी उसकी आँखें  डॉ वन्दना शर्मा*  *12/6/26*=========*सीटी बजा रही है, गाड़ी बुला रही है*  *- डॉ वंदना शर्मा*सीटी बजा रही है, गाड़ी बुला रही है  दौड़ो जल्दी-जल्दी, छूट न जाए  ये गाड़ी न करेगी किसी का इंतजार  प्लेटफार्म पर है लाखों की भीड़  सबको अपनी बारी का इंतजार  चलना ही जिंदगी है चलती ही जा रही है  गाड़ी बुला रही है सीटी बजा रही है  कितनी ही दुनिया देखो भागी ही जा रही है  जिंदगी की गाड़ी में सभी हैं यात्री  आ रहे हैं कुछ तो कुछ जा रहे हैं  सबकी आंखों में हैं सपने  अपनों से मिलने की आस बढ़ती ही जा रही है  जाने कहाँ से, कैसे, क्यों ये भीड़  दुनिया में बढ़ती जा रही है  जनरल डिब्बे की भीड़, देख भीड़ की परेशानी  एहसास हुआ पैसा कमाना है जरूरी  जानवरों की भीड़ में मानवता याद आ रही है  कितनी बेबस है ये भीड़, सहती ही जा रही है  देखो अमीरी-गरीबी की खाई बढ़ती ही जा रही है  ना जाने कितनी कहानियां कहाँ जा रही हैं  चलना ही जिंदगी है चलती ही जा रही है  सीटी बजा रही है, गाड़ी बुला रही है।---*---*अगर बचाना है तो...*  *- डॉ वंदना शर्मा*देश अगर बचाना है तो  बच्चों से मोबाइल दूर भगाओ  युवा अगर बचाना है तो  सोशल मीडिया पर बैन लगाओ  संस्कृति अगर बचानी है तो  बच्चों को संस्कार सिखाओ  धर्म अगर बचाना है तो  बच्चों को धर्म पढ़ाओ  पर्यावरण बचाना है तो  रोज नए पेड़ लगाओ  मोटापा भगाना है तो  रोज योग सीखो और सबको सिखाओ  गाँव अगर बचाने हैं तो  शहरीकरण को दूर भगाओ  अकेलेपन से बचना है तो  प्रकृति को अपना दोस्त बनाओ  बीमारी से बचना है तो  फास्ट-फूड को घर से भगाओ  डिप्रेशन से बचना है तो  खुश रहो और सबको हँसाओ---*---*चारपाई की व्यथा*  *- डॉ वंदना शर्मा*आज एक विचित्र सपना देखा  पूछो तो क्या देखा  आई मेरे सपने में 'चारपाई'  बोली क्यूँ नहीं देती मैं आज दिखाई  पहले हर घर में होती थी  मेरी भी बहुत शान होती थी  शहरीकरण की नजर लग गई  आधुनिकता ने मेरी जान खाई  अब तो गाँव में भी ना दे दिखाई  मेरी जगह डबल बेड ने पाई  तुम्हीं बताओ, क्या मेरी याद न आई  कितनी ही जुड़ी मुझसे बचपन की यादें  मैं भी थी चौपालों की परछाई  पंजाबी ढाबों की शान है आज भी  बड़ी खूबसूरत होती है चारपाई  विदेशों में भी अपनी जगह बनाई  डॉक्टर ने भी उपयोगी बताई  फिर क्यूँ उपेक्षित है चारपाई  सुनकर उसकी व्यथा ये  मेरी भी आँखें भर आई  याद मुझे भी बचपन की आई  घर में आयेगी अब चारपाई---डॉ वंदना शर्मा पांडव नगर new delhi *