*'किरन' - ये सिर्फ एक शिष्या की कहानी नहीं है, ये हर उस गुरु की जीत है जो बच्चों में 'इंसान' बनाता है।यह कहानी मेरी शिष्या की है। उससे मेरा परिचय एम.ए. की कक्षा के दौरान हुआ। पहली बार जब वो प्रवेश लेने आई थी, साधारण सी लगी। उसने गणित से स्नातक किया और हिन्दी से परास्नातक करना चाहती थी। आश्चर्य के साथ मैंने उससे पूछा कि तुम जब गणित की छात्रा हो तो हिन्दी में क्यों आना चाहती हो? वो बड़े भोलेपन से बोली - "मैम जब हम इंटर में थे तो इंजीनियर बनना चाहते थे। परीक्षा भी दी प्रवेश के लिए लेकिन अनुत्तीर्ण हो गए। तो इंजीनियर बन नहीं पाए। फिर सोचा स्नातक (बी.एससी) कर लेती हूँ, सिविल सर्विस में चली जाऊँगी। पापा जी मुझे अध्यापिका बनाना चाहते हैं, वो चाहते हैं मैं बी.एड करूँ। क्या करूँ, क्या करूँ, इसी उधेड़-बुन में एक साल ऐसे ही निकल गया। अनेक फॉर्म भरे नौकरी के, लेकिन किसी में बात नहीं बनी। पर इन असफलताओं ने और जमाने के तानों ने मुझे कविता लिखना सिखा दिया। अब मुझे लगता है मेरे लिए एम.ए. ही ठीक है क्योंकि एम.एस.सी. के बाद तो मैं बेरोजगार ही बनूँगी। लेकिन साहित्य पढ़कर इंसान तो बन ही जाऊँगी।"मुझे उसकी बातें, उसके बात करने का तरीका अच्छा लग रहा था। वो बोलती जा रही थी, मैं सुनती जा रही थी। जब वो चुप हुई तो मैंने मुस्कराकर कहा ठीक है बेटा फार्म ऑफिस में जमा कर दो और अगले हफ्ते से क्लास शुरू होगी। ठीक नौ बजे कमरा नं. 25 में मिलना। वहीं मुलाकात होगी अब तुमसे।किरन थोड़ी चुलबुली, थोड़ी बातूनी, मेहनती और सीखने को हमेशा तत्पर रहती। उसकी कविता करने की आदत थी। किसी भी चीज पर कविता बना देती। फूल, कांटा, कुर्सी, पत्थर, चारपाई, कलम, किताब। उसकी अवलोकन क्षमता गजब की थी। बड़े गौर से देखती वस्तुओं को और उनपर कविता बना देती। उस समय एम.ए. पूर्वार्द्ध में केवल सोलह छात्राएँ थीं। लेकिन क्लास में केवल एक ही छात्रा किरन दिखाई देती। नियमित रूप से ठीक नौ बजे क्लास में कुछ पढ़ती हुई मिलती। बच्चों की तरह चहकती रहती। पढ़ने का इतना शौक था कि लाइब्रेरी की अधिकतम किताबें उसके नाम पर ही बुक थीं। उसे पढ़ने का इतना शौक था जब तक उसकी किताब पूरी नहीं होती। खाना-पीना सब भूल जाती। एक ही दिन में पूरी किताब पढ़ लेती। लाइब्रेरी की मैम ने उत्सुकतावश उससे पूछा कि पढ़ा भी है या नहीं। किरन सब सुनाती, पृष्ठ नंबर भी बता देती।काव्य की एक प्रवक्ता तो उसकी पढ़ने की आदत से बहुत परेशान थी। किरन बहुत प्रश्न पूछती क्लास में। उसे हर चीज विस्तार से सीखना अच्छा लगता। घर से पढ़कर आती और जो समझ में नहीं आता वो क्लास में पूछती। पाठ्यक्रम से इतर भी उसको काव्य-शास्त्र का पूरा ज्ञान सीखना होता। काव्य प्रवक्ता भी हँसकर कहतीं कि किरन को पढ़ाने के लिए तो मुझे भी पढ़कर आना पड़ता है, पता नहीं कब क्या पूछ ले!सभी प्रतियोगिताओं में प्रथम आती, सबकी सहायता करती। विद्यालय की सभी अध्यापिकाओं को कम्प्यूटर भी उसने सिखाया।एम.ए. परीक्षा में विश्वविद्यालय में प्रथम स्थान प्राप्त किया। प्राचार्या महोदया ने भी खुश होकर प्रार्थना सभा में उसे सम्मानित किया। और अपने ही विद्यालय में प्रवक्ता पद पर पढ़ाने के लिए नियुक्त कर दिया। आज किरन मेरे साथ प्रवक्ता सीट पर बैठी है और मुझे बहुत गर्व हो रहा है अपनी शिष्या पर।किरन ने भी मुझे कभी निराश नहीं किया। जो भी जिम्मेदारी उसे दी गई उसे बखूबी निभाया।किरन को याद कर आज भी गर्व की अनुभूति होती है। वर्तमान समय में गुरु-शिष्य के संबंध खत्म ही हो गए हैं। जो प्यार और सेवाभाव हमारे समय के विद्यार्थियों में होता था वो आज विलुप्त होकर इतिहास बन चुका है। ना अब वो गुरु रहे, ना वो अब शिष्य रहे, ना वो अब अनुशासन रहा। आज तो विद्यार्थी क्लास में ही अध्यापक का सम्मान नहीं करते। क्लास के बाहर तो उनसे सम्मान की अपेक्षा करना ही व्यर्थ है। आज के बच्चे तो अपने अध्यापक के ऊपर हास्य सुनाते हैं।शिक्षा का आज स्तर गिरता जा रहा है। सभी पाठकगण सुझाव दें कि आज शिक्षा व्यवस्था में क्या बदलाव होना चाहिए।---डॉ वंदना शर्मा पांडव नगर new delhi