Tom is alive - 19 in Hindi Thriller by Neeraj Sharma books and stories PDF | टाम ज़िंदा हैं - 19

Featured Books
Categories
Share

टाम ज़िंदा हैं - 19

ये ज़िन्दगी कितनी मेहरबान होती है कभी कभी... तुम जिसको खोज रहे हो मिल सकता है।

"--------एसएसपी आज चुप थे। कुछ बोल न पाए। भवानी सिंह अलग से चुप था। " 

"------ बड़े घबराहट मे हो... आज जान गए साहब, नाग तो नाग ही होते है.... कभी सुधर नहीं सकते।" भवानी ने कहा। एम्बुलेंस समय पर न पहुँचती तो शायद आज बहुत कुछ खो देते, सर। " भवानी आज से देख रेख मै खुद लिख कर तुम्हे सभी कुछ सौंपता हु। " एसएसपी ने छोटे लहजे मे बड़ा कहा। "त्रिपाठी हमारे बीच नहीं रहे " भवानी ने जोर देकर कहा। "कया कसूर था सर उसका " कितना कुछ अधूरा ही छूट गया.... सोचता हु.. " भवानी सिंह की आँखो मे पानी था, उस पानी मे त्रिपाठी के सपने कही दूर निकल गए थे।


थाने की मुर्मूत हो रही थी.... जेल की उडी दीवार बन रही थी... थाने मे कबूतरों की गुटरगुह थी। अंदाजन नुकसान हद से जेयादा तो हुआ, पर मानसिकता से ललचार सब ही हो चुके थे। टूट चुके थे.. सबके सब। सेंटर से करवाई हुई पर कुछ हफ्ते मे कोई खास उत्तर नहीं था। भागे हुए चोर जो थे सब दबदबा के भाग चुके थे। जिनके नाम थे वो भी उस आग मे ही जल चुके थे। जिनकी हाज़री लगती थी, कोर्ट मे, उनकी लिस्ट तो मिल चुकी थी... पुलिस उस गश्त मे फिर जम गयी थी... कितनो को पकड़े किसी को नहीं। थाना नाम का ही था... कोई यही समझे गा। दुख होता है पुलिस जवान का रोब कम हो गया हो।

बदलीए हुई।-------

भावनी सिंह बम्बे सेटरल से सेटरल मे ही।

चौधरी केरल से बम्बे शिफ्ट।

मेहरा मोहन बम्बे से शिफ्ट।

चौहान राज बम्बे मे शिफ्ट।

मुंशी दया सागर बम्बे शिफ्ट।

चार बंदे तो बिलकुल नए आ रहे थे। मुंशी पहले भी रह चूका था। अच्छी तरा से भवानी को जनता था। भवानी ने एक बड़ी फोटो दिल से मेंनहेड रूम मे लगा दी थी। जिसको देख कर याद रहे जो बीता कल है हमेशा याद रहे। जो हुआ इतना बुरा कि इससे जयादा कया होगा।

यही की हवा मे आज भी दहशत थी। एसएसपी तो छूटी ले गया था। बहुत बड़ा मदारी था " भवानी के अर्थ  मे " सब उसका ही किया गया था। न कमबख्त खुलता न घोड़ा कोई घायल होता। कमबख्त ने थाने को कया का कया कर दिया था। अख़बार मे खुल कर छप्पा था.... वो कुछ जो आज तक किसी ने कलम पकड़ी हो, सारा गुस्सा आज ही निकाल गया, कमबख्त सपादक। एक भी बात झूठी भी नही थी। देश के गरदार विकते है, बोली ढंग से लगाओ... गरीब को किस्मत मे बाध दो। कुछ तो मतलब निकलता है, किसी  ने कहा नहीं, आपने ही किसी बन्दे ने कान मे जहर उगल गया होगा। "किसी के मुँह पे उसका तमाचा पड़ता है न, माँ कसम अगला पिछला सब याद आ जाता है।" कमबख्त बंदा बंदे को ही डस रहा है... कौन कया करे।

अदालत का नोट्स..... कैदी जो भागे है, उनको एक मंथ मे पकड़ो.. उस मे जलील खान "जिसकोफांसी की सजा थी... अब यहां देखो मार दो। " ये पीले पेन से गहरा किया था.... वाह कया मोड़ था।

पर अमरीश बाबू थे भी या किसे डिने से पता लाओ। शक के आधर पर।

कोट के नोटिस हुक्म थे अगली तारीख 22 सितबर थी।

(चलदा ) मिलते है अगले के सँग......